Nepal Election 2026 Poll Result Dates; Balen Shah KP Oli

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नेपाल में 5 मार्च को होने वाला चुनाव सरकार बनाने की लड़ाई तो है ही, पुराने नेताओं और Gen Z के बीच पहला टकराव भी है। चुनावी शोर सड़कों से ज्यादा स्मार्टफोन की स्क्रीन पर है। वोट मांगने वाले पीएम मोदी और अमिताभ बच्चन के फर्जी वीडियो वायरल हैं। इनमें वे G

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अब तक नेपाल में ज्यादातर नेपाली कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टियां ही सत्ता बांटती रही हैं। इस बार बालेन शाह की राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी रेस में नई एंट्री है। पार्टी का सीधा मुकाबला नेपाली कांग्रेस से है। नेपाल की संसद में 275 सीटे हैं। इनमें 165 पर सीधे चुनाव होते हैं। 110 सीटों पर पार्टी को मिले वोट के हिसाब से हिस्सेदारी मिलती है।

सर्वे बता रहे हैं कि राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी को चुनाव वाली 165 सीटों में से 80 से 90 सीटें मिल सकती हैं। सबसे पुरानी नेपाली कांग्रेस को 60 से 70 सीटें मिलने का अनुमान है। बहुमत किसी को मिलता नहीं दिख रहा। अगर राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी सबसे मजबूत बनकर उभरी, तो 35 साल के बालेन शाह प्रधानमंत्री बन सकते हैं।

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पहले आम लोगों की बात नए वोटर्स में बालेन शाह की बातें, PM देखने की ख्वाहिश नेपाल में इस बार बड़ी रैलियों की जगह सड़कों के किनारे सभाएं ज्यादा हो रही हैं। जमीन से ज्यादा माहौल सोशल मीडिया पर है। नए चेहरे बालेन शाह के नारे लग रहे हैं। पुराने नेताओं में नेपाली कांग्रेस के गगन थापा का नाम सुनाई देता है। प्रधानमंत्री रह चुके पुष्प कमल दहल प्रचंड और केपी शर्मा ओली जमीन पर कम नजर आ रहे हैं।

23 साल के नवराज पोद्देल काठमांडू में सिविल इंजीनियर की पढ़ाई कर रहे हैं। बालेन शाह के समर्थक हैं। नवराज कहते हैं, ‘Gen Z प्रोटेस्ट के दौरान हिंसा हुई, तो युवाओं को लगा कि उनकी आवाज को गंभीरता से नहीं लिया जा रहा। सिस्टम करप्ट हो चुका है, इसलिए लोग बदलाव चाहते हैं।

26 साल के विनोद जोशी भी बालेन शाह को सपोर्ट करते हैं। बैंक में नौकरी कर रहे विनोद कहते हैं कि बालेन से लोगों की उम्मीदें जुड़ी हैं। सब चाहते हैं कि इस बार युवा सरकार आए। पुरानी सरकारों से लोग निराश ही हुए हैं।

वे आगे कहते हैं,

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गगन थापा भी अच्छे उम्मीदवार हैं, लेकिन उनके पुराने काम और पॉलिटिकल बैकग्राउंड से सभी लोग खुश नहीं हैं। उम्मीद है कि बालेन हमारे मुद्दे उठाएंगे और उस पर काम करेंगे।

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24 साल की स्टूडेंट मोनिका भी बालेन शाह का समर्थन करती हैं। वे चाहती हैं कि देश में स्थिर सरकार बने क्योंकि 17 साल में 14 प्रधानमंत्री हो चुके हैं। वे कहती हैं, ‘यह चुनाव बदलाव के लिए ही हो रहा है। हमें बालेन शाह जैसा नया लीडर चाहिए।’

नेपाली कांग्रेस के गगन थापा भी मजबूत 52 साल के सोम सतपड़ा ब्रिटेन से वोट देने आए हैं। नेपाली कांग्रेस के लीडर गगन थापा के सपोर्टर हैं। वे कहते हैं कि इस बार चुनाव में विदेशों में रह रहे करीब 90 लाख से ज्यादा नेपाली भी दिलचस्पी ले रहे हैं। मिडिल ईस्ट में चल रही जंग के बीच लोग वोट डालने आए हैं।

सोम नेपाली कांग्रेस में लीडरशिप बदलने से खुश हैं। वे कहते हैं कि आंदोलन के बाद नेपाल की राजनीति में बदलाव आया है, चाहे पार्टियों के भीतर हो या मतदाताओं के मन में। इससे उम्मीद बढ़ी है।

सोम की तरह काठमांडू के रहने वाले अग्नि ढकाल भी गगन थापा को पसंद करते हैं। वे कहते हैं कि सही लीडरशिप आएगी, तो नेपाल में बदलाव हो सकता है। देश हल्लाबाजी से नहीं चलता, मजबूत और समझदार लीडरशिप चाहिए।’

वे बालेन शाह का नाम लिए बिना कहते हैं, ‘युवाओं के आंदोलन का फायदा लेने के लिए अब कई लोग आगे आ रहे हैं। कुछ पार्टियां तब आंदोलन का हिस्सा नहीं थीं, अब फायदा लेने की कोशिश कर रही हैं।’

गठबंधन सरकार के आसार, बालेन की पार्टी सबसे आगे नेपाल की हिंदी साप्ताहिक पत्रिका हिमालिनी के मैनेजिंग डायरेक्टर सच्चिदानंद मानते हैं कि इस बार भी देश में गठबंधन सरकार बनेगी। उनकी मुताबिक, चुनाव वाली 165 सीटों में से बालेन की पार्टी को 50 से 60 सीटें, नेपाली कांग्रेस को 40 से 50 और कम्युनिस्ट पार्टियां 15 से 30 सीटें मिल सकती हैं। मधेशी दलों को 6-7 सीटें मिल सकती हैं। वहीं सीनियर जर्नलिस्ट कृष्णा डंगाना भी बालेन शाह की पार्टी को सबसे मजबूत देख रहे हैं।

जर्नलिस्ट लीलानाथ सीटों का अनुमान लगाने से बचने की सलाह देते हैं। वे कहते हैं कि सटीक अनुमान लगाना अभी मुश्किल है। हालांकि वे मानते हैं कि बालेन शाह की पार्टी बहुमत नहीं ला पाएगी, लेकिन 100 सीटों के आसपास जाकर ठहर सकती है।

राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के नेता कुमार आनंद मिश्र बहुमत मिलने की उम्मीद जताते हैं। वे दावा करते हैं कि 100 से कम सीटें मिलने पर हम सरकार बनाने की कोशिश नहीं करेंगे, बल्कि विपक्ष में बैठेंगे। भारत और चीन के साथ रिश्तों पर आनंद कहते हैं कि सत्ता में आने पर हमारी पॉलिसी संतुलित रहेगी। नेपाल भाग्यशाली है कि उसके दोनों ओर बड़ी अर्थव्यवस्थाएं हैं। भारत के साथ रोटी-बेटी के संबंध हैं। चीन के साथ भी दोस्ती है।

हमने नेपाली कांग्रेस के सीनियर लीडर शेखर कोइराला और मित्रा बंधु से भी बात करने की कोशिश की, लेकिन संपर्क नहीं हो पाया।

एक्सपर्ट बोले- Gen Z आंदोलन का असर, पुराने नेता पिछड़े नेपाल के सीनियर जर्नलिस्ट युबराज घिमरे मानते हैं कि इस बार चुनाव में वोट प्रतिशत घट सकता है, क्योंकि लोगों को बहुत मजबूत विकल्प नहीं दिख रहा है। वे जिन चेहरों को कई साल से देखते आ रहे हैं, वही मैदान में हैं।’

बालेन पर युबराज कहते हैं, ‘बालेन शाह नए चेहरे जरूर हैं, लेकिन उनकी पार्टी खुद करप्शन के आरोपों से घिरी रही है। आंदोलन के मुद्दे चुनाव में नहीं उठे। आंदोलन का राजनीतिक इस्तेमाल किया गया। आंदोलन में 77 लोगों की मौत की जांच रिपोर्ट भी सार्वजनिक नहीं हुई। इसलिए लोगों को साफ विकल्प नहीं दिख रहा।’

सच्चिदानंद मिश्र मानते हैं कि बालेन शाह बाकी नेताओं से आगे हैं। वे कहते हैं कि Gen Z प्रोटेस्ट का चुनाव पर असर पड़ा है। इससे पुराने नेता पिछड़ रहे हैं, नए चेहरे आगे दिख रहे हैं।

शहरों में बालेन और गांव में गगन थापा आगे सच्चिदानंद ने ग्राउंड पर सर्वे किया है। वे बताते हैं कि गांवों में पुराने दलों का असर अब भी है। शहरों और बाहर के इलाकों में बालेन की पार्टी के सिंबल घंटी की आवाज ज्यादा सुनाई दे रही है। साफ दिख रहा है कि युवा पीढ़ी नई पार्टियों के साथ है। पुराने लोग अब भी पुरानी पार्टियों को समर्थन दे रहे हैं। दूरदराज के इलाकों में भी युवा वोटर्स बालेन शाह के साथ दिख रहे हैं।’

सीनियर जर्नलिस्ट कृष्णा डंगाना कहते हैं-

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नेपाली कांग्रेस के पास देशभर में मजबूत नेटवर्क है। युवा लीडर के तौर पर गगन थापा सामने हैं। दूसरी तरफ बालेन शाह की पार्टी है, जिसके पक्ष में जबरदस्त लहर दिखाई दे रही है। इन्हीं दोनों पार्टियों के बीच मुकाबला है।

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जर्नलिस्ट लीलानाथ गौतम भी मानते हैं कि बालेन शाह को Gen Z आंदोलन का फायदा मिलेगा। हालांकि, नेपाली कांग्रेस की स्थिति भी ठीक है। उसमें लीडरशिप बदली है और गगन थापा को युवा नेतृत्व के तौर पर देखा जा रहा है।

लीलानाथ कहते हैं, ‘अगर पुराना नेतृत्व ही रहता, तो शायद स्थिति अलग होती। पहले मुझे लगता था कि नेपाली कांग्रेस और राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के बीच मुकाबला होगा, लेकिन अब राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी आगे लग रही है।’

चुनाव में बदलाव और करप्शन मुद्दा चुनाव के मुद्दों पर सच्चिदानंंद कहते हैं कि बदलाव और करप्शन ही मुद्दा है। पुराने नेताओं पर भ्रष्टाचार के आरोप रहे हैं। नई पार्टियां उसी को मुद्दा बना रही हैं। वे बताते हैं कि 2 फरवरी की शाम से प्रचार बंद हो गया। इसके बाद नेपाल में मौन अवधि शुरू हो जाती है। इस दौरान प्रचार बंद रहता है। इसे मजाक में मनी अवधि भी कहा जाता है। यानी जिसके पास संसाधन ज्यादा होंगे, इस दौरान वही असर डाल पाएगा।

सच्चिदानंद कहते हैं, ‘नई पार्टियां सोशल मीडिया का बेहतर इस्तेमाल कर रही हैं। पुरानी पार्टियां पीछे हैं। भारत के PM मोदी और अमिताभ बच्चन के नाम से बालेन को बधाई देने वाले फेक वीडियो वायरल हैं।

नेपाल कांग्रेस और कम्युनिस्ट पार्टियां पिछड़े सीनियर जर्नलिस्ट युबराज पुरानी पार्टियों के पिछड़ने की वजह उनकी खराब छवि को बताते हैं। वे कहते हैं कि पिछले 20 साल से नेपाली कांग्रेस, एमाले और माओवादी केंद्र बारी-बारी से सत्ता में रही हैं। उन पर भ्रष्टाचार और अस्थिरता की छवि चिपकी हुई है। प्रचंड की पार्टी की हालत कमजोर दिख रही है। वे अपनी मजबूत सीट की ओर लौटे हैं, जहां जीत तय है। फिर भी उनकी पार्टी का असर घट सकता है।’

वहीं सच्चिदानंद मिश्र मानते हैं कि नेपाली कांग्रेस दूसरी सबसे बड़ी पार्टी बन सकती है। वे कहते हैं कि पार्टी ने गगन थापा को प्रधानमंत्री पद का उम्मीदवार बनाया है। थापा काठमांडू छोड़कर सरलाही से चुनाव लड़ रहे हैं। उन्होंने पहले जीती सीट छोड़ दी, जो ठीक नहीं था।

बाकी दलों को लेकर सच्चिदानंद कहते हैं कि कम्युनिस्ट दलों के पिछड़ने की वजह सत्ता में रहते हुए किया पक्षपात है। उनकी सरकार में ईमानदार लोगों को जगह नहीं मिली।

सच्चिदानंद के मुताबिक, राजशाही समर्थक दल संघर्ष कर रहे हैं। उनका असर सीमित है। हिंदू धर्म के नाम पर समर्थन मिलता दिख रहा है, लेकिन राजा के नाम पर सहानुभूति नहीं बन पा रही।

भारत के खिलाफ बयान देने वाले नेता शांत सच्चिदानंद मानते हैं कि भारत को लेकर इस बार सभी पार्टियां सावधान हैं। भारत की स्थिति तटस्थ दिख रही है। किसी की भी सरकार बनेगी, उसे भारत से अच्छे संबंध रखने ही होंगे। भारत के खिलाफ बयान देते रहे बालेन शाह इस बार शांत हैं। वे जानते हैं कि तराई का वोट भारत से जुड़े रिश्तों से प्रभावित होता है।’

‘चीन भी इस बार खुलकर दखल देता नहीं दिख रहा। वह चुपचाप सब देख रहा है। उसकी चिंता दलाई लामा समर्थकों को लेकर ज्यादा है। खुलकर कोई भी पार्टी दलाई लामा के समर्थन में सामने नहीं आएगी, लेकिन हर पार्टी में उनके समर्थक मौजूद हैं।’

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