\n
Maharashtraउत्तर प्रदेशखेलजीवन शैलीजॉब-एजुकेशनटेक-ऑटोटॉप न्यूज़बिज़नसबिहारबॉलीवुडमध्य प्रदेशराजस्थानराज्य-शहरविदेश
होम › मध्य प्रदेश

9 साल बाद निसरपुर में फिर डूब का खतरा: कागजों में बाहर बताए गए परिवारों के आंगन तक पहुंचा बैक-वाटर, 400 से अधिक परिवार हक से वंचित

WhatsAppFacebookX

मध्य प्रदेश के धार जिले में स्थित निसरपुर कस्बे में एक बार फिर पानी का संकट गहरा गया है। सरदार सरोवर बांध के गेट बंद होने के बावजूद ओंकारेश्वर परियोजना की टर्बाइन चलाकर भारी मात्रा में पानी छोड़े जाने के कारण नर्मदा नदी का जलस्तर तेजी से बढ़ गया है। इस बैक-वाटर ने निसरपुर के उन इलाकों को भी अपनी चपेट में ले लिया है, जिन्हें सरकारी कागजों में डूब क्षेत्र से बाहर बताया जाता रहा है। शुक्रवार को नर्मदा नदी का जलस्तर 138.64 मीटर दर्ज किया गया, जबकि 138.68 मीटर का स्तर पार होते ही पुराने निसरपुर की कई बसाहटों में पानी घरों की चौखट और आंगन तक पहुंच गया। यह स्थिति देखकर स्थानीय निवासियों में दहशत का माहौल है, क्योंकि ठीक नौ साल पहले वर्ष 2017 में भी सरदार सरोवर के बैक-वाटर से यहां बड़ी संख्या में परिवार प्रभावित हुए थे।

ओंकारेश्वर परियोजना से प्रति सेकंड लगभग 1896 क्यूमेक्स पानी छोड़ा जा रहा है। यही कारण है कि नदी का जलस्तर लगातार ऊपर उठ रहा है और निचले इलाकों में रहने वाले लोगों के लिए खतरा बढ़ता जा रहा है। सरदार सरोवर बांध के गेट भले ही बंद हैं, लेकिन ओंकारेश्वर से छोड़े जा रहे पानी की भारी मात्रा ने निसरपुर में तबाही जैसे हालात पैदा कर दिए हैं। वंदे भारत न्यूज़ की रिपोर्ट के अनुसार, मौके पर स्थिति का जायजा लेने पर पाया गया कि कई परिवार आज भी अपने पुराने घरों में ही रहने को मजबूर हैं, जिनके आंगन में अब पानी भर चुका है।

निसरपुर में पुनर्वास और मुआवजे का मामला पिछले नौ सालों से अत्यंत पेचीदा बना हुआ है। डूब क्षेत्र से प्रभावित कुल 3,200 परिवारों में से केवल 2,000 से अधिक परिवारों को ही पुनर्वास का पूरा लाभ मिल पाया है। शेष परिवार आज भी मुआवजे, पात्रता और पुनर्वास की औपचारिकताओं में उलझे हुए हैं। इनमें से कई परिवार ऐसे हैं जो वर्षों से प्रशासनिक कार्यालयों के चक्कर काट रहे हैं, लेकिन उन्हें अभी तक उनका वाजिब हक नहीं मिल सका है।

कृषि भूमि के जलमग्न होने से किसानों की स्थिति और भी दयनीय हो गई है। आंकड़ों के अनुसार, 88 किसानों की खेती योग्य जमीन पूरी तरह से पानी में डूब गई थी। इनमें से 33 किसान ऐसे हैं जो अपनी जमीन खोने के बाद पूरी तरह से भूमिहीन हो चुके हैं। इन किसानों के सामने रोजी-रोटी का गंभीर संकट खड़ा हो गया है और सरकार द्वारा किए गए दावों के विपरीत वे आज भी राहत की प्रतीक्षा कर रहे हैं।

नर्मदा बचाओ आंदोलन के कार्यकर्ता सुरेश प्रधान ने इस मामले में चिंता व्यक्त करते हुए बताया कि डाक बंगला, गांधी नगर और पुरानी बसाहटों के 400 से अधिक परिवार आज भी अपने मकान और वैधानिक हक के लिए दर-दर भटक रहे हैं। सुरेश प्रधान के अनुसार, कई पात्र परिवार आज भी सहायता राशि प्राप्त करने के लिए विभिन्न सरकारी कार्यालयों के चक्कर काट रहे हैं, लेकिन उनकी सुनवाई नहीं हो रही है। उन्होंने कहा कि 2017 की घटना के बाद भी प्रशासन ने इन परिवारों की समस्याओं का स्थायी समाधान नहीं निकाला है, जिसके कारण हर बार जलस्तर बढ़ने पर इन लोगों को जान-माल के नुकसान का सामना करना पड़ता है।

प्रशासनिक स्तर पर इस मामले में क्या कार्रवाई हो रही है, इस पर एनवीडीए-पीडब्ल्यूडी (नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण – लोक निर्माण विभाग) के एसडीओ वीके सिंह ने स्पष्टीकरण दिया है। उन्होंने बताया कि इन प्रभावित परिवारों को अभी तक 5.80 लाख रुपये की सहायता राशि का लाभ नहीं मिल पाया है। वीके सिंह ने जानकारी दी कि निसरपुर के 282 लोगों के प्रकरण तैयार कर लिए गए हैं और इन्हें आयुक्त के माध्यम से भोपाल भेज दिया गया है। उन्होंने आश्वासन देते हुए कहा कि जैसे ही भोपाल से इन प्रकरणों को स्वीकृति मिल जाएगी, सभी पात्र लोगों को नियमानुसार लाभ दे दिया जाएगा।

निसरपुर की वर्तमान स्थिति यह स्पष्ट करती है कि कागजों पर भले ही कुछ परिवारों को डूब क्षेत्र से बाहर मान लिया गया हो, लेकिन जमीनी हकीकत इसके बिल्कुल विपरीत है। 138.68 मीटर का जलस्तर पार होते ही पानी सीधे उन घरों में घुस रहा है जिनके बारे में दावा किया जाता था कि वे सुरक्षित हैं। ओंकारेश्वर से 1896 क्यूमेक्स पानी छोड़े जाने की यह प्रक्रिया निसरपुर के निवासियों के लिए एक बार फिर 2017 जैसी विभीषिका लेकर आई है।

स्थानीय लोगों का कहना है कि नौ साल बीत जाने के बाद भी पुनर्वास की प्रक्रिया पूरी नहीं हो पाई है, जो प्रशासनिक व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े करता है। 3,200 में से 1,200 से अधिक परिवारों का पुनर्वास अधूरा रहना और 400 से अधिक परिवारों का अपने हक के लिए भटकना किसी बड़ी प्रशासनिक चूक की ओर इशारा करता है। वहीं, 33 किसानों का भूमिहीन हो जाना इस बात का प्रमाण है कि डूब क्षेत्र में रहने वाले लोगों को कितनी भारी कीमत चुकानी पड़ रही है।

फिलहाल निसरपुर में जलस्तर 138.64 मीटर पर बना हुआ है और यदि ओंकारेश्वर से पानी छोड़े जाने की यही रफ्तार जारी रही तो स्थिति और अधिक विकट हो सकती है। प्रभावित परिवारों की मांग है कि उनके प्रकरणों को भोपाल में प्राथमिकता के आधार पर मंजूरी दी जाए और उन्हें तत्काल राहत प्रदान की जाए, ताकि वे इस संकट की घड़ी में सुरक्षित स्थानों पर जा सकें। वंदे भारत न्यूज़ इस मामले पर लगातार नजर बनाए हुए है और प्रशासन द्वारा उठाए जा रहे कदमों की जानकारी देता रहेगा।