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9 बरस की लड़की दीवार के सहारे खड़ी है। नाम है आद्या। शरीर ऐसा मानो हड्डी के ऊपर सिर्फ चमड़ी चढ़ी हो। वजन 17 किलो, यानी 4 साल के बच्चे जितना। खेलने-कूदने की उम्र में आद्या को मौत कब आ जाए, कह नहीं सकते। इसका दिल महज 60% ही काम कर रहा है, यानी कभी भी हार्ट अटैक आ सकता है। आद्या दुर्लभ बीमारी से जूझ रही है। जिसमें जिंदा रहने की एक ही शर्त है- पैसा। सालभर में 72 लाख रुपए, यानी हर महीने 6 लाख। जैसे-जैसे शरीर का वजन बढ़ेगा, खर्च भी बढ़ता जाएगा। जिस दिन पैसे खत्म, उसी दिन आद्या की सांसें भी थम सकती हैं। आद्या की बहन को भी यही बीमारी थी। 13 महीने की उम्र में उसे दो बार हार्ट अटैक आया और उसकी मौत हो गई। हालांकि आद्या फिलहाल ठीक है। फ्रांस की एक कंपनी उसका इलाज करा रही है। दुर्लभ बीमारियों की सीरीज- ऐ जिंदगी में मैं नीरज झा पहुंचा हूं, हैदराबाद से 30 किलोमीटर दूर हिम्मत नगर। आज कहानी यहीं से… शाम के 5 बज रहे हैं। हल्की बूंदाबांदी हो रही है। इतने में, आद्या के पिता राज बोधुना आते हैं। वे कहते हैं- जिस बेटी के बारे में मैंने आपसे फोन पर बात की थी, यह वही है। इसे देखते ही आपको अंदाजा लग गया होगा कि यह कितनी कमजोर है। राज बताते हैं- 4 साल पहले यही बीमारी मेरी दूसरी बेटी आयरा को निगल गई। वो सिर्फ 13 महीने ही जी पाई। और अब… कहते-कहते राज आद्या का हाथ कसकर पकड़ लेते हैं। जैसे कोई उनकी बेटी को छीनने वाला हो। फिर कहते हैं- जब से इस बीमारी के बारे में पता चला है, तबसे हमने कल के बारे में सोचना ही छोड़ दिया। रोज सुबह भगवान से प्रार्थना करते हैं कि आज का दिन आद्या जी भरके जी ले, क्योंकि अगली सुबह क्या होगा, पता नहीं। आद्या जब 4 साल की थी, तब इस बीमारी का पता चला। अब आद्या की जिंदगी का एक ही नियम है- हर 15 दिन में अस्पताल जाना और ‘एंजाइम थेरेपी’ करवाना। जब थेरेपी रुकेगी, सांसें भी रुक जाएंगी। अभी एक थेरेपी में 4 घंटे का वक्त लगता है और 3 लाख रुपए खर्च होते हैं। मैं ठहरा एक पुलिस कॉन्स्टेबल। मेरी तनख्वाह इतनी भी नहीं कि मैं अपनी बेटी की सांसों की कीमत चुका सकूं, इसी बेबसी में एक बेटी को खो चुका हूं। शुरुआत में तो आद्या इंजेक्शन देखकर डर जाती थी, रोने लगती थी, लेकिन अब उसे फर्क नहीं पड़ता। इतना कहते ही राज की आंखें भर आती हैं। वे कहते हैं- आज छोटी बेटी आयरा होती, तो 5 साल की होती। मेरे मोबाइल में उसकी कई तस्वीरें हैं, लेकिन कभी देखने की हिम्मत नहीं होती। जब वह इस दुनिया में आई थी, तो ठीक थी। उसका वजन 7 किलो तक बढ़ गया था, लेकिन इस बीमारी की ऐसी नजर लगी कि कुछ ही दिनों में वह सूखकर 4 किलो की रह गई। बगल में ही बैठी राज की पत्नी निरोसा भी रोने लगती हैं। मोबाइल में आयरा के फोटो दिखाते हुए कहती हैं- आद्या 2017 में पैदा हुई थी। 2020 तक हमें पता नहीं था कि इसे कोई बीमारी है। बाकी बच्चों की तरह खेलती-कूदती, लेकिन जल्दी थक जाती थी। नवंबर 2020 में जब दूसरी बेटी आयरा का जन्म हुआ और वह बीमार हुई, तब इस बीमारी के बारे में पता चला। राज बताते हैं- ‘अगस्त 2021 की बात है। आयरा 7 महीने की थी। उसने दूध पीना कम कर दिया था। उसे लगातार दस्त लग रहे थे। शरीर कमजोर होता जा रहा था। हम उसे लेकर शहर पहुंचे। डॉक्टरों की सलाह पर कई टेस्ट कराए, लेकिन कुछ पता नहीं चला।’ तभी, एक बाल रोग विशेषज्ञ ने जेनेटिक टेस्ट कराने की सलाह दी। सैंपल मुंबई भेजे। करीब 15 दिन बाद रिपोर्ट आई। डॉक्टरों ने बताया कि आपकी बेटी को पॉम्पे डिजीज है। यह 6 महीने से ज्यादा जिंदा नहीं रहेगी। उन्होंने बताया- यह जेनेटिक बीमारी है। लाखों बच्चों में से किसी एक को होती है। तब पहली बार हमें इस बीमारी के बारे में पता चला। राज कहते हैं- तब मैंने अपनी पत्नी निरोसा को बीमारी के बारे में कुछ नहीं बताया था। जब भी पूछती, मैं हंसकर टाल देता। कहता- अरे, कुछ नहीं हुआ है, बस हार्ट में मामूली दिक्कत है। दवा से सब ठीक हो जाएगा। लेकिन अंदर ही अंदर मैं रोज मर रहा था। उस वक्त आयरा का हार्ट सिर्फ 30-40% ही चल रहा था। वह 13 महीने की हो गई थी, लेकिन उसमें इतनी भी जान नहीं थी कि वह खड़ी हो सके। 9 जनवरी 2022 की बात है। आयरा की सांसें अचानक उखड़ने लगी। हम उसे लेकर अस्पताल भागे। डॉक्टरों ने उसे वेंटिलेटर सपोर्ट पर रखा। कुछ देर बाद जब डॉक्टर बाहर आए, तो उन्होंने कहा- इसे नहीं बचा पाएंगे, पैसा और समय बर्बाद न करें, इसे घर ले जाएं। बच्ची कुछ ही दिनों की मेहमान है। मैं और मेरी पत्नी ने बिलखते हुए डॉक्टर से कहा- एक बार देख लीजिए, शायद चमत्कार हो जाए। हमारे कहने पर डॉक्टरों ने उसे भर्ती तो रखा, लेकिन 2 दिन बाद फिर कहा- घर ले जाइए, कुछ नहीं हो सकता। हम अपनी बच्ची को लेकर पुराने घर मनचेरियल आ गए। यह शहर हैदराबाद से 250 किलोमीटर दूर है। तीन-चार दिन ही बीते थे कि एक दिन अचानक आयरा की तबीयत बिगड़ने लगी। उसे लगातार दो बार दिल का दौरा पड़ा। वो मेरी गोद में ही थी। देखते ही देखते उसकी सांसें थम गई। उस वक्त उसकी नन्ही-सी उंगली मेरी हथेली में फंसी हुई थी, जैसे वह जीने की कोशिश कर रही हो। मैं बार-बार उसे सीपीआर देता रहा, ऑक्सीजन लगाने की कोशिश करता रहा। लेकिन मेरी बच्ची इस दुनिया से जा चुकी थी। यह कहते-कहते राज और पास बैठी निरोसा फूट-फूटकर रोने लगती हैं। मोबाइल में एक तस्वीर दिखाते हुए निरोसा कहती हैं- जब भी इस तस्वीर को देखती हूं, तो गला भर आता है। खाना-पीना भी छूट जाता है। मुझे याद है- मैं उस दिन किचन में डोसा बना रही थी। अब जब कभी डोसा बनाती हूं, तो उसकी खिलखिलाहट कानों में गूंजने लगती है और हाथ थम जाते हैं। बहुत प्यारी थी मेरी बच्ची। अब दोनों की नजरें आद्या पर आकर टिक जाती हैं। राज कहते हैं- जब आयरा की बीमारी के बारे में पता चला, तब डॉक्टर ने पूछा- आपके और भी बच्चे हैं? मैंने कहा- हां, एक और बेटी है। डॉक्टर ने हिदायत दी कि ‘बड़ी बेटी आद्या का भी जेनेटिक टेस्ट करवाओ। मुमकिन है कि उसे भी यह बीमारी हो।’ आद्या का सैंपल लिया। रिपोर्ट में पता चला ‘पॉम्पे डिजीज’ है। डॉक्टर ने बताया कि आद्या का हार्ट सिर्फ 60% काम कर रहा है। डॉक्टर से पूछा- क्या इसका कोई इलाज नहीं है? तब उन्होंने समझाया कि इसके लिए एक थेरेपी होती है- एंजाइम रिप्लेसमेंट थेरेपी (ERT)। अगर आद्या को यह थेरेपी ताउम्र दी जाए, तभी उसकी जान बच सकती है। ये थेरेपी इतनी महंगी थी कि पैसे का इंतजाम कहां से होगा, हम समझ ही नहीं पा रहे थे। जैसे-जैसे आद्या का वजन बढ़ेगा, खुराक बढ़ेगी, वैसे-वैसे थेरेपी का खर्च भी बढ़ेगा। सबकुछ पता होने के बाद भी तीन साल तक हम कुछ नहीं कर पाए। हर दिन आद्या को अपनी आंखों के सामने कमजोर होते देखते रहे। आखिरकार, साल 2024 में एक उम्मीद जागी। केंद्र सरकार ने रेयर डिजीज फंड से 50 लाख रुपए की सहायता मंजूर की। तब जाकर आद्या की एंजाइम थेरेपी शुरू हो सकी। एक साल बाद, एंजाइम बनाने वाली फ्रांस की कंपनी ने भी आद्या को छह महीने तक मुफ्त दवा देने की मंजूरी दी है। आज मेरी बेटी की हर सांस उसी दवा के सहारे चल रही है। लेकिन डर लगता है, जिस दिन यह दवा बंद हो जाएगी, मैं अपनी बच्ची से हाथ धो बैठूंगा। डॉक्टरों ने आद्या के खेलने-कूदने और दौड़ने-भागने के लिए मना किया है। स्कूल में जब बाकी बच्चे खेलते हैं, तो यह सिर्फ दूर से उन्हें देखती है। जब वह मुझसे पूछती है- पापा, मेरे बाकी दोस्त तो इतना खेलते-कूदते हैं, मैं क्यों नहीं खेल सकती तो मैं कोई जवाब नहीं दे पाता। आप ही बताइए, मैं उस 9 साल की बच्ची को कैसे समझाऊं कि उसका दिल बहुत कमजोर है। कभी भी, कुछ भी हो सकता है। इतने में आद्या, राज की गोद में आकर बैठ जाती है। वह बेटी को कसकर गले लगा लेते हैं। इसके बाद आद्या की एक-एक रिपोर्ट, एक-एक प्रिस्क्रिप्शन दिखाने लगते हैं। अचानक उनकी नजर 2021 के एक प्रिस्क्रिप्शन पर जाकर ठहर जाती है। तब आद्या का वजन 13 किलोग्राम था। डॉक्टरों ने इलाज के लिए जिस थेरेपी की सलाह दी थी। उसका सालाना खर्च लगभग 65 लाख रुपए बताया था। सब कुछ देखने, सुनने के बाद भी इस बीमारी को लेकर मेरे मन में कई सवाल उठ रहे हैं। किसी बच्ची को इतनी कम उम्र में हार्ट अटैक कैसे आ सकता है? भारत में इस बीमारी के 50 केस, महंगा इलाज बड़ी चुनौती इस बीमारी को गहराई से समझने के लिए हैदराबाद के निजाम इंस्टीट्यूट ऑफ मेडिकल साइंसेज (NIMS) के जेनेटिक विभाग की विभागाध्यक्ष डॉ. प्रजन्या रंगनाथ से मुलाकात की। उन्होंने आयरा और आद्या की बीमारी के बारे में बताया कि ‘यह रेयर डिजीज है। भारत में अब तक इसके करीब 50 मामले सामने आए हैं। हालांकि कोई सटीक रिकॉर्ड नहीं है। 2020 से पहले तो ऐसी दुर्लभ बीमारियों पर चर्चा ही नहीं होती थी।’ डॉ. रंगनाथ बताती हैं– ऐसी बीमारियों से जूझ रहे परिवारों के सामने सबसे बड़ी चुनौती सिर्फ बीमारी नहीं, बल्कि समय पर पहचान और महंगा इलाज। पॉम्पे डिजीज भी ऐसी ही एक जेनेटिक बीमारी है। इसे समझने के लिए पहले शरीर के एनर्जी सिस्टम को जानना होगा। हम जो भी खाना खाते हैं, हमारा शरीर उसे ग्लूकोज में बदल देता है। यही ग्लूकोज हमारे शरीर का असली ‘ईंधन’ है, जिससे हमारे अंगों और मांसपेशियों को काम करने के लिए ऊर्जा मिलती है। जब शरीर में जरूरत से ज्यादा ग्लूकोज बन जाता है, तो हमारा सिस्टम उसे भविष्य के लिए सुरक्षित रख लेता है। इस स्टोर किए गए ग्लूकोज को ‘ग्लाइकोजन’ कहते हैं। जब हम कोई काम करते हैं या दौड़ते हैं, तब शरीर को तुरंत ऊर्जा देने के लिए इस स्टोर किए गए ‘ग्लाइकोजन’ को वापस ग्लूकोज में तोड़ना पड़ता है। इस काम को अंजाम देने के लिए हमारे शरीर में GAA यानी एसिड अल्फा-ग्लूकोसिडेस नाम का एक खास एंजाइम होता है। लेकिन पॉम्पे डिजीज के मरीजों में खेल यहीं बिगड़ जाता है। इस बीमारी में मरीज के शरीर में यह बेहद जरूरी GAA एंजाइम या तो बनना बंद हो जाता है या बहुत कम हो जाता है। नतीजा यह होता है कि जब यह एंजाइम ही नहीं रहता, तो ग्लाइकोजन टूट नहीं पाता और कचरे की तरह शरीर के अंगों व मांसपेशियों में जमा होने लगता है, जिससे मांसपेशियां धीरे-धीरे कमजोर और बेजान होने लगती हैं। शरीर का विकास रुक जाता है। सबसे ज्यादा असर फेफड़ों और हार्ट पर पड़ता है। खासकर बच्चों में यह दिल को कमजोर कर देता है। अगर समय रहते इस बीमारी की पहचान कर थेरेपी शुरू न की जाए, तो मरीज का दिल किसी भी वक्त धड़कना बंद कर सकता है। डॉ. रंगनाथ कहती हैं– ‘कुछ समय पहले फ्रांसीसी दवा कंपनी ने एक एंजाइम मायोजाइम तैयार किया था। इसे ‘एंजाइम रिप्लेसमेंट थेरेपी’ के जरिए ड्रिप से मरीज के शरीर में पहुंचाया जाता है, जो ग्लाइकोजन को तोड़कर ग्लूकोज बनाने में मदद करता है। मरीज के वजन के हिसाब से दी जाती है थेरेपी डॉ. रंगनाथ कहती हैं- इस थेरेपी का पूरा गणित मरीज के वजन पर टिका होता है। इस थेरेपी को हर 15 दिन में एक बार दिया जाता है। मरीज के प्रति 1 किलोग्राम वजन पर 20 मिलीग्राम दवा की जरूरत होती है। आद्या का वजन 17 किलो है। नियमानुसार प्रति किलो 20 मिलीग्राम दवा चाहिए, यानी हर 15 दिन में 340 मिलीग्राम (करीब 7 वायल) का डोज लगेगा। एक वायल 35 से 45 हजार के बीच में आती है। इस तरह एक बार का खर्च करीब 3 लाख रुपए आता है। यह थेरेपी 15 दिन में ही क्यों होती है? डॉ. रंगनाथ कहती हैं- मरीज का शरीर खुद एंजाइम नहीं बना पाता। नस के जरिए दी गई दवा का असर शरीर में केवल 7 से 10 दिनों तक ही रहता है। इसके बाद मांसपेशियों में जहरीला ग्लाइकोजन फिर जमा होने लगता है। इस चक्र को रोकने और दिल-फेफड़ों को सुरक्षित रखने के लिए हर 15 दिन में थेरेपी जरूरी है। डॉ. रंगनाथ कहती हैं- पॉम्पे डिजीज किसी भी उम्र में हो सकती है। लक्षणों के आधार पर इसके दो रूप हैं। बच्चे को पॉम्पे डिजीज है या नहीं, गर्भ में पता लग सकता है? डॉ. रंगनाथ कहती हैं- गर्भ के दौरान पॉम्पे डिजीज का पता दो मुख्य टेस्ट से लगाया जाता है। प्रेग्नेंसी के बाद 10 से 13 हफ्ते में कोरियोनिक विलस सैंपलिंग (CVS) के जरिए गर्भनाल का सैंपल लिया जाता है। इसके अलावा, 15 से 20 हफ्ते में एम्नियोसेंटेसिस टेस्ट के जरिए इस बीमारी का पता लगाया जा सकता है। ————————————- ऐ जिंदगी सीरीज की यह खबर भी पड़ें… 1- 14 की उम्र में शरीर बना ‘पेड़ की छाल’: उठो या बैठो फटने लगती है चमड़ी, मन करता है छीलकर फेंक दूं; देश का अकेला केस दोपहर के 1 बजे हैं। जंगल के ऊबड़-खाबड़ रास्तों पर कार हिचकोले खा रही है। तेज गर्मी से गला लगातार सूख रहा है। करीब 2 घंटे बाद जंगलों में कुछ झोपड़ियां नजर आती हैं। इन्हीं झोपड़ियों में से एक के सामने हमारी कार रुकी। झोपड़ी के बाहर एक लड़की बेजान सी खड़ी नजर आई। उसकी मटमैली शर्ट और हाफ पैंट के बाहर जितना भी शरीर दिख रहा है, वह बेहद डरावना है। पूरी स्टोरी यहां पढ़ें… 2. 17 की उम्र में हो गई 70 साल की बूढ़ी:झुर्रियों से खाल लटकी, भूत कहते हैं लोग; कहानी दो बहनों की 19 साल की राजकुमारी और 17 साल की रोशनी घर की चौखट पर बैठी हैं। यूं तो यह उम्र अपने लंबे बाल संवारने और चेहरा निखारने की है। दोस्तों के साथ खिलखिलाने और अपनी सतरंगी दुनिया बुनने की है, लेकिन ये दोनों बहनें 70 साल की किसी बूढ़ी जैसी हो चली हैं। पूरी स्टोरी यहां पढ़ें…
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13 महीने की बेटी को 2 बार हार्ट अटैक, मौत:दूसरी बेटी को भी यही बीमारी, जिंदा रहने के लिए हर साल चाहिए 72 लाख रुपए
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