ESIC स्टाफ नर्स भर्ती: हाईकोर्ट ने कहा- मेरिट में आए उम्मीदवार को मौका नहीं देना गलत, कैट का आदेश निरस्त

रायपुर। छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने कर्मचारी राज्य बीमा निगम (ESIC) की स्टाफ नर्स भर्ती प्रक्रिया से जुड़े एक महत्वपूर्ण मामले में अपना फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया है कि यदि किसी चयनित अभ्यर्थी ने नौकरी जॉइन नहीं की है या पद छोड़ दिया है, तो मेरिट सूची में उसके ठीक बाद वाले अगले नंबर के अभ्यर्थी को नियुक्ति का अवसर नहीं देना गलत है। हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने इस संबंध में केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (कैट) द्वारा दिए गए पूर्व के आदेश को निरस्त कर दिया है और मेरिट में अगले स्थान पर रहे अभ्यर्थी को नियुक्ति देने का निर्देश जारी किया है। यह फैसला सरकारी भर्तियों में रिक्त हुए पदों पर मेरिट आधारित दावेदारों के अधिकारों को लेकर एक महत्वपूर्ण कानूनी मिसाल कायम करता है।
इस मामले की सुनवाई छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के जस्टिस पार्थ प्रतीम साहू और जस्टिस सचिन सिंह राजपूत की डिवीजन बेंच के समक्ष हुई। पीठ ने ESIC की स्टाफ नर्स भर्ती में सामने आए विवाद की विस्तृत जांच की। मामला उस समय शुरू हुआ जब ESIC द्वारा स्टाफ नर्स के पदों पर भर्ती के लिए आयोजित प्रक्रिया में एक अभ्यर्थी का चयन तो हो गया, लेकिन उसने बाद में नौकरी जॉइन नहीं की या फिर चयन के बाद पद छोड़ दिया। इसके परिणामस्वरूप वह पद रिक्त हो गया। नियमानुसार, जब कोई चयनित अभ्यर्थी पद ग्रहण नहीं करता है, तो मेरिट सूची में उसके बाद वाले क्रम के उम्मीदवार को वह अवसर मिलना चाहिए। हालांकि, इस मामले में ऐसा नहीं किया गया और मेरिट में अगले नंबर पर रहे अभ्यर्थी को नियुक्ति का मौका नहीं दिया गया।
जब प्रभावित अभ्यर्थी ने इस अन्याय के खिलाफ कानूनी लड़ाई लड़ी, तो मामला पहले केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (कैट) पहुंचा। कैट ने इस मामले में अपना आदेश पारित किया था। लेकिन कैट के उस फैसले से संतुष्ट न होने पर मामला छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के समक्ष चुनौती दी गई। हाईकोर्ट की डिवीजन बेंच ने कैट के आदेश की वैधता और तर्कसंगतता की गहन समीक्षा की। पीठ ने पाया कि कैट का आदेश कानूनी सिद्धांतों और मेरिट के अधिकारों के अनुरूप नहीं है।
हाईकोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट रूप से कहा कि मेरिट सूची में शामिल किसी योग्य उम्मीदवार को उसका हकदार अवसर नहीं देना पूरी तरह से गलत है। अदालत ने माना कि चयन प्रक्रिया में मेरिट ही सर्वोच्च आधार होता है। यदि किसी कारणवश पहले चयनित अभ्यर्थी पद पर कार्यभार ग्रहण नहीं करता है, तो उस रिक्त पद को भरने के लिए प्रशासन को मेरिट सूची में ठीक उसके नीचे वाले अभ्यर्थी को बुलाना अनिवार्य है। ऐसा न करना न केवल नियमों का उल्लंघन है, बल्कि यह उस उम्मीदवार के साथ भी अन्याय है जिसने अपनी योग्यता के आधार पर वह स्थान हासिल किया था।
डिवीजन बेंच ने इसी आधार पर केंद्रीय प्रशासनिक अधिकरण (कैट) के फैसले को रद्द करते हुए उसे निरस्त कर दिया। हाईकोर्ट ने ESIC को निर्देश दिया कि वह मेरिट में अगले नंबर पर रहे अभ्यर्थी को स्टाफ नर्स के पद पर नियुक्ति प्रदान करे। अदालत का यह रुख इस बात को सुनिश्चित करता है कि सरकारी भर्तियों में पारदर्शिता और मेरिट से किसी भी प्रकार का समझौता नहीं किया जा सकता।
यह फैसला विशेष रूप से उन हजारों युवाओं के लिए राहत की खबर है जो विभिन्न सरकारी विभागों और संगठनों में भर्ती प्रक्रियाओं के पूरा होने के बाद मेरिट सूची में अपना नाम आने का इंतजार करते हैं। कई बार देखा जाता है कि चयनित उम्मीदवारों के नौकरी छोड़ने या जॉइन न करने के बाद पद रिक्त हो जाते हैं, लेकिन प्रशासनिक लापरवाही या अन्य कारणों से वेटिंग लिस्ट में मौजूद अभ्यर्थियों को समय पर अवसर नहीं दिया जाता। ऐसे में अभ्यर्थियों को वर्षों तक न्यायालयों और अधिकरणों के चक्कर लगाने पड़ते हैं।
छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट के जस्टिस पार्थ प्रतीम साहू और जस्टिस सचिन सिंह राजपूत की पीठ द्वारा दिया गया यह निर्णय ESIC जैसी केंद्रीय संस्थाओं की भर्ती प्रक्रियाओं में अनुपालन को लेकर एक कड़ा संदेश देता है। अदालत ने इस बात पर जोर दिया कि नियुक्ति देने वाली एजेंसियों की यह जिम्मेदारी है कि वे रिक्त हुए पदों को मेरिट के आधार पर ही भरे। मेरिट में आए उम्मीदवार को उसका हकदार मौका देना प्रशासनिक बाध्यता है, न कि कोई ऐच्छिक कदम।
इस प्रकार, हाईकोर्ट ने कैट के आदेश को निरस्त करके यह स्थापित किया है कि न्यायिक और अर्ध-न्यायिक मंचों को अभ्यर्थियों के मेरिट आधारित अधिकारों की रक्षा करनी चाहिए। ESIC स्टाफ नर्स भर्ती के इस मामले में अगले नंबर वाले अभ्यर्थी को नियुक्ति देने का आदेश अब कानूनी रूप से लागू होगा और संबंधित विभाग को इसका पालन करना होगा। यह निर्णय भविष्य में इसी तरह के अन्य मामलों में भी एक महत्वपूर्ण संदर्भ के रूप में काम करेगा।

