![]()
एक बार मैं नहर किनारे बैठा था। पानी में एक पॉलिथीन तैरती दिखी। मुझे लगा नारियल होगा, ऐसे ही पॉलिथीन में नारियल बहकर आते थे। मैंने तुरंत पानी में छलांग लगा दी और पॉलिथीन खींचकर किनारे ले आया। पॉलिथीन बहुत भारी थी। जैसे ही उसे खोला, मेरी सांसें अटक गईं। अंदर दो कटे हुए हाथ थे। जो पूरी तरह सड़ चुके थे। कुछ पल के लिए शरीर सुन्न पड़ गया। हाथ से पॉलिथीन छूट गई। धीरे-धीरे नहर से उस लाश के कई हिस्से निकले। वह एक बूढ़े की लाश थी। पुलिस आई तो पता चला कि महज डेढ़ लाख रुपए के लिए उसके भाइयों ने ही उसे मारकर, काटकर नहर में फेंक दिया था। लाश के टुकड़े देखने के बाद मैं कई दिन तक सो नहीं पाया। अब जब भी पानी में कोई पॉलिथीन दिखती तो लगता है वही लाश होगी। मैं गोताखोर परगट सिंह। हरियाणा के कुरुक्षेत्र के छोटे से गांव दबखेड़ी का रहने वाला हूं। 40 साल का हूं। पिछले 18 सालों में 20 हजार से ज्यादा लाशें नहरों से निकाल चुका हूं। इनमें से ज्यादातर लाशें गल चुकी थीं। जब उनका अंतिम संस्कार हुआ तो मांस, हड्डी से एकदम अलग हो चुका था। 16 साल का था, जब नहर से पहली बार लाश निकाली थी। एक दिन की बात है। मैंने नहर से नारियल निकाला और किनारे बैठकर खा रहा था। तभी 20 साल की लड़की की लाश बहती हुई आई। पीछे-पीछे उसका परिवार भी रोते हुए आ गया। ये लोग पंजाब के देवीगढ़ के रहने वाले थे। वे लोहे की रॉड और डंडों से लाश को बाहर निकालने की कोशिश कर रहे थे, लेकिन निकाल नहीं पा रहे थे। फिर मुझसे गुजारिश करने लगे कि शव को किनारे लगा दो। मैं फौरन नहर में कूद गया और लाश के कपड़े पकड़कर किनारे ले आया। परिवार ने बहुत शुक्रिया किया। उसके बाद पुलिस पहुंची। अगले दिन पुलिस के साथ अखबार में मेरी फोटो छपी, यहीं से जिंदगी बदल गई। गांव में खबर फैल गई कि आज अखबार में परगट की फोटो छपी है। तब से नहर से लाशें निकालने का सिलसिला ऐसे ही चलता रहा। न जाने कितनी बार अखबार में मेरी फोटो छपी। अब मोबाइल का जमाना है। सोशल मीडिया पर मेरे वीडियो वायरल होने लगे हैं। दरअसल, जिस परिवार की लाश निकालता वही लोग मेरा नंबर अपने परिचितों को दे देते। धीरे-धीरे ये सिलसिला बढ़ता गया। आप जिस नहर को देख रही हैं, यह हमारे यहां की नरवाना ब्रांच नहर है। इसी में पंजाब की तरफ से सबसे ज्यादा लाशें बहकर आती हैं। यह भाखड़ा मेन लाइन की शाखा है। यह पंजाब के राजपुरा से शुरू होकर हरियाणा से होते हुए दिल्ली तक जाती है। इसका पानी जितना शांत दिखाई देता है, उतना है नहीं। बचपन में जब नहर में नहाने आता था, तब सोचा नहीं था कि एक दिन इसी नहर से सड़ी-गली लाशें निकालूंगा। पढ़ाई में मन नहीं लगता था। 8वीं में फेल हो गया। तब गुस्से में पिताजी ने पढ़ाई भी छुड़वा दी। धीरे-धीरे गोताखोर बन गया। अब तो गहरे पानी और तेज रफ्तार वाली नहरों से लाशें निकालने देशभर में जाता हूं। तैराकी तो आसान है। वह मजे के लिए होती है, जबकि गोताखोरी बहुत मुश्किल। शुरुआत में तो उन लाशों को निकालता था, जो पानी के ऊपर तैर रही होती थीं। फिर यूट्यूब से गोताखोरी सीखी। हालांकि, पेशेवर गोताखोरी सीखने के बाद भी पानी के अंदर से लाशें नहीं निकाल पाता था; लेकिन नहर की तलहटी से कीमती सामान-जैसे बाइक, गाड़ियां, सिलेंडर, चश्मे, मोबाइल और गहने, निकालना सीख लिया था। फिर धीरे-धीरे, पानी से लाशें निकालना भी शुरू कर दिया। अब जब नहर में 40 फीट नीचे सिलेंडर लगाकर जाता हूं तो दिमाग में दो बातें होती हैं। एक वह जो नहर किनारे खड़ा बेसब्री से मेरा इंतजार कर रहा होता है। दूसरा कि कहीं इतने गहरे पानी में ही न मर जाऊं कि लोग मेरी लाश ढूंढे़ं। उत्तर प्रदेश का एक किस्सा है। जब रुड़की नहर में एक 14 साल के बच्चे की लाश ढूंढ़ रहा था। नहर में 15 फीट नीचे गया था। शरीर में बंधी रस्सी एक पेड़ में फंस गई और सांस लेने के लिए मुंह पर लगी पाइप निकल गई। मुझे लगा कि अब नहीं बचूंगा। छटपटा रहा था। मेरे सहयोगी ने बड़ी मुश्किल से मुझे बाहर निकाला। 20 मिनट तक ठीक से सांस नहीं ले सका, फिर वही काम करने लगा। कई बार तो मगरमच्छों वाली नहर में भी गोते लगाए हैं। गोताखोरी के दौरान मौत की दर्दनाक कहानियां सामने आईं। पलभर के गुस्से में आकर लोग बिना सोचे नहर में छलांग लगा देते हैं। पीछे से उनके परिवार वाले चार-चार, पांच-पांच दिन तक गर्मी में, सर्दी में नहर किनारे लाश खोजते हैं। जब तक लाश नहीं मिलती है वे खाना तक नहीं खाते। चार दिन पहले की बात है। हरियाणा के कुरुक्षेत्र के झांसा गांव के पास सतलुज-यमुना लिंक नहर के किनारे एक लावारिस कार मिली। कैथल जिले के कॉल गांव के 30 साल के पुनीत ने नहर में छलांग लगा दी थी। नहर किनारे पूरा परिवार रातभर बैठा रहा। मैंने बड़ी मुश्किल से उस लाश को निकाला। लाश सड़ने लगी थी। दरअसल, गर्मियों में कोई लाश तीन से चार दिन तक पानी में रहे तो उसकी बुरी हालत हो जाती है। दो दिन पहले मैंने नरवाना नहर से लाश निकाली। पूरी तरह सड़ चुकी थी। पैंट की जेब से एक फोन मिला। पुलिस को बताया तो पता लगा कि उसने पांच महीने पहले पंजाब के राजपुरा की नहर में छलांग लगाई थी। परिवार कल ही लाश को लेकर अपने घर गया है। यह काम करते 18 साल हो चुके हैं। कुछ केस तो कभी नहीं भूल पाऊंगा। एक केस करनाल के मधुबन नहर का है। पति-पत्नी का झगड़ा हुआ था। गुस्साए पति ने अपने दो साल, छह साल और 9 साल के बच्चे को मोटरसाइकिल पर बिठाया और एक-एक करके उन्हें नहर में फेंक दिया। गांव में खबर पहुंची तो बच्चों के दादा को हार्ट अटैक आ गया और उनकी भी मौत हो गई। उसके बाद पत्नी ने सोचा कि सिर्फ एक झगड़े ने उसके बच्चे छीन लिए। उसने भी आत्महत्या कर ली। पिता को जेल हुई। 10 दिन बाद जेल में ही उसने फांसी लगाकर जान दे दी। सोचिए महज 15 दिन में पूरा परिवार खत्म हो गया। इस केस में 9 साल की लड़की का शव तीसरे दिन मिला, बेटे का चौथे दिन। लेकिन दो साल के बच्चे का पता नहीं चला। उसे या तो मछलियां खा गई होंगी या मगरमच्छ। यह केस मुझे बहुत दर्द देता है। एक साल पहले की बात है। सर्दियों की रात थी और घड़ी में करीब 12 बजे थे। कुछ मजदूर अपना काम खत्म करके नरवाना ब्रांच नहर के किनारे दबखेड़ी पुल के पास पहुंचे थे। उनमें से एक के पास मेरा नंबर था। उसने मुझे फोन किया। बताया कि नहर में किसी औरत के चीखने की आवाज आ रही है। मैंने फौरन बाइक उठाई और नहर की तरफ भागा। वहां एक औरत मरे हुए मुर्गों से भरी एक बोरी पकड़कर चार किलोमीटर तैरकर आई थी। मुझे देखकर जोर से चिल्लाने लगी। तुरंत पानी में कूदा और उसे बाहर निकाला। उसने बताया कि पति ने उसे नहर में धक्का दे दिया था। वह कुरुक्षेत्र की थी। किसी घरेलू झगड़े के चलते उसके पति ने धक्का दे दिया था। वह आज भी कभी-कभी फोन करके मुझे शुक्रिया कहती है। सबसे ज्यादा दुख तब होता है, जब किसी बुजुर्ग की लाश मिलती है। उनके हाथ-पांव बंधे होते हैं या उन्हें किसी वजनदार चीज से बांधकर डुबोया गया होता है। कई बार कूलर में उनकी बॉडी बांधकर फेंक दी जाती है। ऐसे ही एक जवान लड़के की लाश मिली थी। उसके पेट में 26 बार चाकू घोंपा गया था। सिर फटा हुआ था। टांगों को रॉड मार-मार कर जख्मी कर दिया गया था। उस लाश को देखकर लगा कि इंसानी रिश्ते किस तरह से स्वाहा हो चुके हैं। लोगों की सहनशीलता बहुत कम हो गई है। पिछले 24 घंटे में पांच लाशें निकाल चुका हूं। ये हर दिन का एवरेज है। मुझे सबसे खराब लगता है नहर किनारे किसी अपने की लाश का इंतजार करना। खासकर किसी मां का अपने बच्चे की लाश का इंतजार करना। एक बार नरवाना ब्रांच की नहर में एक मां अपने बच्चे की लाश का इंतजार करती रही। मैंने बहुत कोशिश की, लेकिन नहीं मिली। वह रातभर वहीं रही। उसके बाद भी कई बार आई। अंबाला का एक मामला है। पति-पत्नी के बीच झगड़ा हुआ था। महिला अपनी 6 महीने और दो साल की बच्ची के साथ नहर में कूद गई थी। 6 महीने की बच्ची तो किसी तरह किनारे आ गई और लोगों ने उसे बचा लिया, लेकिन महिला की लाश मिलने के बाद भी उसकी दो साल की दूसरी बच्ची का कुछ पता नहीं चल सका। अपनी बात करूं तो यह काम आसान नहीं है। गोताखोरी के शुरुआत के तीन साल बहुत कष्ट देने वाले रहे। पहले जब किसी की लाश निकालकर घर आता तो मां-बाप गालियां देते थे। घर के अंदर नहीं आने देते थे। बोलते- नहाकर, कपड़े बदलने के बाद ही घर में घुसना। कई बार तो घर से बाहर निकाल देते थे। खाना नहीं देते थे। उस वक्त नहर पर चला जाता था और रात में वहीं सोता था। जब मेरी शादी हुई तो पत्नी ने भी मुझसे बहुत झगड़े किए। वह चाहती थी कि यह काम छोड़ दूं, लेकिन नहीं छोड़ पाया। आज मेरी चार बेटियां हैं। बड़ी बेटी 18 साल की है और सबसे छोटी 5 साल की है। जब कोई लाश निकालकर आता तो पत्नी बेटियों को हाथ नहीं लगाने देती थीं। रिश्तेदार कहते हैं कि तू जाट है। खेती करना तेरा काम है न कि नहर से मुर्दे निकालना। वे बोलते थे कि बच्चे कैसे पालोगे? लेकिन उनकी बातों का मुझ पर ज्यादा असर नहीं होता। घर से निकलता हूं तो सीधे नहर पर ही पहुंचता हूं। (परगट सिंह ने अपने ये जज्बात भास्कर रिपोर्टर मनीषा भल्ला से साझा किए) ———————————————— 1- संडे जज्बात- ‘साथ नहीं नाचूंगी’ कहते ही रिवॉल्वर तानकर नचाया:एक ने कमर में हाथ डालकर पूछा- कितना लोगी? डांसर हूं, शरीर बेचने वाली नहीं मैं अंजली चौधरी। पंजाब के लुधियाना की उस गली में रहती हूं, जहां से कई मशहूर कलाकार निकले हैं। बचपन में जब उन कलाकारों के किस्से सुनती थी, तो लगता था- स्टेज यानी मंच की जिंदगी कितनी अच्छी होती होगी। तेज म्यूजिक होती है। लोगों की तालियां बजती हैं, नाम होता है… और अच्छे पैसे भी मिलते हैं। 2- संडे जज्बात-हम अधेड़ कुंवारे कौवों जैसे अपशकुन माने जाते हैं:सरकार हमें देती है पेंशन, जाने कितने जानवरों से रेप करते पकड़े गए लोग मुझे मेरे नाम से कम, रं@#% कहकर ज्यादा बुलाते हैं। मुझे शुभ कामों से दूर रखा जाता है। गलती से पहुंच जाऊं तो लोगों का चेहरा उतर जाता है। मैं वीरेंद्र दून। हरियाणा के जिला हांसी के गांव पेटवाड़ का रहने वाला हूं। पूरी स्टोरी यहां पढ़ें
Source link
संडे जज्बात- सगे भाई को काटकर नहर में फेंका:मैंने नारियल समझकर पानी से निकाला, पॉलिथीन खोली तो सड़े हुए दो हाथ मिले
Leave a Comment
Leave a Comment















