इंदौर: 5 महीने से पुलिस के पास लंबित थी शिकायत, हाईकोर्ट ने चंदन नगर TI को 60 दिन में कार्रवाई के दिए निर्देश

इंदौर। मध्य प्रदेश में पुलिस प्रशासन की कार्यप्रणाली और आम नागरिकों की शिकायतों पर समयबद्ध कार्रवाई को लेकर एक बार फिर सवाल उठे हैं। इंदौर के चंदन नगर थाना क्षेत्र से जुड़े एक मामले में करीब पांच महीने तक पुलिस के पास शिकायत लंबित रहने और उस पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं किए जाने के बाद मामला मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ तक पहुंचा। हाई कोर्ट ने इस मामले को बेहद गंभीरता से लेते हुए चंदन नगर थाने के पुलिस निरीक्षक (टीआई) को स्पष्ट और समयबद्ध निर्देश जारी किए हैं। अदालत ने टीआई को आदेश दिया है कि वे याचिकाकर्ता की शिकायत पर उचित कार्रवाई करें और जांच का परिणाम भी संबंधित व्यक्ति को अनिवार्य रूप से बताया जाए।
मध्य प्रदेश हाई कोर्ट की इंदौर खंडपीठ में यह सुनवाई जस्टिस गजेंद्र सिंह की एकल पीठ के समक्ष हुई। प्राप्त जानकारी के अनुसार, याचिकाकर्ता ने अपनी शिकायत चंदन नगर थाने में दर्ज कराई थी, लेकिन पांच महीने बीत जाने के बाद भी पुलिस की ओर से इस दिशा में कोई संतोषजनक कदम नहीं उठाया गया था। जब पीड़ित पक्ष को स्थानीय स्तर पर कोई न्याय मिलता नहीं दिखा, तो उसे न्यायपालिका का दरवाजा खटखटाने के लिए बाध्य होना पड़ा। हाई कोर्ट में दायर याचिका में इस बात का उल्लेख किया गया था कि पुलिस अधिकारी शिकायत पर कानून सम्मत कार्रवाई करने में देरी कर रहे हैं, जिससे याचिकाकर्ता को मानसिक और कानूनी दोनों तरह की परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है।
जस्टिस गजेंद्र सिंह ने दोनों पक्षों की दलीलें सुनने और उपलब्ध तथ्यों का अवलोकन करने के बाद चंदन नगर थाना प्रभारी को सीधे तौर पर निर्देशित किया। अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया है कि याचिकाकर्ता की शिकायत पर उचित और विधिक कार्रवाई की जाए। इसके साथ ही, अदालत ने यह भी सुनिश्चित करने का निर्देश दिया कि जांच पूरी होने के बाद उसके परिणाम की जानकारी याचिकाकर्ता को दी जाए। हाई कोर्ट ने इस पूरी प्रक्रिया को पूरा करने के लिए 60 दिन का समय निर्धारित किया है। इसका अर्थ यह है कि चंदन नगर थाने के टीआई को अगले दो महीनों के भीतर जांच पूरी करके न केवल कार्रवाई करनी होगी, बल्कि याचिकाकर्ता को भी जांच के निष्कर्ष से अवगत कराना होगा।
यह मामला इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि यह पुलिस थानों में आम जनता की शिकायतों के निस्तारण में हो रही देरी की ओर ध्यान आकर्षित करता है। आपराधिक प्रक्रिया संहिता और भारतीय न्याय संहिता के प्रावधानों के तहत, यदि कोई व्यक्ति किसी अपराध या शिकायत की जानकारी पुलिस को देता है, तो पुलिस का यह कर्तव्य होता है कि वह उस पर समय रहते संज्ञान ले और आवश्यक कानूनी कदम उठाए। कई बार पुलिस थानों में शिकायतें लंबित रह जाती हैं, जिसके कारण पीड़ितों को उच्च न्यायालय या अन्य न्यायिक मंचों की शरण लेनी पड़ती है। इंदौर खंडपीठ का यह आदेश ऐसे सभी मामलों के लिए एक संदेश है कि पुलिस को अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन समयसीमा के भीतर करना चाहिए।
चंदन नगर थाना इंदौर शहर का एक प्रमुख और व्यस्त पुलिस थाना है। यहां प्रतिदिन बड़ी संख्या में लोग अपनी शिकायतें लेकर आते हैं। ऐसे में पांच महीने तक एक शिकायत का लंबित रहना और उस पर कार्रवाई न होना पुलिस प्रशासन की कार्यशैली पर सवाल खड़े करता है। हालांकि, हाई कोर्ट के हस्तक्षेप के बाद अब यह उम्मीद की जा रही है कि चंदन नगर पुलिस तेजी से काम करेगी और 60 दिन की निर्धारित समयसीमा के भीतर जांच को तार्किक निष्कर्ष तक पहुंचाएगी।
कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि हाई कोर्ट द्वारा पुलिस अधिकारियों को इस प्रकार के समयबद्ध निर्देश दिए जाना न्यायिक सक्रियता का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। जब निचले स्तर पर प्रशासनिक तंत्र सुस्त पड़ जाता है, तो न्यायपालिका का हस्तक्षेप नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा सुनिश्चित करता है। जस्टिस गजेंद्र सिंह के इस आदेश से यह स्पष्ट होता है कि अदालतें आम लोगों की शिकायतों को लेकर पुलिस की उदासीनता को बर्दाश्त नहीं करेंगी।
वन्दे भारत न्यूज़ की रिपोर्ट के अनुसार, फिलहाल याचिकाकर्ता की मूल शिकायत किस विषय या घटनाक्रम से संबंधित है, इसकी विस्तृत जानकारी स्रोत में उपलब्ध नहीं है। हालांकि, अदालत का मुख्य जोर इस बात पर रहा है कि चाहे शिकायत किसी भी प्रकृति की हो, पुलिस का यह दायित्व है कि वह उस पर कानून के अनुसार कार्रवाई करे और शिकायतकर्ता को अनिश्चित काल तक थाने के चक्कर न लगाने पड़ें।
अब चंदन नगर थाने के टीआई के सामने हाई कोर्ट के इस आदेश का पालन करना एक बड़ी चुनौती और जिम्मेदारी है। उन्हें 60 दिनों के भीतर जांच पूरी करके याचिकाकर्ता को उसके परिणाम से अवगत कराना होगा। यदि इस निर्धारित समयसीमा में कार्रवाई नहीं होती है, तो पुलिस अधिकारियों को अदालत की अवमानना जैसे गंभीर परिणामों का भी सामना करना पड़ सकता है। इंदौर पुलिस कमिश्नरेट सिस्टम के तहत काम करता है, और ऐसे में उच्च अधिकारियों से भी यह अपेक्षा की जाती है कि वे थाना स्तर पर शिकायतों के निस्तारण की नियमित समीक्षा करें ताकि भविष्य में ऐसी स्थिति उत्पन्न न हो जहां किसी नागरिक को न्याय के लिए पांच महीने तक इंतजार करना पड़े और अंततः हाई कोर्ट का रुख करना पड़े।

