Wed, 07 Oct 20261:55 PM
Wed, Oct 7, 2026Updated 1:55 PM IST
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INDIA गठबंधन का चुनाव आयोग तक मार्च रोका गया: राहुल गांधी ने CEC ज्ञानेश कुमार से मुलाकात पर अड़े, कहा- सांसदों की अनदेखी देश का अपमान

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नई दिल्ली। लोकतंत्र की रक्षा और चुनाव प्रक्रिया में पारदर्शिता सुनिश्चित करने की मांग को लेकर INDIA गठबंधन के सांसदों द्वारा आयोजित ‘सेव डेमोक्रेसी मार्च’ को दिल्ली पुलिस ने चुनाव आयोग कार्यालय पहुंचने से पहले ही रोक दिया। इस दौरान कांग्रेस नेता राहुल गांधी मुख्य चुनाव आयुक्त (CEC) ज्ञानेश कुमार से व्यक्तिगत रूप से मिलने पर अड़े रहे। उन्होंने स्पष्ट तौर पर कहा कि निर्वाचित सांसदों की बात न सुनना केवल राजनीतिक दलों का नहीं, बल्कि पूरे देश और संविधान का अपमान है। यह विरोध प्रदर्शन विशेष सघन पुनरीक्षण (स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन-SIR) के विरोध और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर किया जा रहा था, जिसमें विपक्षी गठबंधन की 19 पार्टियों के सांसद शामिल हुए।

संसद भवन परिसर से शुरू हुआ यह मार्च जैसे ही निर्धारित मार्ग पर आगे बढ़ा, दिल्ली पुलिस ने बैरिकेडिंग करके इसे बीच रास्ते में ही रोक दिया। पुलिस प्रशासन का तर्क था कि चुनाव आयोग कार्यालय क्षेत्र में धारा 144 और सुरक्षा प्रतिबंध लागू हैं, जिसके कारण इतनी बड़ी संख्या में सांसदों के प्रवेश की अनुमति नहीं दी जा सकती। हालांकि, INDIA गठबंधन के नेताओं ने इस प्रतिबंध का कड़ा विरोध किया और वहीं सड़क पर बैठकर धरना देना शुरू कर दिया। इस दौरान पुलिस और सांसदों के बीच तीखी नोकझोंक भी देखने को मिली, लेकिन विपक्षी नेता अपने स्थान से हटने को तैयार नहीं थे। उनका कहना था कि वे संवैधानिक पद पर आसीन अधिकारी से मिलकर अपनी शिकायत दर्ज करना चाहते हैं, जो उनका लोकतांत्रिक अधिकार है।

प्रदर्शन के दौरान राहुल गांधी ने मीडिया से बातचीत में अपनी मांगों को दोहराया और सरकार तथा चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाए। उन्होंने कहा कि जब देश के चुने हुए प्रतिनिधि किसी गंभीर मुद्दे पर बात करने के लिए समय मांगते हैं और उन्हें वह अवसर नहीं दिया जाता, तो यह सीधे तौर पर जनता के जनादेश का अपमान है। राहुल गांधी ने विशेष सघन पुनरीक्षण (SIR) को लेकर चिंता व्यक्त करते हुए आरोप लगाया कि इसके जरिए मतदाता सूचियों में हेरफेर करने की आशंका है, जिससे निष्पक्ष चुनाव की प्रक्रिया खतरे में पड़ सकती है। उन्होंने कहा कि हम शांतिपूर्ण तरीके से अपनी बात रखना चाहते हैं, लेकिन अगर संस्थाएं दरवाजे बंद कर लेंगी, तो लोकतंत्र कैसे जीवित रहेगा?

इस मार्च में शामिल 19 विपक्षी पार्टियों के सांसदों ने एकजुटता प्रदर्शित करते हुए नारेबाजी की और हाथों में तख्तियां लेकर चुनाव आयोग की स्वतंत्रता की मांग की। इन पार्टियों में कांग्रेस, तृणमूल कांग्रेस, द्रमुक, समाजवादी पार्टी, राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (शरद पवार गुट), शिवसेना (उद्धव ठाकरे गुट), आप, झारखंड मुक्ति मोर्चा और अन्य क्षेत्रीय दल शामिल थे। सभी दलों का साझा आरोप है कि मौजूदा मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार की नियुक्ति और उनके कार्यकाल में हुई कई फैसलों पर विपक्ष को विश्वास नहीं है। उनका कहना है कि SIR जैसी प्रक्रियाएं बिना पर्याप्त पारदर्शिता और विपक्षी दलों की सहमति के लागू की जा रही हैं, जो संदेह पैदा करती हैं। इसलिए, वे CEC के इस्तीफे की मांग कर रहे हैं ताकि एक निष्पक्ष और सर्वमान्य व्यक्ति की नियुक्ति हो सके।

दिल्ली पुलिस ने भारी सुरक्षा बल तैनात करके मार्च को आगे बढ़ने से रोका और कई सांसदों को हिरासत में लेने की चेतावनी भी दी। हालांकि, वरिष्ठ सांसदों ने पुलिस अधिकारियों से वार्ता करके उन्हें समझाने का प्रयास किया कि यह कोई हिंसक प्रदर्शन नहीं, बल्कि एक संवैधानिक विरोध है। पुलिस ने अंततः कुछ वरिष्ठ नेताओं को प्रतिनिधिमंडल के रूप में चुनाव आयोग जाने की अनुमति देने पर विचार किया, लेकिन राहुल गांधी सहित कई नेताओं ने इस प्रस्ताव को तब तक स्वीकार नहीं किया जब तक कि पूरी तरह से स्पष्ट आश्वासन न मिल जाए। इस गतिरोध के कारण संसद से लेकर चुनाव आयोग तक का मार्ग काफी देर तक बाधित रहा और यातायात व्यवस्था भी प्रभावित हुई।

विपक्षी दलों का मानना है कि SIR के तहत मतदाता सूचियों का जो सघन पुनरीक्षण किया जा रहा है, उसमें लाखों नाम काटे जाने या जोड़े जाने की संभावना है, जिसका कोई सार्वजनिक ऑडिट या पारदर्शी तंत्र उपलब्ध नहीं कराया गया है। उनका तर्क है कि ऐसे संवेदनशील मामले पर चुनाव आयोग को विपक्षी दलों को विश्वास में लेना चाहिए था, लेकिन ऐसा नहीं किया गया। यही कारण है कि आज 19 पार्टियों ने मिलकर सड़क पर उतरने का निर्णय लिया। प्रदर्शनकारी सांसदों ने कहा कि वे तब तक धरना जारी रखेंगे जब तक कि उनकी मांगों पर ठोस कार्रवाई नहीं होती या CEC से उनकी सीधी मुलाकात नहीं हो जाती।

इस घटनाक्रम ने एक बार फिर से विपक्ष और केंद्र सरकार तथा संवैधानिक संस्थाओं के बीच चल रहे तनाव को उजागर किया है। विपक्ष जहां लोकतांत्रिक संस्थाओं की स्वायत्तता और पारदर्शिता को लेकर चिंतित है, वहीं प्रशासन कानून-व्यवस्था और सुरक्षा नियमों का हवाला देकर विरोध प्रदर्शनों को नियंत्रित करने का प्रयास कर रहा है। फिलहाल, दोनों पक्षों के बीच गतिरोध बना हुआ है और यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या चुनाव आयोग या सरकार की ओर से इस मुद्दे पर कोई सकारात्मक पहल की जाती है या विपक्ष अपना आंदोलन और तेज करता है। इस पूरे प्रकरण में किसी भी प्रकार की हिंसा या अप्रिय घटना की खबर नहीं है, लेकिन राजनीतिक तापमान निश्चित रूप से बढ़ा हुआ है।