ब्लैकबोर्ड-‘विधवाओं का गांव’, जहां एक भी मर्द जिंदा नहीं बचा:हर दूसरे घर में कैंसर से मौत, बोले- गांव में कोई शादी नहीं करना चाहता

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पंजाब में बठिंडा का एक गांव- जज्जल। 55 बरस की बीरपाल कौर एक मातम से लौटी हैं। लेकिन, उनके हाथों में तस्वीर है पति दौलतराम की। मैंने आहिस्ता से पूछा- क्या हो गया? बीरपाल पंजाबी में बोलीं- ननद की बहू मर गई। उसके मातम से लौंटी हूं। इस बातचीत से पहले मैं बीरपाल के घर की एक दीवार पर टंगी दौलतराम की तस्वीर देख चुका था। सो थोड़ी सी हैरानी भरे लहजे में मैंने फिर पूछा, ‘आपके हाथ में तो पति की फोटो है… ऐसा क्यों? जवाब मिला, ‘जहां से आ रहीं हूं वो भी कैंसर से मर गई और मेरा आदमी भी कैंसर से मरा था। ये जो गली है न, इसके हर घर में कोई न कोई कैंसर से मरा है। किसी को ब्लड कैंसर हुआ तो किसी मुंह का। किसी के फेफड़ों में कैंसर था तो किसी को आंतों का। यहां मौत माने कैंसर है। हालात ऐसे हैं कि यहां शादी से पहले लड़के और लड़की की कैंसर रिपोर्ट देखी जाती है।’ मैं नीरज झा, दैनिक भास्कर की सीरीज ब्लैकबोर्ड में लाया हूं बठिंडा के लोगो की स्याह कहानी, जहां तकरीबन हर घर में कैंसर के मरीज हैं। हजारों लोग मर चुके हैं और हजारों पल-पल मौत का इंतजार कर रहे हैं- पंजाब के बठिंडा से करीब 50 किलोमीटर दूर जज्जल गांव में घुसते ही मैं गाड़ी रोक देता हूं। यहीं बीरपाल का घर है, जहां कैंसर से अपने लोगों को खो चुके आधा दर्जन परिवार मिल जाते हैं और पहुंचते ही बीरपाल अपने रिश्तेदार के घर से मातम मना कर लौटीं मिल जाती हैं। मैं पूछता हूं- बहू की मौत कैसे हुई? नजर फेरते हुए वह पंजाबी में बोलती हैं, ‘कैंसर से… और कैसे? उसके दो छोटे-छोटे बच्चे हैं। पति की दो-तीन साल पहले ही मौत हो गई थी। बेचारे उन बच्चों का अब क्या होगा? पहले बाप की और अब मां की मौत हो गई। बच्चे अनाथ हो गए। ऐसे ही पिछले साल मेरे पति की भी कैंसर से मौत हो गई। यह कहते हुए… बीरपाल की आंखों से आंसू बहने लगते हैं। वह बार-बार अपने पति की फोटो निहारती हैं। कहती हैं, ‘दिन में जितनी बार दीवार पर नजर जाती है, आंखें भर आती हैं। कैंसर ने हमारा हंसता-खेलता परिवार खत्म कर दिया। हॉस्पिटल के चक्कर काटते-काटते लाखों रुपए बर्बाद हो गए। जमींदारों के यहां मेहनत-मजदूरी की, लेकिन न हमारे पति बचे और न पैसा। आजकल बुढ़ापे में बच्चे किसे देखते हैं? बीरपाल कहती हैं, ‘जिस गली में आप घुसे हैं, यह ‘विधवाओं की गली’ कही जाती है। यहां आधे दर्जन से ज्यादा घर हैं, लेकिन एक भी घर में मर्द नहीं बचे हैं। कुछ मर्दों की कैंसर से मौत हो गई, …तो कुछ का पता ही नहीं चला कि उन्हें कौन-सी बीमारी थी।’ आपके पति को किस तरह का कैंसर था? ‘उन्हें ब्लड कैंसर यानी खून का कैंसर था। पहले पास के रामा मंडी गांव के एक हॉस्पिटल में दिखाया, फिर बठिंडा लेकर गई। वहां से डॉक्टर ने पीजीआई चंडीगढ़ में रेफर कर दिया। तब पता चला कि मेरे पति को कैंसर है। डॉक्टर ने ये बात मेरे पति को भी बता दी। उसके बाद वह दिन-रात उसी सोच में डूबे रहने लगे। 3 महीने में ही गुजर गए। घर में कोई कमाने वाला नहीं बचा। मैं जमींदारों के यहां काम करने लगी। पति के इलाज में 2 लाख से ज्यादा रुपए खर्च हो गए। एक दिन के इलाज में 10-10 हजार रुपए लग जाते थे। गरीब औरत हूं, इतने पैसे कहां से लाती? फिर भी पैसे की फिक्र नहीं थी… अगर वह बच जाते, तो कलेजे को ठंडक मिलती। अब न पति बचे, न पैसा। बीरपाल कौर अपने आंगन में बैठी रजनी राणा की ओर इशारा करते हुए कहती हैं, ‘इनके ससुर की भी कुछ साल पहले कैंसर से मौत हुई थी। अभी कुछ दिन पहले सास भी गुजर गईं। तेरहवीं बाकी है।’ इस पर रजनी कहती हैं, ‘7 साल पहले की बात है। मेरी नई-नई शादी हुई थी। कुछ महीने बाद ससुर को जीभ के नीचे छेद जैसा महसूस होने लगा। उन्हें शहर ले जाकर चेकअप कराया, तो पता चला कि चौथे स्टेज का मुंह का कैंसर था। डॉक्टर ने कहा- घर ले जाकर सेवा करो, अब इलाज का कोई फायदा नहीं। फिर भी सास बोलीं- चूल्हा-चौका करके भी पति का इलाज कराऊंगी। वह जमींदारों के यहां गोबर उठाने लगीं। वहां इतना काम करने लगीं कि सिर पर टोकरी उठाते-उठाते उनके बाल घिस गए, लेकिन ससुर जी नहीं बचे। दो साल ही जिंदा रहे, फिर उनकी मौत हो गई। धीरे-धीरे दुख के कारण सास भी कमजोर होने लगीं। अभी एक हफ्ते पहले उनकी भी मौत हो गई। 50-55 साल की उम्र क्या जाने होती है? अब किस्मत ही ऐसी है, तो क्या करें?’ बीरपाल के आंगन में एक पानी की टंकी रखी है। रजनी कहती हैं, ‘इसमें जो गंदा पानी दिख रहा है, वही हम लोग पीते हैं। जब ससुर को डॉक्टर के पास दिखाने ले गई थी, तो डॉक्टर ने कहा था- पानी की खराबी की वजह से मुंह का कैंसर हुआ था। क्या करें, मौत से डर लगता है, लेकिन फिर भी यही पानी पीते हैं।’ रजनी के पास ही 17 साल की निशु बैठी हमारी बातें सुन रही थी। धीरे से बोलती है, ‘जब मैं 7वीं में थी, तो मेरी मां की भी कैंसर से मौत हो गई थी। मां का चेहरा आज भी याद आता है, तो रोने लगती हूं।’ यह कहते हुए वह मुझे कुछ ही कदम दूर अपने घर ले जाती है। दीवार पर उसकी मां रानी कौर की तस्वीर टंगी है। वह कहती है, ‘पापा दिहाड़ी मजदूरी करते हैं। हम दो बहनें और एक भाई हैं। दादी ने किसी तरह हमें पाल-पोसा। 10वीं के बाद मैंने पढ़ाई छोड़ दी। बिना मां के बच्चों की क्या ही जिंदगी होती है। मुझे थोड़ा-थोड़ा याद है। मां के पेट में अक्सर दर्द रहता था। एक दिन पापा उन्हें साइकिल से बठिंडा चेकअप कराने डॉक्टर के पास ले गए। टेस्ट हुआ, तो पता चला कि बच्चेदानी का कैंसर था। पापा ने पैसे के लिए दो कनाल जमीन बेच दी। हर हफ्ते पापा, मां के इलाज के लिए शहर जाने लगे, लेकिन सालभर के भीतर मां की मौत हो गई। बोलते-बोलते निशु ठहर जाती है। उधर पीछे से बीरपाल कौर कहती हैं, ‘मेरी बहन की ननद के यहां जाएंगे क्या?’ हां कहते हुए मैं एक लोकल आदमी की मदद से जज्जल गांव से निकल पड़ता हूं। बीरपाल की बहन की ननद 12 किलोमीटर दूर रामा मंडी गांव में रहती हैं। यह गांव गुरु गोविंद सिंह रिफाइनरी प्लांट से सटा हुआ है। बीरपाल की बहन की ननद आशा रानी अपनी जेठानी बेड़वंती के साथ घर के बरामदे में शोक में बैठी हैं। मेरे पहुंचते ही सहम जाती हैं। थोड़ी बातचीत के बाद कहती हैं, ‘गुद्दा में इंफेक्शन की वजह से बेटे की तीन साल पहले ही मौत हो गई थी। फिर बहू कमलेश के पेट के निचले हिस्से में पस बनने लगी। सिर के बाल भी धीरे-धीरे झड़ने लगे। हमें लगा कमजोरी की वजह से बाल झड़ रहे हैं। जब वह कहने लगी कि उसके मल के रास्ते बहुत खून आ रहा है, तब मैं उसे शहर लेकर गई। डॉक्टर ने बताया कि रेक्टम कैंसर था। अब इसका कुछ नहीं हो सकता। रोती-बिलखती उसे घर लेकर आ गई। धीरे-धीरे उसके पेट के निचले हिस्से में कई घाव हो गए। अभी तीन दिन पहले ही उसकी मौत हो गई। दो बच्चे हैं। कैसे पालूंगी, क्या करूंगी- कुछ समझ नहीं आता। तीन बेटों में से दो बेटों की पहले ही मौत हो चुकी है। अब एक बहू और बेटा ही बचे हैं। आगे की जिंदगी के बारे में सोच-सोचकर मरी जा रही हूं।’ जेठानी बेड़वंती कहती हैं, ‘15 साल पहले मेरे पति की भी ब्लड कैंसर के कारण मौत हो गई थी। एक साल चंडीगढ़ और एक साल बीकानेर में उनका इलाज करवाती रही, लेकिन उन्हें नहीं बचा पाई। घर-द्वार, जमीन… सब बिक गया। अब बेटा है, वही काम-धंधा करके घर चला रहा है।’ इन लोगों की कहानी सुनकर मैं दंग होता जा रहा हूं। मन-ही-मन सोच रहा हूं कि ये कैसा कैंसर है- एक परिवार, एक गली, एक गांव… हर दूसरे घर में इससे मौत हुई है। कई परिवारों में तो तीन-चार से ज्यादा मौतें हो चुकी हैं। मेरा एक स्थानीय साथी 30 किलोमीटर दूर चट्ठेवाला गांव के ऐसे ही हालात के बारे में बताता है। मैं वहां के लिए निकल पड़ता हूं। आधे घंटे बाद गांव में गाड़ी रुकते ही 10 घरों में से 6-7 में कैंसर से हुई मौतों के मामले मिल जाते हैं। यहीं एक घर में महिंदर सिंह पिछले एक साल से बिस्तर पर पड़े हैं। उन्हें मुंह का कैंसर है। पत्नी मंजीत कौर जमींदार के यहां चूल्हा-चौका करने गई हुई हैं। उनकी बेटी बीरपाल एक दिन पहले ही ससुराल से मायके आई हैं। पिता के बारे में पूछते ही फूट-फूटकर रोने लगती हैं। काफी देर बाद कहती है, ‘हर वक्त डर रहता है- इस बार पिता से मिलकर जा रही हूं… अगली बार पता नहीं, कब मौत की खबर आ जाए।’ वह थोड़ी देर रुकती हैं, फिर धीमी आवाज में कहती हैं, ‘अब कोई भी बीमारी होती है, तो लगता है- कहीं कैंसर तो नहीं। तुरंत चेकअप के लिए शहर भागती हूं। लोग कहते हैं कि अगर माता-पिता को कैंसर हो, तो बच्चों में भी होने का खतरा रहता है। डर बस यही रहता है- कहीं हमें या हमारे बच्चों को कैंसर न हो जाए।’ इतनी ही देर में महिंदर सिंह की पत्नी मंजीत कौर आ जाती हैं। हल्की मुस्कान में अपने आंसू छुपाने की कोशिश करती हैं। कहती हैं, ‘पिछले एक साल से हर हफ्ते 6 हजार रुपए कीमोथेरेपी में जा रहे हैं। बरसात में घर की छत टपकती है। इलाज के लिए पैसे नहीं बचते, तो घर की मरम्मत कहां से कराऊं। अब बस यही देख रही हूं- कितनी जिंदगी बची है।’ वह एक पल के लिए चुप होती हैं, फिर कहती हैं, ‘पति ठीक हो जाए, तो सब ठीक… नहीं तो, सब खत्म। और क्या ही बोलूं…। इस चट्ठेवाला गांव में जिधर देखिए, उधर कैंसर के दो-चार मामले मिल जाएंगे। मेरी सास को भी रेक्टम कैंसर था। 10 साल पहले उनकी मौत हो गई थी।’ मैं महिंदर सिंह की गली से आगे गांव की तरफ बढ़ता हूं। तभी जालौर सिंह मिलते हैं। उनके भाई बलौर सिंह की भी कुछ साल पहले कैंसर से मौत हो चुकी है। पूछते ही वह अपने भाई की तस्वीर दिखाने लगते हैं। कहते हैं, ‘वह हू-ब-हू मेरी तरह दिखता था। अभी घर में मेरी 100 साल की मां जिंदा हैं, लेकिन भाई चला गया। जहां-जहां लोगों ने बताया, वहां-वहां उसका इलाज कराया। मैं बिजली विभाग में नौकरी करता था, ठीक-ठाक कमाई थी, फिर भी उसे नहीं बचा पाया। लोग कहते हैं कि गुटखा-तंबाकू खाने से मुंह का कैंसर होता है, लेकिन मेरा भाई तो कुछ भी नहीं खाता था। दो साल बिस्तर पर पड़ा रहा, फिर उसकी मौत हो गई। अब उसकी पत्नी और बच्चे गांव से दूर खेत में जाकर रहने लगे हैं। वहीं मजदूरी करके गुजारा कर रहे हैं। आप मेरे घर के सामने, दाएं-बाएं कहीं भी चले जाइए- हर घर में कैंसर से मौत हुई है। मेरी चचेरी चाची की भी कुछ साल पहले कैंसर से मौत हो गई थी। इलाज के लिए पैसे नहीं थे, तो मैंने उनका घर खरीद लिया। कैंसर के इलाज में लाखों रुपए खर्च होते हैं, फिर भी कोई नहीं बचता। अब तो डर लगा रहता है कि कहीं मुझे या मेरे बच्चों को कुछ न हो जाए। बच्चे कहते हैं कि शहर चलकर बस जाएं, लेकिन घर-द्वार और खेती-बाड़ी छोड़कर कहां जाएं? जहां जन्म लिया, वहीं मर जाएंगे। ये बातें बताते हुए जालौर सिंह आवाज देकर दो-तीन लोगों को बुला लेते हैं। उनमें से एक गरिंदरजीत कौर हैं। उनकी सास की 7 साल पहले मुंह के कैंसर से मौत हो गई थी। वह मुझे अपने घर ले जाती हैं। कहती हैं, ‘सास की जीभ के निचले हिस्से में छाला पड़ा था, जो धीरे-धीरे बड़ा छेद बन गया। वह कुछ खा नहीं पाती थीं। चम्मच से बच्चे की तरह पानी और जूस पिलाना पड़ता था। उनकी हालत देखकर हमारा भी खाना छूट जाता था- हम कैसे खाते? सास जूस-पानी पर रहती थीं और हम पकवान खाएं… ये कैसे होता? करीब डेढ़ साल इलाज चला, फिर उनकी मौत हो गई। डॉक्टर ने कहा था कि यहां का पानी ही इसकी वजह है। उसके बाद हमने घर में RO लगवा लिया।’ गरिंदरजीत के घर के ठीक सामने जसविंदर कौर का घर है। 8 साल पहले उनके जेठ जग्गा सिंह की ब्लड कैंसर से मौत हो गई थी। जसविंदर, जो हरियाणा की रहने वाली हैं, कहती हैं, ‘हम पांच बहनें थीं। पापा ने तीन बार में दो-दो बहनों की एक साथ शादी की। इस घर में भी हम दो बहनें ब्याहकर आईं। पहले मेरी बहन की मौत हुई, फिर जेठ की ब्लड कैंसर से। उनके तीन बच्चे हैं- दो बेटियां और एक बेटा। जॉइंट फैमिली है, तो हम ही उन्हें पाल-पोस रहे हैं। कैंसर का ऐसा डर है कि हमारी बेटियों से कोई शादी नहीं करना चाहता। रिश्ता लेकर आने वाले पहले ही पूछते हैं- घर में किसी को कैंसर तो नहीं? यहां का पानी पीने से भी डरते हैं। हम लोग बस जी रहे हैं… कब कैंसर हो जाए, कब मौत आ जाए- कुछ पता नहीं।’ जज्जल, रामा मंडी और चट्ठेवाला गांव के बाद मैं 20 किलोमीटर दूर गियाना गांव की ओर निकलता हूं। शाम हो चुकी है। मुझे वापस बठिंडा लौटना है। गांव में सब्जी बेचने वाले पवन कुमार मिलते हैं। कैंसर का जिक्र करते ही कहते हैं, ‘क्या बताऊं… मेरे मां-बाप, दोनों की कैंसर से मौत हो गई। 2008 के आसपास की बात है। हमारी परचून की दुकान थी। अचानक पापा को तेज बुखार आने लगा। उस वक्त बठिंडा में इलाज की सुविधा नहीं थी, इसलिए उन्हें बीकानेर लेकर गया। वहां पता चला- ब्लड कैंसर है। 6 महीने बाद मां भी बीमार रहने लगीं। उनका चेकअप कराया, तो बोन कैंसर निकला। धीरे-धीरे उनका शरीर इतना कमजोर हो गया कि जहां से पकड़ता, वहीं से हड्डी टूटने लगती। महीने में तीन बार बीकानेर कीमोथेरेपी के लिए जाना पड़ता था। दुकान बंद करनी पड़ी। दुकान में सामान नहीं रहेगा, तो चलेगी कैसे? आखिर में सब्जी की रेहड़ी लगानी शुरू की। 6 साल के अंदर दोनों की एक-एक करके मौत हो गई। अब पानी ही खराब है… क्या करें? जीना तो है, लेकिन जिंदगी कब तक है- कुछ पता नहीं।’ मैं इन सब कहानियों को समेटते हुए वापस बठिंडा लौट आता हूं। एम्स बठिंडा में कैंसर विशेषज्ञ डॉ. सपना भट्टी से मुलाकात होती है। वह कहती हैं, ‘इन गांवों की स्थिति गंभीर है, लेकिन अब धीरे-धीरे सुधार हो रहा है। बठिंडा में ही चार कैंसर अस्पताल हैं और एम्स में हर दिन 120 से ज्यादा मरीज इलाज के लिए आते हैं। पहले यहां सुविधाएं नहीं थीं, तो लोग बीकानेर जाते थे। यहां से एक ट्रेन चलती थी, जिसे लोग ‘कैंसर एक्सप्रेस’ कहते थे। अब वही मरीज इलाज के लिए बठिंडा आ रहे हैं। यहां बढ़ते कैंसर का सबसे बड़ा कारण पानी है। पानी बेहद खराब है। जिस मिट्टी में उगा अनाज लोग खाते हैं, वह भी प्रभावित है। फसलों में रासायनिक खाद और कीटनाशकों का ज्यादा इस्तेमाल हो रहा है, जिससे मिट्टी और पानी दोनों जहरीले हो गए हैं। पानी में आर्सेनिक, सेलेनियम और यूरेनियम जैसे तत्व खतरनाक स्तर पर पाए जा रहे हैं, जो कैंसर के खतरे को बढ़ाते हैं। इसके अलावा, रिफाइनरी प्लांट से निकलने वाला जहरीला कचरा भी हालात को और बिगाड़ रहा है। यहां तंबाकू, बीड़ी, सिगरेट और शराब का सेवन भी ज्यादा होता है, जो कैंसर के जोखिम को बढ़ाता है। अगर किसी एक व्यक्ति को कैंसर होता है, तो परिवार के बाकी लोगों में भी खतरा बढ़ जाता है। गांवों में लोग शर्म और डर की वजह से कैंसर से हुई मौतों के बारे में खुलकर बात नहीं करते। उन्हें बदनामी का डर रहता है। हालांकि, हम लगातार जागरूकता अभियान चला रहे हैं। स्कूलों और कॉलेजों में जाकर लोगों को इसके प्रति सचेत कर रहे हैं।’ ———————————— 1- ब्लैकबोर्ड- सिर्फ पीरियड्स में नहा पाती हैं महिलाएं:कम खाती हैं, ताकि शौच न जाना पड़े; बोलीं- नमक के खेत में ही पैदा हुए, इसी में मर जाएंगे चिलचिलाती धूप में दूर तक फैला नमक का मैदान इतनी तेज चमक रहा है कि आंखों में चुभ रहा है। दूर तक कहीं छांव नहीं। अचानक एक महिला, रमिला, काम छोड़कर धीरे से कहती हैं- ‘दिन में हम शौच नहीं जाते… लोग देख लेंगे। इसलिए खाना भी कम खाते हैं… ताकि बार-बार जाना न पड़े…पूरी स्टोरी यहां पढ़ें 2- ब्लैकबोर्ड- भूख के बजाय, दवाओं के ट्रायल से मरना अच्छा:बच्चों को तो 25 लाख मिल जाएंगे; उन्हें रिसर्च के लिए खून चाहिए, हमें पैसा ‘किसे अच्छा लगता है कि वह पैसे के लिए अपनी जान की बाजी लगाए, लेकिन मुझे लगानी पड़ती है। अगर मर भी गई तो बच्चों को 20-25 लाख मिलेंगे। कम से कम उनकी जिंदगी तो बेहतर हो जाएगी। अभी तक खुद पर दवाओं के ट्रायल में 4 बार पास हुई हूं।’ पूरी स्टोरी यहां पढ़ें



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