बिलौआ में अवैध खनन के मामले पर गंभीर सवाल — बिना जांच खनिज बाहर नहीं जाते, तो सरकार को डंपर का वजन क्यों नहीं मिलता

ग्वालियर के बिलौआ क्षेत्र में अवैध खनन के मामले पर दैनिक भास्कर की एक रिपोर्ट गंभीर सवाल उठाती है। रिपोर्ट के अनुसार, खनिज सामग्री को बिना उचित जांच और निरीक्षण के बाहर निकाला नहीं जा सकता, फिर सरकारी तरफ से डंपर यानी ट्रक का वजन क्यों नहीं मिलाया जा रहा या रिकॉर्ड नहीं किया जा रहा, इस पर सवाल हैं।
इस मामले में यह महत्वपूर्ण है कि खनन क्षेत्र में अक्सर अवैध निकासी की सूचनाएं मिलती रहती हैं और स्थानीय प्रशासन तथा पुलिस द्वारा निरंतर जांच की मांग की जाती है। बिलौआ में भी ऐसा ही माहौल देखने को मिला है, जहां खनिज सामग्री को ले जाने वाले वाहनों की जांच में कमी का आरोप लगाया जा रहा है।
रिपोर्ट में उठाया गया यह सवाल कि बिना जांच खनिज बाहर नहीं जाते, तो सरकार को डंपर का वजन क्यों नहीं मिलता, इसे सरल शब्दों में समझें तो यह है कि यदि खनिज निकालने से पहले ही निरीक्षण हो रहा है, तो वाहनों का वजन भी मापा जाना चाहिए ताकि यह सुनिश्चित हो सके कि कितना खनिज निकाला जा रहा है और कितना सरकार को राजस्व प्राप्त हो रहा है। यदि वजन मापा नहीं जा रहा है, तो यह संदेह पैदा करता है कि कुछ लोग निरीक्षण प्रक्रिया से बचकर अवैध तरीके से खनिज निकाल रहे हों।
मध्य प्रदेश में खनन एक महत्वपूर्ण क्षेत्र है और ग्वालियर जिले में भी खनिज संसाधनों की उपलब्धता के कारण इस पर नजर रखी जाती है। बिलौआ क्षेत्र में अवैध खनन की सूचनाएं पुलिस और प्रशासन को पहले ही मिल चुकी हैं और इस संदर्भ में कार्रवाई की उम्मीद जताई जा रही है।
रिपोर्ट के अनुसार, जहां तक जानकारी मिली है, वहां खनिज सामग्री को बाहर निकालने से पहले जांच की प्रक्रिया अपनाई जा रही है, लेकिन डंपर के वजन के रिकॉर्ड में अंतर देखा जा रहा है। इस अंतर के कारण सरकार को सही राजस्व नहीं मिल पा रहा है और यह संदेह है कि कुछ वाहन भार छुपाकर खनिज परिवहन कर रहे हैं।
इस मामले में कई मुद्दे प्रमुख हैं। पहला, खनन क्षेत्र में निरीक्षण प्रक्रिया की कमी। दूसरा, वाहनों के वजन मापने की व्यवस्था में खामी। तीसरा, सरकारी राजस्व में होने वाले नुकसान की संभावना। चौथा, पर्यावरण पर पड़ने वाले असर की पहचान।
बिलौआ में अवैध खनन के इस मामले पर स्थानीय प्रशासन और पुलिस द्वारा जांच जारी है। यह जानना आवश्यक है कि क्या डंपरों का वजन वास्तव में मापा जा रहा है या नहीं, और यदि नहीं तो इसके पीछे क्या कारण है। रिपोर्ट में यह भी संदेह व्यक्त किया गया है कि कुछ लोग निरीक्षण प्रक्रिया को टालकर अवैध रूप से खनिज निकाल रहे हों और इसे छिपाने के लिए वाहनों का वजन भी सही नहीं रिकॉर्ड किया जा रहा हो।
इस संदर्भ में विशेषज्ञों का मानना है कि खनन क्षेत्र में पारदर्शिता बनाए रखना बेहद जरूरी है। बिना उचित वजन मापने और निरीक्षण के, अवैध खनन को रोकना मुश्किल है। सरकार को इस मामले में स्पष्टता बरतनी होगी कि डंपर का वजन क्यों नहीं मिल पा रहा और यह कमी कहां से हो रही है।
अवैध खनन से न केवल सरकार को राजस्व की हानि होती है, बल्कि पर्यावरण और स्वास्थ्य भी प्रभावित होते हैं। बिलौआ के निवासियों को भी इसके दुष्प्रभाव से जूझना पड़ता है। इसलिए इस मामले में त्वरित और पारदर्शी जांच की मांग जताई जा रही है।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि खनिज सामग्री को बाहर निकालने से पहले जांच अनिवार्य है, लेकिन यदि वाहनों का वजन सही से मापा नहीं जाता है तो पूरी प्रक्रिया में खामी पड़ती है। सरकार को इस सवाल का उत्तर देना होगा कि डंपर का वजन क्यों नहीं मिलता और यह कमी कैसे दूर की जाएगी।
बिलौआ में अवैध खनन के इस मामले पर सार्वजनिक जागरूकता भी जरूरी है। स्थानीय लोगों को इसके बारे में सूचित रखना और उन्हें जांच में सहयोग करने के लिए प्रेरित करना आवश्यक है। केवल संयुक्त प्रयास से ही अवैध खनन पर अंकुश लगाया जा सकता है।
इस पूरे मामले में एक बात स्पष्ट है कि यदि खनिज बाहर निकालने से पहले ही जांच हो रही है, तो डंपर का वजन भी अवश्य मापा जाना चाहिए। इसमें कमी होना या तो प्रक्रिया की विफलता है या फिर किसी जानबूझकर छिपाव की संभावना है। सरकार को इस सवाल का स्पष्ट उत्तर देना होगा और जिम्मेदारों को कार्रवाई करनी होगी।




