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Wed, Oct 7, 2026Updated 10:21 AM IST
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मक्का पैक्ट सक्रिय: हूती विद्रोहियों से निपटने सऊदी अरब जाएंगी पाकिस्तान और तुर्किये की सेनाएं, जानें रक्षा समझौते की पूरी पृष्ठभूमि

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नई दिल्ली। यमन में हूती विद्रोहियों के बढ़ते खतरे और क्षेत्रीय सुरक्षा चुनौतियों के मद्देनजर सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये के बीच ऐतिहासिक ‘मक्का पैक्ट’ (Mecca Pact) अब व्यावहारिक रूप से सक्रिय हो गया है। इस त्रिपक्षीय रक्षा समझौते के तहत पाकिस्तान और तुर्किये की सेनाएं सऊदी अरब की सुरक्षा और हूती विद्रोहियों से निपटने के लिए तैनात की जाएंगी। यह कदम ऐसे समय में उठाया गया है जब लाल सागर और यमन क्षेत्र में भू-राजनीतिक तनाव चरम पर है। हालांकि, पाकिस्तान ने शुरुआत में सऊदी अरब में अपनी सेना भेजने से इनकार किया था, लेकिन बाद में बदलते हालात और सामरिक मजबूरियों ने इस्लामाबाद को इस समझौते को लागू करने के लिए बाध्य कर दिया। वैंडे भारत न्यूज़ की इस रिपोर्ट में हम विस्तार से जानेंगे कि आखिर किन कारणों से यह पैक्ट सक्रिय हुआ और इसके भारत-पाकिस्तान संबंधों तथा क्षेत्रीय सुरक्षा पर क्या प्रभाव पड़ सकते हैं।

मक्का पैक्ट की पृष्ठभूमि और वर्तमान प्रासंगिकता

सऊदी अरब, पाकिस्तान और तुर्किये के बीच यह संयुक्त रक्षा समझौता मूल रूप से इस्लामी देशों की सामूहिक सुरक्षा और आपसी सहयोग को सुदृढ़ बनाने के उद्देश्य से बनाया गया था। इसे ‘मक्का पैक्ट’ इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसकी आधारशिला इस्लाम के सबसे पवित्र स्थलों की सुरक्षा और मुस्लिम उम्माह की एकता के सिद्धांतों पर टिकी है। पिछले कुछ वर्षों में यमन में हूती विद्रोहियों द्वारा सऊदी अरब पर किए गए ड्रोन और मिसाइल हमलों ने रियाद की सुरक्षा चिंताओं को गहरा कर दिया है। हूती विद्रोहियों को ईरान का समर्थन प्राप्त होने की बातें लगातार सामने आती रही हैं, जिससे सऊदी अरब को अपनी सीमाओं और महत्वपूर्ण ऊर्जा बुनियादी ढांचे की सुरक्षा के लिए विश्वसनीय सैन्य भागीदारों की आवश्यकता महसूस हुई। तुर्किये और पाकिस्तान दोनों ही सैन्य क्षमता और इस्लामी दुनिया में अपने प्रभाव के कारण सऊदी अरब के लिए स्वाभाविक विकल्प रहे हैं।

पाकिस्तान का यू-टर्न: पहले इनकार, फिर स्वीकृति के पीछे की मजबूरियां

इस समझौते की सबसे चर्चित पहलू पाकिस्तान का अपना रुख बदलना है। जब सऊदी अरब ने पहली बार पाकिस्तान से यमन में जमीनी सेना भेजने का अनुरोध किया था, तो इस्लामाबाद ने स्पष्ट रूप से इनकार कर दिया था। पाकिस्तान की संसद ने भी सर्वसम्मति से प्रस्ताव पास करके यमन युद्ध में शामिल होने से मना किया था, क्योंकि वह अपने आंतरिक संसाधनों को सीमावर्ती क्षेत्रों और आतंकवाद विरोधी अभियानों में व्यस्त रखना चाहता था। इसके अलावा, ईरान के साथ संबंधों को बिगाड़ने का डर भी एक प्रमुख कारक था।

हालांकि, वर्तमान में पाकिस्तान के इस निर्णय में बदलाव के पीछे कई ठोस सामरिक और आर्थिक कारण बताए जा रहे हैं। सबसे प्रमुख कारण सऊदी अरब के साथ पाकिस्तान का गहरा आर्थिक निर्भरता है। सऊदी अरब पाकिस्तान को नियमित रूप से वित्तीय सहायता, तेल की उधारी और केंद्रीय बैंक में जमा राशि प्रदान करता रहा है। पाकिस्तान की वर्तमान आर्थिक स्थिति को देखते हुए रियाद का समर्थन उसके लिए जीवनरेखा समान है। दूसरा कारण क्षेत्रीय शक्ति संतुलन है। तुर्किये के सऊदी अरब के साथ बढ़ते रक्षा सहयोग को देखते हुए पाकिस्तान खुद को इस धुरी से अलग नहीं रख सकता था, अन्यथा उसका सऊदी अरब में प्रभाव कमजोर होने की संभावना थी। तीसरा, हूती विद्रोहियों द्वारा लाल सागर में वाणिज्यिक जहाजों पर हमले और सऊदी तेल प्रतिष्ठानों को निशाना बनाना अब केवल सऊदी अरब का आंतरिक मामला नहीं रहा, बल्कि यह वैश्विक ऊर्जा सुरक्षा और पाकिस्तान की अपनी ऊर्जा आपूर्ति के लिए भी खतरा बन गया है।

क्या वाकई यमन में जाएगी जमीनी सेना?

सवाल यह उठता है कि क्या पाकिस्तान और तुर्किये वास्तव में यमन की जमीन पर हूतियों से लड़ने के लिए अपनी सेनाएं भेजेंगे? उपलब्ध जानकारी और विशेषज्ञों के विश्लेषण के अनुसार, फिलहाल पूर्ण पैमाने पर जमीनी युद्ध में शामिल होने की संभावना कम है। ‘मक्का पैक्ट’ के सक्रिय होने का अर्थ मुख्य रूप से सऊदी अरब की सीमाओं की सुरक्षा, एयर डिफेंस सिस्टम का संचालन, प्रशिक्षण और खुफिया साझा करना है। पाकिस्तान पहले भी सऊदी अरब में हजारों सैनिकों को प्रशिक्षण और सुरक्षा कार्यों के लिए तैनात कर चुका है। तुर्किये भी अपनी तकनीकी विशेषज्ञता और ड्रोन तकनीक के माध्यम से सऊदी रक्षा प्रणाली को मजबूत करने में योगदान दे सकता है। यमन के अंदर गहन जमीनी कार्रवाई से बचने की कोशिश की जाएगी ताकि राजनीतिक और मानवीय जटिलताओं से बचा जा सके, लेकिन सऊदी क्षेत्र की रक्षा सुनिश्चित करने के लिए सैन्य उपस्थिति को मजबूत किया जाएगा।

भारत-पाकिस्तान संघर्ष की स्थिति में सऊदी-तुर्किये की भूमिका

इस समझौते का एक संवेदनशील पहलू दक्षिण एशियाई सुरक्षा समीकरणों पर इसका प्रभाव है। यदि भविष्य में भारत और पाकिस्तान के बीच कोई सैन्य संघर्ष होता है, तो क्या सऊदी अरब और तुर्किये पाकिस्तान का साथ देंगे? स्रोत सामग्री में इस प्रश्न को उठाया गया है, लेकिन इसका उत्तर स्पष्ट नहीं है। ऐतिहासिक रूप से, सऊदी अरब ने भारत-पाकिस्तान तनाव के दौरान तटस्थ रहने या मध्यस्थता की भूमिका निभाने का प्रयास किया है, क्योंकि भारत सऊदी अरब का एक प्रमुख व्यापारिक भागीदार और ऊर्जा खरीदार है। तुर्किये ने हाल के वर्षों में कश्मीर मुद्दे पर पाकिस्तान का राजनयिक समर्थन किया है, लेकिन सैन्य हस्तक्षेप की संभावना अत्यंत कम है। ‘मक्का पैक्ट’ का प्राथमिक फोकस इस्लामी देशों की आंतरिक सुरक्षा और बाहरी गैर-मुस्लिम खतरों से बचाव है, न कि दो परमाणु संपन्न पड़ोसियों के बीच द्विपक्षीय विवाद में शामिल होना। फिर भी, यह समझौता पाकिस्तान को एक मनोवैज्ञानिक और राजनयिक सुरक्षा कवच जरूर प्रदान करता है, जो क्षेत्रीय शक्ति संतुलन को प्रभावित कर सकता है।

निष्कर्षतः, ‘मक्का पैक्ट’ का सक्रिय होना पश्चिम एशिया की बदलती सुरक्षा वास्तविकताओं का प्रतिबिंब है। पाकिस्तान और तुर्किये की सऊदी अरब में सैन्य तैनाती हूती खतरे से निपटने के साथ-साथ इस्लामी देशों के बीच रक्षा एकीकरण की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है। हालांकि, इसकी सफलता इस बात पर निर्भर करेगी कि ये देश यमन की जटिल भू-राजनीति में फंसे बिना सऊदी अरब की सुरक्षा को कैसे सुनिश्चित करते हैं और भारत जैसे प्रमुख क्षेत्रीय खिलाड़ियों के साथ अपने संबंधों को कैसे संतुलित रखते हैं।