पहले बेटे का नाम ‘मो’, दूसरे का ‘को’ से शुरू:बेटियों के लिए भी तय है पहला अक्षर, मरिंग लोगों में नाम रखने की अनोखी परंपरा

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रात के 8 बज रहे हैं। कई पुरुष सिर पर सफेद कपड़ा बांधे एक घर की ओर बढ़ रहे हैं। साथ में चलती हुई महिलाएं गीत गा रही हैं। मानो कोई उत्सव हो, लेकिन कहानी कुछ और है। सभी एक घर के पास पहुंचते हैं, जहां आंगन में एक बुजुर्ग महिला का शव रखा है। शव के पास एक तरफ पुरुष और दूसरी ओर महिलाएं बैठ जाती हैं। उसके बाद रातभर गीतों का सिलसिला चलता है। सूरज की पहली किरण के साथ महिलाएं तैयारियों में जुट जाती हैं। उन्हीं में से एक महिला पत्तों में खाना और बांसुरी लेकर आती हैं और शव के पास रख देती हैं। तभी एक लड़का आया, उसके हाथ में जिंदा मुर्गी है। उसने फड़फड़ाती मुर्गी को शव के सामने रखा और फरसे से उसकी गर्दन उड़ा दी। ठीक उसके बाद एक दूसरा लड़का चूजा लेकर आया। उसने शव की दाहिनी हथेली पर रखा और चाकू से काट दिया। ये काम इतने सधे तरीके से किया गया, ताकि शव की हथेली न कटे। इसके बाद सभी ने वहां फैला खून साफ किया। दरअसल, यहां अंतिम संस्कार की तैयारी चल रही है। मुर्गे की बलि दी जा रही है और मरने वाले का पसंदीदा खाना भी बनाया गया है। दैनिक भास्कर की सीरीज ‘हम लोग’ में मैं मनीषा भल्ला इस बार लाई हूं कहानी- मरिंग समुदाय की। मणिपुर के इंफाल और इसके आस-पास बसे इस समुदाय की आबादी करीब 25 हजार है। यह अंतिम संस्कार सांगडांग शेनबा मरिंग नाम के गांव में हो रहा है, जो मणिपुर की राजधानी इंफाल से 50 किमी दूर पहाड़ी पर है। यहां रहने वाले काएसंग अंग्गुन की मां कैसनकैसल की मौत हो गई है। इस तरह मुर्गे की बलि देने के बाद अब उनके शव को एक सुनसान जगह ले जाया जा रहा है। भीड़ भी पीछे-पीछे चल रही है, लेकिन गीत लगातार जारी है। थोड़ी दूर पहुंचते ही कुछ लोग गड्‌ढा खोदना शुरू करते हैं। यह जगह मरिंग लोगों का कब्रिस्तान है। काफी मशक्कत के बाद एक संकरा गाेलाकार गड्‌ढा खोदा गया। मेरे मन में सवाल उठ रहा था, इस संकरे गड्‌ढे में शव को कैसे दफनाएंगे? तभी कुछ लोग शव को उठाते हैं और उसे लिटाने के बजाय गड्ढे में खड़ा रख देते हैं। साथ में बांसुरी भी। फिर गड्‌ढे को मिट्‌टी से पाट देते हैं। उसके बाद कब्र के चारों ओर बांस का घेरा बनाया गया, ताकि कोई जानवर शव को नुकसान न पहुंचा सके। यह सब करते-करते शाम हो गई। उसके बाद सभी घर लौट गए। अगले दिन, मैं फिर अंग्गुन के घर पहुंची। यहां केवल उन्हें ही हिंदी आती है। वे घर के बाहर किसी जानवर के कंकाल को उलट-पलट रहे हैं। मैंने पूछा- यह किसका कंकाल है? वो कहते हैं- यह मिथुन का सिर है। मिथुन, पहाड़ी बैल जैसा जानवर है, जिसके मोटे सींग पीछे की तरफ मुड़े होते हैं। शिकार के बाद इसका सिर घर के सामने टांगना जरूरी होता है। यह जानवर हमारे लिए शुभ होता है, जिसकी हम पूजा करते हैं। यह बताते हुए अंग्गुन मुझे घर के अंदर चलने को कहते हैं। अंदर पहुंचने पर देखा तो घर की छत टीन की और दीवारें बांस की बनी हुई हैं। अंदर पूरा घर बांस से बने सामानों से सजा है। अंग्गुन के चेहरे पर मां के जाने का गम और थकान थी, लेकिन फिर भी मरिंग लोगों के बारे में बातचीत करने के लिए राजी हो गए। मैंने पूछा- आपके यहां मौत पर गीत क्यों गाए जाते हैं? वे बताते हैं- मरिंग मानते हैं कि मौत शरीर की होती है, जबकि जाने वाले से प्यार हमेशा बना रहता है, इसलिए हम गम नहीं मनाते, गीत गाते हैं। शव को खड़ा करके क्यों दफनाया और साथ में बांसुरी भी रखी? हां, मरिंग मानते हैं कि शव को खड़ा दफनाने से मरने वाला दोबारा जन्म ले सकता है। इसलिए खड़ा दफनाते हैं। मरने वाला जो भी वाद्य यंत्र बजाता हो, उसे भी साथ दफनाते हैं। मेरी मां बांसुरी बजाती थीं। इसलिए उसे भी साथ रखा। इस बीच, तेज बारिश होने लगती है। टीन की चादर पर बूंदों की आवाज इतनी तेज कि हम एक-दूसरे की बात नहीं सुन पा रहे। तभी एक बच्चा चाय लेकर आया। शराब तय करती है, रिश्ता आगे बढ़ेगा या नहीं चाय की चुस्की लेते हुए अंग्गुन बताते हैं- हमारे यहां शादी की तीन रस्में होती हैं। पहली- जब लड़के वाले रिश्ता लेकर लड़की के घर जाते हैं। ऐसे में वे अपने साथ चावल से बनी शराब भी लेकर जाते हैं। अगर लड़की वालों को रिश्ता मंजूर न हो तो वे इस शराब की बोतल को अपने दरवाजे के बाहर रख देते हैं। अगर रिश्ता मंजूर हो तो लड़की की मां उस बोतल को अपनी चारपाई के पाये पर बांस की घास से बांध देती है। यह चारपाई वही होनी चाहिए, जिस पर लड़की के माता-पिता सोते हों। इस रस्म को तुलिग्लियांसंग कहते हैं। दूसरी- ये रस्म लड़की की मंजूरी से जुड़ी है। एक खास दिन लड़की के घर वाले उससे पूछते हैं- क्या लड़का तुम्हें पसंद है? अगर लड़की हां कर देती है, तो लड़की के घर वाले चारपाई से बंधी शराब की बोतल लाकर एक खास बर्तन में पीते हैं। यह बर्तन सूखे कद्दू से बना होता है। इसे तुलबोनवा कहते हैं, इसलिए इस रस्म का नाम भी तुलबोनवा है। तीसरी रस्म- इसमें लड़की, लड़के को कपड़े देती है और लड़का, लड़की को अंगूठी। इस रस्म को तुलखम कहते हैं। इसके बाद दोनों शादी से इनकार नहीं कर सकते। इनकार करने पर जुर्माना देना होता है। लेकिन जुर्माना भी खास है। अगर लड़की शादी से इनकार करके किसी और लड़के से शादी करती है, तो लड़की जिस लड़के से शादी करेगी जुर्माना उसे देना होगा। यानी अगली ससुराल वाले को। यह जुर्माना पहले वाले लड़के को मिलता है। इसी तरह, अगर लड़के वाले रिश्ता तोड़कर किसी और लड़की से शादी करें, तो उस लड़की के घर वालों को यह जुर्माना देना होता है। जो कि पहली वाली लड़की को मिलता है। जुर्माना नकद या मिथुन के रूप में दिया जाता है। जब शादी तय हो जाती है तब लड़के के परिवार की कुछ महिलाएं लड़की के घर आती हैं, उसे सजा-धजाकर अपने साथ लेकर जाती हैं। इन महिलाओं का सुहागन होना और उनके माता-पिता का जिंदा होना जरूरी है। यहीं शादी की रस्म पूरी हो जाती है। पहले बेटे का नाम ‘मो’, दूसरे का ‘को’ अक्षर से अंग्गुन बताते हैं- हमारे यहां नाम रखने का भी अलग रिवाज है। पहले बेटे का नाम ‘मो’ से शुरू होगा। जैसे- मोदार, मोरम, मोसिल। दूसरे का ‘को’ और तीसरे का नाम ‘अंग’ से शुरू होता है। ऐसे ही पहली बेटी का नाम ‘टे’, दूसरी का ‘टो’ और तीसरी का ‘तुंग’ से शुरू होता है। बाकी चौथे, पांचवे बच्चे के नाम भी इसी तरह रखे जाते हैं। मैंने पूछा- ऐसा क्यों? वे बताते हैं- इससे पता चलता है कि कौन सा बच्चा बड़ा है और कौन सा छोटा। मरिंग समुदाय में सात गोत्र हैं, सभी में यही परंपरा है। अंग्गुन दावा करते हैं कि उनके पूर्वजों ने ही आग की खोज की थी। इसलिए मरिंग खुद को अग्नि का रक्षक या आग पैदा करने वाला मानते हैं। इसलिए हमारे यहां सिर्फ भाप में बना खाना ही खाया जाता है। हम चावल और सब्जियों की खेती करते हैं। वह बताते हैं कि मरिंग समुदाय में बच्चे के जन्म पर नाल काटने की रस्म भी अनोखी है। बेटे के जन्म पर बांस के पतले टुकड़े सालदा से नाल काटी जाती है। बेटी पैदा होने पर बांस के मोटे टुकड़े पुई से नाल काटी जाती है। यह रस्म गांव की अनुभवी दाई निभाती है। जन्म के पांचवें दिन भोज दिया जाता है। गांव की सुरक्षा के लिए रोज रात में बलि देते हैं इसके बाद मैं और मेरी साथी थांगशा टेसिल गांव की तरफ निकल पड़े। थोड़ा चलने के बाद हम एक घर के पास पहुंचे। घर के अंदर बीचों-बीच एक डंडा गड़ा है। पूछने पर थांगशा बताते हैं कि- यह हमारे पूर्वजों का प्रतीक है। हम इस डंडे पर शराब की एक बूंद रोज चढ़ाते हैं। इसके बाद, हम गांव के बिलकुल बीच पहुंचे, जहां मरिंग लोगों का मंदिर है। इसके दरवाजे पर पक्षियों के कंकाल टंगे हुए हैं। मंदिर के पुरोहित बताते हैं कि शिकार किए गए पक्षियों के सिर मंदिर में टांगना जरूरी है। मंदिर के अंदर एक पेड़ की टहनी है, जिसे हम वाओहाएहिंग कहते हैं। इसी के सामने पूजा करते हैं और मंत्र पढ़ते हैं। वह बताते हैं कि हमारे गांव में आने के लिए दो गेट हैं। पहला- पूर्व और दूसरा- दक्षिण में है। गांव में कोई आपदा न आए, इसलिए हम रोज आधी रात को दोनों गेट पर सफेद रंग का कपड़ा बांधते हैं। साथ ही कौवे, मोर, उल्लू और मुर्गी में से किसी एक पक्षी की बलि देते हैं। हालांकि, मरिंग समुदाय में अब ईसाई धर्म का प्रभाव तेजी से बढ़ रहा है। गांव में एक चर्च भी बनकर तैयार हो चुका है, जो इस बदलाव की साफ झलक देता है। सड़क और तालाबों की सफाई के लिए लमलाई त्योहार अब हम वापस अंग्गुन के घर आते हैं। वे बताते हैं- हमारा सबसे बड़ा त्योहार लमलाई है। इस दिन गांव की सड़कें और तालाब की सफाई की जाती है। उस दिन सभी नाचते हुए तालाब तक जाते हैं और साफ-सफाई करते हैं। तालाब साफ करने में महिलाओं को शामिल नहीं किया जाता। वे बताते हैं- यहां दो तरह के पुरोहित होते हैं। एक खुलपु और दूसरा खुल्लक। खुल्लक, खुलपु से छोटा पुरोहित होता है। तालाबों को सफाई में दोनों शामिल होते हैं। उस दिन वे अच्छी बारिश और फसल के लिए मंत्र पढ़ते हैं।



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