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‘किसे अच्छा लगता है कि वह पैसे के लिए अपनी जान की बाजी लगाए, लेकिन मुझे लगानी पड़ती है। अगर मर भी गई तो बच्चों को 20-25 लाख मिलेंगे। कम से कम उनकी जिंदगी तो बेहतर हो जाएगी। अभी तक खुद पर दवाओं के ट्रायल में 4 बार पास हुई हूं। मुझ पर कैंसर, हार्ट अटैक, स्ट्रोक और किडनी की दवाओं के ट्रायल हो चुके हैं…अब हर तीन महीने में लैब के चक्कर लगाती हूं। पूछती रहती हूं कोई नया ट्रायल होने वाला है क्या?’, बिस्मिल्लाह स्याह कहानियों की सीरीज ब्लैकबोर्ड में ऐसे लोगों की कहानी, जो पैसों के लिए अपनी जान दांव पर लगाकर क्लिनिकल ट्रायल का हिस्सा बन रहे हैं। खुद पर दवाएं टेस्ट करा रहे हैं। अपनी झोपड़ी में बैठी 6 बच्चों की मां बिस्मिल्लाह खुद पर हुए क्लिनिकल ट्रायल की कहानी बता रही हैं। वह बातचीत करने के लिए तैयार नहीं थी, काफी समझाने के बाद राजी हुईं। बिस्मिल्लाह गुजरात के अहमदाबाद शहर से 20 किलोमीटर दूर बसे गणेश नगर इलाके की झुग्गी-बस्ती में रहती हैं। अभी रमजान चल रहे हैं। जिस वक्त मैं बिस्मिल्लाह के घर गया, वह शाम के इफ्तार की तैयारी कर रही थीं। तपती गर्मी में यहां एक मिनट भी ठहरना मुश्किल है। मैंने बिस्मिल्लाह से पूछा- क्लिनिकल ट्रायल के लिए आप लैब कैसे गई थी? दुपट्टे में पसीना पोंछते हुए बोलीं- ‘यहां 100 से ज्यादा परिवार रहते हैं। चार साल पहले की बात है। बस्ती की कई महिलाएं शहर जा रही थीं। मुझे किसी ने बताया कि सभी दवा के ट्रायल के लिए जा रही हैं। बदले में पैसे मिलते हैं। मैं भी उनके पीछे-पीछे ऑटो में बैठ गई। करीब एक घंटे बाद सभी लोग एक लैब के बाहर जाकर रुक गए। उस दिन पता चला कि वहां हम इंसानों पर दवाओं का ट्रायल किया जाता है। क्लिनिकल स्टडी के लिए खून लिया जाता है। लैब में काम करने वाले से जब मैंने पूछा, तो उन्होंने कहा- कैंसर की दवा बनाने का टेस्ट चल रहा है। तुम्हें क्लिनिकल स्टडी करवानी है? इसमें पास हो जाओगी, तो पैसे मिलेंगे। लेकिन अगर तुम्हें कुछ हो गया, तो उसकी जिम्मेदारी हमारी नहीं होगी। मैं सोचने लगी- वैसे भी गरीबी में मर ही रही हूं। स्टडी के दौरान मर गई तो बच्चों को 20-25 लाख तो मिल जाएंगे, ट्रायल करा ही लेती हूं। मैंने हां कह दिया। ‘आपको लैब वालों ने बताया था कि जान भी जा सकती है?’ बिस्मिल्लाह फौरन बोलीं, ‘उन लोगों ने एक फॉर्म भरवाया। उसमें गुजराती में लिखा था- अपनी मर्जी से स्टडी में हिस्सा ले रही हूं। अगर मेरी मौत हो गई, तो उसकी जिम्मेदारी खुद की होगी। लैब की कोई जवाबदेही नहीं होगी। उस दिन मेरे शरीर पर दवा का पहला ट्रायल किया गया और 20 हजार रुपए मिले। 6 महीने किसी के यहां चूल्हा-चौका करती, तब भी इतने पैसे नहीं मिलते। हमें क्या… हमें तो बस पैसा चाहिए और उन्हें इंसानों का खून। पैसों के लालच में मौत से खेलती हूं। बच्चे मना करते हैं। कहते हैं- अगर मुझे कुछ हो गया, तो उनका क्या होगा? मैं समझाती हूं- इंसान की क्या ही कीमत है। पैसे रहेंगे, तो जिंदगी कट ही जाएगी।’ ये कहते हुए बिस्मिल्लाह की आंखें भर आती हैं। कितने पैसे मिलते हैं? 35 हजार रुपए तक मिलते हैं। जैसी स्टडी, वैसा पैसा। पहले मैं तीन-चार दिन की स्टडी में ही जाती थी। अब तो 24 घंटे तक चलने वाली स्टडी में जाती हूं। पहले घर पर छोटे-छोटे बच्चे थे, तो उनकी भी देखभाल करनी पड़ती थी। पड़ोस के दो बच्चों को गोद ले रखा है। दरअसल, उनका बाप मर गया, तो मां ने दूसरी शादी कर ली। बच्चे अनाथ रह रहे थे। मैं उनकी देखभाल करने लगी। दवाओं की यह जांच कई हिस्सों में होती है। एक बार तो मैंने तीन हिस्से पूरे किए थे, चौथे हिस्से में शामिल होने से पहले कुत्ते ने काट लिया। तब लैब वालों ने मेरे पैसे काट लिए। 35 हजार के बदले 25 हजार रुपए ही दिए। एक तो जान की बाजी लगाओ, ऊपर से स्टडी पूरी न होने पर पैसे भी कट जाते हैं, लेकिन हमारे हाथ में कुछ भी नहीं। ट्रायल से पहले मेरे पूरे शरीर का चेकअप किया जाता है, फिर मेरा खून लेते हैं। दो बार में 500 ml तक खून निकाल लेते हैं। कुछ दवाएं खिलाकर एक कमरे में बंद रखते हैं। कोई रिएक्शन या दिक्कत नहीं होती है, तो घर भेज देते हैं। उसके बाद अगर मुझे कुछ हो जाए, तो उनकी कोई जिम्मेदारी नहीं। ट्रायल के बाद वे कहते हैं- घर जाकर ताकत वाली चीजें खाना, लेकिन फल-सब्जियां कहां से खाऊं। दो वक्त का दाल-भात मिल जाए, वही बहुत है। एक बार ऐसी ही स्टडी के लिए पुणे गई थी। 20 हजार रुपए मिले थे। उस दिन लैब वालों ने मुझे कैश में पैसा दिया था। पैसा एक बैग में रखा लिया था, किसी ने बैग चुरा लिया। पूरी मेहनत पानी में चली गई थी। कई बार तो ऐसा होता है कि मेरी रिपोर्ट स्टडी के मुताबिक नहीं होती, तो हमें घर वापस भेज दिया जाता है। तब लगता है कि अगर स्टडी हो जाती, तो पैसे मिल जाते। लेकिन अब घर जाकर बच्चों के खाने-पीने की व्यवस्था कैसे करूंगी।’ ‘यहां कब से रह रही हैं?’ बिस्मिल्लाह कहती हैं, ‘हम लोग पिछले 17 साल से यहां रह रहे हैं। बरसात में पूरा इलाका पानी से भर जाता है। आंधी आती है तो छप्पर उड़ जाते हैं। यहां न कोई रोजगार है, न कोई धंधा। पैसे के लिए दवाओं के ट्रायल में हिस्सा लेना पड़ता है। पेट के लिए हम इंसानों को खुद को बेचना पड़ता है। मैं तो सिर्फ खून बेचती हूं। इस बस्ती में इतनी गंदगी है कि आप कुछ देर भी यहां ठहर नहीं सकते। साबरमती रीवरफ्रंट डेवलपमेंट के दौरान राज्य सरकार ने हमें वहां से हटाकर यहां बसा दिया, लेकिन आज भी यहां कोई सुविधा नहीं है।’ ‘घर में और कौन-कौन रहता है?’ ‘मैं और मेरे तीन बच्चे…। करीब 30 साल पहले की बात है। पहले शौहर से एक बेटी हुई थी। ससुराल वालों ने कहा- तुमने बेटी जनी है, तुम जानो। हमारा इससे कोई मतलब नहीं। डिलीवरी के 6 दिन बाद ही घर से निकाल दिया। मेरे मां-बाप ने भी मुझे रखने से मना कर दिया। मैं अपने नाना-नानी के घर चली गई। कुछ सालों बाद एक हिंदू आदमी से प्यार हो गया। मैंने शादी कर ली। उससे मुझे 5 बच्चे हुए, लेकिन उसने भी मुझे तलाक दे दिया और 3 बच्चे अपने पास रख लिए। तीन बच्चों के साथ मैं अलग रहने लगी। दो बच्चों की शादी हो गई है, एक की नहीं हुई है। उसके दिल में छेद है। अब मेरे पास खाने तक के पैसे नहीं हैं, तो उसका इलाज कहां से कराऊं। किसी मामले में पुलिस उसे उठा ले गई है। मेरे पास तो केस लड़ने के भी पैसे नहीं हैं।’ मजबूरी का यह दंश सिर्फ बिस्मिल्लाह ही नहीं झेल रही हैं। यहां लगभग हर परिवार की यही कहानी है। ज्यादातर परिवार बातचीत के लिए कैमरे पर नहीं आना चाहते हैं। उन्हें डर है कि अगर बात करेंगे, खबर फैल जाएगी तो लैब वाले ट्रायल में लेने से इनकार कर देंगे। बिस्मिल्लाह के बाद बड़ी मुश्किल से 64 साल की मंजू बेन बातचीत के लिए राजी हुईं। वो अकेले रहती हैं। परिवार के बारे में बताती हैं कि एक पोता और एक पोती है। दोनों शहर में रहते हैं। 6 साल पहले पति की मौत हुई थी, फिर एक दुर्घटना में बेटे की मौत हो गई। वह सूरत में रहता था। वहां पर ही वह क्लिनिकल ट्रायल में हिस्सा लेने जाता था। अब घर में कोई कमाने वाला नहीं बचा है। इसलिए मैं क्लिनिकल ट्रायल के लिए जाती हूं। इसी से हमारा घर चलता है। बेटे की मौत के बाद तुरंत बाद ही मैंने एक ट्रायल में हिस्सा लिया था। 20 हजार रुपए मिले थे। उसी से यह टॉफी-बिस्किट की दुकान खोली। इससे दिनभर में 50 रुपए की कमाई हो पाती है। इतने से क्या ही होने वाला है। मेरी तो उम्र भी हो चुकी है। हर दिन सोचती हूं कि एक और स्टडी मिल जाती, तो इस घर की मरम्मत करवा लेती। एक साल में अगर कोई और स्टडी नहीं मिली, तो यह काम नहीं करा पाऊंगी। मेरी उम्र पूरी हो जाएगी। ऐसे भी मर ही जाऊंगी। यदि स्टडी के दौरान मर गई, तो मेरे पोता-पोती को 25 लाख रुपए तो मिलेंगे। यही सोचकर स्टडी के लिए चली जाती हूं। मेरे पोते-पोती को नहीं पता होता कि मैं स्टडी के लिए गई हूं। उन्हें बिना बताए जाती हूं। घर चलाने के लिए पैसे तो चाहिए ही न। यहां कोई काम-धंधा भी नहीं है। किसी के घर काम करने जाऊं, तो 1500 से 2 हजार रुपए ही मिलते हैं। अब काम करने लायक उम्र भी नहीं रही। क्या ही कर सकती हूं।’ बिस्मिल्लाह और मंजू बेन से बातचीत के बाद अभी तक मुझे यही लग रहा था कि क्लिनिकल ट्रायल में सिर्फ महिलाएं जा रही हैं। तभी एक शख्स ने बताया कि पास में रहने वाले जनकभाई भी क्लिनिकल ट्रायल के लिए जाते हैं। मैं उनके पास पहुंचा। खाट पर एक कपड़ा बांधकर अपने बेटे को सुला रहे हैं। पूछने पर कहते हैं, ‘यहां जमालपुर की फूल मंडी है। वहां मजदूरी करता था। धीरे-धीरे धंधा चौपट होने लगा, तो किसी ने बताया कि क्लिनिकल स्टडी में पैसे मिल जाते हैं। मैं और मेरी पत्नी अनशा दोनों स्टडी के लिए गए। पत्नी का वजन कम था, तो उसे स्टडी में लेने से मना कर दिया गया। मैं पास हो गया। पहली स्टडी से जो पैसा मिला, उसी से मैंने इस घर की दीवार खड़ी की। नहीं तो पहले यह पूरी तरह झोपड़ी था। क्या करें, पैसों के लिए स्टडी में जाना पड़ता है। यहां कोई दूसरा काम-धंधा नहीं मिलता। पिछले चार साल में दर्जनों से भी ज्यादा बार स्टडी के लिए गया, लेकिन 4 बार ही पास हो पाया। अभी एक ट्रायल के लिए टेस्ट देकर आया हूं। यह उसी का डॉक्यूमेंट है। इस बार भी फेल हो गया। अब तीन महीने बाद नंबर आएगा।’ सामने जनकभाई की पत्नी अनशा बेन जमीन पर बैठी हमारी बातें सुन रही हैं। कहती हैं, ‘यदि मैं स्टडी में पास हो जाती, तो इन्हें स्टडी नहीं कराने देती। लेकिन मैं तो पहली बार में ही फेल हो गई थी। मेरा वजन कम था। जब ये स्टडी पर जाते हैं, तो हर वक्त मन उधर ही लगा रहता है। जब तक इनका फोन नहीं आ जाता, नींद नहीं आती। डर लगता रहता है कि इन्हें कुछ हो गया तो… मैं तो विधवा हो जाऊंगी, लेकिन पैसे के लिए सब कुछ दांव पर लगाना पड़ता है।’ ————————————- 1- ब्लैकबोर्ड-5 करोड़ मुआवजा शानो-शौकत में उड़ाया:3 करोड़ की जमीन खरीदी, 1 करोड़ का मकान; 80-80 लाख की शादियां- अब रोज कमाने से घर चल रहा एक सच्ची कहानी- ग्रेटर नोएडा के किसान रामेश्वर सिंह की। 12 एकड़ जमीन सरकार ने ली और बदले में उन्हें सवा 5 करोड़ रुपए दिए। पैसा खाते में आते ही जिंदगी बदल गई। पूरी स्टोरी यहां पढ़ें 2- ब्लैकबोर्ड-‘एक्स्ट्रा सर्विस’ न देने पर मारी गई थी अंकिता भंडारी:मां-बाप ने खुद को घर में बंद किया; न कमा रहे, न राशन खरीद पा रहे दिल्ली से आए मीडिया के लोग दिनभर अंकिता भंडारी के माता-पिता से बात करने के लिए उनके घर के बाहर बैठे रहे, लेकिन वे घर पर ताला लगाकर चले गए थे। तब तक नहीं लौटे, जब तक मीडिया के लोग वापस नहीं चले गए। अगले दिन मैं बिना बताए उनके घर पहुंची। वह हड़बड़ा गईं… पूरी स्टोरी यहां पढ़ें
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ब्लैकबोर्ड- भूख के बजाय, दवाओं के ट्रायल से मरना अच्छा:बच्चों को तो 25 लाख मिल जाएंगे; उन्हें रिसर्च के लिए खून चाहिए, हमें पैसा
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