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Tue, Oct 6, 2026Updated 1:30 PM IST
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जौनपुर: बिजली अधिशासी अभियंता पर भ्रष्टाचार आरोप, दो जांच के बाद भी कार्रवाई नहीं; शिकायतकर्ता राज्य सूचना आयोग जाने की तैयारी में

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जौनपुर। उत्तर प्रदेश के जौनपुर जनपद स्थित मछलीशहर बिजली डिवीजन में कार्यरत अधिशासी अभियंता राजन कुमार पर भ्रष्टाचार और गंभीर अनियमितताओं के लगाए गए आरोपों को लेकर विद्युत विभाग में हड़कंप मचा हुआ है। प्राप्त जानकारी के अनुसार, इन आरोपों की अब तक दो बार विभागीय स्तर पर जांच कराई जा चुकी है, लेकिन इसके बावजूद एक वर्ष से अधिक समय बीत जाने के बाद भी संबंधित अधिकारी के विरुद्ध कोई ठोस अनुशासनात्मक या दंडात्मक कार्रवाई अमल में नहीं लाई गई है। प्रशासनिक उदासीनता और कार्रवाई में देरी से असंतुष्ट शिकायतकर्ता ने अब इस मामले को लेकर राज्य सूचना आयोग का दरवाजा खटखटाने की पूरी तैयारी कर ली है, जिससे विभाग की पारदर्शिता और जवाबदेही पर सवाल खड़े हो रहे हैं।

मछलीशहर बिजली डिवीजन में अधिशासी अभियंता के पद पर तैनात राजन कुमार के खिलाफ भ्रष्टाचार और वित्तीय अनियमितताओं की शिकायतें काफी समय से प्रशासनिक संज्ञान में हैं। शिकायतकर्ता द्वारा उपलब्ध कराए गए दस्तावेजों और तथ्यों के आधार पर विभाग ने पहले चरण में जांच शुरू की थी। जब पहली जांच के निष्कर्षों पर संतोष नहीं जताया गया और प्रक्रियागत कमियों की ओर इंगित किया गया, तो दूसरी बार पुनः जांच के आदेश जारी किए गए। सामान्य प्रशासनिक नियमों और सेवा नियमावली के तहत, किसी भी सरकारी कर्मचारी या अधिकारी के विरुद्ध भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच निर्धारित समय सीमा के भीतर पूर्ण कर उस पर उचित निर्णय लिया जाना अपेक्षित होता है। हालांकि, इस प्रकरण में दो-दो जांच पूरी होने के उपरांत भी फाइलें धूल खा रही हैं और न तो आरोपी अधिकारी के विरुद्ध कोई स्पष्ट कार्रवाई हुई है और न ही शिकायतकर्ता को जांच रिपोर्ट या उसके निष्कर्षों के बारे में कोई औपचारिक सूचना दी गई है।

विद्युत विभाग जैसे लोक महत्व के सेवा क्षेत्र में इस प्रकार की प्रशासनिक शिथिलता को लेकर स्थानीय स्तर पर भी तीव्र असंतोष व्याप्त है। मछलीशहर क्षेत्र के उपभोक्ताओं और सामाजिक कार्यकर्ताओं का मानना है कि यदि भ्रष्टाचार के आरोपों की जांच के बाद भी कार्रवाई नहीं होती है, तो इससे न केवल आरोपी अधिकारी के मनोबल को बल मिलता है, बल्कि पूरे सिस्टम की विश्वसनीयता भी क्षतिग्रस्त होती है। एक साल का समय किसी भी विभागीय जांच के लिए पर्याप्त से कहीं अधिक है। ऐसे में कार्रवाई में देरी को लेकर यह स्वाभाविक संदेह उत्पन्न होता है कि क्या कहीं न कहीं मामले को दबाने या प्रभावित करने का प्रयास तो नहीं किया जा रहा है। शिकायतकर्ता का कहना है कि उन्होंने वैधानिक और विभागीय प्रक्रियाओं का पूरी तरह पालन किया है, लेकिन न्याय मिलने में हो रही देरी ने उन्हें अब उच्च स्तरीय हस्तक्षेप की मांग करने के लिए बाध्य कर दिया है।

अब शिकायतकर्ता ने इस मामले में पारदर्शिता सुनिश्चित करने और जांच रिपोर्टों की प्रति प्राप्त करने के लिए राज्य सूचना आयोग में अपील दायर करने का निर्णय लिया है। सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005 के प्रावधानों के तहत, कोई भी नागरिक लोक प्राधिकारी से अपने द्वारा दर्ज कराई गई शिकायतों की स्थिति, की गई जांचों की रिपोर्ट और उस पर लिए गए निर्णयों की जानकारी मांग सकता है। यदि विभाग ने जांच पूरी कर ली है, तो उसकी रिपोर्ट सार्वजनिक हित और पारदर्शिता के नाम पर उपलब्ध कराई जानी चाहिए। वहीं, यदि जांच अभी भी लंबित है या कार्रवाई नहीं हुई है, तो इसके कारणों का खुलासा किया जाना आवश्यक है। राज्य सूचना आयोग का रुख करने का यह कदम स्पष्ट करता है कि शिकायतकर्ता विभागीय स्तर पर न्याय मिलने की उम्मीद खो चुके हैं और अब वे कानूनी एवं वैधानिक मार्ग से जवाबदेही तय करवाना चाहते हैं।

उत्तर प्रदेश विद्युत नियामक आयोग और ऊर्जा विभाग द्वारा समय-समय पर भ्रष्टाचार मुक्त सेवा प्रदान करने और उपभोक्ता शिकायतों के त्वरण निस्तारण पर जोर दिया जाता रहा है। मुख्यमंत्री कार्यालय और ऊर्जा मंत्रालय के स्तर पर भी भ्रष्टाचार के प्रति जीरो टॉलरेंस की नीति घोषित है। ऐसे परिदृश्य में जौनपुर के मछलीशहर बिजली डिवीजन में चल रहा यह प्रकरण विभागीय नीतियों और जमीनी वास्तविकताओं के बीच की खाई को उजागर करता है। जब दो जांचों के बाद भी एक साल तक कार्रवाई शून्य रहती है, तो यह केवल एक व्यक्ति विशेष का मामला नहीं रह जाता, बल्कि यह समूचे प्रशासनिक तंत्र की कार्यशैली पर प्रश्नचिह्न बन जाता है।

इस संदर्भ में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि राज्य सूचना आयोग में दायर की जाने वाली अपील पर क्या रुख अपनाया जाता है और क्या आयोग के हस्तक्षेप से विभाग की नींद खुलती है। साथ ही, यह भी स्पष्ट होना चाहिए कि यदि जांच में आरोप निराधार पाए गए थे, तो आरोपी अधिकारी को क्लीन चिट क्यों नहीं दी गई? और यदि आरोप सही पाए गए थे, तो दंडात्मक कार्रवाई में इतनी देरी क्यों हुई? ये सभी प्रश्न अब रिकॉर्ड पर हैं और इनका उत्तर विभाग को देना ही होगा। फिलहाल, मछलीशहर बिजली डिवीजन में अधिशासी अभियंता राजन कुमार पर लगे भ्रष्टाचार आरोपों और उस पर हुई जांचों का मामला विभागीय गलियारों में चर्चा का विषय बना हुआ है, और शिकायतकर्ता के राज्य सूचना आयोग जाने की तैयारी ने इस मामले को एक नया मोड़ दे दिया है। आने वाले दिनों में इस प्रकरण में पारदर्शिता और न्याय की उम्मीद अब केवल वैधानिक हस्तक्षेप से ही जुड़ गई है।