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Tue, Oct 6, 2026Updated 11:26 AM IST
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बारां में औसत से पांच गुना अधिक रासायनिक खाद की खपत: मिट्टी की सेहत पर गहराया संकट, गेहूं में प्रोटीन और आयरन का स्तर घटा

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राजस्थान के बारां जिले से कृषि और मिट्टी की उर्वरता को लेकर एक चिंताजनक स्थिति सामने आई है। ताजा रिपोर्टों के अनुसार, बारां जिले में किसानों द्वारा रासायनिक खाद का उपयोग राष्ट्रीय औसत की तुलना में लगभग पांच गुना अधिक किया जा रहा है। इस अत्यधिक रासायनिक खाद की खपत ने जिले की मिट्टी की सेहत पर गंभीर संकट पैदा कर दिया है। विशेषज्ञों और कृषि वैज्ञानिकों का मानना है कि मिट्टी की गुणवत्ता में आई इस भारी गिरावट का सीधा असर फसलों की पोषण क्षमता पर भी पड़ रहा है। सबसे ज्यादा चिंता की बात यह है कि क्षेत्र में उगाए जाने वाले गेहूं में प्रोटीन और आयरन (लोहा) जैसे महत्वपूर्ण पोषक तत्वों का स्तर लगातार घटता जा रहा है, जो उपभोक्ताओं के स्वास्थ्य के लिए एक बड़ी चुनौती बन सकता है।

बारां जिले में किसानों की ओर से कम समय में अधिक उत्पादन प्राप्त करने की होड़ ने खेतों में रसायनों का अंधाधुंध इस्तेमाल बढ़ा दिया है। सूत्रों से मिली जानकारी के मुताबिक, किसान अपनी फसलों की पैदावार तेजी से बढ़ाने के लिए जरूरत से बहुत ज्यादा यूरिया और अन्य रासायनिक खादों का छिड़काव कर रहे हैं। शुरुआती दौर में इससे उत्पादन में वृद्धि देखने को मिल सकती है, लेकिन लंबी अवधि में इस प्रवृत्ति ने मिट्टी की प्राकृतिक संरचना और उसकी उर्वरता शक्ति को नुकसान पहुंचाना शुरू कर दिया है। मिट्टी में कार्बनिक पदार्थों की कमी हो रही है और वह धीरे-धीरे अपनी मूल गुणवत्ता खो रही है। जब मिट्टी स्वस्थ नहीं रहती, तो वह फसलों को आवश्यक पोषण देने में सक्षम नहीं रह पाती, जिसका परिणाम अब गेहूं जैसी प्रमुख फसल की गुणवत्ता में स्पष्ट रूप से दिखाई दे रहा है।

गेहूं भारत और विशेषकर राजस्थान की मुख्य खाद्य फसलों में से एक है। इसे ऊर्जा, प्रोटीन और आयरन का एक प्रमुख स्रोत माना जाता है। हालांकि, बारां जिले की मिट्टी में रासायनिक खादों के अत्यधिक दोहन के कारण गेहूं के दानों में प्रोटीन और आयरन की मात्रा में गिरावट दर्ज की गई है। पोषण विशेषज्ञों और कृषि वैज्ञानिकों का कहना है कि यदि मिट्टी को आवश्यक सूक्ष्म पोषक तत्व और जैविक खाद नहीं मिलती है, तो उसमें उगने वाली फसल भी पोषण विहीन होने लगती है। गेहूं में प्रोटीन और आयरन की कमी का सीधा संबंध आम जनता के स्वास्थ्य से है। आयरन की कमी से शरीर में खून की कमी (एनीमिया) जैसी समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं, जबकि प्रोटीन की कमी से शारीरिक विकास और रोग प्रतिरोधक क्षमता पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ता है। ऐसे में, बारां के खेतों से निकलने वाले गेहूं की घटती पोषण गुणवत्ता एक गंभीर सार्वजनिक स्वास्थ्य चिंता का विषय बन गया है।

इस स्थिति के पीछे मुख्य कारण किसानों की बदलती खेती की पद्धतियां और रासायनिक खादों पर उनकी बढ़ती निर्भरता बताई जा रही है। कई बार किसान बिना मिट्टी परीक्षण कराए ही अपने खेतों में मनमाने ढंग से यूरिया और डीएपी (DAP) जैसी रासायनिक खादें डाल देते हैं। उन्हें लगता है कि जितनी अधिक खाद डाली जाएगी, फसल उतनी ही अच्छी होगी और उत्पादन भी अधिक मिलेगा। लेकिन वास्तविकता इसके बिल्कुल विपरीत है। मिट्टी की एक निश्चित सहन क्षमता होती है। जब उसमें अनुशंसित मात्रा से कई गुना अधिक रसायन डाले जाते हैं, तो मिट्टी का पीएच (pH) स्तर असंतुलित हो जाता है। मिट्टी या तो अत्यधिक क्षारीय हो जाती है या फिर उसमें लवणीयता बढ़ जाती है। इससे मिट्टी में मौजूद लाभदायक जीवाणु और केंचुए नष्ट होने लगते हैं, जो मिट्टी को प्राकृतिक रूप से उपजाऊ बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

बारां जिले में रासायनिक खाद की खपत का राष्ट्रीय औसत से पांच गुना अधिक होना कृषि विशेषज्ञों के लिए एक चेतावनी संकेत है। यह आंकड़ा दर्शाता है कि जिले की कृषि भूमि पर कितना अत्यधिक रासायनिक दबाव है। यदि समय रहते इस दिशा में सुधारात्मक कदम नहीं उठाए गए, तो आने वाले वर्षों में जिले की हजारों हेक्टेयर कृषि भूमि बंजर होने का खतरा मंडरा रहा है। मिट्टी की सेहत को बहाल करना कोई एक दिन का काम नहीं है; इसके लिए वर्षों तक लगातार प्रयास करने पड़ते हैं। इसलिए कृषि विभाग और संबंधित एजेंसियों के लिए यह अत्यंत आवश्यक हो गया है कि वे किसानों को रासायनिक खादों के दुष्प्रभावों के प्रति जागरूक करें।

इस संकट से निपटने के लिए मिट्टी परीक्षण को अनिवार्य बनाने और किसानों को संतुलित खाद प्रयोग की जानकारी देने की जरूरत है। गोबर की खाद, वर्मीकम्पोस्ट, हरी खाद और नीम की खली जैसे जैविक विकल्पों के उपयोग को बढ़ावा देना होगा। सरकार और कृषि विश्वविद्यालयों को मिलकर ऐसे अभियान चलाने चाहिए जिससे किसान समझ सकें कि मिट्टी की सेहत ही उनके और समाज के स्वास्थ्य की असली गारंटी है। बारां का यह मामला पूरे राजस्थान और देश के अन्य कृषि प्रधान क्षेत्रों के लिए भी एक सबक है, जहां रासायनिक खादों का अत्यधिक उपयोग मिट्टी और फसलों की गुणवत्ता दोनों को नुकसान पहुंचा रहा है।