ईरान के सुप्रीम लीडर रहे आयतुल्लाह अली खामेनेई के अंतिम संस्कार की रस्में जारी हैं। 100 से ज्यादा देशों के नेता पहुंच रहे हैं। काले कपड़ों में रोते-बिलखते लाखों ईरानी अपने ‘रहबर’ का आखिरी दीदार करना चाहते हैं। इन सबके बीच ईरान के नए सुप्रीम लीडर मुजत
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क्या वो जिंदा भी हैं, अगर हां तो किस हाल में, क्या उनकी जान को अब भी खतरा; आज का एक्सप्लेनर इसी बात पर…
सवाल-1: मुजतबा खामेनेई जिंदा भी हैं या नहीं?
जवाब: मुजतबा खामेनेई घायल हुए थे, लेकिन जिंदा हैं…
- 28 फरवरी, 2026 की सुबह। तेहरान में सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह खामेनेई के घर पर अमेरिका-इजराइल ने पहली स्ट्राइक की, तो कंपाउंड में मुजतबा भी मौजूद थे।
- इजराइली मीडिया ने मुजतबा के भी मारे जाने की आशंका जताई, लेकिन बाद में सूत्रों के हवाले से दावा किया कि मुजतबा बुरी तरह घायल हैं।
- ईरान के अधिकारियों के मुताबिक उन्हें सिर्फ मामूली चोटें आई थीं। ईरानी मीडिया ने मुजतबा को ‘जानबाज’ बताया। यह शब्द जंग में घायल हुए सिपाही के लिए इस्तेमाल किया जाता है।
- 9 मार्च को ईरान की 88 सदस्यीय असेंबली ऑफ एक्सपर्ट्स ने उन्हें नया सुप्रीम लीडर चुन लिया। इसके बाद मीडिया में उनके 20 से ज्यादा लिखित संदेश जारी हुए, लेकिन उनकी कोई तस्वीर या वीडियो अब तक सामने नहीं आया है।
- मई में एक प्रेस कॉन्फ्रेंस के दौरान अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रम्प ने भी कहा- हमें नहीं पता वो (मुजतबा खामेनेई) जिंदा हैं या नहीं। किसी ने उन्हें नहीं देखा, जो कि अजीब है।
- हालांकि, जून में अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने कहा था कि मुजतबा ईरान के ज्यादातर फैसलों में सक्रिय रूप से शामिल हैं।
- इजराइल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू भी कह चुके हैं, ‘मुझे लगता है कि मुजतबा खामेनेई जिंदा हैं। वो किसी बंकर या खुफिया ठिकाने पर हैं।’

आयतुल्लाह खामेनेई और उनके परिवार के सदस्यों की कब्र तेहरान की एक मस्जिद में रखी गई है। उनके शव को अंतिम दर्शन के लिए इराक भी ले जाया जाएगा। 9 जुलाई को उनके जन्म स्थल मशहद में शव दफनाया जाएगा।
सवाल-2: जिंदा हैं, तो किस हाल में हैं मुजतबा?
जवाब: कोई पुख्ता जानकारी नहीं, 3 तरह के दावे हैं…
1. ब्रिटिश अखबार ‘द टाइम्स’ ने अप्रैल में रिपोर्ट की थी कि मुजतबा होश में नहीं हैं और वे कोमा में भी हो सकते हैं। उन्हें इस बात की कोई जानकारी नहीं है कि ईरान में क्या हो रहा है। अन्य ब्रिटिश अखबार ‘द सन’ के मुताबिक वेंटिलेटर पर हैं। वो बिना सपोर्ट के सांस भी नहीं ले पा रहे हैं।
2. अमेरिकी अखबार ‘द न्यूयॉर्क टाइम्स’ के मुताबिक बुरी तरह से घायल हैं, लेकिन दिमाग सक्रिय है और वे फैसले ले रहे हैं। उनके पैर की 3 बार सर्जरी हो चुकी है। उन्हें प्रोस्थेटिक, यानी कृत्रिम पैर लगाया जाना है। उनका चेहरा और होंठ बुरी तरह जल गए हैं। उनके हाथ में भी चोट लगी है।
3. सुप्रीम लीडर के दफ्तर में प्रोटोकॉल महानिदेशक मजाहेर होसैनी के मुताबिक, सुप्रीम लीडर के कान के पीछे छोटी खरोंच है। ईरान के स्वास्थ्य मंत्रालय का कहना है कि सुप्रीम लीडर के घाव में कुछ टांके लगे, लेकिन उन्हें कोई गंभीर चोट नहीं आई है।
सवाल-3: क्या मुजतबा फिलहाल ईरान में नहीं हैं?
जवाब: कुवैत के अखबार अल-जरीदा ने रिपोर्ट किया था कि मुजतबा रूस की राजधानी मॉस्को में इलाज करवा रहे हैं। उन्हें राष्ट्रपति पुतिन के सुझाव पर रूसी प्लेन से मॉस्को ले जाया गया है। यहीं उनकी सर्जरी हुई है और वे रिकवर हो रहे हैं। पुतिन के ही किसी घर में उन्हें ठहराया गया है।
अल-जरीदा के मुताबिक, मुजतबा की गंभीर चोटों को विशेष इलाज और देखरेख की जरूरत थी, जो ईरान में जंग के बीच मुमकिन नहीं था। इजराइल की धमकी के बाद ईरान में उनकी सुरक्षा को खतरा हो सकता था। हालांकि, मॉस्को में ईरान के राजदूत काजेम जलाली ने इन दावों को खारिज कर दिया।
अमेरिकी मीडिया के मुताबिक भी मुजतबा ईरान में ही किसी सीक्रेट लोकेशन पर हैं। अमेरिकी न्यूज चैनल CBS ने अमेरिकी अधिकारियों के हवाले से बताया है कि ईरान के बड़े अधिकारियों को भी नहीं पता है कि मुजतबा कहां हैं। लोकेशन लीक न हो, इसलिए ईरान के सीनियर नेता और इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) के अधिकारी मिलने या हाल-चाल पूछने भी नहीं जाते हैं।

मुजतबा खामेनेई के सुप्रीम लीडर बनने के बाद हाथ में राइफल लिए यह तस्वीर वायरल हुई थी। वे ईरान-इराक जंग का भी हिस्सा रहे हैं।
सवाल-4: तो फिर सुप्रीम लीडर तक सूचनाएं कैसे पहुंचती हैं?
जवाब: किसी भी डिजिटल ट्रैकिंग से बचकर मुजतबा तक मैसेज पहुंचाने के लिए पुराने जमाने का तरीका अपनाया जाता है। अमेरिकी अखबार द न्यूयॉर्क टाइम्स और इजराइली अखबार इजराइल हायोम की रिपोर्ट्स के मुताबिक…
- कोई भी खबर, संदेश या आदेश फोन या कंप्यूटर से नहीं भेजा जाता। इन्हें हाथों से कागज पर लिखा जाता है।
- संदेश लिखे कागज लिफाफे में बंद करके सील किए जाते हैं, फिर ये दर्जनभर भरोसेमंद संदेशवाहकों की एक चेन से गुजरते हैं।
- ये संदेशवाहक मुख्य सड़कों की बजाय गांव-देहात के रास्तों से होते हुए टुकड़ों में सफर करते हैं और संदेश मुजतबा तक पहुंचाते हैं। जवाब भी इसी के जरिए आते हैं।
अमेरिकी खुफिया अधिकारियों ने इसे ‘कोरियरों का भूलभुलैया’ बताया है। इसी वजह से अमेरिका-ईरान की बातचीत या फैसलों में देरी हुई है।
एक ईरानी अधिकारी ने इजराइली अखबार ‘द जेरूसलम पोस्ट’ को बताया कि जब तक सुप्रीम लीडर की मंजूरी मिलती है, तब तक वो शर्त या सूचना पुरानी हो चुकी होती है। क्योंकि जवाब आने में काफी वक्त लगता है।
न्यूज एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक, कुछ मामलों में सीक्रेट ऑडियो लिंक के जरिए भी मुजतबा बैठकों में शामिल होते हैं।
सवाल-5: ऐसे में ईरान चला कौन रहा है?
जवाब: न्यूज एजेंसी रॉयटर्स के मुताबिक, 1979 की क्रांति के बाद, पहली बार ईरान के पास कोई एक ऐसा धार्मिक नेता नहीं है जो हर फैसले पर आखिरी मुहर लगाए।
कागजी तौर पर भले मुजतबा सुप्रीम लीडर हैं, लेकिन हकीकत ये है कि ईरान को IRGC के टॉप कमांडर्स और मुजतबा के वफादार सलाहकारों का ग्रुप चला रहा है।

दरअसल, आयतुल्लाह खामेनेई ने मरने से पहले ही अपनी गैरमौजूदगी को भरने के लिए अलग-अलग स्तर पर जिम्मेदारियां बांट दी थी। न्यू यॉर्क टाइम्स के मुताबिक बड़े सैन्य और सरकारी पदों पर 4 स्तर के विकल्प तैयार किए गए थे, जिससे किसी की मृत्यु होने पर अगला व्यक्ति तुरंत जिम्मेदारी संभाल ले। इसके अलावा उन्होंने पहले ही IRGC को कई अधिकार दे दिए थे।
ब्रिटिश थिंकटैंक चाथम हाउस में मिडिल ईस्ट प्रोग्राम के डायरेक्टर सनम वकील के मुताबिक, ‘ईरान में अभी कोई एक कमांडर नहीं है। यहां एक सिस्टम चल रहा है, जहां बहुत सारे लोग कमांड कर रहे हैं। हर कोई अपने लिए लड़ रहा है।’
अमेरिका की इंडियाना यूनिवर्सिटी ऑफ ब्लूमिंगटन में ईरानी राजनीति के प्रोफेसर हुसैन बनाई के मुताबिक, ‘ईरान में सुप्रीम लीडर की शक्तियां कम होने के कई सबूत हैं। राष्ट्रपति जो चाहते हैं, कहते हैं। स्पीकर को जो ठीक लगता है, वो कह देते हैं। किसी में कोई सामंजस्य नहीं है।’
रॉयटर्स ने सूत्रों के हवाले से रिपोर्ट किया है कि अब मुजतबा की भूमिका सहमति की मुहर लगाने भर की रह गई है। बड़े फैसले जनरल लेते हैं और मुजतबा उन्हें अपनी धार्मिक-संवैधानिक वैधता देते हैं।
ईरान मामलों के जानकार आरश अजीजी के मुताबिक, जरूरी मसौदे शायद मुजतबा से होकर गुजरते होंगे, लेकिन यह मुश्किल है कि वे नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल के फैसले पलट सकें। यहां तक कि राष्ट्रपति पजशकियान भी कई बड़े फैसलों से बाहर रखे गए हैं।
सवाल-6: जंग खत्म हो गई, क्या अब भी मुजतबा की जान को खतरा है?
जवाब: 4 मार्च, 2026 को इजराइल के रक्षा मंत्री काट्ज ने धमकी दी- ‘जो भी ईरान का लीडर बनेगा, वो इजराइल का टारगेट होगा।’ उन्होंने 1 जुलाई को फिर दोहराया कि ईरान के सुप्रीम लीडर मुजतबा को मारना हमारा टारगेट है।
इजराइल टारगेट किलिंग में एक्सपर्ट है। उसने दशकों की मेहनत के बाद ईरान में अपना खुफिया नेटवर्क बहुत मजबूत कर लिया है। करीब 3 महीने की जंग में इजराइल ने ईरान में 250 से ज्यादा टारगेट किलिंग की हैं।
स्वीडन की उप्साला यूनिवर्सिटी में इस्लामी धर्मशास्त्र के प्रोफेसर मोहम्मद फजलहाशमी के मुताबिक, ‘इजराइल और अमेरिका का खुफिया तंत्र ईरान से मजबूत है। ईरान में इजराइल के एजेंट तैनात हैं। मुजतबा जैसे ही सामने आएंगे, अमेरिका और इजराइल उन्हें अपना निशाना बना लेंगे।’
इजराइल पहले भी सार्वजनिक कार्यक्रमों में बड़े हमले कर चुका है। 2024 में ईरान के राष्ट्रपति मसूद पजशकियान के शपथ ग्रहण में पहुंचे हमास प्रमुख इस्माइल हानिया को इजराइल ने मिसाइल हमले में मार दिया था। 1992 में हिज्बुल्लाह के महासचिव अब्बास अल-मुसावी पर लेबनान में एक रैली से लौटते हुए हमला किया था।

पजशकियान के शपथ ग्रहण में शामिल होने के बाद अगली सुबह इस्माइल हानिया पर इजराइल ने हमला कर दिया था। तेहरान में सुप्रीम लीडर खामेनेई और राष्ट्रपति पजशकियान ने उन्हें श्रद्धांजलि दी थी।
सवाल-7: क्या वाकई पिता के जनाजे में नहीं पहुंचेंगे मुजतबा? जवाब: भारत में मुजतबा खामेनेई के प्रतिनिधि आयतुल्लाह हाकिम इलाही ने 3 जुलाई को बताया कि सुप्रीम लीडर जनाजे में शामिल होना चाहते थे। वो अपने लोगों से मिलना चाहते थे। लेकिन सुरक्षाबलों ने उन्हें ऐसा करने से मना कर दिया।
ईरान के आंतरिक सुरक्षा मामलों के डिप्टी मिनिस्टर और समारोहों की देखरेख करने वाली समिति के सचिव अली अकबर पोरजमशीदियन ने कहा कि सुप्रीम लीडर के जनाजे में शामिल होने का फैसला उनके कार्यालय के हाथों में है। आयोजकों को इस बारे में कोई जानकारी नहीं मिली है कि वे शामिल होंगे या नहीं। अगर मुजतबा शामिल नहीं होंगे, तो उनकी जगह जनाजे की नमाज कौन अदा करेगा, इसकी घोषणा भी अभी नहीं हुई है।
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अयातुल्लाह अली खामेनेई को हत्या के 131 दिन बाद सुपुर्द-ए-खाक किया जाना है। 6 दिन के राजकीय जनाजे में ईरान दुनियाभर से नेताओं को बुला रहा है। 23 जून को राष्ट्रपति पेजेश्कियान ने पीएम मोदी को भी न्योता दिया। लेकिन पीएम मोदी नहीं पहुंचे। पूरी खबर पढ़िए…















