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Wed, Oct 7, 2026Updated 8:36 AM IST
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मुजफ्फरपुर क्रिकेट ट्रायल विवाद: निजी एकेडमी से जुड़े चयनकर्ताओं की भूमिका पर सवाल, AIDSO ने डीएम से निष्पक्ष जांच की मांग की

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मुजफ्फरपुर। बिहार के मुजफ्फरपुर जिले में हाल ही में आयोजित जिलास्तरीय खेल प्रतियोगिता के क्रिकेट ट्रायल को लेकर गंभीर अनियमितताओं के आरोप सामने आए हैं। इस चयन प्रक्रिया में पारदर्शिता और निष्पक्षता पर उठे सवालों के बाद ऑल इंडिया डिफेंस सर्विसेज ऑर्गनाइजेशन (AIDSO) ने जिलाधिकारी से हस्तक्षेप की मांग की है। संगठन ने इस पूरे मामले की उच्च स्तरीय और निष्पक्ष जांच कराने की अपील की है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि सरकारी स्तर पर होने वाली खेल प्रतियोगिताओं में मेधावी खिलाड़ियों के साथ कोई भेदभाव न हो।

AIDSO द्वारा जिलाधिकारी को दिए गए ज्ञापन और सार्वजनिक बयानों में मुख्य रूप से हितों के टकराव (Conflict of Interest) का मुद्दा उठाया गया है। संगठन ने स्पष्ट आरोप लगाया है कि सरकारी तंत्र के तहत आयोजित किए गए इस क्रिकेट ट्रायल में चयन समिति का गठन विवादास्पद तरीके से किया गया। आरोपों के अनुसार, चयन प्रक्रिया की जिम्मेदारी उन व्यक्तियों को सौंपी गई थी जो सीधे तौर पर एक निजी क्रिकेट एकेडमी से जुड़े हुए थे। खेल प्रशासन के सामान्य मानकों और सरकारी नियमों के विपरीत, जब चयनकर्ता स्वयं किसी निजी संस्थान से संबद्ध हों, तो उस प्रक्रिया की विश्वसनीयता स्वाभाविक रूप से संदिग्ध मानी जाती है।

मामले को और अधिक गंभीर बनाने वाली बात यह है कि जिस निजी एकेडमी से संबंधित लोगों को चयनकर्ता बनाया गया था, उसी एकेडमी के खिलाड़ी भी इस ट्रायल में बड़ी संख्या में शामिल हुए थे। AIDSO का कहना है कि यह स्थिति सीधे तौर पर ‘निष्पक्ष प्रतिस्पर्धा’ के सिद्धांतों का उल्लंघन करती है। जब निर्णय लेने वाले पदाधिकारी और लाभार्थी दोनों एक ही निजी संस्थान से जुड़े हों, तो अन्य स्वतंत्र खिलाड़ियों और अकादमियों के प्रतिभागियों के लिए समान अवसर की गारंटी देना असंभव हो जाता है। संगठन ने आशंका जताई है कि इस व्यवस्था का दुरुपयोग करके पूर्व-निर्धारित चयन किया गया हो सकता है, जिससे योग्य खिलाड़ियों को बाहर रखा गया होगा।

जिलास्तरीय खेल प्रतियोगिताएं राज्य और राष्ट्रीय स्तर पर प्रतिभा पहचानने की आधारशिला होती हैं। ऐसे में, यदि जिला स्तर पर ही चयन प्रक्रिया दूषित हो जाती है, तो इसका असर पूरे खेल पारिस्थितिकी तंत्र पर पड़ता है। AIDSO ने अपने विरोध में यह रेखांकित किया है कि सरकारी आयोजनों में निजी संस्थाओं के हस्तक्षेप या उनके प्रतिनिधियों को अनियंत्रित अधिकार देना प्रशासनिक त्रुटि है। संगठन ने मांग की है कि जिलाधिकारी इस मामले को केवल एक शिकायत के रूप में न देखें, बल्कि इसे खेल नीति के अनुपालन और सरकारी आयोजनों की गरिमा बनाए रखने के दृष्टिकोण से देखें।

ज्ञापन में यह भी कहा गया है कि यदि इस ट्रायल की निष्पक्ष जांच नहीं हुई और दोषियों पर कार्रवाई नहीं की गई, तो इससे युवा खिलाड़ियों का सरकारी खेल प्रणाली से विश्वास उठ जाएगा। मुजफ्फरपुर जैसे जिले में, जो ऐतिहासिक रूप से प्रतिभाशाली खिलाड़ियों के लिए जाना जाता है, ऐसी घटनाएं खेल संस्कृति के लिए घातक सिद्ध हो सकती हैं। AIDSO ने स्पष्ट किया है कि उनकी मांग किसी विशेष व्यक्ति या एकेडमी के खिलाफ बदले की भावना से प्रेरित नहीं है, बल्कि यह भविष्य में होने वाले सभी सरकारी ट्रायल्स में पारदर्शिता सुनिश्चित करने के उद्देश्य से है।

संगठन ने जिलाधिकारी से अनुरोध किया है कि वे मौजूदा चयन समिति की वैधता की समीक्षा करें और यदि आवश्यक हो, तो एक नई, स्वतंत्र और तटस्थ समिति का गठन करके पुनः ट्रायल या सत्यापन प्रक्रिया आयोजित कराएं। इसके अलावा, भविष्य में इस प्रकार की अनियमितताओं को रोकने के लिए एक स्पष्ट दिशा-निर्देश जारी करने की भी मांग की गई है, जिसमें यह सुनिश्चित किया जाए कि किसी भी सरकारी ट्रायल में चयनकर्ता के रूप में उसी टूर्नामेंट में भाग लेने वाली निजी एकेडमी या क्लब से जुड़े व्यक्तियों को शामिल न किया जाए।

फिलहाल, जिला प्रशासन की ओर से इस मांग पर कोई औपचारिक प्रतिक्रिया या जांच आदेश जारी होने की पुष्टि नहीं हुई है। हालांकि, AIDSO द्वारा उठाए गए बिंदु तकनीकी और नैतिक दोनों स्तरों पर महत्वपूर्ण हैं। खेल प्रशासन में हितों के टकराव को लेकर भारत सरकार और बिहार सरकार के खेल विभाग के पास पहले से ही दिशा-निर्देश मौजूद हैं। अब यह देखना होगा कि मुजफ्फरपुर जिला प्रशासन इन आरोपों पर कितनी तत्परता से संज्ञान लेता है और क्या वह चयन प्रक्रिया की शुचिता को बहाल करने के लिए ठोस कदम उठाता है। इस मामले का निपटारा न केवल वर्तमान ट्रायल के लिए, बल्कि जिले में भविष्य की खेल गतिविधियों की विश्वसनीयता के लिए भी एक मिसाल स्थापित करेगा।