ऐसा मंदिर जहां देवी का योनि रूप पूजते हैं:‘रजस्वला’ में लाल हुए कपड़े के लिए मचती है होड़; चुनाव जीतने के लिए तंत्र-मंत्र करवा रहे नेता

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चारों तरफ धधकती चिताएं। इनके बीच कई तांत्रिक समाधि में बैठे साधना कर रहे हैं। सबके अपने तरीके हैं। कोई जोर-जोर से मंत्र पढ़ रहा, तो कोई ठंडी चिता पर धूनी रमाए हुए है। थोड़ी दूर दो तांत्रिक एक ही चिता पर मंत्र जाप कर रहे हैं। उनमें से एक उठता है और चिता की गरम राख के सामने उंगलियों से सीटी मारकर किसी को बुलाने का इशारा करता है। फिर चिता के चारों ओर चक्कर लगाने लगता है। ये तांत्रिक चिता से कुछ शक्तियां पुकार रहा है। उनके हाव-भाव से लग रहा मानो कोई अकेले में बात कर रहा हो। ये नजारा साल में एकबार जून में दिखाई देता है। अंबुबाची मेले के दौरान। लेकिन पिछले 6 महीने से कामाख्या मंदिर में नेताओं का मेला लगा है। अंबुबाची मेले के दौरान मां कामाख्या रजस्वला यानी मासिक धर्म में होती हैं। उनके स्राव से भीगकर लाल हुए कपड़े की कतरन के लिए भीड़ में होड़ मचती है। वहीं नेताओं का मेले में माता के ज्यादा वोटरों का आशीर्वाद लेने की होड़ मची है। देखते हैं इसकी दो बानगी- तारीख- 19 फरवरी 2026, कामाख्या देवी मंदिर का परिसर। लंबी दाढ़ी, काले कपड़े में जटाधारी नागा साधु। उनके बगल में लाल-काली साड़ी पहने माथे पर लाल टीका लगाए एक महिला खड़ी है। जेड प्लस सिक्योरिटी ने दोनों को घेर रखा है। आम लोग वीडियो बना रहे हैं। नागा साधु महिला के सिर पर हाथ रखते हैं और कहते हैं- जय महाकाल बाबा, भैरव बाबा। इस साल बेटी का नाम अच्छा बनेगा। इस साल बेटी प्रधानमंत्री बनेगी। ये सुनते ही महिला खिलखिला उठती है और झेंप जाती है। ये कोई और नहीं बल्कि कांग्रेस नेता प्रियंका गांधी हैं। तारीख- 27 दिसंबर 2025। जेड प्लस सिक्योरिटी के साथ कुछ नेता पहुंचे। वीआईपी लाइन से गर्भगृह में उनकी एंट्री हुई। पुजारी ने खास अनुष्ठान के बाद योनि स्थल का पवित्र जल छिड़का और कुछ बुदबुदाए। फिर माता की लाल रंग की चुनरी नेता के गले में डाल दी। ये थे बीजेपी के नए राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष नितिन नवीन। दरअसल, श्रद्धा ही नहीं, कामाख्या देवी का ये मंदिर तकरीबन पूरे असम की राजनीति का भी केंद्र है। मंदिर असम की ब्रह्मपुत्र वैली में बसा है। इसी वैली में बारपेटा, डिब्रूगढ़, जोरहाट समेत असम 86 विधानसभा सीटें आती हैं। यहां हिंदू वोटर्स जैसे असमिया हिंदू, बोडो हिंदू की बड़ी हिस्सेदारी है। कामाख्या मंदिर इन समुदायों के लिए सिर्फ धार्मिक स्थल नहीं, बल्कि एक साझा सांस्कृतिक पहचान का प्रतीक भी है। कामाख्या मंदिर का सीधा असर इन 86 सीटों पर है। इनमें से अकेले बीजेपी ने 34 और कांग्रेस सिर्फ 24 सीटें जीत पाई थी। वहीं, बदरुद्दीन की AIUDF ने 11 और बाकी सीटें अन्य पार्टियों ने जीती थीं। मतलब साफ है असम में अगर सरकार बनानी है तो कामाख्या मंदिर के जरिए ब्रम्हपुत्र वैली की इन सभी 86 सीटों पर अपना प्रभाव दिखाना होगा। बीजेपी और कांग्रेस सभी इसी प्रयास में लगे हुए हैं। इसे ही ध्यान में रखते हुए साल 2026 के विधानसभा चुनाव से ठीक पहले प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी ने असम के लिए 47,800 करोड़ रुपये से ज्यादा के पैकेज का ऐलान किया। इसमें कामाख्या मंदिर के लिए 213 करोड़ रुपये का रोपवे प्रोजेक्ट और दूसरे कनेक्टिविटी प्रोजेक्ट शामिल किए गए। आस्था और राजनीति के केन्द्र इस मंदिर में मैं नीलांचल पर्वत चढ़कर पहुंचा। कामाख्या मंदिर का गुंबद दूर से ही नजर आ जाता है। यह मधुमक्खी के छत्ते जैसा गोल है। 51 शक्तिपीठों में से एक कामाख्या मंदिर नाव के आकार में बना है। न तो कोई ऊंचे-ऊंचे शिखर हैं, न ही फर्श पर चमकता हुआ संगमरमर। दीवारों पर देवी-देवता, अप्सराओं समेत कई आकृतियां उकेरी हैं। इस मंदिर की सबसे खास बात है कि यहां मूर्ति नहीं, योनि की पूजा होती है। ये दुनिया की इकलौती शक्तिपीठ है, जहां दसों महाविद्या- भुवनेश्वरी, बगला, छिन्नमस्तिका, काली, तारा, मातंगी, कमला, सरस्वती, धूमावती और भैरवी एक ही स्थान पर विराजमान हैं। यहां के मुख्य मंदिर में एक अंधेरी गुफा है, जिसके तीनों ओर सोने के दरवाजे है। यहां टेढ़ी-मेढ़ी सीढ़ियां उतरकर पहुंचते हैं। यहां एक चौकोर-सी छोटी जगह कपड़ों से ढंकी है। जिसके चारों तरफ जल है। भक्त उस जल को छूकर माथे से लगा रहे हैं, पी रहे हैं। कुछ भक्त उसे गडवी में भरकर घर भी ले जा रहे हैं। यही वो योनि स्थल है, जो हमेशा कपड़ों से ढंका रहता है। यह इतना गहरा है कि घुटनों के बल झुककर ही इसे छुआ जा सकता है। कामाख्या मंदिर में दर्शन नहीं, योनि जल के स्पर्श का महत्व
मंदिर के पुजारी भूपेश शर्मा कहते हैं- ‘इस मंदिर में दर्शन नहीं स्पर्श का महत्व है। योनि स्थल के दर्शन नहीं होते, लेकिन उससे रिसने वाले जल के स्पर्श का महत्व है। लोग ये जल भरकर अपने साथ ले जाते हैं। किसी भी शुभ काम में इसका इस्तेमाल करते हैं। यहां ‘योनि’ को सृष्टि की शुरुआत, नई जिंदगी और स्त्री शक्ति का प्रतीक माना जाता है। जैसे बच्चे का जन्म मां से होता है, वैसे ही पूरी सृष्टि देवी की शक्ति से बनी मानी जाती है।
इसी वजह से कामाख्या मंदिर में तंत्र साधना का भी खास महत्व है और यहां देवी को सबसे बड़ी शक्ति के रूप में पूजा जाता है।’ रजस्वला के दौरान योनि स्थल को सफेद कपड़े से ढक दिया जाता है। तीन दिन मंदिर के पट बंद रहते हैं। इसी दौरान अंबुबाची मेला लगता है। जिसका जिक्र हमने इस खबर की शुरुआत में किया। तीन दिन बाद जब पट खुलता है तब कपड़ा लाल हो जाता है। इस लाल कपड़े के एक-एक धागे को लेने के लिए भक्तों की भीड़ लगती है। ये मंदिर ब्रह्मपुत्र नदी के किनारे बना है। माना जाता है कि जब देवी कामाख्या रजस्वला में होती हैं, उसी दौरान नदी के इस हिस्से का पानी भी लाल हो जाता है। हालांकि, इसकी प्राकृतिक वजह कुछ और है। मंदिर के ऊपर कबूतर दिखाई दे रहे हैं। उनके ऊपर सिंदूर लगा हुआ है। कबूतर वाले से पूछा तो बताने लगे कि शरीर से रोग दूर करने और मनोकामना पूरी करने के लिए सिंदूर लगाकर कबूतर को उड़ाया जाता है। यहां एक कबूतर करीब 500 रुपए में मिलता है। बकरों की बलि और माता को लगता है भोग
मंदिर के पुजारी भूपेश शर्मा बताते हैं ‘यहां की पूजा पद्धति दूसरे मंदिरों से अलग है, क्योंकि ये तंत्रपीठ है। यहां पूजा तंत्रों पर ही आधारित है। हालांकि वैदिक विधान से भी पूजा होती है, लेकिन तंत्र विधान से ज्यादा होती है। ब्रह्म मुहूर्त में सबसे पहले देवी को ‘जागृत’ करने की प्रक्रिया होती है। गर्भगृह में स्थित योनि-कुंड को पवित्र जल से साफ कर, फूल, कपड़ा और अन्य सामग्री चढ़ाई जाती है। इसके बाद मंगल आरती होती है। जिसमें सिर्फ पुजारी और मंदिर से जुड़े लोग ही अंदर होते हैं। सुबह करीब 5:30 बजे मंदिर के कपाट आम भक्तों के लिए खोले जाते हैं। दिनभर अलग-अलग तरह की मन्नत और विशेष पूजाएं होती रहती हैं। कुछ लोग तांत्रिक अनुष्ठान भी करवाते हैं। दोपहर के समय देवी को भोग लगाया जाता है। भोग में आमतौर पर मिठाई, फल और नारियल होता है। किसी खास अनुष्ठान में पशु-बलि के बाद भोग लगाया जाता है। भोग के बाद कुछ समय के लिए मंदिर के कपाट बंद किए जाते हैं। इसे देवी के विश्राम का समय माना जाता है। शाम को फिर से मंदिर खुलता है और संध्या आरती होती है।’ मंदिर परिसर के अंदर एक कोने में लोहे की जालियां लगी हैं। कई सारे बकरे बंधे हैं। कुछ छोटे-कुछ बड़े। खास अनुष्ठान में यहीं बलि दी जाती है। जिस वक्त बलि दी जाती है, मंदिर परिसर में मौजूद हर कोई देख सकता है। इसके अलावा यहां कबूतर की भी बलि होती है। चुपचाप पूजा करवा के निकल जाते हैं नेता
पीएम मोदी, गृहमंत्री अमित शाह, रक्षामंत्री राजनाथ सिंह, अरबपति मुकेश अंबानी समेत कई प्रदेशों के मुख्यमंत्री यहां पूजा करने आ चुके हैं। मंदिर के पुजारी भूपेश शर्मा कि इस वक्त चुनाव के मौसम में यहां नेताओं का आना शुरू हो गया है। सभी आकर यहां मन्नत मांग रहे हैं। अनुष्ठान करवाते हैं। हालांकि, सभी आम लोगों की तरह ही आते हैं। अगर आपके बगल से निकल जाएं तो शायद आप पहचानेंगे भी नहीं।’ कामाख्या शक्तिपीठ असम की सांस्कृतिक पहचान है। यहां आशीर्वाद लेना धार्मिक सम्मान का प्रतीक बन जाता है, जो जनता को संदेश देता है कि नेता उनकी आस्था का आदर करते हैं। इससे छवि मजबूत होती है। एक तरह से ये मंदिर चुनावी ‘शुभारंभ स्थल’ बन चुका है। ये राज्य के 65% हिंदू वोट बैंक का प्रतीकात्मक केंद्र जैसा है। मुगलों के सेनापति ने तोड़ दिया था मंदिर
पुरातत्वविदों के अनुसार, कामाख्या मंदिर की उत्पत्ति 8वीं-9वीं शताब्दी में हुई। मूल मंदिर का निर्माण कामदेव ने विश्वकर्मा की सहायता से करवाया था। हालांकि, 15वीं शताब्दी में मुगल सेनापति कालापहाड़ ने मंदिर तोड़ दिया था। बाद में कोच राजा विश्वसिंह ने मंदिर के अवशेष खोजे और पूजा-पाठ को फिर से शुरू कराया। उनके पुत्र नर नारायण ने अपने सेनापति चिलाराई की मदद से मंदिर का पुनर्निर्माण करवाया। 17वीं शताब्दी की ‘दारंग-राजवंशावली’ के अनुसार, मंदिर के पुनर्निर्माण में कई चुनौतियां आईं। पारंपरिक पत्थरों से मंदिर का शिखर नहीं बन पाया। तब राजमिस्त्रियों ने ईंटों से गुंबद बनाया। इसे 16-कोणीय बहुभुज आकार दिया गया। यही शैली आगे चलकर ‘नीलाचल शैली’ बनी और पूरे असम में लोकप्रिय हो गई। मंदिर के पुजारी भूपेश शर्मा बताते हैं कि ‘कालिका पुराण और देवी भागवत के अनुसार कहानी शुरू होती है सती और भगवान शिव से। सती के पिता प्रजापति दक्ष ने एक बड़ा यज्ञ किया। इसमें अपनी बेटी सती और दामाद भगवान शिव को नहीं बुलाया। सती फिर भी वहां पहुंच गईं। उनके सामने शिव का अपमान हुआ। ये बात वो सह नहीं पाईं और उन्होंने यज्ञ की आग में कूदकर जान दे दी। भगवान शिव गुस्से में सती का शरीर उठाकर तांडव करने लगे। हालात इतने बिगड़ गए कि भगवान विष्णु को बीच में आना पड़ा। उन्होंने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर के टुकड़े कर दिए, ताकि शिव का तांडव शांत हो सके। जहां-जहां ये टुकड़े गिरे, वहां शक्तिपीठ बने। माना जाता है कि कामाख्या में सती का योनि भाग गिरा था, इसलिए इसे योनिपीठ कहा जाता है। ये शक्ति और सृजन का प्रतीक है।’



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