महाराष्ट्र के मुख्य निर्वाचन अधिकारी एस. चोकलिंगम ने ECINet सॉफ्टवेयर में 4 बदलावों की मांग की, चुनाव आयुक्तों ने भी जताई आपत्ति

नई दिल्ली। महाराष्ट्र के मुख्य निर्वाचन अधिकारी (CEO) एस. चोकलिंगम ने भारत निर्वाचन आयोग से एक अत्यंत महत्वपूर्ण मांग रखी है। उन्होंने चुनाव आयोग द्वारा उपयोग किए जाने वाले ECINet सॉफ्टवेयर में कम से कम चार प्रमुख बदलाव करने का अनुरोध किया है। यह मांग विशेष रूप से मतदाता पंजीकरण प्रक्रिया और स्थानीय अधिकारियों को मिलने वाले अधिकारों से जुड़ी हुई है। चोकलिंगम ने इस संबंध में चुनाव आयोग को एक औपचारिक पत्र लिखकर अपनी बात रखी है, जिसमें उन्होंने स्पष्ट किया है कि चुनावी कानून के तहत निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी (ERO) को जो अधिकार प्राप्त हैं, उन्हें किसी भी सॉफ्टवेयर के जरिए सीमित या बाधित नहीं किया जाना चाहिए।
महाराष्ट्र के मुख्य निर्वाचन अधिकारी की ओर से उठाया गया यह कदम इसलिए भी बेहद महत्वपूर्ण माना जा रहा है क्योंकि इससे पहले दो वरिष्ठ चुनाव आयुक्त भी इस सॉफ्टवेयर की कार्यप्रणाली पर आपत्ति जता चुके हैं। चुनाव आयुक्तों द्वारा पहले ही व्यक्त की गई चिंताओं के बाद अब एक बड़े राज्य के मुख्य निर्वाचन अधिकारी की तरफ से लिखा गया यह पत्र इस विषय को और अधिक गंभीर बना देता है। सूत्रों के अनुसार, इस पूरे मामले का केंद्र बिंदु SIR यानी स्टैट्यूटरी इंस्ट्रक्शन रजिस्टर और मतदाता सूची के रखरखाव से जुड़ा हुआ है। मांग की जा रही है कि SIR प्रणाली में स्थानीय स्तर पर काम करने वाले अधिकारियों को ज्यादा अधिकार दिए जाने चाहिए, ताकि वे जमीनी स्तर पर आने वाली समस्याओं का समाधान समय रहते कर सकें।
एस. चोकलिंगम ने अपने पत्र में जिन चार बदलावों की मांग की है, उनका सीधा संबंध निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी (ERO) की दिन-प्रतिदिन की कार्यप्रणाली से है। वर्तमान में ECINet सॉफ्टवेयर के तहत कई बार ऐसा देखा गया है कि स्थानीय अधिकारी कानूनी रूप से मिले अपने अधिकारों का पूर्ण रूप से उपयोग नहीं कर पाते हैं, क्योंकि सॉफ्टवेयर की तकनीकी सीमाएं उनके हाथ बांध देती हैं। चोकलिंगम का तर्क है कि जब लोक प्रतिनिधित्व अधिनियम और अन्य चुनावी कानून ERO को विशिष्ट शक्तियां प्रदान करते हैं, तो कोई भी डिजिटल प्लेटफॉर्म या सॉफ्टवेयर उन शक्तियों को कम नहीं कर सकता। यदि सॉफ्टवेयर में ऐसे बदलाव नहीं किए गए, तो मतदाता पंजीकरण की प्रक्रिया में देरी और स्थानीय स्तर पर असुविधा हो सकती है।
बता दें कि ECINet सॉफ्टवेयर भारत निर्वाचन आयोग का एक प्रमुख डिजिटल ढांचा है, जिसका उपयोग देश भर में चुनाव संबंधी कार्यों, विशेषकर मतदाता पंजीकरण, डेटा प्रबंधन और मतदाता सूचियों के अपडेशन के लिए किया जाता है। इस सॉफ्टवेयर के माध्यम से बूथ स्तर के अधिकारियों से लेकर राज्य और राष्ट्रीय स्तर तक के चुनाव अधिकारी जुड़े हुए हैं। ऐसे में, अगर इस सॉफ्टवेयर की कार्यप्रणाली में कोई तकनीकी खामी है जो स्थानीय अधिकारियों के कानूनी अधिकारों को प्रभावित कर रही है, तो इसे दूर करना चुनाव आयोग की प्राथमिकता होनी चाहिए।
इस मुद्दे पर दो चुनाव आयुक्तों द्वारा पहले ही आपत्ति दर्ज कराए जाने की जानकारी इस बात की पुष्टि करती है कि यह समस्या केवल महाराष्ट्र तक सीमित नहीं है, बल्कि यह एक व्यापक प्रशासनिक और तकनीकी मुद्दा है। चुनाव आयुक्तों ने भी इस बात पर जोर दिया था कि तकनीक का उपयोग अधिकारियों के काम को आसान बनाने के लिए होना चाहिए, न कि उनके कानूनी अधिकारों को छीनने या सीमित करने के लिए। जब शीर्ष स्तर पर बैठे अधिकारी ही इस सॉफ्टवेयर की मौजूदा संरचना पर सवाल उठा रहे हैं, तो राज्य स्तर के मुख्य निर्वाचन अधिकारियों का इस दिशा में आवाज उठाना स्वाभाविक है।
महाराष्ट्र जैसे बड़े राज्य में, जहां मतदाताओं की संख्या करोड़ों में है और भौगोलिक विविधता भी बहुत अधिक है, वहां निर्वाचन पंजीकरण अधिकारी (ERO) की भूमिका अत्यंत संवेदनशील होती है। ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में मतदाता सूचियों को अद्यतन रखना, नए मतदाताओं के नाम जोड़ना, मृत या स्थानांतरित मतदाताओं के नाम हटाना और दावे-आपत्तियों का निस्तारण करना ERO की जिम्मेदारी है। चोकलिंगम ने अपने पत्र में इसी बात पर बल दिया है कि इन सभी कार्यों को सुचारू रूप से चलाने के लिए ERO को सॉफ्टवेयर में पर्याप्त लचीलापन और अधिकार मिलने चाहिए।
अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि भारत निर्वाचन आयोग महाराष्ट्र के मुख्य निर्वाचन अधिकारी की इन चार मांगों पर क्या रुख अपनाता है। क्या आयोग ECINet सॉफ्टवेयर में तत्काल बदलाव करने का निर्देश देगा, या फिर इस पर कोई तकनीकी समिति गठित की जाएगी, यह अभी स्पष्ट नहीं है। हालांकि, चुनाव आयुक्तों की पूर्व की आपत्तियों और अब राज्य के CEO के औपचारिक पत्र को देखते हुए, यह माना जा रहा है कि चुनाव आयोग को इस तकनीकी-प्रशासनिक मुद्दे पर जल्द ही कोई ठोस कदम उठाना होगा। वंदे भारत न्यूज़ की ओर से इस संबंध में चुनाव आयोग की आधिकारिक प्रतिक्रिया का इंतजार है। फिलहाल, यह मामला चुनावी प्रशासन और तकनीकी सुधारों के बीच के संतुलन को लेकर एक महत्वपूर्ण बहस का विषय बन गया है।

