मध्य प्रदेश में सारा ऐप की तकनीकी खराबी से भू-अभिलेख और फसल सर्वेक्षण प्रभावित, पटवारियों ने जियो-फेंसिंग की मांग को लेकर आयुक्त को सौंपा ज्ञापन

भोपाल। मध्य प्रदेश में राजस्व विभाग द्वारा भूमि अभिलेखों के डिजिटलीकरण और फसल सर्वेक्षण के लिए उपयोग किए जाने वाले ‘सारा’ (SARA) ऐप में आई तकनीकी खराबी के कारण प्रदेश भर के किसानों और राजस्व अधिकारियों को गंभीर समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है। इस तकनीकी गड़बड़ी के परिणामस्वरूप किसानों की भूमि और उनके द्वारा बोई गई फसलों की लोकेशन (स्थिति) में बदलाव या विस्थापन होने की शिकायतें सामने आई हैं। रिपोर्टों के अनुसार, इस तकनीकी त्रुटि का सीधा असर गिरदावरी कार्य पर पड़ रहा है, जिससे भूमि संबंधी आंकड़ों की शुद्धता और विश्वसनीयता पर प्रश्नचिह्न लग गया है।
सारा ऐप में उत्पन्न हुई इस समस्या के कारण कई स्थानों पर ऐसा देखा गया है कि एक किसान के खेत की फसल की जानकारी दूसरे किसान के खेत में दर्ज हो रही है। यह त्रुटि न केवल भू-अभिलेखों में अशुद्धियां पैदा कर रही है, बल्कि किसानों के बीच भ्रम और असंतोष का कारण भी बन रही है। जब फसल सर्वेक्षण के दौरान किसी व्यक्ति की फसल का रिकॉर्ड किसी अन्य की भूमि से जुड़ जाता है, तो इससे राजस्व विभाग के आंकड़ों में विसंगति उत्पन्न होती है। ऐसी स्थिति में वास्तविक लाभार्थियों की पहचान करना और उन्हें सरकारी योजनाओं का सटीक लाभ पहुंचाना चुनौतीपूर्ण हो जाता है। गिरदावरी, जो कि फसल निरीक्षण और भूमि अभिलेखों के अद्यतन की एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है, इस तकनीकी बाधा के कारण बाधित हो रही है।
इस गंभीर समस्या को देखते हुए पटवारियों ने अब व्यवस्थागत सुधार की मांग उठाई है। पटवारियों का कहना है कि वर्तमान में ऐप जिस तकनीक पर कार्य कर रहा है, उसमें सुधार की आवश्यकता है ताकि भविष्य में इस प्रकार की त्रुटियों से बचा जा सके। इस संदर्भ में, पटवारियों ने राजस्व आयुक्त को एक औपचारिक ज्ञापन सौंपा है। इस ज्ञापन में उन्होंने विशेष रूप से ‘जियो-फेंसिंग’ (Geo-fencing) तकनीक को लागू करने की मांग की है। पटवारियों का तर्क है कि यदि सारा ऐप में जियो-फेंसिंग की व्यवस्था की जाती है, तो भूमि की सीमाओं और फसल की लोकेशन को अधिक सटीकता के साथ चिह्नित किया जा सकता है। जियो-फेंसिंग तकनीक जीपीएस निर्देशांकों का उपयोग करके एक आभासी भौगोलिक सीमा निर्धारित करती है, जिससे यह सुनिश्चित किया जा सकता है कि कोई भी डेटा केवल उसी निर्दिष्ट क्षेत्र से जुड़े जहां से उसे एकत्र किया गया है।
पटवारियों द्वारा प्रस्तुत किए गए ज्ञापन में यह स्पष्ट किया गया है कि बिना जियो-फेंसिंग के, ऐप पर निर्भरता बढ़ाने से त्रुटियों की संभावना बनी रहती है। वे चाहते हैं कि तकनीकी ढांचे को मजबूत किया जाए ताकि मैदानी स्तर पर काम करने वाले कर्मचारियों को सही और विश्वसनीय डेटा उपलब्ध कराया जा सके। उनका मानना है कि जियो-फेंसिंग न केवल वर्तमान समस्या का समाधान करेगी, बल्कि भविष्य में भू-अभिलेखों से जुड़े विवादों को कम करने में भी सहायक सिद्ध होगी। यह मांग ऐसे समय में उठी है जब प्रदेश सरकार डिजिटल इंडिया और ई-गवर्नेंस के तहत राजस्व प्रशासन को पूरी तरह से डिजिटल और पारदर्शी बनाने के प्रयास कर रही है।
राजस्व विभाग के लिए सारा ऐप एक महत्वपूर्ण उपकरण है, जिसका उद्देश्य भूमि संबंधी कार्यों को सरल, पारदर्शी और त्वरित बनाना है। हालांकि, तकनीकी खराबी ने इस पहल की प्रभावकारिता को अस्थायी रूप से कमजोर किया है। किसानों की जमीन की लोकेशन खिसकने और फसल रिकॉर्ड के मिश्रण की घटनाएं यह दर्शाती हैं कि सॉफ्टवेयर के मौजूदा संस्करण में अभी भी कुछ कमियां हैं जिन्हें दूर करने की तत्काल आवश्यकता है। यदि इन त्रुटियों को समय रहते ठीक नहीं किया गया, तो इससे न केवल गिरदावरी का कार्य प्रभावित होगा, बल्कि किसानों के हितों से जुड़े अन्य कार्यों जैसे कि फसल बीमा, राहत सहायता और भूमि स्वामित्व संबंधी प्रमाण पत्र जारी करने में भी देरी हो सकती है।
ज्ञापन प्राप्त होने के बाद अब यह देखा जाना बाकी है कि राजस्व आयुक्त और तकनीकी टीम इस मुद्दे पर क्या संज्ञान लेते हैं। पटवारियों की जियो-फेंसिंग की मांग को तकनीकी रूप से कितनी प्राथमिकता दी जाती है, यह आने वाले समय में स्पष्ट होगा। फिलहाल, सारा ऐप में सुधार और त्रुटि मुक्त संचालन सुनिश्चित करना राजस्व विभाग के समक्ष एक प्रमुख चुनौती है। इस मामले में किसी भी आधिकारिक प्रतिक्रिया या तकनीकी अपडेट की अभी पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन मैदानी स्तर से उठ रही ये आवाजें यह संकेत देती हैं कि डिजिटल सिस्टम को अधिक सटीक और उपयोगकर्ता-अनुकूल बनाने की जरूरत है। भू-अभिलेखों की शुद्धता बनाए रखना राज्य के राजस्व प्रशासन की रीढ़ है, और किसी भी तकनीकी हस्तक्षेप का अंतिम लक्ष्य इसी शुद्धता को सुनिश्चित करना होना चाहिए।

