30 अप्रैल 2026 की दोपहर, ढाका के बरिधारा डिप्लोमैटिक जोन में हलचल थी। बांग्लादेश के विदेश मंत्रालय ने भारत के कार्यवाहक उच्चायुक्त पवन बधे को तलब किया। कूटनीति की भाषा में ‘तलब’ एक सीधा और सख्त संदेश होता है।
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वजह था एक बयान- ‘मैं हर सुबह भगवान से प्रार्थना करता हूं कि भारत-बांग्लादेश संबंधों में और सुधार न हो, ताकि अवैध प्रवासियों को सुविधाजनक जगहों पर ले जाकर रात के अंधेरे में सीमा पार धकेलना जारी रहे।’
यह बयान असम के मौजूदा मुख्यमंत्री हिमंता बिस्वा सरमा का था। मौका असम के विधानसभा चुनाव, जहां हिंदू-मुसलमान और अवैध घुसपैठ बड़ा चुनावी मुद्दा है।
मौजूदा बीजेपी में हिमंता का रुख कई बार कट्टर बीजेपी कार्यकर्ताओं से भी सख्त होता है। लेकिन वे हमेशा ऐसे नहीं थे। 2015 में भाजपा में आने से पहले वे असम की कांग्रेस सरकार में मंत्री थे और हिंदू-मुस्लिम भाई-भाई की राजनीति करते थे।
उस दौर में हिमंता नरेंद्र मोदी के कट्टर आलोचक माने जाते थे। 2014 के लोकसभा चुनाव प्रचार में उन्होंने मोदी पर हमला करते हुए कहा था, ‘गुजरात में पानी के पाइपों से मुसलमानों का खून बहता है।’
हिमंता की राजनीति, हालात और मौके दोनों से बदलती रही है, लेकिन चुनाव में कामयाबी इनकी मुख्य ताकत है। 2026 का चुनाव भी उन्होंने पहले से ज्यादा सीटों से जीता है। यह कहानी उन्हीं हिमंता की है, जो हर बार पाला बदलकर ताकतवर होते गए…

1 फरवरी 1969, असम का जोरहाट। एक शिक्षित ब्राह्मण परिवार में हिमंता का जन्म हुआ। उनके पिता कैलाश नाथ सरमा जाने-माने लेखक और गीतकार थे। मां मृणालिनी देवी लेखिका थीं, जो आगे चलकर असम साहित्य सभा की उपाध्यक्ष बनीं।
दिलचस्प विरोधाभास यह है कि ‘बाहरी बनाम असमिया’ की राजनीति करने वाले हिमंता के पूर्वज खुद उत्तर प्रदेश के कन्नौज से जाकर असम में बसे थे। एक अर्थ में, वे भी कभी ‘बाहरी’ थे।
शब्दों की विरासत घर से मिली। 10 साल की उम्र तक आते-आते भाषण देने की कला उनकी पहचान बन चुकी थी। कक्षा 5 में ही वे असमिया वक्ता के रूप में मशहूर हो गए थे। अक्सर अपने पिता के लिखे भाषण पढ़ते, लेकिन उसमें जान खुद भरते। कामरूप एकेडमी स्कूल की कक्षा 6 में वे ऑल असम स्टूडेंट यूनियन (AASU) से जुड़ गए थे।
इसी समय असम में भाषा और पहचान को लेकर आंदोलन तेज हो रहे थे। इसी दौरान वे AASU के उभरते नेताओं प्रफुल्ल कुमार महंत और भृगु कुमार फूकन के संपर्क में आए।

AASU के नेताओं के साथ पैंफलेट पढ़ते 12 साल के हिमंता बिस्वा सरमा। 1981 के आसपास, जब असम आंदोलन अपने चरम पर था, किशोर हिमंता हर शाम संगठन की प्रेस रिलीज और पर्चे लोगों तक पहुंचाते थे।
1971 में बांग्लादेश बनने के बाद बड़ी संख्या में शरणार्थियों आए। इनसे असम की अस्मिता, संस्कृति और जनसंख्या संतुलन जैसे मुद्दे जोर पकड़ने लगे।
अप्रैल 1979 में असम के शिवसागर जिले में कुछ छात्रों ने एक हथियारबंद संगठन बनाया- यूनाइटेड लिबरेशन फ्रंट ऑफ असम यानी ULFA। असम एक उबलते हुए बर्तन की तरह था और हिमंता इसी उबाल के बीच पल-बढ़ रहे थे।

1985 असम के इतिहास का एक निर्णायक साल था।
AASU और ऑल असम गण संग्राम परिषद के नेतृत्व में बाहरियों के खिलाफ आंदोलन अपने चरम पर था। आंदोलनकारियों ने हाईवे बंद कर दिए। तेल की सप्लाई रुक गई, स्कूल-कॉलेज बंद हो गए और सरकारी कामकाज ठप पड़ गया।
इससे भी पहले 1983 में नेल्ली नरसंहार हो चुका था। आधिकारिक आंकड़ों के अनुसार उसमें 2,000 से ज्यादा लोग मारे गए। गैर-सरकारी अनुमान 5,000 तक जाते हैं। इस खून-खराबे की चर्चा दुनियाभर में थी।
राजीव गांधी इस चैप्टर को बंद करना चाहते थे।

1985 में केंद्र की राजीव सरकार और AASU के बीच असम समझौता हुआ। तय हुआ कि जल्द चुनाव होंगे और 25 मार्च 1971 के बाद अवैध रूप से आए हर व्यक्ति को राज्य से बाहर भेजा जाएगा।
समझौते के दो महीने बाद AASU के नेताओं ने असम गण परिषद (AGP) बनाई। दिसंबर 1985 के चुनाव में AGP को बहुमत मिला और महज 32-33 साल की उम्र में प्रफुल्ल कुमार महंत किसी राज्य के सबसे युवा मुख्यमंत्री बने।
और 16 साल का हिमंता? वह भी उस इतिहास के बनने की प्रक्रिया में थे। उसी साल उन्होंने गुवाहाटी के कॉटन कॉलेज में दाखिला लिया। ये पूर्वोत्तर की राजनीति का असली पावर सेंटर था। अब तक असम के 7 मुख्यमंत्री इसी कॉलेज से निकले हैं।
सीएम प्रफुल्ल महंत के करीबी होने के चलते उन्हें मुख्यमंत्री आवास और सचिवालय तक सीधी पहुंच मिली। कम उम्र में ही उन्होंने देख लिया कि फाइलें कैसे चलती हैं, पुलिस-प्रशासन को कैसे साधा जाता है।
कॉटन कॉलेज के छात्र संघ चुनाव में 1988 से 1992 तक लगातार तीन बार महासचिव चुने गए थे। ये एक रिकॉर्ड है।
इस बीच 1990 में हालात बदलने लगे। ULFA ने असम में आतंक फैला दिया था। प्रफुल्ल सरकार बेबस दिखने लगी। केंद्र ने राष्ट्रपति शासन लगाया। उस साल AGP चुनाव हार गई और हिमंता की जिंदगी में आया एक बड़ा तूफान।
1990 में असम पुलिस ने उनके हॉस्टल पर छापा मारा। किचन के पीछे से एक रिवॉल्वर और 25 कारतूस बरामद हुए। आर्म्स एक्ट में मामला दर्ज हुआ।
1991 में उन पर ULFA से जुड़े होने के आरोप लगे। कहा गया कि वे व्यापारियों से वसूली कर रहे थे। जनवरी और मार्च 1991 में दो अलग-अलग थानों में आतंक विरोधी कानून TADA के तहत मामले दर्ज हुए।
इसी दौरान कांग्रेस नेता मानवेंद्र शर्मा की हत्या हुई और इस केस में भी हिमंता का नाम आया। मार्च 1991 में उन्हें गिरफ्तार किया गया, 15 दिन पुलिस हिरासत में रहे।
22 साल की उम्र में हिमंता समझ चुके थे कि केंद्र के समर्थन के बिना असम की राजनीति में लंबा सफर संभव नहीं है।

इन संकटों में फंसे हिमंता ने एक चतुर कदम उठाया। उन्होंने AASU छोड़ा और तत्कालीन मुख्यमंत्री हितेश्वर सैकिया की शरण में चले गए।
सैकिया उनके जमीनी नेटवर्क से प्रभावित थे। 1993 में हिमंता आधिकारिक तौर पर कांग्रेस में शामिल हो गए। 1996 तक उनसे जुड़े TADA मामलों की केस डायरी और रिकॉर्ड पुलिस स्टेशनों से रहस्यमय तरीके से गायब हो गए।
1996 में हिमंता ने पहली बार विधानसभा चुनाव लड़ा। सैकिया ने उन्हें जालुकबारी सीट से उतारा, जो AASU के बड़े नेता भृगु कुमार फूकन की सीट थी। रणनीति थी कि आंदोलन से निकला नया चेहरा, उसी आंदोलन के पुराने चेहरे को हरा दे। लेकिन हिमंता खुद हार गए।
इस बीच सैकिया का भी निधन हो गया। एक झटके में वे उस नेता से वंचित हो गए, जिन्होंने उन्हें संरक्षण दिया था।
निराशा इतनी गहरी थी कि हिमंता ने असम छोड़ने का मन बना लिया। दिल्ली जाकर सुप्रीम कोर्ट में वकालत करना चाहते थे, लेकिन तभी पूर्व प्रधानमंत्री पी वी नरसिम्हा राव ने उन्हें रोका।
अजीत दत्त की किताब, हिमंता बिस्वा सरमा- फ्रॉम बॉय वंडर टू सीएम, के अनुसार राव ने कहा- ‘जब कोई विधायक अपने क्षेत्र में जाता है तो लोग ध्यान नहीं देते। लेकिन जब हारने वाला उम्मीदवार बार-बार लौटकर लोगों की मदद करता है, तो लोग उसे याद रखते हैं।’
हिमंता जालुकबारी वापस लौटे। सड़क, राशन, कागजी अड़चनों जैसी लोगों की छोटी-बड़ी समस्याएं सुलझाते रहे। जमीन से जुड़े रहे।
इसी दौरान उन्होंने तरुण गोगोई के साथ गठबंधन को मजबूत किया, जो दिल्ली के 10 जनपथ के करीबी थे।

पहली बार असम के मुख्यमंत्री बने तरुण गोगोई के साथ हिमंत बिस्वा सरमा।
गोगोई को ऐसे साथी की जरूरत थी, जो मैदान में उतरकर आक्रामक राजनीति कर सके। हिमंता बिल्कुल वैसे ही थे। उन्होंने अपने पुराने AASU नेटवर्क के जरिए यह पता लगाया कि प्रफुल्ल सरकार के दौर में हुई ‘गुप्त हत्याओं’ के पीछे ULFA के पुराने मेंबर्स के संगठन SULFA और राज्य पुलिस के कुछ अफसरों का हाथ था, जिन्हें मुख्यमंत्री कार्यालय का मौन समर्थन था।
गोगोई ने इसे अपना चुनावी हथियार बना लिया। हर सभा में एक ही जुमला गूंजता था- ‘असम की माताओं और बहनों, रात को आपके दरवाजे पर जो नकाबपोश दस्तक देते हैं, उन्हें सचिवालय से आशीर्वाद मिला हुआ है।’
इस एक लाइन ने माहौल बदल दिया। सीएम प्रफुल्ल की छवि खराब होती गई और 2001 में कांग्रेस सत्ता में लौटी। हिमंता ने जालुकबारी से भृगु कुमार फूकन को 10 हजार से ज्यादा वोटों से हराकर 1996 की हार का बदला ले लिया।

धीरे-धीरे हिमंता, तरुण गोगोई के परिवार जैसे हो गए। गोगोई की पत्नी डॉली गोगोई का भरोसा जीतना उनकी बड़ी सफलता थी। जब भी गोगोई गुवाहाटी आते, हिमंता सबसे पहले एयरपोर्ट पहुंचते। राज्य की हर छोटी-बड़ी राजनीतिक जानकारी उन्हीं के जरिए गोगोई तक पहुंचती।
2002 में गोगोई सरकार के विस्तार में हिमंता राज्य मंत्री बने। कृषि, योजना, वित्त, स्वास्थ्य, शिक्षा- एक के बाद एक बड़े विभाग उनके पास आते गए। धीरे-धीरे सरकार के ज्यादातर फैसले और विधायकों को संभालने का काम भी हिमंता देखने लगे। उन्हें असम का ‘सुपर सीएम’ कहा जाने लगा।
2011 के चुनाव में कांग्रेस ने 126 में से 78 सीटें जीतीं। पार्टी के अंदर सबको पता था- इस जीत के असली आर्किटेक्ट हिमंता थे, लेकिन गोगोई ने अपने बेटे गौरव गोगोई को आगे बढ़ाना शुरू किया। हिमंता को लगने लगा- वे उत्तराधिकारी नहीं, प्रतिद्वंद्वी समझे जा रहे हैं।
फिर एक पल आया जिसने रिश्ते को लगभग खत्म कर दिया। एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में जब पत्रकारों ने हिमंता की भूमिका पर सवाल किया, तो गोगोई ने हल्की मुस्कान के साथ कहा- हिमंता बिस्वा सरमा कौन है? आखिरकार वो मेरे एक मंत्री ही तो हैं।
हिमंता को साफ हो गया कि गोगोई के रहते मुख्यमंत्री बनना असंभव है।
2012 में तनाव और बढ़ा। असम कांग्रेस के संगठनात्मक चुनाव में गोगोई के उम्मीदवार हारे, हिमंता समर्थित जीत गए। हिमंता ने गुवाहाटी के एक होटल में 50 से ज्यादा कांग्रेस विधायकों को इकट्ठा कर ताकत दिखाई।
दिल्ली को संदेश था कि गोगोई का नियंत्रण कमजोर पड़ रहा है। जब पर्यवेक्षक मल्लिकार्जुन खड़गे आए, हिमंता ने गुप्त मतदान की मांग रखी, लेकिन अंत में सोनिया गांधी ने यथास्थिति बनाए रखी।
2014 में हिमंता अपनी शिकायत लेकर राहुल गांधी से मिलने दिल्ली पहुंचे। लेकिन यह मुलाकात एक और झटका बन गई।
हिमंता के मुताबिक, बातचीत के दौरान राहुल गांधी का ध्यान अपने पालतू कुत्ते ‘पिडी’ को बिस्कुट खिलाने में था। लेखक अजीत दत्ता अपनी किताब हिमंता बिस्वा सरमा- फ्रॉम बॉय वंडर टू सीएम में हिमंता के हवाले से लिखते हैं कि यहीं से रिश्तों में दरार शुरू हुई। जब हिमंता ने बताया की इस आपसी लड़ाई से कांग्रेस कमजोर हो सकती है और विपक्ष जीत सकता है, तो जवाब मिला- तो क्या हुआ?
यह आखिरी संकेत था।
अप्रैल 2013 में पश्चिम बंगाल में शारदा समूह का चिटफंड घोटाला सामने आया। लाखों गरीब निवेशकों के पैसे डूब गए। शारदा के मालिक सुदीप्त सेन के साथ हिमंता के संबंधों के आरोप लगे। केंद्र में मोदी सरकार आने के बाद अगस्त 2014 में CBI ने उनके घर और न्यूज चैनल ‘न्यूज लाइव’ पर छापेमारी की।
जुलाई 2015 में एक और मामला सामने आया। अमेरिकी कंपनी लुई बर्जर पर आरोप था कि उसने असम में जल आपूर्ति परियोजनाओं के ठेके लेने के लिए मंत्रियों को रिश्वत दी। हिमंता 2010-11 में गुवाहाटी विकास विभाग के मंत्री थे। गोगोई इन फाइलों का इस्तेमाल दबाव बनाने के लिए कर रहे थे।
हिमंता को अहसास हो गया कि कांग्रेस में रहे तो ये फाइलें कभी भी जेल तक ले जा सकती हैं।

कैरावैन रिपोर्ट में दर्ज है कि जब हिमंता बिस्वा सरमा कांग्रेस छोड़ना चाहते थे, तब वे बीजेपी के संगठन मंत्री राम माधव से मिले। राम माधव ने ही उन्हें बीजेपी में लाने का खाका खींचा।
21 जुलाई 2015 को जब दिल्ली में असम बीजेपी के नेता सर्बानंद सोनोवाल और किरेन रिजिजू प्रेस कॉन्फ्रेंस में हिमंता की गिरफ्तारी की मांग कर रहे थे। उसी समय पर्दे के पीछे शाह से मुलाकात तय हो रही थी।
2016 में छपी कैरावैन की रिपोर्ट में छपा कि अमित शाह ने इस प्रेस वार्ता के बाद असम के बीजेपी अध्यक्ष सिद्धार्थ भट्टाचार्य से कहा- ‘ये तो गलती हुई। फिर जो गलती हुई, उसको सुधारना है।‘
‘हिमंता बिस्वा सरमा- फ्रॉम बॉय वंडर टू सीएम‘ किताब में अजीत दत्ता लिखते हैं कि मध्य प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री और असम के प्रभारी दिग्विजय सिंह से जब हिमंता ने तकलीफ साझा की तो उन्होंने भाजपा जॉइन करने की सलाह दी। दिग्विजय का तर्क था कि इधर कांग्रेस में कुछ नहीं होने वाला है। बीजेपी का नेतृत्व गंभीर है। वही पार्टी तुम्हारे लिए बेहतर रहेगी।
23 अगस्त 2015 को दिल्ली में हिमंता ने अमित शाह से मुलाकात की। और आखिरकार हिमंता कांग्रेस से इस्तीफा देकर भाजपा में शामिल हो गए।

बीजेपी की सदस्यता लेने के बाद गुवाहाटी एयरपोर्ट पर हिमंता का स्वागत करते उनके समर्थक
हिमंता के आने के बाद भाजपा ने असम गण परिषद (AGP) और बोडोलैंड पीपुल्स फ्रंट (BPF) के साथ गठबंधन किया। वे इन दलों के नेताओं की नब्ज जानते थे।
उन्होंने भाजपा के हिंदुत्व एजेंडे को ‘असमिया अस्मिता’ के साथ जोड़ा और चुनाव को नैरेटिव दिया- ‘35 बनाम 65’ यानी मुस्लिम-हिंदू और ‘स्थानीय बनाम घुसपैठिए’।
अपने न्यूज चैनल की मदद से पूरे अभियान को एक इवेंट की तरह चलाया। इनकी रैलियां और बयान 24 घंटे दिखती थीं। कई बार तो खुद मुख्यमंत्री उम्मीदवार सोनोवाल से भी ज्यादा।
नतीजे आए और भाजपा गठबंधन को 86 सीटें मिलीं। विश्लेषकों का मानना था कि हिमंता के बिना यह आंकड़ा 40-45 पर ठहर जाता। सर्बानंद सोनोवाल मुख्यमंत्री बने। दिल्ली के गलियारों में एक लाइन बार-बार सुनाई देती- चेहरा सोनोवाल का है, दिमाग हिमंता का।
कॉटन कॉलेज के दिनों का एक चर्चित किस्सा है। हिमंता की गर्लफ्रेंड रिनिकी भुइयां ने उनसे पूछा था- मैं अपनी मां को तुम्हारे बारे में क्या बताऊं?’
हिमंता ने बिना झिझक जवाब दिया था- मां से कह देना, तुम असम के होने वाले मुख्यमंत्री से शादी करने जा रही हो।’
उस वक्त यह दंभ लगता था। 2021 में यह भविष्यवाणी सच होने वाली थी।
2021 में बीजेपी की दोबारा जीत हुई। लेकिन 2 मई से 9 मई तक यानी 7 दिन असम का अगला मुख्यमंत्री तय नहीं हो पाया। भाजपा के इतिहास में यह दुर्लभ था कि जीतकर आए मौजूदा मुख्यमंत्री को बदलने की बात इतनी खुलकर हो।
दिल्ली में तब के बीजेपी अध्यक्ष जेपी नड्डा के घर बैठकें हुईं। अमित शाह ने दोनों नेताओं से अलग-अलग बात की। हिमंता ने कहा- मैंने 20 साल इस दिन के लिए काम किया है।
शाह ने सोनोवाल को समझाया। केंद्र में भूमिका के आश्वासन के बाद वे पीछे हट गए। विधायक दल की बैठक में खुद सोनोवाल ने हिमंता के नाम का प्रस्ताव रखा।
10 मई 2021 को शपथ ग्रहण हुआ। शपथ के बाद पत्नी रिनिकी भावुक हो गईं और बोलीं कि कॉटन कॉलेज में किया गया वादा आज पूरा हुआ।

2021 में मुख्यमंत्री पद की घोष्णा होने के बाद पत्नी रिनिकी के साथ हिमंता
मुख्यमंत्री बनते ही हिमंता ने आक्रामक प्रशासक की छवि बनाई। दशकों से चल रहे उग्रवाद को कमजोर किया। दिसंबर 2023 में ULFA के शांति गुट के साथ समझौता एक ऐतिहासिक मोड़ माना गया। असम-मेघालय और असम-अरुणाचल सीमा विवादों को सुलझाने की दिशा में समझौते हुए। सरकारी मदरसों को सामान्य स्कूलों में बदला गया। कानून-व्यवस्था पर सख्ती के साथ ड्रग्स के खिलाफ बड़े अभियान चले।
औद्योगिक मोर्चे पर 2024-25 में जागीरोड में टाटा समूह के 27 हजार करोड़ रुपए के सेमीकंडक्टर प्लांट की आधारशिला रखी गई। ‘ओरुनोदोई योजना’ के जरिए लाखों महिलाओं के बैंक खातों में सीधे पैसे पहुंचे। माइक्रो फाइनेंस कर्ज माफी ने ग्रामीण इलाकों में बड़ा असर डाला।
हिमंता ने 2026 का चुनाव भी जीत लिया है और लगातार दूसरी बार सीएम बनने की तैयारी कर रहे हैं।
****** References and Further Readings:
- असम- द एकॉर्ड, द डिस्कॉर्ड (संगीता बरुआ पिशरोती)
- द 2026 असम इलेक्शन एक्सप्लेंड (अजाची चक्रबर्ती, कैरावैन)
- स्कैम प्रोन (समीर पुरकायस्थ और संदीप शर्मा, द फेडरल),
- हिमंता बिस्वा सरमा- फ्रॉम बॉय वंडर टू सीएम (अजीत दत्ता)
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