राहुल गांधी का मध्य प्रदेश पर बढ़ता फोकस: बालाघाट दौरा, आदिवासी मुद्दे और सियासी समीकरण

मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले में पिछले कई महीनों से चल रहे बच्चों की मौत के मामले ने अब राष्ट्रीय राजनीतिक ज्यादा गर्मा दिया है। लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने एक अक्टूबर को सीधे जगला गांव का दौरा किया, जहां उन्होंने बैगा आदिवासी परिवारों से मुलाकात की। बताया जा रहा है कि उन्हें देखने के लिए करीब 1500 ग्रामीण पहुंचे। यह पिछले बारह दिनों में राहुल गांधी का मध्य प्रदेश का दूसरा दौरा है। इससे पहले 19 सितंबर को उन्होंने इंदौर में ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम को संबोधित किया था।
राहुल गांधी का यह दौरा ऐसे समय में हुआ है, जब अगले साल उत्तर प्रदेश में विधानसभा चुनाव होने हैं। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि जब चुनाव यूपी में हैं, तो राहुल गांधी का इतना ध्यान मध्य प्रदेश पर क्यों है? भारतीय जनता पार्टी ने इसे ‘पॉलिटिकल टूरिज्म’ करार दिया है। हालांकि, कांग्रेस का मानना है कि राहुल गांधी के कार्यक्रम मुद्दों और उन राज्यों के हिसाब से तय हो रहे हैं, जहां पार्टी के पास भाजपा से सीधे मुकाबले की गुंजाइश है।
मामले की पूरी पृष्ठभूमि समझने के लिए टाइमलाइन पर गौर करना जरूरी है। 18 से 19 मई को बिरसा ब्लॉक में पहली दो मौतें हुईं, जिनमें तीन साल की रूही और उसके पांच साल के भाई राम की जान घर पर ही चली गई। 29 जुलाई को जब यह मामला मीडिया में आया, तब तक प्रशासन सिर्फ आठ मौतें मान रहा था। अगस्त में भास्कर की ग्राउंड रिपोर्ट में अकेले नौ गांवों में बीस मौतों की पुष्टि हुई। इसके बाद आदिवासी संगठन आंदोलन पर बैठे। पांच सितंबर को राहुल गांधी ने इस मुद्दे पर अपनी पहली पोस्ट की। 9 से 18 सितंबर के बीच हाईकोर्ट में इस मामले की सुनवाई हुई, जहां मरने वालों की संख्या 25 से 27 तक पहुंच गई। कोर्ट ने भी प्रशासन से सख्त सवाल पूछे। 12 सितंबर को कॉकरोच जनता पार्टी के अभिजीत दीपके प्रभावित गांवों में पहुंचे। 17 से 19 सितंबर के बीच राहुल गांधी ने दूसरी पोस्ट की और फिर इंदौर में ‘छात्रों की गूंज’ कार्यक्रम में शिरकत की। एक अक्टूबर को बालाघाट दौरे से ठीक एक दिन पहले एक और बच्चे की मौत के बाद आंकड़ा 34 तक पहुंच गया।
बालाघाट दौरे की सबसे बड़ी वजह मध्य प्रदेश का आदिवासी वोट बैंक है। प्रदेश की करीब 21 प्रतिशत आबादी आदिवासी समुदाय से आती है और विधानसभा की 47 सीटें अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित हैं। यानी हर पांच में से एक व्यक्ति आदिवासी है। ऐसे में इस वोट बैंक तक पहुंचना दोनों ही राष्ट्रीय पार्टियों के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।
राहुल गांधी ने बालाघाट में अपने भाषण में इसे सिर्फ बच्चों की मौत तक सीमित नहीं रखा, बल्कि इसे आदिवासी अधिकारों से जोड़ दिया। उनकी सक्रियता ने भाजपा को भी सतर्क कर दिया है। भाजपा दो स्तरों पर काम करती दिख रही है। पहला, जमीन पर राहत कार्यों को तेज करना और दूसरा, बहस को मुद्दे से हटाकर राहुल गांधी के व्यवहार और उनके दौरों की तरफ मोड़ना।
पिछले एक महीने में राहुल गांधी के कार्यक्रमों पर नजर डालें तो यूपी में 8 से 9 सितंबर को रायबरेली का दो दिन का दौरा हुआ, जो मुख्यतः सांसद के तौर पर था और उसमें DISHA बैठक तथा बाढ़ प्रभावित इलाकों का जायजा शामिल था। वहीं, मध्य प्रदेश में 19 सितंबर को इंदौर और एक अक्टूबर को बालाघाट का दौरा हुआ। ‘छात्रों की गूंज’ के पांच कार्यक्रमों में कोटा (17 जून), देहरादून (17 जुलाई), प्रयागराज (8 अगस्त), पुणे (22 अगस्त) और इंदौर (19 सितंबर) शामिल हैं। इनमें से सिर्फ उत्तराखंड और यूपी में अगले साल की शुरुआत में चुनाव हैं, जबकि राजस्थान और मध्य प्रदेश में चुनाव 2028 में और महाराष्ट्र में 2029 में होने हैं।
इसी तरह पंजाब में अगले साल की शुरुआत में चुनाव हैं और राहुल गांधी 28 फरवरी को बरनाला में रैली कर चुके हैं। सितंबर में अमृतसर से बस यात्रा की योजना भी थी। गुजरात में चुनाव 2027 के अंत में हैं और इससे पहले राहुल गांधी मार्च और जुलाई 2025 में गुजरात भी जा चुके हैं। ऐसे में मध्य प्रदेश पर राहुल गांधी के बढ़ते फोकस को लेकर राजनीतिक गलियारों में चर्चा तेज है।
फिलहाल, मामला कोर्ट से लेकर संसद और सोशल मीडिया तक पहुंच चुका है। बच्चों की मौत का सिलसिला अभी भी जारी है, जिसके चलते यह मुद्दा कांग्रेस के लिए सबसे बड़ा सियासी हथियार बन गया है। कांग्रेस ने राहुल गांधी के बालाघाट दौरे का वीडियो सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘X’ पर भी पोस्ट किया है, जिसके जरिए पार्टी इस मुद्दे को जनता तक पहुंचाने का प्रयास कर रही है।




