![]()
चिलचिलाती धूप में दूर तक फैला नमक का मैदान इतनी तेज चमक रहा है कि आंखों में चुभ रहा है। दूर तक कहीं छांव नहीं। अचानक एक महिला, रमिला, काम छोड़कर धीरे से कहती है- ‘दिन में हम शौच नहीं जाते… लोग देख लेंगे। इसलिए खाना भी कम खाते हैं… ताकि बार-बार जाना न पड़े। सरकारी पानी का टैंकर महीने में सिर्फ एक बार आता है। उसमें भी खारा पानी होता है। जब पीने के लिए पानी नहीं, तो नहाने के लिए कहां से मिलेगा। महीने में एक बार… और वो भी पीरियड के बाद ही नहाती हूं। पीरियड में तो नहाना जरूरी होता है न! लगता है… नमक में पैदा हुए हैं… और नमक में ही मर जाएंगे।’ स्याह कहानियों की सीरीज ‘ब्लैकबोर्ड’ में नमक की खेती करने वाले किसानों की कहानी। ये किसान 8 महीने तंबू में रहते हैं। महीनों नहा नहीं पाते। उनके पैरों की चमड़ी खराब हो जाती है और एक किलो नमक के सिर्फ 30 पैसे मिलते हैं। मैं गुजरात के सुरेंद्रनगर से करीब 70 किलोमीटर दूर ‘लिटिल रण ऑफ कच्छ’ में हूं। यहां देश का करीब 30 फीसदी नमक पैदा होता है। सुबह के 8 बजे ही लगभग 12 लाख एकड़ यानी 5,000 वर्ग किमी में फैले रण में सूरज सिर के ऊपर जलता हुआ दिखाई दे रहा है। इसी मैदान में रमिला अपनी मां सोनल के साथ नमक का ढेर समेट रही हैं। रमिला के पैरों में चप्पल और मोजे हैं, जबकि उनकी मां नंगे पैर लकड़ी के फावड़े से नमक समेट रही हैं। मेरे कुछ पूछने से पहले ही रमिला कहती हैं, ‘खाली पैर रहने पर तलवों में घाव हो जाता है। ये घाव सालों-साल नहीं सूखते। हमेशा खुजली और जलन बनी रहती है। कभी-कभी तलवा इतना नोच देती हूं कि खून आ जाता है। मन करता है, पैर काटकर फेंक दूं।’ ‘मां को तो नंगे पैर रहने की आदत हो गई है। मुझसे नहीं हो पाता। जूते पहनती हूं, तो उनमें नमक के मोटे दाने फंस जाते हैं। इससे और खुजली होने लगती है। इसलिए मोजे ही पहनती हूं। अब नमक पक चुका है। 15-20 दिन में पूरा खेत खाली हो जाएगा।’ रमिला बताती हैं, ‘साल के 12 में से 8 महीने हमें इसी नमकीन दलदले रण के बीच रहना पड़ता है। अगस्त-सितंबर आते-आते पूरा गांव तंबू लेकर यहीं आ जाता है। जब हम आते हैं, तो यह पूरा इलाका दलदल होता है। इसी में तंबू गाड़कर रहना पड़ता है।’ ‘नमक की खेती शुरू होने से पहले ही आंधी-तूफान, चिलचिलाती धूप और फिर शून्य डिग्री तापमान… हर मौसम की मार झेलनी पड़ती है।’ कब से नमक की खेती कर रही हैं?’ रमिला की जवाब देतीं उससे पहले ही उनकी मां सोनल बोल पड़ीं, ‘पैदा होते ही नमक के खेत में आ गए। रमिला को मैं अपनी पीठ पर साड़ी में बांधकर खेती करती थी। पति इतना शराब पीता था कि एक-एक रुपए की मोहताज रहती थी। जब ये 5-6 साल की हुई, तो मेरे साथ खेत में आने लगी। अब इसकी 4 महीने की बेटी है। इसी तंबू में ही पैदा हुई है। यहीं खेलते-कूदते बड़ी हो जाएगी और हमारी तरह खेत में नमक तैयार करने लगेगी।’ मां की बात सुनते ही रमिला तुरंत टोकती हैं, ‘नहीं चाहती हूं कि मेरे बच्चे भी नमक की खेती करें। इस खेती से जख्म के अलावा क्या मिलता है। अगर दूसरा काम होता, तो यहां यूं जिंदगी नहीं खपा रहे होते। हम तो साल का बड़ा हिस्सा इसी नमक में गुजार देते हैं। आप मेरे तंबू में चलिए, दिखाती हूं हम कैसे रहते हैं।’ ये बातें कर ही रही थीं कि 21 साल की रमिला की गोद में उनकी 4 महीने की बेटी आ जाती है। पड़ोसन अभी-अभी उसे तंबू से उठाकर लाई है। बातचीत के बीच रमिला उसे दूध पिलाने लगती हैं। कहती हैं, ‘हमें तो दूध भी नसीब नहीं होता। अब ये नवजात है, तो अपना दूध तो पिलाना पड़ेगा न… बहुत देर से भूखी होगी।’ उसके बाद रमिला मेरे साथ अपने तंबू की ओर चल पड़ती हैं। धूप और तेज होती जा रही है। रमिला चलते-चलते कहती हैं, ‘काम न करूं, तो मालिक दिहाड़ी काट लेगा। तेज धूप में काम रोकना पड़ता है। सफेद नमक पर धूप पड़ती है, तो और खतरनाक हो जाता है। हमें त्वचा और आंखों की बीमारी हो जाती है।’ तंबू के पास उनकी पड़ोसन बर्तन धो रही हैं। रमिला वहीं सोलर प्लेट की छांव में बेटी को खाट पर सुला देती हैं। खुद बैठते हुए कहती हैं, ‘यही हमारा ठिकाना है। रण में पानी का टैंकर 20-30 दिन में एक बार आता है। वही पानी पीना पड़ता है। जब पीरियड्स आता है, तभी हम महिलाएं नहाते हैं। पीने का पानी नहीं, तो नहाने का कहां से आएगा… आप यकीन नहीं करेंगे, हम कम खाते हैं, ताकि रात में ही शौच जाना पड़े।’ ‘रात में?’ ‘क्या करूं… हमारी भी तो इज्जत है। यहां दूर-दूर तक घास का तिनका नजर नहीं आएगा। दिन में कहां जाएं? कोई देख लेगा। इसलिए खाना भी कम खाते हैं, ताकि दिन में न जाना पड़े। बरसात में चूल्हे की लकड़ी भीग जाती है, तो भूखे रहना पड़ता है। उस समय आटा घोलकर पी लेते हैं। छप्पर से पानी टपकता है, तो रातभर जागकर गुजारनी पड़ती है। गोद में छोटा बच्चा है… कहीं कोई जानवर आकर उसे न ले जाए, यही डर लगा रहता है।’ तंबू के एक कोने में रखी गुदड़ियों की ओर इशारा करते हुए रमिला कहती हैं, ‘अभी जितनी गर्मी है, उससे भी ज्यादा कड़ाके की ठंड पड़ती है। पेट की खातिर रहना तो है ही यहांं। यही गुदड़ियां ओढ़कर रात काटती हूं, फिर भी ठंड से कांपती रहती हूं। उस वक्त मोबाइल पर देखती हूं- देश में क्या-क्या हो रहा है… हमारी जिंदगी तो पहले जैसी थी, आज भी वैसी ही है। हां, कुछ साल पहले तक जेनरेटर चलाकर रहना पड़ता था। जमीन से पानी खींचते थे, बल्ब जलाना पड़ता था। अब सरकार ने सोलर लगवा दिए हैं।’ लेकिन सोलर सिस्टम खराब हो जाए, तो मोमबत्ती भी यहां नहीं टिकती। तेज हवा चलती है। तब टॉर्च की रोशनी में खाना बनाना पड़ता है।’ जिस खेत में रमिला काम कर रही हैं, वहां मालिक जोर-जोर से आवाज देने लगता है। बातचीत करते-करते वह नमक का ढेर लगाने वापस चली जाती हैं। खेत में पहुंचते ही उनकी मां सोनल कहती हैं कि जल्दी-जल्दी काम खत्म करो। बात करने से थोड़े न पेट भरेगा। धूप तेज हो रही है, चमड़ी जलने लगेगी। सोनल की उम्र 60 के करीब लगती है। पूछने पर तंज कसते हुए कहती हैं- ‘आपको तो हर चीज खाने-पीने को मिलती होगी। हमें दूध-दही नसीब नहीं होता। बस पेट भरने के लिए जो मिल जाए, खा लेते हैं। मेरी उम्र 45 साल है। अब 8 महीने घर से दूर रहूंगी। कड़कड़ाती धूप में नमक पकाती हूं, तो उम्र तो घटेगी ही न। हाथ-पैर की चमड़ी में बीमारी फैल गई है। जैसे मछली की चमड़ी उखड़ती है, वैसे ही हमारे हाथ-पैर की चमड़ी उखड़ती है। खुजली भी बनी रहती है। हर साल का यही हाल है।’ अब रमिला और सोनल खेत में नमक का ढेर खींचने लग जाती हैं। तीन-चार लोग ट्रैक्टर और फावड़े से ढेर जमा रहे हैं। यहीं पास में जगदीश सवारियां ट्रैक्टर चला रहे हैं। वे कहते हैं, ‘मेरी उम्र देख लीजिए- 30 साल का हूं। आप भी करीब 30 के होंगे, लेकिन हम दोनों में कितना फर्क दिख रहा है। इसी से आप हमारी मेहनत समझ सकते हैं। 10वीं तक पढ़ा हूं। एक महीने पहले तक मेरी गर्भवती पत्नी इसी तंबू में रहती थी। अचानक उसे दर्द हुआ, तो एंबुलेंस बुलाकर अस्पताल ले गया। बच्चा होने के बाद से गांव में है। कुछ दिन बाद फिर यहीं आ जाएगी। अभी बच्चे को यहां नहीं ला रहा। कुछ हो गया तो… आप देख ही रहे हैं कि कितनी गर्मी है। बाद में बच्चा भी आएगा और मां उसे पीठ पर बांधकर काम करेगी। ऐसे ही हमारे बच्चों की जिंदगी नमक के खेत से शुरू होती है। अब नमक तैयार हो चुका है। कुछ समय बाद रण में पानी भर जाएगा, इसलिए नमक को इकट्ठा करके शहर में स्टॉक किया जा रहा है। अगर रोज खेत में फावड़ा और दंतालो नहीं चलाओ, तो नमक खराब हो जाता है। सेठ से कर्ज लेकर खेती करता हूं। नुकसान हो गया, तो कैसे चुकाऊंगा।’ सामने दो बड़े टैंकर ट्रक खड़े हैं। इनमें नमक बनने के बाद बचा हुआ पानी खींचा जा रहा है। जगदीश कहते हैं- यह पानी फैक्ट्री में जाता है। इससे केमिकल बनता है। एक टैंकर के हजार रुपए मिलते हैं। करीब 50 फीट गहराई से बोरवेल के जरिए पानी निकाला जाता है। इसी पानी में नमक होता है, जिसे क्यारियां बनाकर जमाते हैं और नमक तैयार करते हैं।’ कितना मुनाफा होता है? जगदीश हंसते हुए कहते हैं, ‘यह पूरा रण पाटड़ी के दरबार जैसा है। हम सेठ से खेत लीज पर लेकर नमक जमाते हैं। हर साल अलग-अलग जगह पर तीन-चार बोरवेल डालने पड़ते हैं। जहां ज्यादा पानी निकलता है, वहीं खेती करने लगते हैं। एक किलो नमक के करीब 30 पैसे मिलते हैं। इससे क्या होने वाला है? हम सेठ से ही पैसा लेकर खेती करते हैं। फिर जो नमक बिकता है, उसका आधा हिस्सा सेठ को देना होता है। एक सीजन में मुश्किल से 50 हजार रुपए बचते हैं। वो भी खाने-पीने में खर्च हो जाते है। फिर अगले सीजन में सेठ से दोबारा कर्ज लेना पड़ता है। ऐसे ही यहां जिंदगी चलती है।’ इतनी मुश्किल है, तो क्यों करते हो नमक की खेती? पूछते ही जगदीश कहते हैं, ‘हम लोगों के पास खेती की एक धुर जमीन भी नहीं है। फिर क्या करें? कोई दूसरा काम नहीं आता। पुरखों से यही काम सीखा है। मैं तो नमक के खेत में ही पैदा हुआ था। यहां पढ़ने का कोई साधन नहीं है। हम लोग सिर्फ 4 महीने ही गांव में रह पाते हैं, फिर 70 किलोमीटर दूर इस रण में आ जाते हैं। कुछ सालों से सरकार ने ‘बस वाला स्कूल’ शुरू किया है। यहां 7वीं तक के बच्चे पढ़ पाते हैं। इसके बाद पढ़ने का कोई साधन नहीं है। अब हम अपने बच्चों को शहर भेजने की सोच रहे हैं।’ धूप तेज हो चुकी है। मेरे लोकल साथी भरत भाई कहते हैं, ‘दूसरे तंबू में चलते हैं। 12 बजे के बाद यहां रुकना मुश्किल हो जाएगा।’ हम यहां से पास के दूसरे तंबू की ओर चल पड़ते हैं। यहां 15 साल का राकेश नमक के खेत में दंतालो नाम का एक औजार चला रहा है। उसके पैर में काला बूट है। वे कहते हैं, ‘खाली पैर नमक के खेत में चलेंगे, तो पैर सड़ जाएंगे। इसलिए जूते पहनने पड़ते हैं। नमक की खेती की वजह से पढ़ाई छोड़ दी। अब 8 महीने यही रहूंगा। पूरे खेत में दंतालो न चलाऊं, तो नमक जमकर पीला पड़ जाता है। फिर व्यापारी दाम नहीं देते। दंतालो चलाने से ही नमक छोटे-छोटे टुकड़ों में जमकर इकट्ठा होता है।’ राकेश के सामने ही खेत की मेड़ पर कालू सुरेला खड़े हैं। वह कहते हैं, ‘शुरू से हम लोग यही करते आ रहे हैं। दूसरा कोई काम करने का रास्ता नहीं है। इस इलाके में नमक की खेती और फैक्ट्री के अलावा कुछ नहीं है। इस तरह रण में करीब 4,800 से ज्यादा परिवार नमक की खेती करते हैं। हमने अपनी जवानी नमक में खपा दी। अब नहीं चाहते कि हमारी अगली पीढ़ी भी यही करे। इसमें पूरी जिंदगी तबाह हो जाती है। मुनाफा तो व्यापारियों को होता है। व्यापारी हमारा नमक 30 पैसे में खरीदकर उसे प्रॉसेस करके 30 रुपए में बेचते हैं। हमें मिलता है बस- बेउम्र बुढ़ापा। 40-45 की उम्र पार करते ही फेफड़ों की बीमारी हो जाती है। आंखों से कम दिखने लगता है। चमड़ी सूखने से शरीर काला पड़ जाता है। यही हमारी किस्मत है।’ सामने नजर डालने पर एक ‘बस स्कूल’ दिखाई देता है। मैं उसकी ओर चल पड़ता हूं। बिना इंजन की एक बस खड़ी है। इसमें 20 से ज्यादा बच्चे पढ़ाई कर रहे हैं। इसी में 10 साल की अरुणा भी पढ़ रही है। वह सहमी हुई आवाज में कहती है, ‘सर! मैं नहीं चाहती कि बड़ी होकर नमक की खेती करूं, इसलिए पढ़ रही हूं। मां-पापा को देखती हूं कि वे कितना दुख सहकर नमक पकाते हैं। अभी 7वीं में हूं। इसके बाद यहां पढ़ाई नहीं होती। इस ‘बस स्कूल’ में भी नामभर की पढ़ाई होती है। मैं क्या कर सकती हूं… कोई सुनने वाला नहीं है।’ अब धूप और तेज हो रही है। सफेद चमकते नमक की ओर देखना भी मुश्किल हो गया है। खेत में काम कर रहे सभी किसान अपने तंबुओं की ओर लौटने लगे हैं। मैं भी इन बच्चों की आंखों में नमक की खेती का स्याह भविष्य देखकर वहां से वापस चल पड़ता हूं। जाते-जाते मन में यही सवाल उठता है- शायद ही इन बच्चों के पढ़ने का सपना सच हो पाए। जिस नमक को हम खाते हैं, उसकी कितनी बड़ी कीमत ये किसान और उनके बच्चे अपनी जिंदगी से चुकाते हैं! —————————- 1- ब्लैकबोर्ड- भूख के बजाय, दवाओं के ट्रायल से मरना अच्छा:बच्चों को तो 25 लाख मिल जाएंगे; उन्हें रिसर्च के लिए खून चाहिए, हमें पैसा ‘किसे अच्छा लगता है कि वह पैसे के लिए अपनी जान की बाजी लगाए, लेकिन मुझे लगानी पड़ती है। अगर मर भी गई तो बच्चों को 20-25 लाख मिलेंगे। कम से कम उनकी जिंदगी तो बेहतर हो जाएगी। अभी तक खुद पर दवाओं के ट्रायल में 4 बार पास हुई हूं।’ पूरी स्टोरी यहां पढ़ें 2- ब्लैकबोर्ड-5 करोड़ मुआवजा शानो-शौकत में उड़ाया:3 करोड़ की जमीन खरीदी, 1 करोड़ का मकान; 80-80 लाख की शादियां- अब रोज कमाने से घर चल रहा एक सच्ची कहानी- ग्रेटर नोएडा के किसान रामेश्वर सिंह की। 12 एकड़ जमीन सरकार ने ली और बदले में उन्हें सवा 5 करोड़ रुपए दिए। पैसा खाते में आते ही जिंदगी बदल गई। पूरी स्टोरी यहां पढ़ें
Source link
ब्लैकबोर्ड- सिर्फ पीरियड्स में नहा पाती हैं महिलाएं:कम खाती हैं, ताकि शौच न जाना पड़े; बोलीं- नमक के खेत में ही पैदा हुए, इसी में मर जाएंगे
Leave a Comment
Leave a Comment















