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हर 4 में से 1 डॉक्टर रिटायरमेंट के करीब: 67 देशों में डॉक्टर्स की कमी का खतरा; लेकिन भारत में 55+ के सिर्फ 12% डॉक्टर

विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की नई रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया भर में चिकित्सा कार्यबल की उम्र बढ़ने का संकट गंभीर रूप से गंभीर होता जा रहा है। रिपोर्ट में बताया गया है कि विश्व में करीब 25 प्रतिशत डॉक्टर 55 वर्ष से अधिक उम्र के हैं, जिससे निकट भविष्य में स्वास्थ्य सेवाओं में भारी कमी […]
हर 4 में से 1 डॉक्टर रिटायरमेंट के करीब: 67 देशों में डॉक्टर्स की कमी का खतरा; लेकिन भारत में 55+ के सिर्फ 12% डॉक्टर
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विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) की नई रिपोर्ट के अनुसार, दुनिया भर में चिकित्सा कार्यबल की उम्र बढ़ने का संकट गंभीर रूप से गंभीर होता जा रहा है। रिपोर्ट में बताया गया है कि विश्व में करीब 25 प्रतिशत डॉक्टर 55 वर्ष से अधिक उम्र के हैं, जिससे निकट भविष्य में स्वास्थ्य सेवाओं में भारी कमी की आशंका जताई गई है। इस रिपोर्ट ने 67 देशों में डॉक्टर और नर्स की कमी को बड़ी चुनौती के रूप में दर्शाया है। रिपोर्ट ने स्वास्थ्यकर्मियों की बढ़ती संख्या के बावजूद देशों के बीच भारी असमानता और कार्यबल के बूढ़े होने को प्रमुख चुनौती बताया है।

भारत की स्थिति दुनिया भर से अलग दिखती है। यहां 55 वर्ष से अधिक उम्र के डॉक्टर सिर्फ 12 प्रतिशत हैं, जबकि वैश्विक औसत 25 प्रतिशत है। हालांकि, रिपोर्ट में इंगित किया गया है कि भारत में 65 वर्ष से अधिक उम्र की आबादी 2024 से 2030 के बीच 26 प्रतिशत बढ़ने का अनुमान है, जिससे स्वास्थ्य सुविधाओं की मांग में अवश्य वृद्धि होगी। इसका मतलब है कि भले ही वर्तमान में डॉक्टरों की उम्र वैश्विक औसत से कम हो, लेकिन बढ़ती वरिष्ठ आबादी के कारण भविष्य में चिकित्सा सेवाओं की मांग बढ़ जाएगी।

रिपोर्ट के अनुसार, पिछले 20 वर्षों में स्वास्थ्यकर्मियों की संख्या में 52 प्रतिशत की वृद्धि हुई है। 2006 में प्रति 10 हजार जनसंख्या में 44.8 स्वास्थ्यकर्मी थे, जो बढ़कर 2025 में 67.9 हो गए। फिर भी, 2030 तक विश्व में 1.11 करोड़ स्वास्थ्यकर्मियों की कमी का अनुमान है, जो 67 देशों में डॉक्टर और नर्स की कमी का कारण बनेगी। यह दर्शाता है कि संख्या में वृद्धि होने के बावजूद कार्यबल की वितरण और अनुभव संबंधी समस्याएं बनी हुई हैं।

इस कमी का सीधा असर आम नागरिकों पर पड़ता है। सरकारी अस्पतालों में डॉक्टरों की कमी के चलते लोगों को मजबूरी में निजी अस्पतालों का रुख करना पड़ता है। वहां भारी-भरकम फीस आम आदमी की जेब पर सीधा और बड़ा आर्थिक बोझ डालती है। अस्पतालों में भारी भीड़ की वजह से मरीजों को इलाज के लिए घंटों या कई दिनों तक अपनी बारी का इंतजार करना पड़ता है। डॉक्टरों पर काम का दबाव इतना ज्यादा होता है कि वे हर मरीज को पर्याप्त समय और जरूरी देखभाल नहीं दे पाते।

ग्रामीण और देहाती इलाकों में स्थिति और भी चिंताजनक है। स्वास्थ्य केंद्रों में डॉक्टरों के पद खाली पड़े हुए हैं, जिससे ग्रामीण आबादी को मामूली और बुनियादी इलाज के लिए भी मीलों दूर शहरों के चक्कर लगाने पड़ते हैं।

इसी संदर्भ में केरल की स्थिति भी उल्लेखनीय है। राज्य का मेडिकल इंफ्रास्ट्रक्चर देश में सबसे मजबूत माना जाता है, लेकिन वहां डॉक्टरों को दिक्कत हो रही है। सूचना के अनुसार, केरल में डॉक्टरों की सैलरी 20 हजार रुपये है, जो सफाईकर्मी के बराबर है। इंडियन मेडिकल एसोसिएशन ने यह बताया कि राज्य में 66 प्रतिशत डॉक्टरों की हालत बंधुआ मजदूरों जैसी है। यह दर्शाता है कि अवसंरचना मौजूद होने के बावजूद मानव संसाधनों की समस्या राष्ट्रव्यापी है और वेतन भेदभाव इसे और बिगड़ा रहा है।

विश्व स्वास्थ्य संगठन की इस रिपोर्ट ने यह भी स्वीकार किया है कि स्वास्थ्यकर्मियों की बढ़ती संख्या के बावजूद देशों के बीच भारी असमानता बनी हुई है और कार्यबल के बूढ़े होने को बड़ी चुनौती बताया गया है। भविष्य में स्वास्थ्य सेवाओं की मांग बढ़ने के मद्देनजर डॉक्टरों की संख्या बढ़ाने के साथ-साथ उनके कार्यबल को युवा बनाए रखने की रणनीति की भी आवश्यकता है।

भारत में भी इस रिपोर्ट के आंकड़ों को ध्यान में रखते हुए भविष्य की चुनौतियों का सामना करना होगा। यद्यपि भारत में 55 वर्ष से अधिक उम्र के डॉक्टरों का प्रतिशत कम है, लेकिन बढ़ती वरिष्ठ आबादी और ग्रामीण-शहरी विभाजन के कारण भविष्य में चुनौतियां बढ़ सकती हैं। स्वास्थ्य सुविधाओं की जरूरतें बढ़ने के मद्देनजर कार्यबल प्रबंधन में बदलाव की संभावना है।

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