महू से रतलाम जा रही डीजल मल्टीपल यूनिट (डेमू) ट्रेन में सफर कर रहे एक व्यक्ति की मौत इसलिए हो गई थी कि ट्रेन ओवर लोड चल रही थी और अचानक से जर्क लगा तो व्यक्ति बाहर जा गिरा। गंभीर चोट लगने से मौके पर ही उसकी जान चली गई। व्यक्ति के पत्नी और बच्चों ने र
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ट्रिब्यूनल के ज्यूडिशियल सदस्य ने तो मुआवजा दिए जाने पर सहमति जताई, लेकिन टेक्निकल मेंबर ने इनकार कर दिया। दोनों सदस्यों में मतभेद होने पर दिल्ली स्थित ट्रिब्यूनल की प्रिंसिपल बेंच के समक्ष मामला भेजा गया। ट्रिब्यूनल की प्रिंसिपल बेंच ने भी मुआवजा दिए जाने की मांग को खारिज कर दिया। ट्रिब्यूनल के आदेश के खिलाफ हाई कोर्ट इंदौर में अपील दायर की गई थी। हाई कोर्ट ने दिवंगत व्यक्ति की पत्नी और बच्चों को कुल 8 लाख रुपए का मुआवजा दिए जाने के आदेश रेलवे को दिए हैं।
ये है पूरा मामला-
अधिवक्ता ऋषि तिवारी के मुताबिक 1 जून 2014 को अरुण पाल महू से रतलाम जाने के लिए ट्रेन में टिकट लेकर सवार हुए थे। ट्रेन क्षमता से अधिक भरी हुई थी। ट्रेन की गति रुकने के लिए कम होना शुरू हुई, इसी बीच जोरदार झटका लगा और अरुण गिर गए। उनके द्वारा खरीदा गया टिकट भी गुम हो गया। पत्नी बिंदु पाल ने क्लेम के लिए परिवाद दायर किया था। 31 अगस्त 2018 को ट्रिब्यूनल के सदस्यों ने मतभेद के चलते मामला दिल्ली भेज दिया। 14 जनवरी 2019 को ट्रिब्यूनल के तीसरे सदस्य दिनेश कुमार त्रिपाठी ने यह कहते हुए मामला खारिज कर दिया कि ट्रेन को दौड़कर पकड़ते वक्त हादसा हुआ होगा।
इसमें रेलवे की लापरवाही नहीं है। परिवाद खारिज किया जाता है। हाई कोर्ट ने सभी पक्षों को सुनने के बाद फैसले में कहा कि केवल टिकट के विषय पर पीड़ित परिवार का दावा खारिज नहीं किया जा सकता। रेलवे की जिम्मेदारी बनती है कि वह परिवादियों को मुआवजे का भुगतान करे। पत्नी बिंदु को 4 और दो संतानों के 2-2 लाख रुपए का मुआवजा दिए जाने के आदेश हाई कोर्ट ने दिए हैं। वहीं 7 फीसदी ब्याज भी चुकाना होगा।