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‘डेढ़ महीने से मुझे ‘महाराजा’ पनिशमेंट दी जा रही थी, जिसमें सिर के बल डेढ़-डेढ़ घंटे रहना होता था। एक दिन मैं बॉक्सिंग की ट्रेनिंग ले रहा था। तभी एक जोरदार पंच मेरे सिर पर लगा और मैं गिर पड़ा। अफसर चिल्लाए- चेतन, उठो और लड़ो। मैंने कहा- अब नहीं लड़ पाऊंगा, सर। लेकिन उन्होंने कहा- नहीं चेतन, तुम्हें भिड़ना होगा। आखिरकार मैं न चाहते हुए भी उठा और ट्रेनिंग पूरी की। आर्मी की ट्रेनिंग ऐसे ही होती है। हालत बहुत खराब हो चुकी थी। ट्रेनिंग से लौटते वक्त अचानक आंखों के सामने अंधेरा छा गया और मैं जमीन पर गिर पड़ा। उसके बाद मुझे कुछ याद नहीं। 8 महीने कोमा में रहा। जब होश आया, तो खुद को अस्पताल में पाया। मेरा आधा शरीर पैरालाइज्ड हो चुका था। उसके बाद मुझे नौकरी से बाहर कर दिया गया। मेरी तरह ही ट्रेनिंग के दौरान घायल हुए अब तक लगभग 450 लोग सेना से बाहर हो चुके हैं, जिनकी जिंदगी बर्बाद हो गई।’, चेतन चौधरी बताते हैं। स्याह कहानियों की सीरीज ‘ब्लैकबोर्ड’ में इस बार उन आर्मी जवानों की कहानी है, जिन्हें ट्रेनिंग के दौरान चोट लगी और अंग खराब होने पर नौकरी से बाहर कर दिया गया। चेतन अपने परिवार के साथ गाजियाबाद में रहते हैं। आर्मी में भर्ती होने के बाद उनकी ट्रेनिंग बिहार के पटना में हो रही थी, जहां उन्हें सिर में चोट लगी और उनका आधा शरीर पैरालाइज्ड हो गया। इसके बाद उन्हें नौकरी से बाहर कर दिया गया। चार महीने पहले ही उनकी शादी हुई है। चेतन से मिलने जब मैं उनके घर पहुंचा, तो उन्होंने कहा, ‘सॉरी सर, मैं आपका नाम भूल गया। आपने आने से पहले क्या नाम बताया था?’, सकुचाते हुए 27 साल के चेतन चौधरी हाथ मिलाते हैं और मुझसे पूछते हैं। मैं दोबारा नाम बताता हूं, तो कहते हैं- अरे, हां याद आया! आपके आने से कुछ देर पहले तक मुझे याद था, लेकिन अचानक भूल गया। सिर में चोट लगने से कोमा में चला गया था। तब से मेरी शॉर्ट-टर्म मेमोरी यानी याददाश्त कमजोर हो गई है। अब कुछ देर पहले कही गई बातें भूल जाता हूं।’ यहां तक कि सिर की चोट से मेरी आंखों की रोशनी भी कमजोर हो गई है। इस वजह से आपका चेहरा कैसा है, मुझे ठीक से नहीं दिखाई दे रहा है। आपसे बात करने के लिए मैंने आंख घुमाकर आपकी ओर सेट की है, तब आपको थोड़ा ठीक से देख पा रहा हूं। लेकिन अब भी आपकी दो तस्वीरें दिख रही हैं। एक तस्वीर में आप सामने बैठे हुए दिख रहे हैं, तो दूसरी में उसी के ठीक बाई तरफ। दरअसल, आर्मी की ट्रेनिंग में एक हादसे में 8 महीने कोमा में रहा था। सिर में चोट लगने से शरीर का दायां हिस्सा और बायां पैर पैरालाइज्ड हो गया। बाएं पैर से चल नहीं पाता। आखिर में बेकार होने के कारण मुझे नौकरी से निकाल दिया गया। मैंने पूछा- याद है कि क्या हुआ था? चेतन कहते हैं- मैं बिहार के गया में ओटीए- यानी ऑफिसर्स ट्रेनिंग एकेडमी में ट्रेनिंग ले रहा था। करीब चार महीने हुए थे। 26 अप्रैल 2015 की बात है। सुबह करीब 8 बजे थे। उस दिन बॉक्सिंग की ट्रेनिंग चल रही थी। मैंने उससे पहले कभी बॉक्सिंग नहीं की थी, तभी एक पंच मेरे सिर की बाईं तरफ लगा। आंखों के सामने अंधेरा छा गया। गिर पड़ा। मैंने अफसरों से कहा- अब बॉक्सिंग नहीं कर पाऊंगा, सर। अफसर दबाव डालते हुए कह रहे थे- ‘चेतन, दिस इज माय ऑर्डर, यू हैव टु फॉलो’। यानी यह मेरा आदेश है, तुम्हें मानना पड़ेगा। मैं उठा और किसी तरह ट्रेनिंग पूरी की। इससे पहले करीब डेढ़ महीने तक मुझे ‘महाराजा’ पनिशमेंट दी जा रही थी- यानी रोज डेढ़-डेढ़ घंटे सिर के बल रहना होता था। इसे ट्रेनिंग का सामान्य हिस्सा माना जाता है। बॉक्सिंग खत्म होने के बाद मैं लौट रहा था कि अचानक चक्कर आया और चीखते हुए जमीन पर गिर पड़ा। साथ में चल रहे दोस्त हर्ष से कहा- ‘हर्ष, मैं मर गया… कुछ दिखाई नहीं दे रहा।’ उसके बाद मुझे कुछ याद नहीं। उधर, 27 अप्रैल को घर पर फोन आया कि आपके बेटे की तबीयत खराब है, आप पटना आ जाइए। वह एक प्राइवेट हॉस्पिटल में भर्ती है। सबसे पहले मेरे नानाजी फ्लाइट से पहुंचे, फिर मम्मी-पापा। मैं वेंटिलेटर पर था। मम्मी मेरी हालत देखकर जमीन पर गिर पड़ीं। कुछ देर बाद उन्हें होश आया। डॉक्टर ने बताया कि गहरी चोट की वजह से सिर के एक हिस्से में खून जम गया था, जिसे ऑपरेशन करके हटा दिया गया है। अगर गया में 12 घंटे के भीतर ऑपरेशन हो जाता, तो बचने की संभावना ज्यादा थी। अब 14 घंटे बाद ऑपरेशन हुआ है, इसलिए 24 से 48 घंटे में होश आ गया तो ठीक, नहीं तो आपका बेटा नहीं बचेगा। शरीर के ऊपर का दाहिना हिस्सा और निचला बायां हिस्सा पैरालाइज्ड हो चुका है। यह सुनने पर परिवार के लिए एक-एक पल काटना मुश्किल हो गया। मैं घर का इकलौता बेटा था। मम्मी वहां मौजूद आर्मी अफसरों से कह रही थीं- हमने 6 फीट का हट्टा-कट्टा 17 साल का बेटा दिया था, आपने विकलांग बना दिया? अब यह पूरी जिंदगी कैसे जिएगा? सीमा पर शहीद होता, तो तिरंगे में लिपटकर घर आता, लेकिन यह तो जीते-जी मर गया? करीब 2 महीने पटना के उस अस्पताल में भर्ती रहा। पेशाब-लैट्रिन सब बेड पर कर रहा था। पाइप के सहारे पतला खाना अंदर डाला जा रहा था। उसके बाद मुझे दिल्ली के आर्मी हॉस्पिटल में रेफर कर दिया गया, जहां 6 महीने रहा। इस तरह कुल 8 महीने कोमा में रहा। अक्टूबर का महीना था। व्हीलचेयर पर मुझे लेकर जाया जा रहा था था। अचानक मैं कोमा से बाहर आ गया। इधर-उधर देखकर सोचने लगा- मैं तो एकेडमी में था, यहां हॉस्पिटल में कैसे आ गया। चोट लगने से तीन दिन पहले की बातें ही याद थीं। मुझे परेशान देख पापा कहने लगे- बेटा, तुम्हें बहुत तेज बुखार हुआ था। इसलिए यहां लाए हैं, लेकिन मैं समझ गया था- जरूर कुछ बड़ी घटना हुई है। बाद में धीरे-धीरे सब पता चला। उस दौरान मुझे हर रोज चार-चार इंजेक्शन लग रहे थे। एक इंजेक्शन की कीमत ढाई लाख थी। हालांकि, सारे पैसे आर्मी ही खर्च कर रही थी। लेकिन 26 अक्टूबर 2016 को आर्मी ने मुझे 100 फीसदी विकलांग माना। नौकरी से निकाल दिया। बदले में हर महीने 45 हजार रुपए मुआवजे के तौर पर दे रही थी। उस समय लगा कि- मेरी जान की कीमत केवल 45 हजार रुपए लगाई गई है। उसके बाद डेढ़ साल तक बिस्तर पर रहा। 34 किलो का रह गया था। कंकाल लग रहा था। मां मुझे बिस्तर पर ही लैट्रिन-पेशाब कराती थीं। मुझे शर्म आती थी, लेकिन वह कहतीं- तुम समझो कि मुझे 3 साल का दूसरा बेटा हुआ है। उसकी सू-सू, पॉटी कर रही हूं। सोचिए, मां ऐसी ही होती हैं। वह अपने बच्चे की देखभाल के लिए कोई न कोई बहाना खोज लेती हैं। यह कहते-कहते चेतन की आंखें डबडबा जाती हैं। वे कहते हैं- मम्मी-पापा मेरे सामने तो कभी नहीं रोते, लेकिन छुपकर अक्सर रो लेते थे। चेतन अपने सिर का बायां हिस्सा दिखाने लगते हैं, जो ऑपरेशन के कारण नारियल के छिलके की तरह दो हिस्सों में नजर आ रहा है। कहते हैं- सेना में अफसर बनने गया था, लेकिन विकलांग बनकर आ गया। मेरी चार पीढ़ियां सेना में रहीं। पापा भी सेना में थे। बचपन से वर्दी देखते हुए बड़ा हुआ था। पापा चाहते थे कि मैं डॉक्टर बनूं, लेकिन मेरा सपना फौज में जाने का था। 12वीं के बाद SSB यानी सर्विस सिलेक्शन बोर्ड का फॉर्म भरा और मेरा सिलेक्शन हो गया था। मुझे नहीं पता था कि इस तरह मैं उस सपने को केवल छूकर लौट आऊंगा। इस बातचीत के दौरान मेरी नजर चेतन के ड्राइंग रूम की दीवारों पर गई। उनकी वर्दी वाली कई तस्वीरें पर। चेतन कहते हैं, ‘ये तस्वीरें तब की हैं मैं जब मेरे घर वाले और सभी मान चुके थे कि अब मैं सेना में अफसर बन चुका हूं। पूरा परिवार खुश था। जब थोड़ा ठीक हुआ अस्पताल से घर आया तो लेटे-लेटे सोचता- अब क्या ही जिंदगी बची है। क्यों न आत्महत्या करके सारा किस्सा खत्म कर दूं! लेकिन मां-बाप का चेहरा देखकर रुक जाता था। घर पर रिश्तेदार मुझे देखने आते, तो कहते- सेना में भर्ती होने के बाद वहां से कोई भला कैसे बाहर आ सकता है। सेना में नौकरी से निकाला ही नहीं जा सकता। लेकिन हकीकत यह है कि ट्रेनिंग के दौरान इस तरह बीच में पैरालाइज्ड होने पर सेना में कोई जगह नहीं बचती। हमें मक्खी की तरह निकालकर फेंक दिया जाता है। अब मेरी जो हालत है, इसका कोई तो जिम्मेदार होगा ही। चोट लगने के 12 घंटे के भीतर अगर मेरी सर्जरी हो जाती, तो मैं शायद इतना ज्यादा बेकार न होता, यह कहते हुए चेतन का गला सूखने लगता है। सामने रखी पानी की बोतल तुरंत उनकी तरफ बढ़ा देता हूं। पानी पीकर वे कहते हैं- ज्यादा बोलने से गला सूख जाता है। गले की सर्जरी हुई है। आपको गर्दन में एक छेद दिख रहा होगा। इसकी नस काम नहीं कर रही थी। यही नहीं, हादसे के बाद तो मेरे हाथ भी बहुत कांपते थे। लगता था कि यह मेरे शरीर का हिस्सा ही नहीं हैं। थेरेपी और एक्सरसाइज की बदौलत काफी ठीक हुए, लेकिन बाएं पैर से अब भी नहीं चल पाता। रोज थेरेपी लेता हूं। घुटने में सपोर्ट सिस्टम लगाता हूं, तब इस पैर से थोड़ा चल पाता हूं। आर्मी का सारा पैसा मेरे शरीर के इलाज में खर्च हो रहा है। मैं तो थोड़ा भाग्यशाली हूं कि कम-से-कम मेरी हालत ऐसी है, वर्ना ट्रेनिंग के दौरान ऐसे लोग भी निकाले गए हैं, जिनकी पूरी जिंदगी व्हीलचेयर पर चली गई है। मैं पढ़ने में तेज रहा हूं, इसलिए यादाश्त कम होने पर भी पढ़ाई शुरू की। दो साल पहले ही मिनिस्ट्री ऑफ डिफेंस में मेरी नौकरी लगी है। अब जाकर पैसे की दिक्कत दूर हुई है। लेकिन आज भी मैं हर रात सेना की वर्दी वाली इस फोटो को देखता हूं। इससे बातें करता हूं कि- चेतन तुझे फिर से ठीक होकर ऐसा ही दिखना है। उसके बाद सोता हूं। शादी में क्या दिक्कत आई? मैंने तो सोच लिया था कि शादी नहीं करूंगा। जब पैरालाइज्ड पार्ट थोड़ा ठीक हुआ, नौकर लगी तब कुछ रिश्ते आए। जो भी देखने आता, शादी से मना कर देता। आखिर में मेरी बहन ने एक रिश्ता तय किया। चेतन से मिलने के बाद मैं दिल्ली के नारायणा विहार पहुंचा। मैनेजमेंट की पढ़ाई के लिए कैट की तैयारी कर रहे आशीष के पास। आशीष उत्तर प्रदेश के मथुरा के रहने वाले हैं। वे कहते हैं- अप्रैल 2022 में मैं NDA की परीक्षा पास करके सेना में भर्ती हुआ था। पापा भी सेना में थे। जब मैंने नौकरी जॉइन की, तब लगा कि अब तो लाइफ सेट हो गई है। पापा से कहा- अब आपको नौकरी करने की जरूरत नहीं है। 18 साल आप नौकरी कर चुके हैं। वीआरएस लेकर अब घर रहिए। मेरी बात मानकर उन्होंने वीआरएस ले ली और घर पर रहने लगे। लेकिन जुलाई 2022 आते-आते सब कुछ बदल गया। मैं पुणे के आर्मी इंस्टीट्यूट में ट्रेनिंग ले रहा था। सेना में भर्ती हुए महज 4 महीने हुए थे। उस दिन 10 मीटर की तैराकी की ट्रेनिंग हो रही थी। जैसे ही मैंने पानी में छलांग लगाई। पानी के दबाव से मेरे दाएं कंधे की नस ऊपर की ओर खिसक गई। गंभीर रूप से घायल हो गया। मुझे पानी से निकालकर तुरंत पुणे के आर्मी हॉस्पिटल में भर्ती कराया गया। उस दौरान घर वाले फोन करते, तो कहता- सब ठीक है। हल्की चोट लगी है, जल्दी ठीक हो जाऊंगा। खैर, वहां डॉक्टर ने कंधे की सर्जरी की। इस तरह अक्टूबर तक एकेडमी में रहा। एक दिन आर्मी वालों ने कहा कि मुझे ट्रेनिंग से निकाला जा रहा है। उसके बाद घर वालों को बताया। मैं तो डिप्रेशन में चला गया। सोच रहा था कि यह क्या हो गया। ट्रेनिंग के दौरान सेना के लोग भले हमें अपना न मानें, लेकिन हम तो खुद को सेना का आदमी मान बैठते हैं। लेकिन सच यह है कि बिना ट्रेनिंग पूरी किए कोई सेना का नहीं होता। इस तरह मुझे सेना की नौकरी से निकाल दिया गया। पूरा घर परेशान था। उस दौरान गांव का एक लड़का लेफ्टिनेंट बनकर आया। लोगों ने फूल-माला से उसका स्वागत किया। उस दिन मुझे देखकर मेरी मां फूट-फूटकर रोई थीं। मेरा कंधा अब ऐसा हो गया कि हल्का जोर पड़े तो खिसक जाता है। गेंद नहीं फेंक सकता। न कोई भारी काम कर पाता हूं। अब तो ये हमेशा ऐसा ही रहेगा। बस एक चीज से संतोष कर लेता हूं कि चलो बाकी शरीर तो ठीक है न। इस तरह आर्मी के सपने देखते हुए मेरे 3 साल बर्बाद हो गए। वहां से आने के बाद 2025 में दिल्ली यूनिवर्सिटी में दाखिला लिया। साथ-साथ कैट एग्जाम की तैयारी कर रहा हूं। चेतन और आशीष से मिलने के बाद मैं दिल्ली के करोल बाग पहुंचा। यहां यूपीएससी की तैयारी कर रहे यश्मित कौशिक से मुलाकात हुई। यश्मित हरियाणा के बहादुरगढ़ के रहने वाले हैं। कुछ दिन पहले जब इनसे उनके गांव आकर मिलने की बात हुई थी, तब इन्होंने मना कर दिया था। यश्मित कहते हैं, ‘दरअसल गांव में मम्मी-पापा के सामने ये सारी बातें नहीं करना चाहता था। मेरे घर में तो कोई सेना में था भी नहीं। पापा टीचर थे। मैं पायलट बनना चाहता था, लेकिन कम दिखाई देने की वजह से पायलट नहीं बन पाया। ‘लक्ष्य’ जैसी देशभक्ति फिल्में देखी थी, तभी से सेना में जाने का मन हुआ था। 2021 का बात है। मैंने NDA की परीक्षा पास की और नौकरी लग गई। 2 साल बीता। ढाई किलोमीटर की एक रनिंग के दौरान मेरे पैर में फ्रैक्चर आ गया। कुल्हे से सटी पैर की हड्डी टूट गई। पहले तो हेयर लाइन फ्रैक्चर था। यानि हल्का-हल्का क्रैक हुआ, तब मैंने ज्यादा ध्यान नहीं दिया। फिर धीरे-धीरे क्रैक ऐसा बढ़ा कि हड्डी टूट गई। अस्पताल में भर्ती कराया गया। कई महीने व्हीलचेयर पर रहा। बाद में मुझे सेना से निकाल दिया गया। मेरा सपना वहीं का वहीं रह गया। पापा बार-बार समझाते हैं। कोई बात नहीं, कम-से-कम तू तो सही सलामत है। कुछ और कर लेना। जबकि अफसर होने का ख्वाब देखते हुए बड़ा हुआ था। फिलहाल, अब दिल्ली में यूपीएससी की तैयारी कर रहा हूं। सेना में अभी जो नियम है, उसके मुताबिक 4 साल की ट्रेनिंग के दौरान अगर किसी जवान का अंग गंभीर रूप से खराब हो जाए या उसकी मौत हो जाए, तो उसे मुआवजे में कुछ रुपए देकर ट्रेनिंग के बीच से ही नौकरी से निकाल दिया जाता है। वह सेना का हिस्सा नहीं माना जाता। न ही कोई सुविधा मिलती है। इस तरह अब तक लगभग 450 लोगों को बोर्डआउट यानी ट्रेनिंग के दौरान बाहर किया गया है। कई ऐसे कैंडिडेट भी हैं, जो पूरी तरह से विकलंगा हो गए हैं। इसको लेकर मामला सुप्रीम कोर्ट में गया है। वहां हम सभी की मांग है कि हमें सेना की तरफ से या तो पूर्वा सैनिक का दर्जा दिया जाए या सेना में ही कोई टेबल जॉब। यानी हल्की-फुल्की मेहनत वाली नौकरी। ——————————————- 1- ब्लैकबोर्ड- सिर्फ पीरियड्स में नहा पाती हैं महिलाएं:कम खाती हैं, ताकि शौच न जाना पड़े; बोलीं- नमक के खेत में ही पैदा हुए, इसी में मर जाएंगे चिलचिलाती धूप में दूर तक फैला नमक का मैदान इतनी तेज चमक रहा है कि आंखों में चुभ रहा है। दूर तक कहीं छांव नहीं। अचानक एक महिला, रमिला, काम छोड़कर धीरे से कहती हैं- ‘दिन में हम शौच नहीं जाते… लोग देख लेंगे। इसलिए खाना भी कम खाते हैं… ताकि बार-बार जाना न पड़े…पूरी स्टोरी यहां पढ़ें 2- ब्लैकबोर्ड- भूख के बजाय, दवाओं के ट्रायल से मरना अच्छा:बच्चों को तो 25 लाख मिल जाएंगे; उन्हें रिसर्च के लिए खून चाहिए, हमें पैसा ‘किसे अच्छा लगता है कि वह पैसे के लिए अपनी जान की बाजी लगाए, लेकिन मुझे लगानी पड़ती है। अगर मर भी गई तो बच्चों को 20-25 लाख मिलेंगे। कम से कम उनकी जिंदगी तो बेहतर हो जाएगी। अभी तक खुद पर दवाओं के ट्रायल में 4 बार पास हुई हूं।’ पूरी स्टोरी यहां पढ़ें
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ब्लैकबोर्ड-हट्टा-कट्टा भर्ती हुआ, फौज ने विकलांग बनाकर भेज दिया:8 महीने कोमा में रहा, होश आया तो पता चला- मुझे आर्मी से निकाल दिया
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