Arunachal Pradesh Galo Tribe Interesting Facts; Wedding Bali Ritual

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सुबह के 7 बजे हैं। अरुणाचल प्रदेश की एक पहाड़ी बस्ती में हूं। यहं एक घर पर लोगों की भीड़ जमा है। उन्हीं के बीच एक लड़का परेशान खड़ा है। थोड़ी देर में घर से एक बुजुर्ग बाहर आते हैं। काले कपड़े में, बाघ की खाल का जैकेट पहने। कंधे पर धनुष, पीठ पर तीरों से

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सभी उन्हें पुरोहित कह रहे हैं। नाम है- मोगी ओरी। वह लकड़ी से बने एक पाट पर बैठते हैं। उनके बगल ही एक और बुजुर्ग बैठते हैं, ये उनके साथी हैं।

एक महिला आती है और पुरोहित के कान में कुछ बुदबुदाती है। तभी वहां मौजूद एक शख्स पुरोहित के हाथ में फड़फड़ाती मुर्गी थमाता है। पुरोहित मोगी ओरी फरसा उठाते हैं और झटके से मुर्गी की गर्दन काट देते हैं। चारों तरफ खून फैल जाता है।

दैनिक भास्कर की सीरीज ‘हम लोग’ में मैं मनीषा भल्ला इस बार लाई हूं अरुणाचल प्रदेश के गालो समुदाय की कहानी, जो संख्या में करीब 80 हजार बचे हैं।

जानवर की खाल की जैकेट पहनते हुए पुरोहित मोगी ओरी।

जानवर की खाल की जैकेट पहनते हुए पुरोहित मोगी ओरी।

मुर्गी की यह बलि अरुणाचल प्रदेश की राजधानी ईटानगर से 140 किमी दूर यीगीकन्न बस्ती में स्थित पुरोहित के आंगन में दी जा रही है…

मैंने वहां मौजूद एक शख्स से पूछा कि ये बलि क्यों दी जा रही है?

वो एक महिला की ओर इशारा करते हुए बताने लगे कि उन्होंने उस परेशान खड़े लड़के पर धान चोरी का आरोप है, जिसकी सुनवाई चल रही है।

पुरोहित ने लड़के से उसका नाम और जन्म की तारीख पूछी और उसके बाद दोनों हाथ से मुर्गी को फाड़ दिया। उसका कलेजा निकाला और खून से सने हाथों में कलेजा छिपाए घर के अंदर चल पड़ा।

मुझे भी पीछे आने का इशारा किया। अंदर जाते ही पुरोहित ने आंखें बंद कर लीं और कुछ बुदबुदाने लगा। फिर खून से सने मुर्गी के कलेजे पर बार-बार फूंकने लगा। कुछ देर बाद फिर बाहर आया।

अपने गले में पहना हुआ टाइगर का एक दांत लड़के की तरफ बढ़ाया और बोला- ‘इस पर हाथ रखकर कहो कि तुमने चोरी नहीं की है।’

लड़का फौरन बोला- ‘मैंने चोरी नहीं की, धान नहीं चुराया।’

इस पर पुरोहित ने पास बैठे बुजुर्ग को उबला हुआ अंडा खाने को दिया। अंडा खाने के बाद बुजुर्ग ने पुरोहित के कान में कुछ कहा।

कुछ पल खामोशी रहती है। उसके बाद पुरोहित कहता है- ‘लड़का बेकसूर है, इसे घर जाने दो।’

इसके बाद लड़का और वहां मौजूद सभी लोग घर चले जाते हैं। करीब 10 मिनट बाद मैं पुरोहित मोगी ओरी के पास गई और पूछा- अंडा खाने से कैसे पता चला कि लड़का चोर नहीं है?

पुरोहित बोला- अंडा खाने के बाद अगर मन का भाव अच्छा है तो आरोपी सच बोल रहा है। अगर भाव गलत है तो आरोपी झूठ बोल रहा है।

फिर मैंने पूछा- यदि आरोप साबित होता तो क्या सजा मिलती?

पुरोहित बोला- जिस पर चोरी, हत्या या बलात्कार का आरोप साबित होता है उसे हमारे सबसे खास उत्सव मोपिन में शामिल नहीं किया जाता। साथ ही आरोपी और उसके परिवार को चावल और अदरक की खेती करने से रोक दिया जाता है।

फिर मैंने पुरोहित की वेश-भूषा के बारे में पूछा। वह बताते हैं- इस तरह बाघ की खाल पहने बिना मैं बलि नहीं दे सकता।

इस बातचीत के दौरान ओरी के तरकश और तीर को छूने के लिए मैं हाथ बढ़ाती हूं, तो वह तेज आवाज में बोल पड़ते हैं- नहीं, इसे मत छुओ, मर जाओगी। इन्हें छूने से तुम्हारा हाथ सड़ सकता है। तीर हल्का सा भी लग गया तो जान चली जाएगी।

मैंने पूछा ऐसा क्यों?

वह बताते हैं, इन तीरों पर एक जहरीले पौधे पाएजन की पत्तियों को पीसकर लगाया गया है। इससे यह तीर इतना खतरनाक हो गया है कि इसके एक ही वार से इंसान हो या जानवर ढेर हो जाता है।

तरकश में जहरीले तीर लिए हुए पुरोहित।

तरकश में जहरीले तीर लिए हुए पुरोहित।

फिर वह मुझे अपने गले में पहने टाइगर के दांत को दिखाते हुए बताते हैं- यह पांच पीढ़ी पुराना है। जैसे- हिंदुओं के लिए गीता, मुसलमानों के लिए कुरान और ईसाइयों के लिए बाइबल होती है, वैसे ही हमारे लिए यह टाइगर का दांत पवित्र होता है।

इसकी पवित्रता के लिए हम रोज पूजा करते हैं। इसे सिर्फ पुरोहित पहनते हैं। हम टाइगर को अपना भाई मानते हैं। इसी से हमें शक्ति मिलती है। यदि कोई इसे छूकर झूठी कसम खा ले तो उसके साथ बहुत बुरा होता है।

जानवरों के कंकाल से सजा मंदिर

अब तक दोपहर के 11 बज चुके हैं। मैं और मेरी साथी रीबा दूसरी बस्ती- लोगोमजोन की तरफ निकल पड़ते हैं। करीब 20 मिनट बाद दूर से ही बांस और लकड़ियों से बने घर नजर आने लगते हैं। यहां घर जमीन से एक-दो फीट ऊपर बने हुए हैं।

बस्ती में पहुंचने पर यहां एक लड़का लिबोन ईंगो हमें अपने घर लेकर जाता है। आंगन में एक ओर दीवार पर जानवरों के कंकाल टंगे हैं।

मैंने पूछा- यह क्या है?

लिबोन बताते हैं- ये जंगली सूअर और हिरण के सिर के कंकाल हैं। इन्हें हमारे पूर्वज शिकार करके लाए थे। ये घर के जिस कोने में टंगे हैं, वही हमारे गालो समुदाय का मंदिर है।

यहां हर घर में ऐसा ही मंदिर होता है। इस मंदिर में महिलाओ के आने पर रोक है। यहां सिर्फ पुरुषों को आकर पूजा करने की इजाजत है। आप भी मंदिर से थोड़ा दूर ही रहें।

ये सुनते ही मैं दो कदम पीछे हट गई।

लिबाेन बताते हैं- जब हम शिकार करके लाते हैं तो उसकी विधि-विधान से पूजा करते हैं। माना जाता है कि पूजा न करने पर जानवर का भूत आ सकता है।

अगर हम जंगली सूअर मारते हैं तो उसकी बड़ी पूजा करते हैं। पूजा के बाद उसका मांस पूरी बस्ती में बांटते हैं। सिर का मांस महिलाओं को नहीं दिया जाता।

मैंने पूछा- कैसे पता चलता है कि भूत आ गया?

वह बताते हैं- अगर किसी घर में कोई बीमार पड़ जाए या शराब खराब हो जाए तो समझा जाता है कि जंगली सूअर का भूत आ गया है। फिर भूत को शांत करने के लिए 20 सूअर और 40 मुर्गियों की बलि दी जाती है।

जानवरों के कंकाल से सजा मंदिर।

जानवरों के कंकाल से सजा मंदिर।

रसोई में टांगते हैं मिथुन का सींग

इसके बाद वह हमें अपनी रसोई में ले जाते हैं। रसोई इतनी बड़ी है कि 20-25 लोग आराम से बैठ सकते हैं। बीचों-बीच चूल्हा जल रहा है। पुरुषों और महिलाओं के बैठने की जगह अलग-अलग तय है। जहां पुरुष बैठते हैं, वहां महिलाएं नहीं बैठ सकतीं।

रसोई में बैठे परिवार के लोग गालो भाषा में बात कर रहे हैं। एक महिला सभी को शराब और सूखा मांस परोसती हैं। शराब को यहां ‘पोको’ कहते हैं, जो चावल और धान की भूसी से बनी होती है।

इस दौरान मेरी नजर रसोई की एक दीवार पर पड़ी, जहां जानवरों के सींग टंगे हैं।

रसोई में टंगा मिथुन का सींग।

रसोई में टंगा मिथुन का सींग।

मैंने पूछा- ये किसके सींग हैं?

बुजुर्ग महिला पाकंगम पाकम ईंगो बताती हैं- ‘ये मिथुन के सींग हैं। मिथुन हमारी परंपरा में शामिल है, खासकर शादी के वक्त। दरअसल, मिथुन अरुणाचल प्रदेश का राजकीय पशु है, जो पहाड़ी बैल जैसा होता है।’

वह एक पुरानी कथा सुनाती हैं। उनके मुताबिक, गालो समुदाय के लोग कभी गुफाओं में रहा करते थे और बहुत जरूरत पड़ने पर ही बाहर निकलते थे।

एक दिन एक विशाल पत्थर गुफा के मुहाने पर आ गिरा और रास्ता पूरी तरह बंद हो गया। गालो लोगों ने एक-एक कर कई जानवरों को उस पत्थर को हटाने के लिए भेजा, लेकिन कोई कामयाब नहीं हुआ।

आखिर में मिथुन को भेजा गया। उसने अपनी ताकत से जोरदार धक्का मारा और पत्थर को हटा दिया।

कहा जाता है कि उसी दिन से गालो लोग गुफा से बाहर निकलकर खुले संसार में आकर रहने लगे। तभी से मिथुन हमारे लिए सिर्फ एक जानवर नहीं, बल्कि पूजनीय साथी माना जाता है।

गुफा के मुहाने का पत्थर हटाता मिथुन।

गुफा के मुहाने का पत्थर हटाता मिथुन।

मैंने पूछा- मिथुन यहां की परंपराओं में कैसे शामिल है?

वे बताती हैं- सबसे पहले लड़के वाले, लड़की के परिवार को संदेश भेजते हैं कि हमारा बेटा, आपकी बेटी से शादी करना चाहता है। रिश्ता तय होते ही लड़के वाले दहेज के रूप में लड़की के परिवार के लिए मछली, तलवार, 10 मिथुन और 10 गाय भेजते हैं। इस प्रथा को ‘अरी’ कहते हैं।

इसके बाद, दोनों परिवार शादी का दिन तय करते हैं। फिर हमारे यहां लड़का और लड़की धनुष के एक-एक सिरे को पकड़ कर घर के सात फेरे लेते हैं। यह घर लड़के का होता है। फेरे के बाद शादी हो जाती है।

उसके बाद नई दुल्हन ससुराल आने पर सबसे पहले घर की चौखट पर मुर्गी की बलि देती है और लड़की का भाई मिथुन की बलि देता है। कोई 10, कोई 20 तो कोई 50 की बलि देता है, जो जितनी ज्यादा बलि देता है, वह उतना संपन्न माना जाता है।

वह बताती हैं, हमारे यहां बच्चों का नाम रखने की भी खास परंपरा है। पिता के नाम के आखिरी अक्षर से बेटे का नाम शुरू होता है। जैसे- पिता का नाम- ’आबो’ है तो बेटे का नाम ‘बो’ से शुरू होगा। इससे हमें हमारे पूर्वजों के नाम याद रहते हैं।

इस बातचीत के दौरान ही लिबोन की पत्नी घर से बाहर आती हैं। वह मुझे अपना लोअर ‘गाले’ पहनाती हैं। यह यहां का पारंपरिक लिबास है।

अपने पारंपरिक लिबास में एक गालो युवती।

अपने पारंपरिक लिबास में एक गालो युवती।

मोपिन देवी की पूजा करते हैं

अब तक दोपहर के 2 बज गए थे। हम फिर से पुरोहित मोगी ओरी के घर वापस पहुंचते हैं। वो मोपिन उत्सव के बारे में बताते हुए कहते हैं- गालो समुदाय में हमारे एक पूर्वज थे- औबोतनि। वह घुमक्कड़ थे। इधर-उधर घूमते रहते थे।

माना जाता है कि हमारी मोपिन देवी ने उन्हें खेती करना सिखाया, ताकि वह एक स्थान पर ही रहें, इधर-उधर भटकें नहीं।

मोपिन देवी, मां लक्ष्मी का रूप मानी जाती हैं। उनके आशीर्वाद से ही गालो लोगों ने खेती करना सीखा। उसके बाद हम एक जगह बस गए। तब से हर साल अप्रैल के पहले हफ्ते में मोपिन उत्सव मनाया जाता है।

इस उत्सव पर सभी एक-दूसरे के चेहरे पर चावल का आटा लगाते हैं। मिथुन की बलि दी जाती है। जिस मिथुन को बलि के लिए चुना जाता है, उसे बलि से एक रात पहले मोपिन देवी के मंदिर के बाहर बांध जाता है।

सुबह उसकी बलि दी जाती है और मांस को बांटा जाता है। मान्यता है, यह मांस खाने से दुख दूर होता है। इसलिए इसे खाना जरूरी होता है।

पुरोहित बताते हैं- गालो सूर्य यानी ‘दौनी’ और चंद्रमा यानी ‘पौलो’ की पूजा करते हैं। सुबह-शाम बाकायदा ध्यान भी लगाते हैं।

मौत पर गीत गाते हैं, देते हैं बलि

इसके बाद, पुरोहित मुझे गालो समुदाय में होने वाले अंतिम संस्कार के बारे में बताते हैं। वे कहते हैं- हमारे यहां मौत के बाद दफनाने की परंपरा है, क्योंकि इंसान धरती से पैदा हुआ है, इसलिए उसे धरती की ही गोद में लौटना चाहिए।

यदि गालो समुदाय में किसी की मौत होती है, तो पूरी रात शव के पास बैठकर महिलाएं गीत गाती हैं। उस दौरान पुरुष और पुरोहित अपनी भाषा में लगातार मंत्र पढ़ते हैं।

फिर मुर्गी, गाय, भेड़ और बकरी की बलि दी जाती है। मृतक की समाधि पर उसका मनपसंद भोजन रखा जाता है।

शव को दफनाने के बाद पांच दिन तक बस्ती में भोज चलता है। गालो मानते हैं कि यदि किसी को मरने के बाद जलाया जाए तो वह यमलोक चला जाता है और फिर लौटकर नहीं आता।

इस सीरीज में अगले हफ्ते पढ़िए लेह के बौद्ध तपस्वियों की कहानी….

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