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Wed, Oct 7, 2026Updated 10:05 AM IST
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शिवसेना चुनाव चिह्न विवाद: सुप्रीम कोर्ट ने दलबदल को बताया संवैधानिक पाप, कहा- चुनाव आयोग दोनों गुटों को अलग-अलग निशान दे सकता था

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नई दिल्ली। शिवसेना के चुनाव चिह्न आवंटन से जुड़े विवाद में मंगलवार, 6 अक्टूबर 2026 को सुप्रीम कोर्ट में महत्वपूर्ण सुनवाई हुई। इस दौरान सर्वोच्च न्यायालय ने बेहद सख्त टिप्पणी करते हुए दलबदल को ‘संवैधानिक पाप’ करार दिया। कोर्ट ने यह भी सवाल उठाया कि क्या चुनाव आयोग शिवसेना के दोनों धड़ों को अलग-अलग चुनाव चिह्न आवंटित कर सकता था या नहीं। शिवसेना के चुनाव चिह्न और पार्टी नाम को लेकर चल रहा यह विवाद पिछले लगभग चार सालों से न्यायिक प्रक्रिया का हिस्सा बना हुआ है।

सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान सीधे तौर पर पूछा कि जो लोग दलबदल करते हैं, उनके लिए पार्टी के चुनाव चिह्न की भावना कैसे लागू हो सकती है। न्यायालय ने इस बात पर गहराई से विचार किया कि जब कोई नेता या गुट अपनी मूल पार्टी छोड़कर अलग हो जाता है, तो उस स्थिति में पार्टी के पारंपरिक चुनाव चिह्न पर उसका दावा किस हद तक वैध माना जा सकता है। कोर्ट की यह टिप्पणी शिवसेना में हुई टूट और उसके बाद चुनाव आयोग द्वारा दिए गए फैसले की संवैधानिक वैधता पर सीधे तौर पर सवाल खड़े करती है।

सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट ने चुनाव आयोग की भूमिका और उसके विकल्पों पर भी चर्चा की। न्यायालय ने यह अवलोकन किया कि चुनाव आयोग के पास यह विकल्प मौजूद था कि वह शिवसेना के दोनों गुटों को अलग-अलग चुनाव चिह्न आवंटित कर दे। कोर्ट ने इस बात पर बल दिया कि एक ही चुनाव चिह्न किसी एक गुट को देने के बजाय, दोनों पक्षों को अलग-अलग निशान दिए जाने का रास्ता अपनाया जा सकता था। इससे न केवल विवाद से बचा जा सकता था, बल्कि लोकतांत्रिक प्रक्रिया में निष्पक्षता भी सुनिश्चित होती।

गौरतलब है कि शिवसेना में विभाजन के बाद पार्टी के नाम और उसके प्रतिष्ठित चुनाव चिह्न ‘धनुष और तीर’ को लेकर दोनों गुटों के बीच कड़ा संघर्ष शुरू हो गया था। यह विवाद पिछले करीब चार वर्षों से विभिन्न मंचों पर लंबित है। पहले यह मामला चुनाव आयोग के समक्ष गया, जहां निर्वाचन आयोग ने अपने अधिकार क्षेत्र का उपयोग करते हुए एक गुट के पक्ष में फैसला सुनाया था। इसके बाद यह मामला सुप्रीम कोर्ट पहुंचा, जहां अब इसकी संवैधानिक वैधता और दलबदल कानून के तहत इसके निहितार्थों की गहन जांच की जा रही है।

सुप्रीम कोर्ट द्वारा दलबदल को ‘संवैधानिक पाप’ बताए जाने का भारतीय राजनीति और संवैधानिक कानून में बहुत बड़ा महत्व है। भारत में दलबदल विरोधी कानून (एटीडीएल) संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत आता है, जिसका मुख्य उद्देश्य ही जनप्रतिनिधियों द्वारा पार्टी बदलने की प्रवृत्ति को रोकना है। कोर्ट की ताजा टिप्पणी इस बात को रेखांकित करती है कि जो व्यक्ति या समूह संवैधानिक रूप से गलत माने जाने वाले कार्य यानी दलबदल में शामिल होता है, उसे उसी पार्टी के मूल चुनाव चिह्न और पहचान का लाभ मिलना न्यायसंगत नहीं हो सकता।

इस मामले में चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली भी सुप्रीम कोर्ट के सवालों के घेरे में आई है। चुनाव आयोग ने पहले इस विवाद को सुलझाने के लिए बहुमत के आधार पर फैसला किया था, लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने अब यह संकेत दिया है कि आयोग के पास विवाद को सुलझाने के अन्य तरीके भी उपलब्ध थे। दोनों गुटों को अलग-अलग चिह्न देने का सुझाव इस बात की ओर इशारा करता है कि कोर्ट चाहता है कि चुनावी प्रक्रिया में किसी भी गुट को अनुचित लाभ न मिले और मतदाताओं के बीच भ्रम की स्थिति पैदा न हो।

शिवसेना का यह चुनाव चिह्न विवाद केवल महाराष्ट्र की राजनीति तक सीमित नहीं है, बल्कि यह देश भर में राजनीतिक दलों में होने वाली टूट और चुनाव चिह्नों के आवंटन के लिए एक बड़ा उदाहरण बन चुका है। सुप्रीम कोर्ट की इन टिप्पणियों से भविष्य में चुनाव आयोग द्वारा इस तरह के विवादों को निपटाने के तरीकों में बदलाव आ सकता है। यदि कोर्ट यह तय करता है कि दलबदल करने वालों को मूल पार्टी का चिह्न नहीं मिलना चाहिए, तो यह देश की राजनीतिक व्यवस्था में एक ऐतिहासिक बदलाव साबित होगा।

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने यह स्पष्ट किया कि चुनाव चिह्न केवल एक प्रतीक नहीं है, बल्कि यह किसी राजनीतिक दल की विचारधारा, उसके इतिहास और मतदाताओं के साथ उसके जुड़ाव की भावनात्मक पहचान है। इसलिए, इस भावना को उन लोगों के लिए लागू करना तर्कसंगत नहीं है जिन्होंने पार्टी के मूल ढांचे को तोड़ने का काम किया है। कोर्ट ने यह भी ध्यान दिलाया कि संविधान की दसवीं अनुसूची का मूल उद्देश्य ही दलबदल को रोकना है, ऐसे में दलबदल करने वालों को पार्टी की पूरी संपत्ति और चिह्न सौंप देना इस कानून की भावना के खिलाफ है।

यह मामला अभी सुप्रीम कोर्ट में विचाराधीन है और अंतिम फैसला आना बाकी है। हालांकि, मंगलवार को हुई सुनवाई और कोर्ट की कड़ी टिप्पणियों ने यह स्पष्ट कर दिया है कि न्यायालय इस मुद्दे को अत्यंत गंभीरता से ले रहा है। शिवसेना के दोनों गुटों के वकीलों ने अपने-अपने तर्क रखे हैं, लेकिन कोर्ट द्वारा उठाए गए संवैधानिक सवालों ने इस पूरे विवाद को एक नया आयाम दे दिया है। वंदे भारत न्यूज़ की रिपोर्ट के अनुसार, इस मामले में आगे की सुनवाई और अंतिम आदेश पर पूरे देश की राजनीतिक नजरें टिकी हुई हैं, क्योंकि इस फैसले का असर आने वाले समय में देश के सभी राजनीतिक दलों की आंतरिक लोकतांत्रिक प्रक्रियाओं पर पड़ सकता है।