नई दिल्ली। पूर्व उपराष्ट्रपति मोहम्मद हामिद अंसारी ने पूर्व प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू का एक प्रसिद्ध बयान दोहराते हुए कहा कि भारत के सामने असली खतरा कम्युनिज्म से नहीं, बल्कि हिंदू दक्षिणपंथी सांप्रदायिकता से था। अंसारी ने यह विचार तीसरे एजी नूरानी मेमोरियल लेक्चर में व्यक्त किया, जो अब्दुल गफूर नूरानी के जीवन और कार्यों पर आयोजित किया गया था। इस कार्यक्रम का शीर्षक ‘रिमेंबरिंग अ पॉलीमैथ: द लाइफ एंड टाइम्स ऑफ अब्दुल गफूर नूरानी’ रखा गया था और यह आयोजन नई दिल्ली के इंडिया इस्लामिक कल्चरल सेंटर में सम्पन्न हुआ।
अंसारी ने इस सम्मेलन में अपने भाषण के दौरान नागरिक राष्ट्रवाद से सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की ओर बढ़ते रुझानों पर गंभीर चिंता जताई। उन्होंने अपने भाषण में पूर्व पीएम नेहरू के उस चेतावनी का हवाला दिया जिसे विदेश मंत्रालय के अधिकारियों की एक बैठक में दर्ज किया गया था। पूर्व विदेश सचिव जगत सिंह गुंडेविया के दस्तावेज में दर्ज नेहरू के इस बयान का अंसारी ने विस्तार से उल्लेख किया। अंसारी ने कहा, “नेहरू ने चेतावनी दी थी कि भारत को असली खतरा कम्युनिज्म से नहीं, बल्कि हिंदू दक्षिणपंथी सांप्रदायिकता से था।” इस बयान को फिर से सार्वजनिक रूप से प्रस्तुत कर अंसारी ने समकालीन राजनीतिक परिदृश्य पर सवाल उठाए।
अंसारी ने लेक्चर के दौरान लेखक, संवैधानिक विशेषज्ञ और राजनीतिक टिप्पणीकार अब्दुल गफूर नूरानी के योगदान को याद करते हुए उनके लेखन और विचारों की सराहना की। नूरानी ने संवैधानिक मामलों, इतिहास और राजनीति पर कई किताबें लिखी थीं। उन्होंने धर्मनिरपेक्षता, अल्पसंख्यक अधिकारों और शासन से जुड़े मुद्दों पर भी विस्तार से लेखन किया था। अंसारी ने नूरानी की 2019 में प्रकाशित किताब ‘द RSS: अ मेनेस टू इंडिया’ का जिक्र किया और कहा कि यह किताब शायद उनकी आखिरी बड़ी किताब थी। उन्होंने इसे आकार और सामग्री, दोनों पहलुओं से महत्वपूर्ण बताया।
अंसारी ने बताया कि नूरानी ने इस किताब की भूमिका में दो उर्दू शेरों के माध्यम से अपने विचार रखे थे। उनके मुताबिक, नूरानी ने किताब में अपने वैचारिक उद्देश्य को छिपाने की कोशिश नहीं की। अंसारी ने भूमिका में नूरानी की उस टिप्पणी का भी उल्लेख किया, जिसमें उन्होंने इसे भारत के मुसलमानों के बीच मौजूदा भावना बताया था। अंसारी ने नूरानी के राष्ट्रवाद, पहचान तथा भारत के राजनीतिक घटनाक्रम पर उनके विचारों की भी गहन चर्चा की।
नागरिक राष्ट्रवाद पर अपने विचार व्यक्त करते हुए अंसारी ने कहा कि हाल के वर्षों में ऐसे रुझान और तौर-तरीके उभरे हैं, जो नागरिक राष्ट्रवाद के स्थापित सिद्धांतों को सीधी चुनौती देते हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि इनकी जगह सांस्कृतिक राष्ट्रवाद की नई और काल्पनिक व्यवस्था लाई जा रही है। अंसारी ने कहा, “यह चुनावी बहुमत को धार्मिक बहुमत के रूप में पेश करना और राजनीतिक सत्ता पर एकाधिकार करना चाहता है।” उनके अनुसार, यह आस्था के आधार पर नागरिकों में भेद करना चाहता है।
अंसारी ने आगे कहा कि यह प्रवृत्ति असहिष्णुता को बढ़ावा देती है, दूसरों को अलग बताती है और समाज में बेचैनी और असुरक्षा पैदा करती है। उन्होंने कहा कि इनके हालिया कुछ रूप डराने वाले हैं और ये कानून के शासन के तहत चलने के भारत के दावे पर भी गंभीर सवाल खड़े करते हैं। अंसारी ने कहा, “यह ऐसा सवाल है, जिसका जवाब देना होगा। इन रुझानों का विरोध करना जरूरी है। इनका कानूनी और राजनीतिक, दोनों तरीकों से विरोध होना चाहिए।”
इस लेक्चर में नूरानी के बहुमुखी प्रतिभा और उनके साहित्यिक योगदान को केंद्र में रखकर अंसारी ने समकालीन भारतीय राजनीति में धर्मनिरपेक्षता और संवैधानिक मूल्यों की रक्षा की आवश्यकता पर जोर दिया। कार्यक्रम के दौरान नूरानी के जीवन और उनके दर्शन को याद किया गया, जिन्होंने अपने पूरे साहित्यिक और राजनीतिक करियर में संविधान, धर्मनिरपेक्षता और अल्पसंख्यक अधिकारों की रक्षा के लिए लगातार आवाज उठाई थी।
इस खबर को 19 सितंबर 2026 को अपडेट किया गया।


















