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Tue, Oct 6, 2026Updated 8:15 AM IST
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पश्चिम बंगाल का नाम बदलने की तैयारी: BJP प्रदेश अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य ने कहा- अगले सत्र में सरकार लाएगी विधेयक, 1999 में ज्योति बसु ने रखा था पहला प्रस्ताव

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कोलकाता। पश्चिम बंगाल राज्य का नाम बदलकर ‘पश्चिम बंगा’ करने की प्रक्रिया को लेकर एक बार फिर राजनीतिक गहमागहमी तेज हो गई है। भारतीय जनता पार्टी (BJP) के प्रदेश अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य ने सोमवार को कोलकाता में यह जानकारी दी कि राज्य सरकार जल्द ही विधानसभा में इस संबंध में एक विधेयक पेश कर सकती है। उनके अनुसार, सरकार आगामी विधानसभा सत्र में यह बिल लाने की तैयारी कर रही है। इस घोषणा के बाद से ही राज्य की राजनीति में नई बहस शुरू हो गई है और विभिन्न दलों की प्रतिक्रियाएं सामने आने लगी हैं।

समिक भट्टाचार्य ने मीडिया से बातचीत करते हुए स्पष्ट किया कि पश्चिम बंगाल का नाम बदलकर ‘पश्चिम बंगा’ रखने का प्रस्ताव कोई नया विचार नहीं है। उन्होंने इस मुद्दे के ऐतिहासिक संदर्भ को भी रेखांकित किया। हालांकि, भाजपा प्रदेश अध्यक्ष ने यह दावा किया है कि वर्तमान सरकार इस दिशा में ठोस कदम उठाने जा रही है और अगले सत्र में विधेयक पेश किए जाने की पूरी संभावना है। उनके इस बयान ने राज्य में नाम परिवर्तन की मांग को एक बार फिर सुर्खियों में ला दिया है।

इस पूरे मामले का इतिहास काफी पुराना है। राज्य का नाम बदलने का सबसे पहला औपचारिक प्रस्ताव वर्ष 1999 में तत्कालीन मुख्यमंत्री और वामपंथी नेता ज्योति बसु द्वारा रखा गया था। उस समय ज्योति बसु के नेतृत्व वाली वाम मोर्चा सरकार ने राज्य का नाम बदलने की पहल की थी। इसके बाद से यह मुद्दा समय-समय पर उठता रहा है, लेकिन इसे केंद्र सरकार की मंजूरी मिलने में हमेशा देरी होती रही है या फिर राजनीतिक कारणों से यह प्रस्ताव आगे नहीं बढ़ पाया।

पश्चिम बंगाल का नाम बदलने की मांग के पीछे मुख्य रूप से सांस्कृतिक और भाषाई पहचान को आधार बनाया जाता रहा है। राज्य के कई हिस्सों में और विशेषकर बांग्ला भाषी समुदाय के बीच यह भावना रही है कि ‘बंगाल’ शब्द अंग्रेजी शासन काल की देन है, जबकि ‘बंगा’ शब्द इस क्षेत्र की प्राचीन और मौलिक पहचान से जुड़ा हुआ है। इसलिए नाम को ‘पश्चिम बंगा’ करने से राज्य की सांस्कृतिक विरासत और ऐतिहासिक अस्मिता को बल मिलेगा।

गौरतलब है कि किसी भी भारतीय राज्य का नाम बदलना एक लंबी संवैधानिक और कानूनी प्रक्रिया है। इसके लिए सबसे पहले राज्य विधानसभा में एक प्रस्ताव पारित करना होता है। विधानसभा से प्रस्ताव पास होने के बाद उसे केंद्र सरकार के पास भेजा जाता है। केंद्र सरकार इस प्रस्ताव की समीक्षा करती है और उसके बाद संसद में एक विधेयक पेश किया जाता है। संसद के दोनों सदनों—लोकसभा और राज्यसभा—से विधेयक पारित होने और राष्ट्रपति की मंजूरी मिलने के बाद ही राज्य का नाम औपचारिक रूप से बदला जा सकता है। भारत के संविधान के अनुच्छेद 3 के तहत संसद को किसी राज्य का नाम, क्षेत्र या सीमाएं बदलने का अधिकार प्राप्त है।

अतीत में पश्चिम बंगाल की ममता बनर्जी सरकार ने भी राज्य का नाम बदलने का प्रयास किया था। वर्ष 2018 में तृणमूल कांग्रेस (TMC) सरकार ने राज्य विधानसभा में एक प्रस्ताव पारित किया था, जिसमें राज्य का नाम तीन भाषाओं में बदलने का सुझाव दिया गया था। बांग्ला में ‘बांग्ला’, हिंदी में ‘बंगाल’ और अंग्रेजी में ‘Bengal’ रखने का प्रस्ताव था। हालांकि, केंद्रीय गृह मंत्रालय ने इस प्रस्ताव को यह कहते हुए खारिज कर दिया था कि किसी राज्य का सभी आधिकारिक भाषाओं में एक ही नाम होना चाहिए। इसके बाद यह मामला ठंडे बस्ते में चला गया था।

अब भाजपा प्रदेश अध्यक्ष समिक भट्टाचार्य के ताजा बयान ने इस पुराने मुद्दे को फिर से जीवित कर दिया है। कोलकाता में दिए गए उनके बयान के बाद राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भाजपा इस मुद्दे को लेकर राज्य में अपनी राजनीतिक पैठ मजबूत करने और सांस्कृतिक राष्ट्रवाद के एजेंडे को आगे बढ़ाने की रणनीति पर काम कर रही है। हालांकि, यह अभी स्पष्ट नहीं है कि क्या सत्तारूढ़ तृणमूल कांग्रेस सरकार वास्तव में अगले सत्र में ‘पश्चिम बंगा’ नाम वाला विधेयक पेश करेगी, क्योंकि समिक भट्टाचार्य ने सरकार की तैयारी का जो दावा किया है, उस पर अभी तक राज्य सरकार या सत्ताधारी दल की ओर से कोई आधिकारिक पुष्टि नहीं की गई है।

यदि राज्य सरकार वास्तव में अगले विधानसभा सत्र में यह विधेयक पेश करती है, तो इसे पारित करवाने के लिए सरकार को विधानसभा में आवश्यक बहुमत जुटाना होगा। इसके बाद केंद्र सरकार और संसद के स्तर पर इसकी मंजूरी की प्रक्रिया शुरू होगी। फिलहाल, समिक भट्टाचार्य के इस बयान के बाद पश्चिम बंगाल की राजनीति में नाम परिवर्तन का मुद्दा एक बार फिर केंद्र बिंदु पर आ गया है और आने वाले दिनों में इस पर अन्य राजनीतिक दलों की प्रतिक्रियाएं आना तय माना जा रहा है।