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Tue, Oct 6, 2026Updated 10:27 PM IST
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डॉक्टरों पर हमलों को लेकर सुप्रीम कोर्ट सख्त: कहा- कानून से ऊपर कोई नहीं, चुने हुए नेताओं की जिम्मेदारी ज्यादा; शिवसेना पार्षद की जमानत रद्द

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नई दिल्ली। देश भर में डॉक्टरों और अन्य सरकारी कर्मचारियों पर हो रहे हमलों के मामलों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने बेहद सख्त रुख अपनाया है। सर्वोच्च न्यायालय ने विशेष रूप से महाराष्ट्र के ठाणे स्थित एक अस्पताल में हुए हमले की घटना का संज्ञान लेते हुए गहरी चिंता व्यक्त की है। इस मामले में आरोपी शिवसेना के एक पार्षद की जमानत को सुप्रीम कोर्ट ने रद्द कर दिया है। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में चुने हुए जनप्रतिनिधियों की कानून का सम्मान करने की जिम्मेदारी आम नागरिकों की तुलना में कहीं अधिक होती है।

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में साफ तौर पर कहा कि कानून से ऊपर कोई भी व्यक्ति नहीं है। चाहे वह कोई भी हो, उसे कानूनी प्रक्रिया का पालन करना होगा। अदालत ने यह टिप्पणी ठाणे के एक अस्पताल में डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों पर निर्वाचित नेताओं द्वारा किए गए हमले के मामले की सुनवाई के दौरान की। इस घटना ने न केवल चिकित्सा जगत बल्कि पूरे समाज को झकझोर कर रख दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे मामलों में शामिल जनप्रतिनिधियों के खिलाफ सख्त कार्रवाई की आवश्यकता पर जोर देते हुए कहा कि जब खुद जनप्रतिनिधि ही कानून को हाथ में लेने लगेंगे, तो आम नागरिकों से कानून के पालन की उम्मीद कैसे की जा सकती है।

इस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने शिवसेना के एक पार्षद को दी गई जमानत को खारिज करते हुए उसे रद्द कर दिया है। अदालत ने माना कि इस तरह के गंभीर अपराधों में यदि आरोपी जनप्रतिनिधि हैं, तो उन्हें जमानत देना समाज में गलत संदेश देता है। पीड़ित डॉक्टरों और अस्पताल के कर्मचारियों को न्याय दिलाने के लिए यह कदम अत्यंत आवश्यक था। जमानत रद्द होने के बाद अब संबंधित पार्षद को कानूनी प्रक्रिया का सामना करना होगा और उन्हें आत्मसमर्पण करना पड़ सकता है।

सुप्रीम कोर्ट ने ठाणे अस्पताल की घटना का विस्तार से उल्लेख करते हुए कहा कि डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों पर हमला केवल एक व्यक्ति पर हमला नहीं है, बल्कि यह पूरी स्वास्थ्य व्यवस्था और सेवा भाव पर प्रहार है। अस्पतालों में कार्यरत डॉक्टर और नर्सिंग स्टाफ दिन-रात मरीजों की सेवा में लगे रहते हैं। ऐसे में उनके साथ मारपीट या अभद्रता का व्यवहार किसी भी सभ्य समाज में स्वीकार्य नहीं हो सकता। कोर्ट ने कहा कि निर्वाचित नेताओं को अपनी शक्ति और पद का उपयोग जनता की भलाई के लिए करना चाहिए, न कि डर और दहशत फैलाने के लिए।

अदालत ने इस बात पर भी गहरी चिंता जताई कि हाल के वर्षों में देश के विभिन्न हिस्सों में डॉक्टरों और सरकारी कर्मचारियों पर हमलों की घटनाओं में वृद्धि देखी गई है। कई बार इन हमलों के पीछे राजनीतिक रसूख या पद का दुरुपयोग होता है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जनप्रतिनिधियों को यह समझना होगा कि उनका पद उन्हें कानून से कोई छूट नहीं देता। बल्कि, एक चुने हुए नेता के रूप में उनकी जिम्मेदारी और बढ़ जाती है कि वे कानून का पालन करें और समाज में एक आदर्श उदाहरण प्रस्तुत करें।

सुप्रीम कोर्ट की इस सख्त टिप्पणी और शिवसेना पार्षद की जमानत रद्द करने के फैसले को चिकित्सा जगत और कानूनी विशेषज्ञों द्वारा एक ऐतिहासिक कदम के रूप में देखा जा रहा है। लंबे समय से डॉक्टरों के संगठन और मेडिकल एसोसिएशन इस मांग को उठाते रहे हैं कि स्वास्थ्यकर्मियों पर हमला करने वालों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई होनी चाहिए। विशेष रूप से जब हमलावर कोई राजनेता या जनप्रतिनिधि हो, तो कानून का शिकंजा और भी कड़ा होना चाहिए ताकि भविष्य में ऐसे मामलों की पुनरावृत्ति न हो।

अदालत ने अपने आदेश में यह भी रेखांकित किया कि लोकतंत्र में जनप्रतिनिधियों को जनता ने सेवा करने के लिए चुना है, न कि अस्पतालों या सरकारी कार्यालयों में गुंडागर्दी करने के लिए। ठाणे जैसे शहर में, जहां स्वास्थ्य सुविधाओं पर पहले से ही भारी दबाव रहता है, वहां डॉक्टरों के मनोबल को तोड़ने वाले कृत्यों को कतई बर्दाश्त नहीं किया जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि कानून का शासन हर हाल में बना रहना चाहिए और इसके लिए न्यायपालिका प्रतिबद्ध है।

इस पूरे मामले में सुप्रीम कोर्ट ने जहां एक ओर पीड़ित डॉक्टरों को न्याय दिलाने की दिशा में मजबूत कदम उठाया है, वहीं दूसरी ओर सभी राजनीतिक दलों और उनके नेताओं को एक स्पष्ट संदेश भी दिया है। कोर्ट ने कहा कि कोई भी व्यक्ति, चाहे वह कितने भी बड़े पद पर क्यों न हो, कानून के दायरे से बाहर नहीं है। ठाणे अस्पताल में हुई घटना और उसके बाद सुप्रीम कोर्ट द्वारा शिवसेना पार्षद की जमानत रद्द करने का यह फैसला भविष्य में इस प्रकार के मामलों में एक मिसाल के रूप में काम करेगा। अदालत ने स्पष्ट कर दिया है कि जनप्रतिनिधियों की जवाबदेही तय करना न्यायपालिका की प्राथमिकताओं में शामिल है और डॉक्टरों की सुरक्षा से किसी भी कीमत पर समझौता नहीं किया जाएगा।