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Mon, Oct 5, 2026Updated 9:26 PM IST
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AI से मिनटों में साइबर अटैक, सरकारें टॉप टारगेट: डिफेंस सेक्टर में रैनसमवेयर पांच गुना बढ़ा; भारत टॉप-7 प्रभावित देशों में

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नई दिल्ली। आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (AI) ने जहां एक ओर काम की स्पीड को कई गुना बढ़ाया है, वहीं दूसरी ओर इसने साइबर अटैक की रफ्तार और खतरे को भी अभूतपूर्व रूप से बढ़ा दिया है। माइक्रोसॉफ्ट द्वारा जारी की गई ‘डिजिटल डिफेंस रिपोर्ट 2026’ के अनुसार, वैश्विक स्तर पर साइबर अपराधियों ने AI तकनीक का उपयोग करके हमलों की गति और पैमाने दोनों में भारी वृद्धि की है। इस रिपोर्ट में यह चिंताजनक तथ्य सामने आया है कि भारत दुनिया के उन टॉप-7 देशों में शामिल हो गया है जो साइबर हमलों से सबसे अधिक प्रभावित हैं।

माइक्रोसॉफ्ट की इस विस्तृत रिपोर्ट में स्पष्ट किया गया है कि AI की मदद से साइबर अपराधी अब मिनटों में बड़े और जटिल साइबर अटैक को अंजाम देने में सक्षम हो गए हैं। पहले जहां किसी सिस्टम में सेंध लगाने या डेटा चुराने में हैकर्स को दिनों या हफ्तों का समय लगता था, वहीं अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस आधारित टूल्स की मदद से यह काम कुछ ही मिनटों में पूरा किया जा रहा है। इस तेजी ने दुनिया भर की सरकारों, सुरक्षा एजेंसियों और निजी कंपनियों के लिए एक नई और गंभीर चुनौती खड़ी कर दी है।

रिपोर्ट के मुताबिक, साइबर अपराधियों के निशाने पर सबसे ज्यादा सरकारें और सरकारी संस्थान हैं। सरकारी डेटाबेस, नागरिकों की संवेदनशील जानकारी और राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़े दस्तावेजों तक पहुंच बनाना हैकर्स का प्राथमिक लक्ष्य बना हुआ है। इसके अलावा, रक्षा क्षेत्र (डिफेंस सेक्टर) में रैनसमवेयर हमलों में पिछले वर्षों की तुलना में पांच गुना की भारी बढ़ोतरी दर्ज की गई है। रैनसमवेयर एक प्रकार का मैलवेयर है जो सिस्टम या डेटा को एन्क्रिप्ट कर देता है और उसे वापस डिक्रिप्ट करने के लिए फिरौती की मांग करता है। रक्षा क्षेत्र जैसे अत्यंत संवेदनशील ढांचे पर इन हमलों का पांच गुना बढ़ना किसी भी देश की राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए सीधा खतरा माना जा रहा है।

भारत के संदर्भ में रिपोर्ट में कहा गया है कि देश दुनिया के शीर्ष सात सबसे अधिक साइबर प्रभावित देशों की सूची में शामिल है। भारत में तेजी से बढ़ता डिजिटल इंफ्रास्ट्रक्चर, करोड़ों इंटरनेट यूजर्स और ई-गवर्नेंस सेवाओं का व्यापक विस्तार साइबर अपराधियों के लिए एक बड़ा आकर्षण केंद्र बन गया है। भारतीय सरकारी नेटवर्क, वित्तीय संस्थान और स्वास्थ्य सेवाएं लगातार साइबर खतरों का सामना कर रही हैं। भारत का इस टॉप-7 लिस्ट में होना यह दर्शाता है कि देश को अपनी साइबर सुरक्षा नीतियों और बुनियादी ढांचे को और अधिक मजबूत करने की तत्काल आवश्यकता है।

साइबर हमलों के तरीकों में भी AI के कारण भारी बदलाव देखा जा रहा है। रिपोर्ट में वॉयस फिशिंग (Voice Phishing) के बढ़ते खतरे पर विशेष प्रकाश डाला गया है। AI आधारित वॉयस क्लोनिंग तकनीक का इस्तेमाल करके अपराधी किसी भी व्यक्ति की आवाज की हूबहू नकल कर रहे हैं। इस तकनीक के जरिए वे लोगों को फोन करके उनके परिचितों या अधिकारियों की आवाज में बात करते हैं और उन्हें झांसा देकर पैसे या संवेदनशील जानकारी ऐंठ लेते हैं। वॉयस फिशिंग के ये मामले आम जनता से लेकर कॉर्पोरेट अधिकारियों तक को अपना शिकार बना रहे हैं, जिससे पहचान की चोरी और वित्तीय धोखाधड़ी के मामलों में तेजी से इजाफा हुआ है।

रैनसमवेयर के खतरे ने वैश्विक स्तर पर एक महामारी का रूप ले लिया है। रिपोर्ट बताती है कि रैनसमवेयर ऑपरेटर्स अब अधिक संगठित हो गए हैं और वे AI का उपयोग करके ऐसे हमले कर रहे हैं जिन्हें पारंपरिक सुरक्षा सॉफ्टवेयर द्वारा पहचानना बेहद मुश्किल हो गया है। विशेष रूप से डिफेंस सेक्टर में पांच गुना की वृद्धि यह संकेत देती है कि राज्य-प्रायोजित हैकर समूह या बड़े साइबर अपराध सिंडिकेट सैन्य और रक्षा संबंधी गुप्त जानकारियों को निशाना बना रहे हैं।

माइक्रोसॉफ्ट की ‘डिजिटल डिफेंस रिपोर्ट 2026’ इन सभी आंकड़ों और रुझानों को सामने लाते हुए सरकारों और संगठनों को सतर्क रहने की चेतावनी देती है। रिपोर्ट में यह रेखांकित किया गया है कि जैसे-जैसे AI तकनीक उन्नत होगी, साइबर खतरे भी उसी अनुपात में अधिक घातक होते जाएंगे। इसलिए, साइबर सुरक्षा के पारंपरिक तरीकों पर निर्भर रहना अब पर्याप्त नहीं है। संगठनों को AI-संचालित सुरक्षा समाधान अपनाने होंगे और अपने कर्मचारियों को वॉयस फिशिंग तथा रैनसमवेयर जैसी नई तकनीकों के प्रति जागरूक करना होगा।

भारत सहित दुनिया के अन्य प्रभावित देशों के लिए यह रिपोर्ट एक आईना है, जो दिखाता है कि डिजिटलीकरण की दौड़ में सुरक्षा को नजरअंदाज करने के क्या परिणाम हो सकते हैं। साइबर अटैक की रफ्तार को रोकने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर सहयोग, मजबूत साइबर कानून और तकनीकी रूप से उन्नत डिफेंस सिस्टम की स्थापना अब समय की सबसे बड़ी मांग बन चुकी है।