वाराणसी में उदय प्रताप कालेज और बीएचयू के अंतर्विश्वविद्यालय अध्यापक शिक्षा केंद्र के संयुक्त तत्वावधान में संगोष्ठी का आयोजन किया गया। जहां प्रख्यात शिक्षाविद् प्रो. हरिकेश सिंह ने कहा कि “राजर्षि उदय प्रताप सिंह जू देव का व्यक्तित्व हिमालय की ऊंचाई
.
प्रो. सिंह ने आगे कहा कि राजर्षि की पुण्य भूमि में न केवल पवित्रता का अनुभव होता है, बल्कि यह काशी शहर के विकास में भी उनका अहम योगदान रहा है। उन्होंने उदय प्रताप कालेज, महेन्द्रवी छात्रावास और भिनगाराज अनाथालय जैसे संस्थानों की स्थापना की, जिन्हें काशी कभी भी भुला नहीं सकती।
“राजर्षि का जीवन शिक्षा, साहित्य और आध्यात्म का अद्भुत समन्वय था
संगोष्ठी में विशिष्ट वक्ता के रूप में बोलते हुए मां विन्ध्य वासिनी विश्वविद्यालय की कुलपति प्रो. शोभा गौड़ ने कहा, “राजर्षि का जीवन शिक्षा, साहित्य और आध्यात्म का अद्भुत समन्वय था। आध्यात्मिक विकास ही व्यक्ति को समाज के प्रति उसकी जिम्मेदारियों से जोड़ता है।”
उत्तर प्रदेश राजर्षि टंडन मुक्त विश्वविद्यालय की पूर्व कुलपति प्रो. सीमा सिंह ने अपने उद्बोधन में कहा, “राजर्षि पर साहित्य सृजन और उसका प्रकाशन ही उनकी सच्ची श्रद्धांजलि होगी।” वहीं दिल्ली विश्वविद्यालय के आचार्य प्रो. रजनी रंजन सिंह ने कहा, “राजर्षि का दर्शन कर्तव्य आधारित था, अधिकार आधारित नहीं। यह दर्शन पक्षपात रहित था और विश्व के समस्त शुभ तत्वों को समाहित करता था।”

संगोष्ठी में कई लोग हुए शामिल
संगोष्ठी का शुभारंभ राजर्षि की प्रतिमा पर माल्यार्पण और दीप प्रज्जवलन से हुआ। प्राचार्य प्रो. धर्मेन्द्र कुमार सिंह ने स्वागत भाषण में राजर्षि के व्यक्तित्व के अनछुए पहलुओं को उजागर किया। आयोजन सचिव प्रो. रमेश धर द्विवेदी ने धन्यवाद ज्ञापन किया, जबकि संचालन प्रो. रेनू सिंह ने किया।
संगोष्ठी के समापन सत्र में प्रख्यात साहित्यकार डा. राम सुधार सिंह ने कहा, “जाति और धर्म आधारित संस्थाओं की स्थापना का मुख्य उद्देश्य नवजागरण काल में भारतीय जनता को यह शिक्षित करना था कि वे अपनी अस्मिता को जीवित रखते हुए राष्ट्र निर्माण में योगदान दे सकें।”
संगोष्ठी में डा. अशोक कुमार सिंह, डा. उदय प्रताप सिंह, डा. अरविन्द सिंह और प्रो. प्रदीप सिंह जैसे प्रमुख शिक्षाविदों ने भी अपने विचार प्रस्तुत किए। प्रो. प्रदीप सिंह ने कहा कि “उदय प्रताप कालेज शिक्षा और अनुशासन के क्षेत्र में एक विशिष्ट पहचान रखता है। हमें राजर्षि के शैक्षिक योगदान पर और अधिक शोध कार्यों को बढ़ावा देना चाहिए।”
इस अवसर पर प्रो. एन. पी. सिंह, प्रो. गरिमा सिंह, प्रो. शशिकान्त द्विवेदी, प्रो. मनोज प्रकाश त्रिपाठी और महाविद्यालय के अन्य अध्यापक और छात्र उपस्थित थे।
संगोष्ठी का आयोजन न केवल राजर्षि उदय प्रताप सिंह जू देव के योगदान को याद करने का अवसर था, बल्कि यह शिक्षा, संस्कृति और राष्ट्र निर्माण के प्रति उनकी प्रतिबद्धता को और भी अधिक सम्मानित करने का मंच साबित हुआ।