नाचती लड़की का हाथ पकड़ा और भगा ले गया लड़का:मैतेई लोगों में शादी की अनोखी परंपरा, पैदा होते ही बच्चे को खिला देते हैं नमक

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शाम के 5 बजे हैं। एक सुनसान जगह पर कुछ लोग जमीन को चौकोर खोद रहे हैं। आसपास भीड़ है। आधे घंटे बाद खुदाई करने वालों को गड्ढे में कुछ नजर आया। कुछ पल बाद दो-तीन लोग उस गड्‌ढे में उतरे और एक लाश बाहर निकालकर रख दी। लाश के कई हिस्से कंकाल में तब्दील हो चुके हैं। इसके बाद सधे तरीके से लाश की खोपड़ी को धड़ से अलग कर दिया। भीड़ से एक लड़का शराब की बोतल लिए आगे आता है। कपाल को उठाता है और शराब से धोने लगता है। पास ही खड़ा दूसरा शख्स मंत्र जैसे कुछ बुदबुदाने लगता है। तभी भीड़ से एक और शख्स सफेद कपड़ा लेकर आगे आता है। घर वाले उसे शराब से धुले कपाल पर पगड़ी की तरह बांध देते हैं। इसके बाद कपाल को एक मटके में रख, पास में मौजूद पत्थर पर टिका दिया। इस पत्थर को लोग ‘लुफउनुंग’ कह रहे हैं। कुछ देर बाद खोपड़ी और धड़ को दोबारा वहीं गाड़कर मिट्टी समतल कर दी गई। दैनिक भास्कर की सीरीज ‘हम लोग’ में मैं मनीषा भल्ला इस बार लाई हूं मणिपुर के मैतेई समुदाय की कहानी। इनकी आबादी करीब 15 लाख है… जिस प्रक्रिया का मैंने ऊपर जिक्र किया वो मैतई समुदाय के अंतिम संस्कार की है। जो मौत के एक साल बाद यानी बरसी पर की जाती है। इसे फूरा कहते हैं। ऐसा माना जाता है कि इससे मरे हुए व्यक्ति का आशीर्वाद बना रहता है। मैतई समुदाय को जानने के लिए मैं मणिपुर की राजधानी इंफाल के एक मोहल्ले- लैटोनजामखोरी में पहुंची हूं। शाम के 4 बजे हैं। सड़क पर सन्नाटा है। यहां एक घर के आंगन में कुछ लोग गोल घेरे में बैठे हैं। इनके बीच सफेद धोती-कुर्ता पहने एक पुरोहित उकड़ू बैठा है। उसने मुर्गे का मुंह कसकर पकड़ रखा है। मुर्गा छटपटा रहा है। आसपास के लोग टक-टकी लगाए देख रहे हैं। सबका ध्यान मुर्गे की टांगों पर है। कुछ ही देर में मुर्गा मर जाता है। पुरोहित मुर्गे को उठाकर एक लड़के को दिखाते हुए मैतेई में कहता है- ‘देख, दोनों टांगें बराबर हैं… मतलब तुम्हारी शादी में आ रही अड़चन दूर हो जाएगी।’ इतना सुनते ही लड़का और उसके पास बैठे लोग राहत की सांस लेते हैं। पुरोहित फिर समझाता है- ‘अगर मुर्गे की दाहिनी टांग ऊपर होती तो बहुत शुभ होता…और बायीं टांग ऊपर होती तो अशुभ। लेकिन दोनों बराबर हैं… यानी मुश्किल है, पर समाधान भी है।’ मेरे साथ मणिपुर के कल्चरल एक्टिविस्ट लैरेल्लाकपम इबोम्चा मैतेई हैं। बताते हैं- ‘ये येनखौंगतंबा है। यहां ‘येन’ मतलब मुर्गा, ‘खौंग’ मतलब पंजे और ‘तंबा’ यानी देखना… यानी मुर्गे के पंजों से किस्मत देखना।’ करीब 20 मिनट बाद हम इंफाल के दूसरे मोहल्ले में पहुंच जाते हैं। मोहल्ले में रंग-बिरंगी रोशनी है। लोग धीरे-धीरे एक जगह जमा हो रहे हैं। यहां कुछ कुर्सियां रखी हैं। सामने एक स्टेज है… जिस पर सफेद कपड़ों में दो पुरोहित बैठे हैं। पुरोहित पोटसछंग मौरोलैर मैतेई और निंथउजम कोकिल मैतेई माइक संभालते हैं और एक कहानी सुनाते हैं। स्टेज पर कलाकार इन कहानियों पर अभिनय करते हैं। वे कभी जोश से भर जाते हैं तो कभी भावुक होकर रुक जाते हैं। पुरोहित बता रहे हैं- ‘मणिपुर में 1562 के आसपास मैतेई राजा मोंगजांबा हुआ करते थे। घुड़सवारी में माहिर और बेहद बहादुर। उसी दौर में चीन का एक राक्षसी राजा था, जो हर दिन यहां के 10 इंसान और 10 जानवर मारकर खा जाता था। पूरा इलाका उससे खौफ में था।’ पुरोहित इशारे से बताते हैं- परेशान लोग अपने राजा के पास जाकर कहते हैं- अब इसका अंत जरूरी है। इसके बाद राजा ने एक बड़े चाकू से चीनी राजा को मार गिराया। यह कहानी यहां हर हफ्ते इस किस्सागोई डांस में दोहराई जाती है। इसमें कलाकार मैतेई राजाओं की बहादुरी के किस्सों पर अभिनय करते हैं। घर के कोने में महज एक दीवार इनका मंदिर होती है इसके बाद मैं कल्चरल एक्टिविस्ट इबोम्चा के घर पहुंची। घर के कोने में एक अलग सी दीवार है। उस पर कुछ फल रखे हैं। वे बताते हैं- ‘यही हमारा मंदिर है। मैतेई भाषा में इसे सनामहिस्म कहते हैं। इससे बुरी आत्माएं नहीं आतीं।’ मैं बात कर ही रही थी, तभी इबोम्चा के परिवार ने खाना परोस दिया। खाने में चिकन, बतख का मांस और चावल थे। साथ में कबोक, क्वा, थोईथिंग और हमईबोन नाम की सब्जियां भी परोसी गईं। मैंने खाना खाया। रात धीरे-धीरे गहरा रही थी, इसलिए मैं होटल लौट आई। सुबह मैं इबोम्चा के साथ कार से पूर्वी इंफाल के खुर्रई पुथीबा लैईकई गांव के लिए निकल गई। यह गांव करीब 35 किलोमीटर दूर था। गांव में सबसे पहले दो छोटे-छोटे प्राकृतिक झरने दिखाई दिए। मैतेई भाषा में इन्हें थुमखौंग कहते हैं। मैं कार से उतर कर झरनों के पास पहुंची। यहां पानी पीया तो यह नमकीन जैसा लगा। इबोम्चा ने बताया ये मैतेई समुदाय की परंपराओं की लाइफलाइन है। हम फिर कार में सवार हो गए। आधे घंटे के बाद पुथीबा लैईकई गांव पहुंचे। यहां मेरी मुलाकात जोशिता चानू से हुई। मैंने उनसे झरने के पानी का जिक्र किया। वे बताती हैं- ‘हम इन झरने के नमकीन पानी को मटकों में इकट्ठा करते हैं। फिर इसे लैरंग, यानी भट्ठी पर रखी टिन के बने कनस्टर में डालकर उबालते हैं। धीरे-धीरे नमक ऊपर आता है। इसकी प्लेट्स बनाकर सुखाई जाती है। फिर इन्हीं प्लेट्स को बारीक करके थुम, यानी नमक बनाया जाता है। तैयार नमक को बाजार में भी बेचा जाता है। यह काम यहां कई परिवार करते हैं।’ पैदा होते ही बच्चे को चटाया जाता है नमक जोशिता बताती हैं- ‘जब बच्चा पैदा होता है तो उसे यह नमक चटाया जाता है। मरने पर भी इसे शव की जीभ पर रखा जाता है। शादी-ब्याह समेत हर त्योहार में यह अनिवार्य है।’ वे हमें एक और मैतेई इंग्सींबिराक्सी गांव ले जाती हैं। यह गांव करीब 30 किलोमीटर दूर है। गांव में दाखिल होते हैं, नजर पड़ती है सफेद रंग के पापड़ के आकार की चीजों पर, जो सुखाई जा रही हैं। जोशिता बताती हैं- ‘यहां चावल को फर्मेंट किया जा रहा है। इससे एक लोकल शराब बनाई जाएगी, जिसे हमई कहते हैं। पांच दिन में यह तैयार हो जाती है।’ वे बताती हैं कि- ‘हमारे यहां महिलाएं शराब नहीं पीतीं।’ इसके बाद हम यहां से पास ही के एक और गांव एंग्सीनबीराकसी पहुंचते हैं। यहां मल्लयुद्ध होने वाला है, जिसे देखने के लिए भीड़ जमा है। मैतेई भाषा में इसे लोग यूबी लकपी कह रहे हैं। इसमें हिस्सा लेने वाले युवक अपने शरीर पर तेल लगाकर तैयार हैं। सात-सात खिलाड़ियों वाली दो टीमें हैं। इसमें खिलाड़ियों को एक-दूसरे से नारियल छीनना होता है। नारियल पर भी इतना तेल लगा दिया जाता है कि खिलाड़ियों के हाथ में न आए। जीतने वाले को सफेद कपड़ा और कुछ पैसे दिए जाते हैं। हालांकि, शाम गहरा रही थी, इसलिए मल्लयुद्ध देखे बिना ही हम इंफाल के लिए रवाना हो जाते हैं। मैतेई लड़के-लड़कियां भागकर करते हैं शादी अगले दिन इंफाल में मैं एंथ्रोपॉलोजिस्ट शाकमाचा सिंह के पास पहुंची। वे बताते हैं मैतेई समाज में शादी की रस्म अलग है। आमतौर पर यहां लड़का-लड़की घर से भागकर शादी करते हैं। इस रस्म के लिए होली की रात गांव के बाहर एक त्योहार थाबलचोंग्बा मनाया जाता है। इसमें लड़कियां गोल घेरे में डांस करती हैं। इसी दौरान कोई लड़का उनमें से एक लड़की को चुनता है। फिर वह लड़की का हाथ पकड़ लेता है। पास ही बैठे लड़कियों के माता-पिता इसे ध्यान से देख रहे होते हैं कि उनकी बेटी का हाथ किस लड़के ने पकड़ा। हाथ पकड़ना माना जाता है कि वह लड़का इस लड़की से शादी करना चाहता है। इसके बाद वह लड़का, लड़की से मिलने के लिए गांव आता है। दोनों को मिलने-जुलने के लिए पूरा समय और निजी जगह दी जाती है, ताकि वे एक-दूसरे को अच्छी तरह समझ सकें। लड़की के परिवार वाले भी नजर रखते हैं कि वह लड़का कौन है? कैसा है? अगर परिवार को लड़का ठीक नहीं लगता तो वे अपनी बेटी को उससे मिलने से रोक देते हैं। अगर लड़की और परिवार दोनों लड़के को पसंद कर लेते हैं तो लड़का, लड़की को भगाकर अपने घर ले जाता है। भागने के लिए लड़की की मंजूरी है जरूरी शाकमाचा बताते हैं- ‘जब लड़के के परिवार को पता चलता है कि उनका बेटा लड़की को भगाकर लाया है तो वे अपने बड़े-बुजुर्गों के साथ लड़की के घर पहुंचते हैं। उनके हाथों में नमक की थाली, फल और पान होते हैं। वहां पहुंचकर वे लड़की के परिवार से माफी मांगते हैं।’ इस दौरान लड़की भी साथ होती है। लड़की से पूछा जाता है- ‘क्या इस लड़के ने तुम्हें जबरदस्ती भगाया, या यह तुम्हारी मर्जी से हुआ?’ ऐसे में लड़की का जवाब मायने रखता है। अगर लड़की कह देती है कि लड़का उसे बहला-फुसला कर ले गया तो लड़के को तुरंत समुदाय और गांव से निकाल दिया जाता है। अगर लड़की अपनी सहमति बताती है तो दोनों की शादी तय हो जाती है। जलसा लाने का दिया जाता है न्योता शाकमाचा बताते हैं- ‘जब शादी से दो दिन पहले बोर जातरा, यानी एक यात्रा होती है। इसमें लड़की के घर का सबसे छोटा लड़का कुछ लोगों के साथ दूल्हे के घर जाकर न्योता देता है कि- वह हमारे घर हाईचिंग पोट यानी जलसा लेकर आएं। इसके बाद लड़के के गांव की महिलाएं जलसा लेकर लड़की के घर जाती हैं। वे सिर पर बांस की एक टोकरी में गहने, फल और नमक की 5 प्लेट लेकर चलती हैं। इस टोकरी को फिंगारुख कहते हैं। इस जातरा की अगुवाई एक सुहागन महिला करती है, जिसके बच्चे हों और माता-पिता भी। इसके दो दिन बाद शादी होती है। मंडप में पहले लड़का दाखिल होता है, फिर लड़की। इसके बाद फेरे होते हैं। लड़की, लड़के को फूल देती है। लड़का, लड़की के गले में मफलर जैसा कपड़ा डालता है। ये कपड़ा तनखुल नगा समुदाय के हाथ का ही बना होना चाहिए। मैतेई लोग तनखुल नगा समुदाय को अपना भाई मानते हैं। इसके बाद दूल्हा, दुल्हन के भाइयों से पान के पत्ते की अदला-बदली करता है। फिर दोनों, बुजुर्गों से आशीर्वाद लेते हैं। यहां शादी की रस्म पूरी हो जाती है।’ शाकमाचा बताते हैं- ‘शादी होने के बाद लड़का, लड़की को साथ नहीं ले जाता। पहले लड़का अकेले ही अपने घर लौटता है। इसके कुछ घंटे बाद लड़की विदा होती है। ससुराल की चौखट पर बांस जलाकर धुआं किया जाता है। इस धुएं से होकर लड़का-लड़की के घर के अंदर दाखिल होते हैं। इसके पांच दिन बाद मंगानी चकोदा नाम की रस्म होती है, जिसमें पूरे खानदान और गोत्र को भोज दिया जाता है।’
इस सीरीज में अगले हफ्ते पढ़िए ऐसे ही अनोखे कोया लोगों की कहानी…. —————————————————-
1- 100 किलो का पत्थर उठाया, लड़की बोली- तुमसे करूंगी शादी:औरतें 5 पति भी रख सकती हैं, 1800 अनोखे ‘टोडा’ लोगों की कहानी सुबह की हल्की धुंध अभी पहाड़ियों से हटी नहीं है। घास पर जमी ओस चमक रही है। मैदान के किनारे जंगल में एक पुराने पेड़ के नीचे लोग जमा हुए हैं। इसी पेड़ के नीचे एक बड़ा इम्तिहान होने वाला है। पूरी कहानी यहां पढ़ें 2- शरीर के ऊपरी हिस्से पर कपड़े नहीं पहनतीं बोंडा महिलाएं:शादी ठुकराने पर लड़कीवालों का घर तोड़ देते हैं, मृत्युभोज में खाते हैं गाय का मांस सुबह करीब 10 बजे का वक्त। मिट्टी से लिपा-पुता एक कच्चा घर। बाहर सिर मुंडाए दो महिलाएं बैठी हैं। उम्र करीब 38-40 साल। ऊपरी बदन लगभग नंगा। बाकी शरीर पर नाम मात्र के कपड़े। छाती छिपाने के लिए मोतियों और कौड़ियों से बनी मालाएं। पूरी कहानी यहां पढ़ें



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