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Tue, Oct 6, 2026Updated 1:29 PM IST
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ग्वालियर: वर्क फ्रॉम होम और फर्जी रिकवरी के दोहरे जाल में फंसी महिला, साइबर ठगों ने लूटे 9 लाख से अधिक

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ग्वालियर। मध्य प्रदेश के ग्वालियर शहर में साइबर अपराधियों ने एक महिला को दो अलग-अलग चरणों में ठगी का शिकार बनाया है। इस सुनियोजित साइबर वारदात में पीड़िता ने पहले ‘वर्क फ्रॉम होम’ (Work From Home) टास्क स्कैम के जरिए अपनी गाढ़ी कमाई गंवाई, और इसके बाद जब उसने इंटरनेट पर मदद तलाशने का प्रयास किया, तो दूसरे गिरोह ने खुद को साइबर एक्सपर्ट और वकील बताकर उसे फिर से चूना लगा दिया। इन दोनों घटनाओं में मिलकर महिला से कुल 9 लाख 5 हजार रुपये की धोखाधड़ी हुई है। यह मामला डिजिटल लेनदेन और ऑनलाइन सहायता की खोज में आम नागरिकों के सामने आ रहे दोहरे खतरे को उजागर करता है।

घटना का पहला चरण ‘वर्क फ्रॉम होम’ या पार्ट-टाइम जॉब के नाम पर शुरू हुआ। साइबर ठगों ने महिला को घर बैठे आसान काम करके अच्छी आय का लालच दिया। शुरुआत में विश्वास जीतने के लिए छोटे भुगतान भी किए गए होंगे, जो ऐसे स्कैम का सामान्य पैटर्न है। इसके बाद पीड़िता को बड़े टास्क पूरे करने या प्रीमियम सदस्यता लेने के नाम पर निवेश करने के लिए कहा गया। झांसे में आकर महिला ने कई किश्तों में कुल 8.55 लाख रुपये ठगों को ट्रांसफर कर दिए। जब वादा किया गया रिटर्न नहीं मिला और संपर्क टूट गया, तब उसे एहसास हुआ कि वह एक सुनियोजित टास्क स्कैम का शिकार हो चुकी है।

ठगी का शिकार होने के बाद पीड़िता ने स्वाभाविक रूप से अपने पैसे वापस पाने का रास्ता खोजना शुरू किया। इसी भ्रम और असहायता की स्थिति का फायदा दूसरे साइबर अपराधी गिरोह ने उठाया। महिला ने सर्च इंजन गूगल पर ‘साइबर फ्रॉड रिकवरी’ या संबंधित कीवर्ड सर्च किए। इस दौरान उसे कुछ ऐसे नंबर या लिंक मिले, जो दावा कर रहे थे कि वे साइबर अपराधों में फंसे पैसे वापस दिलाने में विशेषज्ञ हैं। ये लोग खुद को साइबर एक्सपर्ट और वकील के रूप में पेश कर रहे थे। उन्होंने महिला को यकीन दिलाया कि तकनीकी और कानूनी प्रक्रिया के माध्यम से उसका पैसा वापस लाया जा सकता है।

फर्जी एक्सपर्ट्स ने रिकवरी प्रक्रिया शुरू करने के नाम पर महिला से विभिन्न शुल्कों की मांग की। उन्हें बताया गया कि बैंकिंग चैनलों या सरकारी पोर्टल पर कार्रवाई के लिए सर्विस चार्ज, जीएसटी या अन्य औपचारिकताएं पूरी करना आवश्यक है। पीड़िता, जो पहले ही मानसिक और आर्थिक तनाव में थी, ने बिना किसी स्वतंत्र सत्यापन के इन तथाकथित विशेषज्ञों पर भरोसा किया और उन्हें 50 हजार रुपये और दे दिए। हालांकि, इस राशि के हस्तांतरण के बाद भी न तो कोई रिकवरी हुई और न ही इन फर्जी एक्सपर्ट्स ने कोई ठोस कार्रवाई की। जब महिला ने पुनः संपर्क करने का प्रयास किया, तो ये लोग भी अनुत्तरदायी हो गए या उनके नंबर बंद पाए गए।

यह मामला ‘रिकवरी स्कैम’ की बढ़ती प्रवृत्ति को दर्शाता है, जिसमें अपराधी पहले से पीड़ित व्यक्तियों को ही अपना लक्ष्य बनाते हैं। साइबर सुरक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि ठगी का शिकार हुए लोग अक्सर शर्मिंदगी या तत्काल समाधान की चाहत में आधिकारिक चैनलों के बजाय अनवेरिफाइड ऑनलाइन स्रोतों पर निर्भर हो जाते हैं। गूगल या अन्य सर्च इंजन पर मिलने वाले हर विज्ञापन या लिस्टिंग को आधिकारिक नहीं माना जाना चाहिए। साइबर क्राइम हेल्पलाइन 1930 या राष्ट्रीय साइबर क्राइम रिपोर्टिंग पोर्टल ही एकमात्र विश्वसनीय सरकारी माध्यम हैं, जहां शिकायत दर्ज की जानी चाहिए।

ग्वालियर पुलिस और साइबर सेल द्वारा इस प्रकार के मामलों में जांच की प्रक्रिया अपनाई जाती है। पीड़िता द्वारा दर्ज कराई गई शिकायत के आधार पर बैंक खातों को फ्रीज करने और डिजिटल फुटप्रिंट्स को ट्रैक करने का कार्य किया जाता है। हालांकि, क्रिप्टोकरेंसी या त्वरित यूपीआई ट्रांसफर के माध्यम से किए गए भुगतानों की रिकवरी अत्यंत कठिन होती है। इसलिए, पूर्व-सावधानी ही सबसे प्रभावी सुरक्षा है। नागरिकों को सलाह दी जाती है कि वे किसी भी अनजान व्यक्ति या संस्था को ऑनलाइन पैसा ट्रांसफर करने से पहले उनकी प्रामाणिकता की पुष्टि करें।

इस घटना से स्पष्ट होता है कि साइबर अपराधी अब केवल प्राथमिक ठगी तक सीमित नहीं हैं, बल्कि वे पीड़ितों की द्वितीयक शोषण (Secondary Victimization) भी करते हैं। वर्क फ्रॉम होम स्कैम और फर्जी रिकवरी सेवाएं आज के डिजिटल परिदृश्य में दो सबसे खतरनाक जाल हैं। ग्वालियर की इस महिला की दुर्भाग्यपूर्ण कहानी अन्य नागरिकों के लिए एक गंभीर चेतावनी है कि ऑनलाइन दुनिया में अत्यधिक सावधानी और सत्यापन ही वित्तीय सुरक्षा की कुंजी है। किसी भी प्रकार की साइबर ठगी की सूचना तुरंत स्थानीय पुलिस या साइबर क्राइम पोर्टल पर देना अनिवार्य है, न कि इंटरनेट पर मिलने वाले अनजान ‘मसीहाओं’ पर भरोसा करना।