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आप एक मेडिकल छात्र हैं। हार्ट अटैक आने पर क्या करना चाहिए… यह सिर्फ किताबों में ही पढ़ा होता है। पर जब पहली बार आप जीवित इंसान के सामने खड़े होते हैं, जिसकी सांसें उखड़ रही हैं, तो हाथ कांपने लगते हैं…’ अमेरिकन एकेडमी ऑफ नर्सिंग की प्रेसिडेंट डॉ. डेब्रा बार्क्सडेल कहती हैं,‘अनुभव डरावना होता है। भले ही आपके पास अथाह नॉलेज हो, पर जीवित इंसान पर उसका अभ्यास करना बहुत चुनौतीपूर्ण है।’ इसी डर को खत्म करने के लिए अब मेडिकल की दुनिया में क्रांतिकारी बदलाव आया है। अब छात्र सीधे इंसानों पर हाथ आजमाने के बजाय ‘हाई-फिडेलिटी मेडिकल सिमुलेटर’ यानी बेहद असली दिखने वाले पुतलों पर अभ्यास करते हैं। ये खास तरह के पुतले सांस ले सकते हैं, पलकें झपकाते हैं, उन्हें पसीना आता है और चोट लगने पर उनसे खून (लाल तरल पदार्थ) भी निकलता है। कुछ पुतले तो ऐसे भी हैं जिन्हें दौरे पड़ सकते हैं या उनके मुंह से झाग निकल सकता है। कुछ तो डॉक्टर से बात भी करते हैं। कुछ दिन पहले नर्सिंग छात्रा, जुलियाना विटोलो, ‘मॉम-एनी’ नाम के गर्भवती पुतले का परीक्षण कर रही थी। जब जुलियाना ने पूछा,‘आप कैसा महसूस कर रही हैं?’ तो उस पुतले ने पलकें झपकाईं और जवाब दिया,‘पेट के निचले हिस्से में थोड़ा दर्द है।’ अलग तरह के मरीजों को ध्यान में रखकर पुतलों की डिजाइन भी अलग रखते हैं। प्रीमेच्योर बच्चों के पुतलों पर असली जैसे बाल होते हैं, जबकि बुजुर्ग पुतलों की त्वचा पर झुर्रियां और आंखों में मोतियाबिंद तक दिखाते हैं। टॉर्च से आंखों की जांच की जाती है, तो पुतलियां सिकुड़ जाती हैं। इन्हें इंजेक्शन दे सकते हैं और नब्ज भी महसूस की जा सकती है। अगर किसी ‘बच्चे’ वाले पुतले को पर्याप्त ऑक्सीजन न मिले, तो होंठों के आसपास की त्वचा नीली पड़ने लगती है (हाइपोक्सिया), जिससे छात्रों को तुरंत फैसला लेना पड़ता है। सबसे बड़ा फायदा यह है कि यहां गलती करने पर किसी की जान नहीं जाती। सेटन हॉल की सिमुलेशन डायरेक्टर जेनिफर मैकार्थी कहती हैं,‘अगर मरीज को 2 मिग्रा. दवा देनी है और छात्र ने सिर्फ 1.8 मिग्रा. दे दी, तो यह गंभीर गलती है। पुतले के अंदर लगी तकनीक इस मामूली अंतर को भी पकड़ लेती है और गलती सुधारने का मौका देती है।’ कंट्रोल रूम से विशेषज्ञ इन पुतलों के जरिए बात भी करते हैं। वे कभी चीखते हैं, कभी दर्द में कराहते हैं, तो कभी सवाल पूछते हैं। इससे डॉक्टर व नर्स इलाज के साथ तुरंत फैसले लेना और तनावपूर्ण माहौल में मरीज से बात करने का सलीका भी सीखते हैं। माहौल असली रहे, इसलिए एक्टर्स को ‘रिश्तेदार’ के तौर पर बुलाते हैं वेल-कॉर्नेल सिम्युलेशन सेंटर के प्रमुख डॉ. केविन चिंग कहते हैं,‘कुछ मैनिकिन्स में अचानक हालात बदलने की प्रोग्रामिंग होती है। इससे छात्रों को तेज सोचने की ट्रेनिंग मिलती है। बेबी मैनिकिन को सुस्त दिखा सकते हैं, ताकि छात्र लक्षण देखकर समस्या पहचानें। जैसे बीपी गिरने पर तय करना कि फ्लूड देना है या नहीं। असली माहौल बनाने के लिए पास में चश्मा, फोन रखे जाते हैं और कभी ‘चिंतित रिश्तेदार’ की भूमिका में एक्टर भी बुलाया जाता है। इसे हाइब्रिड सिम्युलेशन कहते हैं।’
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मरीज वर्चुअल, इलाज रियल; डॉक्टर्स को बारीकियां सिखा रहे ‘पुतले’:नब्ज चलेगी, खून बहेगा, दवा देने में गलती हुई तो सुधारने की नसीहत भी
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