Nilgiri Toda Culture; Toda Tribe Many Husband Tradition

24 Min Read


सुबह की हल्की धुंध अभी पहाड़ियों से हटी नहीं है। घास पर जमी ओस चमक रही है। मैदान के किनारे जंगल में एक पुराने पेड़ के नीचे लोग जमा हुए हैं। इसी पेड़ के नीचे एक बड़ा इम्तिहान होने वाला है।

.

जमीन पर 100 किलो का एक पत्थर रखा है। सामने 6 फीट लंबा हट्टा-कट्टा लड़का खड़ा है। नाम है कारन। थोड़ी दूर पर एक लड़की परिवार के साथ खड़ी है। नाम है मुथी। सबकी नजरें कारन पर टिकी हुई हैं।

एक बुजुर्ग कारन से कहते हैं, ‘आज तुमने ये पत्थर उठा लिया, तो हम मान लेंगे कि तुम लड़की की जिम्मेदारी भी उठा सकते हो।’

कारन झुकता है। दोनों हाथ पत्थर के नीचे लगाता है। जोर लगाता है, लेकिन पत्थर टस से मस नहीं होता।

भीड़ में हल्की हंसी गूंजती है।

‘अरे, नहीं उठा पाएगा…’

कारन एक पल के लिए रुकता है। सांस भरता है। दोबारा झुकता है- इस बार थोड़ा और जोर, थोड़ी और जिद के साथ। पत्थर धीरे-धीरे जमीन से ऊपर उठने लगता है। मुथी मुस्कुराकर बुजुर्गों की तरफ देखने लगती है। वो आंखों से इशारा करते हुए हां में सिर हिला देते हैं।

कारन ने 100 किलो का पत्थर उठा लिया।

कारन ने 100 किलो का पत्थर उठा लिया।

वहां खड़े लोग वाह-वाह करने लगते हैं। कारन पत्थर छोड़कर मुथी की तरफ बढ़ता है। मुथी कहती है- ‘तुमसे करूंगी शादी।’ कारन एक थैले से 100 रुपए और एक साड़ी निकालकर मुथी को देता है। वो प्यार भरी नजरों से कारन को देखती हुई सामान लेने के लिए हाथ आगे बढ़ा देती है।

कारन, मुथी का हाथ पकड़ता है और अपने साथ लेकर चला जाता है। इस तरह मुथी और कारन की शादी हो जाती है। यह अनोखी परंपरा है नीलगिरि पर्वत पर बसे टोडा समुदाय की है।

दैनिक भास्कर अपनी नई सीरीज ‘हम लोग’ में हर मंगलवार लाएगा ऐसे ही अनोखे लोगों की कहानियां। पहली कहानी के लिए मैं मनीषा भल्ला तमिलनाडु में 2200 मीटर की ऊंचाई पर बसे टोडा लोगों की एक बस्ती में पहुंची…

मेरे साथ राम भी थे, जो कि हमारी मदद कर रहे थे। हम मार्लिमंथ गांव पहुंचे तो वहां मीनराज कुट्टन हमारा इंतजार कर रहे थे। राम ने तमिल में उनसे परिचय कराया। मीनराज ने बताया कि टोडा समुदाय में केवल 1800 लोग बचे हैं। सब इसी पहाड़ी के पास बसे गांव में रहते हैं। फिर वो हमें अपने घर ले गए और चाय पिलाई।

इत्तफाकन आज उनका एक खास त्योहार भी है। वे अपने साथ मुझे एक मैदान में ले गए। मैदान में इंद्रधनुष के आकार की एक झोपड़ी है, जिसके आसपास काफी मर्द इकट्ठा हुए हैं। ऊंचे कद, चेहरे पर तेज। सभी लाल-काली कढ़ाई वाली सफेद शॉल और इसी रंग की लुंगी पहने हैं। इनके पैर में चप्पल नहीं है।

मैदान से करीब 15-20 किलोमीटर एरिया में बसे सभी गांव के टोडा लोग यहां आ रहे हैं। उनके कंधे पर भी वही शॉल है। इनका पारंपरिक त्योहार शुरू होने वाला है। एक ऐसा त्योहार जो 15 साल में एक बार आता है। इस दिन वे अपने मंदिर को उजाड़कर फिर से बनाते हैं। इस त्योहार को पिरितुकटुवदु कहते हैं।

सभी मर्द मिलकर इस झोपड़ी की फूस की छत उजाड़ने में जुटे हुए हैं। पता चला कि ये झोपड़ी टोडा लोगों का मंदिर है। इनके घर भी इंद्रधनुष आकार के होते हैं। इनका कहना है कि इनके देवता ने ऐसे घर और मंदिर बनाने के लिए कहा था।

मंदिर की छत उजाड़ते हुए टोडा लोग।

मंदिर की छत उजाड़ते हुए टोडा लोग।

मैं इन दृश्यों को कैमरे में कैद कर ही रही थी कि एक टोडा युवक मेरे पास आया। उसने विनम्रता से कहा, ‘मैदान में जूते पहनकर नहीं आ सकते।’

मैंने तुरंत जूते उतार दिए और ओस से भीगी घास पर आगे बढ़ने लगी। तभी ऊपर खड़े कुछ लोगों ने रुकने का इशारा किया। एक युवक तेजी से मेरी तरफ आया और हल्की मुस्कान के साथ अंग्रेजी में बोला,

‘विमन आर नॉट अलाउड।’

मैंने तुरंत कैमरा बंद किया। अपने साथी राम को मोबाइल थमाया और कहा- ‘तुम ही जाकर वीडियो शूट कर लो।’

फिर वहां से गांव लौट आई और मीनराज कुट्टन के घर में बैठ गई। सभी टोडा औरतें घर पर ही हैं। कुछ देर बातचीत के बाद उन्होंने खाने के लिए उबला आलू और घी दिया। कहने लगीं, ‘आज के दिन हम लोग यही खाते हैं। आलू में घी लगाकर खाइए, आपको भी पसंद आएगा। ये घी हमारी भैंसों का ही है।’

सच कहूं तो इतना स्वादिष्ट आलू-घी मैंने पहले कभी नहीं खाया था। लोगों में भैंस के घी के बिना कोई आयोजन पूरा नहीं होता।

शाम तक राम वीडियो शूट करके लौटे। साथ में मीनराज भी थे। मैंने एक-एक करके वीडियो देखना शुरू किया। पहले वीडियो में दिख रहा है कि सभी मर्द दोपहर 11:45 बजे का इंतजार रहे हैं। समय होते ही वे सभी झोपड़ीनुमा मंदिर के सामने इकट्ठा होते हैं। दाहिना हाथ नाक की सीध में करते हैं और मंत्र पढ़ने लगते हैं।

थोड़ी देर बाद काले रंग की लुंगी पहने दो शख्स सुरंग जैसे मंदिर के छोटे दरवाजे से रेंगकर अंदर जाते हैं। पता चलता है कि ये दोनों पुजारी हैं। दोनों ने एक-एक कर घी से भरी 10 मटकियां बाहर निकालीं और पास में बनी दूसरी झोपड़ी में लाकर रख दीं। ये दूसरी झोपड़ी भी इनका पवित्र स्थान है, जहां इनकी भैंसों का घी रखा जाता है।

घी की मटकियां निकालकर दूसरे मंदिर में रखते हुए पुजारी।

घी की मटकियां निकालकर दूसरे मंदिर में रखते हुए पुजारी।

जब सारी मटकियां बाहर आ गईं, तो पुरुषों ने मंदिर की छत और बांस की डंडियां उखाड़नी शुरू कर दीं। करीब आधे घंटे में मंदिर की छत हट गई। अंदर कोई मूर्ति नहीं। सिर्फ एक जलता हुआ दीया दिख रहा है। टोडा लोगों के लिए यही दीया ईश्वर है। यह भैंस के घी से जलता है, इसलिए उनके जीवन में भैंस का पवित्र स्थान है।

मीनराज बताते हैं कि नया मंदिर बनाने के लिए करीब 40 किलोमीटर दूर से हम बांस और खास तरह की घास लेकर आते हैं। यह घास करीब 15 साल तक खराब नहीं होती। बांस की डंडियों से दीवारें बनाई जाती हैं और घास-पुआल से छत।

इस मंदिर की नींव पत्थर की होती है और खाली जगह मिट्टी से लीपकर भरी जाती है। करीब 18 से 20 दिन में यह मंदिर बनकर तैयार होता है। जब मंदिर बनकर तैयार हो जाएगा तब ये लोग अपना पारंपरिक नृत्य ‘ओड़िथ’ करेंगे।

मंदिर के दरवाजे के ऊपर भैंस, चांद, तारे का चित्र।

मंदिर के दरवाजे के ऊपर भैंस, चांद, तारे का चित्र।

मंदिर को उजड़े हुए 20 दिन बीत चुके हैं। एक बार फिर सभी लोग उसी जगह पर इकट्ठा हुए हैं। जैसा कि मैं पहले बता चुकी हूं कि मंदिर से जुड़े किसी भी रीति-रिवाज में ‘विमन आर नॉट अलाउड’, इसलिए मेरे साथी राम वहां गए हैं। मैं गांव की एक महिला रेवती के घर में उनका इंतजार कर रही हूं।

कई घंटे बाद जब वो लौटे तो मैं वीडियो में देख पा रही हूं कि सभी टोडा मर्द अपना पारंपरिक नृत्य ‘ओड़िथ’ कर रहे हैं। नया मंदिर बनकर तैयार हो चुका है।

कुछ देर बाद सभी मर्द एक साथ खड़े हुए। उनके बीच खड़े हैं कोरन, जिन्हें नया पुजारी चुना गया है। उनके शरीर पर सिर्फ काली धोती है। वो मंदिर के छोटे दरवाजे से रेंगकर अंदर जाता हैं। सबसे पहले वह भैंस के घी का दीपक जलाते हैं। अब डेढ़ महीने तक पुजारी इसी अंधेरे मंदिर में रहेंगे।

इस दौरान वह न तो किसी से बात करेंगे, न गांव जाएंगे और न ही अनाज या सब्जियां खाएंगे। केवल शहद और भैंस का घी खाएंगे। डेढ़ महीने में पुजारी, शहद लेने के लिए केवल जंगल जा सकते हैं।

पुजारी के लिए नियम बहुत सख्त हैं। अगर वो इन नियमों को तोड़ते हैं तो उसे तुरंत हटा जाएगा। फिर नया पुजारी चुन लिया जाएगा।

टोडा लोग मानते हैं- इन्हीं कठोर नियमों की वजह से उनकी परंपराएं आज तक बची हुई हैं।

इसके अलावा ये लोग साल में एक बार पर्वत की भी पूजा करते हैं। वहां प्रार्थना करते हैं कि- ‘समय पर बारिश हो, भैंसों के लिए घास मिले, हमारे पशु भूखे न रहें।’

अभी मैं जिस घर में हूं उस घर की महिला रेवती जल्दी-जल्दी रसोईं के काम निपटा रही हैं। चूल्हे पर खाना बन रहा है। घड़ी में शाम के 6 बजते ही वह काम रोक देती हैं। एक छोटा दीपक जलाती हैं और उसे घर के कोने में रख देती हैं। इसे ‘दीपम’ कहते हैं।

रेवती उसके सामने प्रार्थना करती हैं, लेकिन दोनों हाथ जोड़कर नहीं। सिर्फ एक हाथ उठाती हैं।

प्रार्थना के बाद वो मुस्कुराकर कहती हैं, ‘हमारे यहां हर टोडा महिला को शाम तक घर लौटना होता है। चाहे वह खेत में हो, रिश्तेदार के यहां या कहीं और। उसे 6 बजे घर आकर ‘दीपम’ जलाना ही होता है।

अगर कोई महिला दीपम जलाना भूल जाए, तो अच्छा नहीं माना जाता। बुजुर्ग कहते हैं- ‘इससे बुरी शक्तियों का असर बढ़ सकता है। घर की समृद्धि घट सकती है।’

रेवती कहती हैं, 'अगर कोई दीपम जलाना भूल जाए, तो अमावस्या के दिन मंदिर में विशेष पूजा करनी पड़ती है।'

रेवती कहती हैं, ‘अगर कोई दीपम जलाना भूल जाए, तो अमावस्या के दिन मंदिर में विशेष पूजा करनी पड़ती है।’

टोडा लोगों की शादी भी अनोखे तरीके से होती है। 100 किलो का पत्थर उठाने के बाद कारन नाम के युवक की शादी तय होने का किस्सा हम आपको ऊपर बता चुके हैं।

रिश्ता तय होने के बाद शादी के एक दिन पहले लड़के के परिवार वाले फिर से जंगल जाते हैं। वहां उसी पुराने पेड़ के नीचे सब इकट्ठा होते हैं। इस पेड़ को वे नावलमरम कहते हैं। दूल्हे की मां पेड़ के नीचे दीये में भैंस का घी डालती है, जिसे दुल्हन जलाती है।

फिर दूल्हे की मां उसी जलती हुई बाती से दुल्हन की हथेली के पिछले हिस्से पर हल्का-सा निशान बनाती है। उसे आशीर्वाद माना जाता है। इसके बाद सब घर लौट आते हैं और दुल्हा और दुल्हन साथ रहने लगते हैं।

गर्भ के 6 महीने बाद होती है शादी की आखिरी रस्म

शादी की सभी रस्में तब पूरी होती हैं, जब लड़की गर्भवती हो जाती है। गर्भवती होने के छठे महीने में पूरा कुल फिर उसी नावलमरम पेड़ के नीचे जाता है। फिर एक दीया जलाया जाता है।

जंगल की एक बड़ी और मजबूत घास से, जिसे भइजन या पुरस कहते हैं- दुल्हन तीर-कमान बनाती है। फिर दूल्हे से पूछती है- ‘तुम्हारा कुल कौन-सा है?’

दूल्हा तीन बार अपने कुल का नाम बताता है। तब दुल्हन वो तीर-कमान दूल्हे को दे देती है।

इस तरह कुल तय होने के बाद दोनों पूरी तरह पति-पत्नी घोषित कर दिए जाते हैं। इस रस्म में दुल्हन के मायके वाले दुल्हे को पांच भैंस देते हैं। उसके बाद सभी अपना पारंपरिक नृत्य ‘ओड़िथ’ करते हैं।

इस दौरान बड़े-बुजुर्ग जोड़े को आशीर्वाद देते हैं, लेकिन ये आशीर्वाद हाथ से नहीं, पैर से दिया जाता है।

इसी रस्म को लेकर कहा जाता है कि टोडा महिलाओं की शादी गर्भवती होने के 6 महीने बाद होती है। हालांकि, टोडा लोग इसे भ्रामक बताते हैं। टोडा महिला वस्समली बताती हैं- ‘लोग कहते हैं प्रेग्नेंसी के 6 महीने बाद हमारे यहां लड़की की शादी होती है, लेकिन यह सही नहीं है। यह रस्म सिर्फ बच्चे के कुल का निर्धारण करने के लिए होती है।’

वहां मौजूद कारिकुट्टन कहते हैं कि ‘हमारे यहां शादी से पहले एक और रस्म होती है- ‘निच्यदारतम’। इसमें लड़का-लड़की के जवान होने से पहले ही रिश्ता तय कर दिया जाता है।’

पारंपरिक पोषाक और खास तरह से बाल बनाए हुए टोडा महिलाएं।

पारंपरिक पोषाक और खास तरह से बाल बनाए हुए टोडा महिलाएं।

बच्चे के जन्म के 13 दिन बाद घर में लौटती है मां बच्चा होने पर भी एक खास रस्म होती है। बच्चे के जन्म के बाद 13 दिनों तक मां और बच्चे दोनों को पास के किसी घर या बस्ती में रखा जाता है। जब मां ‘पवित्र’ हो जाती है, तब वापसी की रस्में शुरू होती हैं।

छठी के बाद आने वाली पूर्णिमा की रात बच्चे को लेकर मां जंगल में जाती है। साथ में दूसरे रिश्तेदार भी होते हैं। वहां मां ‘पोली’ नाम के पौधे की जड़ निकालती है। उसे पत्थर पर मां के दूध के साथ रगड़ा जाता है। उससे बना घोल बच्चे को चटाया जाता है। माना जाता है कि इससे बच्चा प्रकृति से जुड़ता है।

फिर मां, बच्चे को आसमान की ओर उठाकर चमकते तारे दिखाती है। उसी समय मामा तीन बार बच्चे के कान में नाम पुकारता है। यही से उसका नामकरण हो जाता है। इनके नाम भी प्रकृति से जुड़े होते हैं। लड़कों के नाम अक्सर पत्थर, पहाड़, पेड़ या सूरज पर रखे जाते हैं। लड़कियों के नाम धरती, फूल, पौधे, चांद या आभूषणों पर।

टोडा महिलाओं के होते थे एक से ज्यादा पति

15 साल पहले तक टोडा महिलाओं के पांच-पांच पति होते थे। इसे बहुपति प्रथा कहा जाता था। हालांकि, अब यह प्रथा लगभग खत्म हो चुकी है। वस्समली बताती हैं- ‘करीब 15-20 साल पहले तक हमारे समाज में बहुपति प्रथा थी। तब पुरुषों को महीनों जंगल में रहना पड़ता था- कभी शहद इकट्ठा करने, तो कभी दूसरी चीजों के लिए।

ऐसे में भैंसों की देखभाल के लिए, घर संभालने के लिए महिला को पुरुषों की जरूरत होती थी। इसलिए उसे कई पुरुषों से शादी करनी पड़ती थी। जरूरत पड़ने पर आज भी महिलाएं ऐसा कर सकती हैं’

वस्समली कहती हैं कि बहुपति प्रथा, परिवार और पशुओं की जिम्मेदारी बांटने का तरीका था।

वस्समली कहती हैं कि बहुपति प्रथा, परिवार और पशुओं की जिम्मेदारी बांटने का तरीका था।

एक खास अनुष्ठान के बाद हो जाती है बुजुर्गों की मृत्यु

पता चला कि टोडा लोगों में अंतिम संस्कार का तरीका भी बेहद अलग है। जब कोई बुजुर्ग जीवन के बिल्कुल आखिरी दौर में हो, तो एक अलग रस्म होती है।

सुबह करीब 5 बजे परिवार और समुदाय के लोग ‘एन वड़ा’ और ‘एकेज वड़ा’ नाम का अनुष्ठान करते हैं। इसमें वो लोग पूर्वजों को याद करते हुए प्रार्थना करते हैं- ‘अगर इनका समय आ गया है, तो इन्हें अपने साथ ले जाओ।’

लोग मानते हैं कि इससे बुजुर्ग को लंबे कष्ट से मुक्ति मिल जाती है। कई बार इस अनुष्ठान के कुछ समय बाद ही बुजुर्ग की मृत्यु हो जाती है, जिसे वे पुरखों की कृपा मानते हैं।

कुछ देर बाद मैं एक बुजुर्ग के अंतिम संस्कार में पहुंची। नीलगिरि की पहाड़ियों में एक चिता जलाने की तैयारी चल रही है। पास खड़े लोग चुप हैं। चिता पर लेटे मृतक कन्नन के माथे पर एक चांदी का सिक्का रखा जाता है। उनके पैरों के अंगूठों को सटाकर काले धागे से बांधा जाता है। उसके बाद चिता में आग लगाई जाती है।

कुछ देर बाद उनके करीबी रिश्तेदार आगे बढ़ते हैं। वे मृतक की पसंद का सामान चिता में डालते हैं। उसके बाद अपने बालों का एक छोटा-सा हिस्सा काटकर जलती चिता में फेंकते हैं। टोडा समुदाय में यह मृतक से खास रिश्ता जाहिर करने का तरीका है।

चिता में बाल काटकर डालने की प्रतीकात्मक AI तस्वीर।

चिता में बाल काटकर डालने की प्रतीकात्मक AI तस्वीर।

आस-पास खड़े लोग बीच-बीच में आसमान की ओर भी देखते रहते हैं। अचानक ऊपर एक खास तरह की चील, जिसे वे इजीप्टियन चील कहते हैं, अगर वह दिख जाए तो मानते हैं कि उनके पूर्वज आत्मा को लेने आए हैं।

लोग धीरे से कहते हैं, ‘पूर्वज आ गए… आत्मा को ले जाने।’

टोडा समाज पुनर्जन्म में यकीन नहीं करता। वस्समली कहती हैं कि- हमारे यहां पहली मृत्यु इनके देवता तिलकिश के पिता की हुई थी। इस दुनिया से स्वर्ग जाने के लिए उन्होंने वेस्टर्न घाट के तिरमुस्कुल पर्वत से एक रास्ता चुना। हमारे समुदाय में जब कोई मरता है तो वो भी उसी रास्ते स्वर्ग जाता है, लेकिन मृत्यु हो जाने के बाद पुनर्जन्म नहीं होता। इसलिए हम मानते हैं कि हमें इस दुनिया में एक अच्छा बनकर इंसान जीना चाहिए।

कुछ देर बाद मैं वहां से फिर गांव की तरफ आ गई। मेरे साथ मीनराज भी हैं।

एक घर के बाहर एक महिला बैठी है- लक्ष्मी। गोद में सफेद कपड़ा फैलाए लाल और काले रंग के धागे से कढ़ाई कर रही हैं। ये बिलकुल वैसी ही है जैसी शॉल टोडा मर्दों ने ओढ़ी थी। लक्ष्मी ने बताया कि ये उनकी पारंपरिक शॉल पुतुकुली है। जिस पर वो कढ़ाई कर रही हैं।

शॉल पर सूरज, चांद और पहाड़ जैसी आकृतियां कढ़ी गई हैं। वो शॉल पर छोटे ज्यामितीय डिजाइन बन रही हैं। इसे महिलाओं की पुतुकुली कहते हैं। एक पुतुकुली बनाने में चार से छह महीने लग जाते हैं। बच्चों की पुतुकुली लगभग एक महीने में तैयार होती है।

इस पर की गई कढ़ाई को ‘टोडा कढ़ाई’ कहते हैं। जो दुनियाभर में मशहूर है। कई कलाकारों को इसके लिए राष्ट्रीय स्तर पर सम्मान भी मिल चुका है। इस शॉल की कीमत 14 से 16 हजार होती है।

पुतुकुली शॉल बनाती हुईं लक्ष्मी।

पुतुकुली शॉल बनाती हुईं लक्ष्मी।

टोडा महिलाओं के आभूषण भी उनकी संस्कृति की तरह अलग और सादे होते हैं। वे आमतौर पर सोना नहीं पहनतीं। उनके ज्यादातर गहने चांदी या मोतियों के होते हैं।

टोडा महिलाओं के गहने।

टोडा महिलाओं के गहने।

चुकंदर, आलू और बींस की खेती

मीनराज कहते हैं, ‘अब हम पहले की तरह जंगल नहीं जा पाते। वहां जंगली जानवरों का खतरा रहता है। इसलिए सड़क किनारे घर बनाने लगे हैं। खेती भी शुरू कर दी है। अब तो हमारे बच्चे स्कूल भी जाने लगे हैं। शॉल के अलावा आज कई परिवार अपनी जमीन पर गाजर, चुकंदर, आलू, बींस और गोभी उगाते हैं, जिसे बाजार में बेचकर पैसे कमाते हैं।’

मीनराज आगे बताते हैं ‘आज हमारे समुदाय में करीब 700 भैंसें हैं। हमारे लिए भैंस केवल पशु नहीं, बल्कि हमारा धर्म, भोजन का आधार और अर्थव्यवस्था है। एक परिवार के पास लगभग 15 से 20 भैंसें होती हैं। दूध, दही और घी ही हमारा मुख्य भोजन है। हम इन्हें पवित्र मानते हैं, इसलिए बाजार में नहीं बेचते। जरूरत पड़ने पर ये लोग आस-पास के आदिवासी समुदायों- जैसे बडगा और कोटा से दूध या घी के बदले अनाज ले लेते हैं।’

टोडा महिला दही से मक्खन निकालती हुई।

टोडा महिला दही से मक्खन निकालती हुई।

मीनराज बताते हैं कि ‘हमारे यहां झगड़े थाने में नहीं, मुखिया सुलझाते हैं। हर कबीले का एक मुखिया होता है। दो लोगों के बीच विवाद हो, तो मामला सीधे मुखिया के पास जाता है। वो दोनों पक्ष की बात सुनते हैं। फिर परंपराओं के आधार पर फैसला देते हैं।’

अगर विवाद दो कबीले के बीच हो, तो तीसरे कबीले का मुखिया फैसला करता है। सजा के तौर पर गलती करने वाला, पीड़ित को एक भैंस देता है। ये लोग पुलिस के पास कम ही जाते हैं।

कई बार दोषी को सबके सामने माफी भी मांगनी पड़ती है। अगर पीड़ित व्यक्ति बुजुर्ग हो, तो उनके पैरों में गिरकर माफी मांगनी पड़ती है।

मीनराज अपने समुदाय के बारे में जानकारी देते हुए।

मीनराज अपने समुदाय के बारे में जानकारी देते हुए।

नीलगिरी की पहाड़ियों में जंगल ही टोडा लोगों का पहला अस्पताल है। यहां बीमार होने पर सबसे पहले जड़ी-बूटियों का सहारा लिया जाता है। इसे लोग ‘ऊत प्रैक्टिस’ कहते हैं।

यह ज्ञान पीढ़ी दर पीढ़ी आता है। कुछ बुजुर्गों को पौधों के औषधीय इस्तेमाल की गहरी समझ है। जंगल में रहने के कारण यहा सांप के काटने की घटनाएं भी होती हैं। टोडा लोग खास जड़ी-बूटियों से उसका भी इलाज करते हैं।

मीनराज कहते हैं, ‘अब नई पीढ़ी जरूरत पड़ने पर अस्पताल जाने लगी है। फिर भी जड़ी-बूटियों का यह ज्ञान समुदाय में जिंदा है।’

इस सीरीज में अगले हफ्ते पढ़िए ऐसे ही अनोखे बोंडा लोगों की कहानी….



Source link

Share This Article
Leave a Comment