जर्मनी में कार इंडस्ट्री पर मंडरा रहे संकट के बादल:ईवी से पेट्रोल, डीजल और गैस वाली छोटी कारों की बिक्री घटने का खतरा

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जर्मनी के दक्षिण पश्चिम में बसा बादेन-वुरटमबर्ग लंबे समय से जर्मनी के बिजनेस मॉडल की मिसाल है। इसकी छोटी, मध्यम और बड़ी कंपनियां हाई क्वालिटी का सामान खासकर कारें बनाने के लिए काफी लोगों को रोजगार देती हैं, लेकिन इन दिनों अमेरिकी टैरिफ, चीन से बढ़ते आयात और ऑटोमोबाइल सेक्टर के संकट में आने से यह सब खतरे में पड़ गया है। आर्थिक मंत्री निकोल हॉफमीस्टर-क्राउट कहते हैं, यह सेक्टर अपने इतिहास की सबसे बड़ी चुनौती का सामना कर रहा है। राज्य की राजधानी स्टटगार्ट के आसपास लगभग दो लाख जॉब उस पर निर्भर हैं। मर्सिडीज और पोर्शे कामगारों की छंटनी कर रही हैं। बड़ी सप्लायर कंपनी बॉश्च 2030 तक 22 हजार जॉब कम करेगी। कम्बशन एंजिन (पेट्रोल, डीजल, गैस) पर निर्भर छोटी मितेलस्टैंड कंपनियां ज्यादा मुश्किल में हैं। इलेक्ट्रिक कारों के आने से इनकी बिक्री घटने का खतरा पैदा हो गया है। स्टटगार्ट स्थित कॉरपोरेट वकील मार्टिन मुछा कहते हैं, पहले जो कंपनियां अपना स्टाफ कम कर रहीं थीं,अब वे कंपनियां बंद हो रही हैं। कंपनियों के संकट में होने से टैक्स की आय कम हुई है। पिछले दो साल में कॉरपोरेट टैक्स आय में आधी गिरावट आई है। कारों में मंदी देखकर लोग दूसरे क्षेत्र में दस्तक देने लगे हैं। पांच हजार वर्करों की कूलिंग टेक्नोलॉजी कंपनी ईबीएम पैप्स्ट ने नए सिरे से कुछ करने की संभावना दिखाई है। पांच साल पहले स्थिति बिगड़ते देख कंपनी ने कार बिजनेस छोड़कर डेटा सेंटरों के कूलिंग सिस्टम पर दांव लगाया है। कई लोग ऑटो सेक्टर में अब भी भविष्य देखते हैं। सत्तारूढ़ ग्रीन्स पार्टी के सेम ओजडेमिर कहते हैं, हमें भविष्य की कार बनाने वाला बनना चाहिए। पेटेंट के 40% आवेदन यहीं से बादेन-वुटनबर्ग की वर्कफोर्स बेहद हुनरमंद है। वहां अच्छे विश्वविद्यालय और इनोवेशन का माहौल है। जर्मनी की 13% आबादी के राज्य में देश के लगभग 40% पेटेंट आवेदन आते हैं। एआई, रोबोटिक्स और हेल्थ केयर की अच्छी स्थिति है।



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