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9 साल बाद फिर डूब का खतरा: कागजों में डूब से बाहर बताए गए परिवारों के आंगन तक पहुंचा बैक-वाटर, ओंकारेश्वर से 1896 क्यूमेक्स पानी छोड़े जाने पर निसरपुर में बढ़ी चिंता

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मध्य प्रदेश के धार जिले के निसरपुर क्षेत्र में एक बार फिर डूब का गंभीर खतरा मंडराने लगा है। सरदार सरोवर बांध के गेट बंद होने के बावजूद ओंकारेश्वर परियोजना की टर्बाइन चलाकर करीब 1896 क्यूमेक्स प्रति सेकंड पानी छोड़े जाने के कारण निसरपुर में बैक-वाटर का स्तर तेजी से बढ़ गया है। इस स्थिति ने उन सैकड़ों परिवारों की चिंताएं फिर से बढ़ा दी हैं, जिन्हें सरकारी कागजों में डूब क्षेत्र से बाहर बताया जा रहा था, लेकिन हकीकत में उनके घरों के आंगन और चौखट तक पानी पहुंच चुका है। शुक्रवार को यहां जलस्तर 138.64 मीटर दर्ज किया गया, जबकि 138.68 मीटर का स्तर पार होते ही पुराने निसरपुर की कई बसाहटों में पानी सीधे घरों तक पहुंच गया।

यह वही निसरपुर क्षेत्र है, जहां वर्ष 2017 में सरदार सरोवर बांध के बैक-वाटर से बड़ी संख्या में परिवार प्रभावित हुए थे। उस समय आई बाढ़ और डूब की स्थिति ने हजारों लोगों के जीवन को अस्त-व्यस्त कर दिया था। अब ठीक नौ साल बाद, 2026 में भी हालात नहीं बदले हैं। आज भी सैकड़ों परिवार मुआवजे, पात्रता निर्धारण और पुनर्वास की प्रक्रियाओं में उलझे हुए हैं। भास्कर की टीम ने जब मौके पर जाकर स्थिति का जायजा लिया, तो देखा गया कि कई परिवार अभी भी अपने पुराने घरों में ही रहने को मजबूर हैं। उन्हें न तो उचित पुनर्वास मिल पाया है और न ही सुरक्षित स्थान पर शिफ्ट किया जा सका है।

डूब क्षेत्र से जुड़े आंकड़ों पर नजर डालें तो स्थिति और भी स्पष्ट हो जाती है। कुल 3,200 प्रभावित परिवारों में से केवल 2,000 से अधिक परिवारों को ही पुनर्वास का पूरा लाभ मिल पाया है। इसका सीधा अर्थ यह है कि लगभग 1,200 परिवार आज भी पूरी तरह से पुनर्वास सुविधाओं से वंचित हैं। इसके अलावा, किसानों की स्थिति भी बेहद दयनीय बनी हुई है। डूब के कारण 88 किसानों की खेती योग्य जमीन जलमग्न हो गई थी। इनमें से 33 किसान ऐसे हैं जो अपनी जमीन खोने के बाद पूरी तरह से भूमिहीन हो चुके हैं। इन किसानों के पास अब न तो खेती करने के लिए जमीन बची है और न ही जीविकोपार्जन का कोई अन्य साधन उपलब्ध कराया गया है।

नर्मदा बचाओ आंदोलन के कार्यकर्ता सुरेश प्रधान ने इस समस्या की गंभीरता को रेखांकित करते हुए बताया कि डाक बंगला, गांधी नगर और पुरानी बसाहटों के 400 से अधिक परिवार अपने मकान और वैधानिक हकों के लिए दर-दर भटक रहे हैं। उन्होंने कहा कि कई पात्र परिवार आज भी सहायता राशि प्राप्त करने के लिए सरकारी कार्यालयों के चक्कर काट रहे हैं, लेकिन उनकी सुनवाई नहीं हो रही है। सुरेश प्रधान के अनुसार, ये परिवार पिछले नौ वर्षों से अनिश्चितता के साये में जी रहे हैं और हर बार जब जलस्तर बढ़ता है, तो इनके सामने विस्थापन का नया संकट खड़ा हो जाता है।

प्रशासनिक स्तर पर इस मामले में क्या कार्रवाई हो रही है, इस पर एनवीडीए-पीडब्ल्यूडी (नर्मदा घाटी विकास प्राधिकरण – लोक निर्माण विभाग) के एसडीओ वीके सिंह ने जानकारी दी। उन्होंने बताया कि ऐसे कई लोग हैं जिन्हें अभी तक 5.80 लाख रुपये की सहायता राशि का लाभ नहीं मिल पाया है। वीके सिंह ने स्पष्ट किया कि निसरपुर के 282 लोगों के प्रकरण तैयार कर लिए गए हैं और इन्हें आयुक्त के माध्यम से भोपाल भेज दिया गया है। उन्होंने आश्वासन दिया कि जैसे ही भोपाल से इन प्रकरणों की स्वीकृति मिलेगी, सभी पात्र लोगों को तत्काल लाभ दे दिया जाएगा।

इस बीच, ओंकारेश्वर परियोजना से 1896 क्यूमेक्स प्रति सेकंड की दर से पानी छोड़े जाने का मामला भी चर्चा का विषय बना हुआ है। हालांकि सरदार सरोवर बांध के गेट बंद हैं, लेकिन टर्बाइन के जरिए इतनी भारी मात्रा में पानी छोड़े जाने से निचले इलाकों में बैक-वाटर का दबाव बढ़ना स्वाभाविक है। विशेषज्ञों और स्थानीय जानकारों का मानना है कि यदि जलस्तर इसी गति से बढ़ता रहा या 138.68 मीटर से ऊपर बना रहा, तो निसरपुर के और भी अधिक इलाकों में पानी भर सकता है।

निसरपुर की वर्तमान स्थिति नर्मदा घाटी में विस्थापन और पुनर्वास को लेकर उठाए जा रहे सवालों का एक जीवंत उदाहरण है। वर्ष 2017 की घटना के बाद से अब तक नौ वर्ष बीत चुके हैं, लेकिन प्रभावित परिवारों की मूल समस्याएं जस की तस बनी हुई हैं। कागजों में डूब से बाहर घोषित किए गए परिवारों के आंगन में पानी का पहुंचना यह साबित करता है कि जमीनी हकीकत और सरकारी रिकॉर्ड के बीच कितना बड़ा अंतर है। 400 से अधिक परिवारों का अपने हकों के लिए भटकना और 33 किसानों का भूमिहीन हो जाना इस बात की ओर इशारा करता है कि पुनर्वास नीतियों के क्रियान्वयन में गंभीर कमियां रह गई हैं।

स्थानीय निवासियों का कहना है कि हर बार जब जलस्तर बढ़ता है, तो उन्हें अपने घरों और सामान को बचाने की चिंता सताने लगती है। 282 प्रकरण भोपाल भेजे जाने के बाद अब सभी की निगाहें राज्य सरकार और संबंधित विभागों की मंजूरी पर टिकी हैं। देखना यह होगा कि क्या प्रशासन समय रहते इन परिवारों को राहत पहुंचा पाता है या फिर 2017 जैसी स्थिति दोबारा उत्पन्न हो जाएगी। फिलहाल, निसरपुर के लोग बढ़ते जलस्तर और अधूरे पुनर्वास के बीच अपनी जिंदगी गुजारने को मजबूर हैं।