पूर्व CJI जस्टिस गवई ने जस्टिस उज्जल भुइयां की SIR मामले पर टिप्पणी का किया विरोध, कहा- विचाराधीन मुकदमे पर बयान देना न्यायिक मर्यादा के खिलाफ

नई दिल्ली। सुप्रीम कोर्ट के वरिष्ठ न्यायाधीश और पूर्व मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस बीआर गवई ने सर्वोच्च न्यायालय के ही जस्टिस उज्जल भुइयां द्वारा हाल ही में दिए गए एक बयान पर कड़ी आपत्ति जताई है। यह विवाद SIR (स्पेशल इन्वेस्टिगेशन रिपोर्ट या संबंधित प्रक्रिया) से जुड़े एक मामले को लेकर उत्पन्न हुआ है। जस्टिस गवई ने स्पष्ट रूप से कहा है कि चूंकि SIR से संबंधित मामला वर्तमान में सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है, इसलिए इस पर किसी भी न्यायाधीश द्वारा सार्वजनिक रूप से बयान देना न्यायिक मर्यादा और स्थापित मानकों के पूरी तरह से खिलाफ है। उनके इस रुख को न्यायिक आचरण और संस्थागत गरिमा बनाए रखने की दिशा में एक महत्वपूर्ण हस्तक्षेप के रूप में देखा जा रहा है।
जानकारी के अनुसार, जस्टिस उज्जल भुइयां ने SIR प्रक्रिया को लेकर एक टिप्पणी की थी, जिसके बाद न्यायिक हलकों में इसकी व्यापक चर्चा शुरू हो गई। इसी टिप्पणी के जवाब में पूर्व CJI जस्टिस बीआर गवई ने अपना विरोध दर्ज कराया है। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि जब कोई मामला देश के सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष विचाराधीन हो, तो उस पर बाहर किसी भी प्रकार की राय व्यक्त करना न केवल अनुचित है, बल्कि यह न्यायपालिका की स्वतंत्रता और निष्पक्षता पर भी प्रश्नचिह्न लगा सकता है। जस्टिस गवई ने स्पष्ट किया कि विचाराधीन मामलों पर टिप्पणी करने से बचना हर न्यायाधीश का मूलभूत दायित्व होता है और इस सिद्धांत का पालन सख्ती से किया जाना चाहिए।
इस पूरे विवाद में केवल जस्टिस गवई ही नहीं, बल्कि दिल्ली उच्च न्यायालय के दो सेवानिवृत्त न्यायाधीशों ने भी जस्टिस उज्जल भुइयां की टिप्पणी की आलोचना की है। इन रिटायर्ड जजों ने भी इस बात से सहमति जताई है कि सुप्रीम कोर्ट में लंबित किसी मामले पर इस तरह का बयान देना न्यायिक शिष्टाचार के अनुरूप नहीं है। दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीशों का मानना है कि न्यायपालिका की विश्वसनीयता इसी बात पर निर्भर करती है कि उसके सदस्य संयम और मर्यादा का पालन करें। जब वरिष्ठ न्यायाधीश ही विचाराधीन मामलों पर सार्वजनिक मंचों से अपनी राय रखने लगेंगे, तो आम जनता और वादकारियों का न्याय व्यवस्था से विश्वास डगमगा सकता है।
SIR से जुड़ा यह मामला फिलहाल सुप्रीम कोर्ट की पीठ के समक्ष सुनवाई के विभिन्न चरणों में है। ऐसे में, न्यायिक परंपराओं के अनुसार, जब तक किसी मामले पर अंतिम फैसला नहीं आ जाता, तब तक न्यायपालिका के सदस्यों से यह अपेक्षा की जाती है कि वे उस मुद्दे पर सार्वजनिक रूप से कोई ऐसी बात न कहें जिससे मामले की सुनवाई या न्यायिक प्रक्रिया प्रभावित होती हो। जस्टिस गवई की इस टिप्पणी को न्यायिक अनुशासन को बनाए रखने के एक ठोस प्रयास के रूप में देखा जा रहा है। पूर्व CJI के रूप में उनका यह बयान न्यायिक बिरादरी में काफी गंभीरता से लिया जा रहा है, क्योंकि यह सीधे तौर पर न्यायालय की गरिमा और विचाराधीन मामलों की गोपनीयता से जुड़ा विषय है।
न्यायिक विशेषज्ञों और कानूनी जानकारों का कहना है कि भारत की न्याय व्यवस्था में ‘सब ज्यूडिस’ (Sub Judice) यानी विचाराधीन मामलों पर टिप्पणी न करने का एक सुदृढ़ सिद्धांत रहा है। यह सिद्धांत न केवल मीडिया और आम नागरिकों पर लागू होता है, बल्कि न्यायपालिका के सदस्यों पर इसकी जिम्मेदारी और भी अधिक होती है। जस्टिस गवई ने अपने विरोध के माध्यम से इसी सिद्धांत की याद दिलाई है। उन्होंने यह संदेश देने का प्रयास किया है कि चाहे न्यायाधीश कितने भी वरिष्ठ क्यों न हों, उन्हें न्यायिक मर्यादा की सीमाओं के भीतर रहकर ही कार्य करना चाहिए।
दिल्ली हाईकोर्ट के दोनों रिटायर्ड जजों ने भी इस मुद्दे पर अपनी चिंता व्यक्त करते हुए कहा कि जस्टिस भुइयां की टिप्पणी से न्यायिक प्रक्रिया की गरिमा को ठेस पहुंची है। उन्होंने कहा कि सुप्रीम कोर्ट देश का सर्वोच्च न्यायालय है और यहां चल रही सुनवाई पर किसी भी प्रकार का बाहरी दबाव या असर नहीं पड़ना चाहिए। यदि कोई न्यायाधीश खुद ही किसी विचाराधीन मामले पर बयानबाजी करने लगे, तो यह एक खतरनाक परंपरा की शुरुआत हो सकती है।
इस पूरे घटनाक्रम से यह स्पष्ट होता है कि न्यायपालिका के भीतर आचरण और मर्यादा को लेकर मानक कितने महत्वपूर्ण हैं। जस्टिस बीआर गवई द्वारा जस्टिस उज्जल भुइयां की टिप्पणी का विरोध किए जाने और दिल्ली हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीशों द्वारा इसका समर्थन किए जाने से यह मामला अब न्यायिक हलकों में चर्चा का केंद्र बन गया है। हालांकि, इस विषय पर सुप्रीम कोर्ट की ओर से कोई आधिकारिक प्रतिक्रिया या औपचारिक कार्रवाई की अभी तक कोई पुष्ट जानकारी सामने नहीं आई है। यह भी स्पष्ट नहीं है कि क्या इस मामले को लेकर भविष्य में कोई औपचारिक बैठक होगी या इसे यहीं विराम दिया जाएगा। फिलहाल, SIR से जुड़ा मूल मामला सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन बना हुआ है और उसकी नियमित सुनवाई जारी है। वंदे भारत न्यूज़ इस खबर की निरंतर निगरानी कर रहा है और जैसे ही इस मामले में कोई नया विकास होगा, उसे प्रमुखता से प्रकाशित किया जाएगा।

