बालाघाट के जगला गांव में बैगा आदिवासी बच्चों की मौत का मामला: राहुल गांधी के दौरे के बाद प्रशासन ने 44 नामों की संशोधित सूची जारी की, आंगनवाड़ी से भेजी गई रिपोर्ट रिकॉर्ड में दर्ज क्यों नहीं हुई?

मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले के जगला गांव में बैगा आदिवासी बच्चों की लगातार हो रही मौतों और सरकारी रिकॉर्ड में उनके नाम दर्ज न होने का गंभीर मामला सामने आया है। एक अक्टूबर को कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने इस गांव का दौरा किया और सरकारी सिस्टम की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए। उनका आरोप था कि गांव में कई बैगा आदिवासी बच्चों की बीमारियों से मौतें हुईं, लेकिन मृतकों के नाम सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज नहीं किए गए। राहुल गांधी से बातचीत के दौरान कुछ पीड़ित परिवारों ने बताया कि उनके बच्चे जिला अस्पताल में भर्ती रहे, इसके बावजूद उनके नाम प्रशासन की आधिकारिक सूची में शामिल नहीं थे।
इस मामले में दैनिक भास्कर ने विस्तृत पड़ताल की। पड़ताल में सामने आया कि आंगनवाड़ी कार्यकर्ताओं ने बच्चों की मौत की जानकारी समय रहते स्वास्थ्य विभाग को भेजी थी, लेकिन यह सूचना सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज नहीं हुई। राहुल गांधी के दौरे के बाद प्रशासन ने मृतकों की एक संशोधित सूची जारी की, जिसमें 44 नाम दर्ज हैं। इस पूरे मामले में बालाघाट के कलेक्टर कुमार सत्यम से जवाब मांगा गया, लेकिन उनकी ओर से कोई प्रतिक्रिया नहीं मिली।
आंगनवाड़ी स्तर पर रिपोर्ट भेजे जाने का दावा
जगला गांव की आंगनवाड़ी सहायिका मीना मरावी ने पड़ताल के दौरान चार बच्चों के नाम बताए। उन्होंने स्पष्ट किया कि इन बच्चों की मौत खसरा और निमोनिया जैसी बीमारियों से हुई थी। मीना मरावी के अनुसार, इसकी जानकारी स्वास्थ्य विभाग को समय पर भेज दी गई थी। वर्तमान में इस आंगनवाड़ी केंद्र में 76 बच्चे पंजीकृत हैं। आंगनवाड़ी सुपरवाइजर वंदना परते ने भी पुष्टि की कि उन्हें इन बच्चों की मौतों की पूरी जानकारी थी और यह सूचना उच्च अधिकारियों तक पहुंचाई गई थी। हालांकि, जब उनसे पूछा गया कि पीड़ित परिवारों को अब तक मुआवजा क्यों नहीं मिला, तो उन्होंने कहा कि इस सवाल का जवाब केवल अफसर ही दे सकते हैं।
नीलम की मौत: दस दिन अस्पताल में भर्ती रहने के बाद भी नहीं बची जान
भास्कर की टीम ने जगला गांव में उन परिवारों से बात की जिन्होंने अपने बच्चों को खोया है। ग्रामीण चमरू धुर्वे की दो साल की बेटी नीलम की हाल ही में मौत हो गई। नीलम की मां बमनीन बाई ने बताया कि उनकी बेटी के पूरे शरीर पर दाने निकल आए थे और उसे तेज बुखार था। वे पहले उसे बैहर अस्पताल ले गए, जहां वह एक दिन और एक रात भर्ती रही। इसके बाद उसे बालाघाट जिला अस्पताल रेफर कर दिया गया। पिता चमरू धुर्वे के मुताबिक, नीलम बालाघाट जिला अस्पताल में सात दिन तक भर्ती रही। जब उसकी हालत में कोई सुधार नहीं हुआ, तो वे उसे घर वापस ले आए और दो दिन बाद उसकी मौत हो गई। दस दिन तक अस्पताल में रहने के कारण दंपती की मजदूरी छूट गई और इलाज के लिए उन्हें कर्ज लेना पड़ा। चमरू धुर्वे को अभी भी सरकार से मदद मिलने की उम्मीद है।
बुनियादी सुविधाओं का घोर अभाव
जगला गांव नवी पंचायत के अंतर्गत आता है। गांव तक पहुंचने के लिए बुनियादी ढांचे की भारी कमी है। पंचायत भवन से गांव तक पक्की सड़क से जाने पर 17 किलोमीटर का लंबा चक्कर लगाना पड़ता है, जबकि कच्चे रास्ते से दूरी पांच किलोमीटर है। गांव में न तो स्कूल है और न ही अस्पताल। इलाज और रोजमर्रा की जरूरतों के लिए ग्रामीण 30 किलोमीटर दूर बिठली के हाट बाजार पर निर्भर हैं। राधा मरावी और संगीता खुसरे ने बताया कि गांव से बिठली के लिए ऑटो केवल साप्ताहिक हाट बाजार वाले दिन ही चलते हैं, जिससे आपातकालीन स्थिति में ग्रामीणों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ता है।
राहुल गांधी ने जगला गांव को क्यों चुना?
राहुल गांधी का बारह दिन में मध्य प्रदेश का यह दूसरा दौरा था। इससे पहले वे 19 सितंबर को इंदौर पहुंचे थे। जगला गांव उनके दौरे का केंद्र इसलिए बना क्योंकि यहां बच्चों की मौतों और सरकारी रिकॉर्ड में नाम दर्ज न होने का मुद्दा प्रमुखता से सामने आया था। कांग्रेस विधायक विक्रांत भूरिया कुछ दिन पहले जगला गांव पहुंचे थे और उन्होंने यहां की स्थिति की विस्तृत जानकारी राहुल गांधी को दी थी। ग्रामीणों से जमीन पर बैठकर मुलाकात करने के बाद राहुल गांधी ने कहा कि गांव में स्वास्थ्य, शिक्षा और रोजगार की सुविधाएं नहीं हैं। उन्होंने आरोप लगाया कि कई बच्चों की मौत के बावजूद परिवारों को मुआवजा नहीं दिया गया। उन्होंने आदिवासी महिलाओं के लिए चल रही योजनाओं का लाभ लाड़ली बहना योजना के साथ देने की भी मांग की।
पिछले मामलों में भी सरकार पर उठाए सवाल
राहुल गांधी इससे पहले भी मध्य प्रदेश में सरकार की कार्यप्रणाली पर सवाल उठा चुके हैं। उन्होंने इंदौर के भागीरथपुरा में दूषित पानी की घटना, सागर के बंडा में जहरीली शराब से हुई मौतों और छिंदवाड़ा में कफ सिरप से बच्चों की मौत के मामले उठाए थे। अब बालाघाट के जगला गांव का मामला प्रशासनिक व्यवस्था की कमियों को लेकर एक और बड़ा सवाल खड़ा करता है। यदि आंगनवाड़ी स्तर से मौतों की रिपोर्ट भेजी गई थी, तो ये नाम पहले की सरकारी सूची में क्यों नहीं थे और क्या यह रिपोर्ट जिला स्तर तक पहुंची थी, इसका जवाब प्रशासन को देना होगा।




