Iran Attack Israel Strategy; USA Saudi Arabia Gain Loss Analysis

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जून 2025- अमेरिका-ईरान में न्यूक्लियर डील पर बातचीत चल रही थी। ऐन मौके पर इजराइल ने ईरान के न्यूक्लियर प्रोग्राम को अपने लिए खतरा बताते हुए उस पर हमला कर दिया। अमेरिका भी इसमें शामिल हो गया। जबकि अमेरिकी खुफिया एजेंसियों को ईरान के न्यूक्लियर हथियार

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फरवरी 2026- अमेरिका और ईरान में दोबारा न्यूक्लियर डील पर बात हो रही थी, डील लगभग होने ही वाली थी। इजराइल और सऊदी अरब ने ट्रम्प को दोबारा ईरान पर हमले के लिए मना लिया। जानकारों मानते हैं कि एकबार फिर ट्रम्प, नेतन्याहू की जंग लड़ रहे हैं।

आखिर, नेतन्याहू ने ट्रम्प को ईरान के खिलाफ जंग में कैसे घसीटा, खामेनेई को मारने से इजराइल को क्या फायदा, भास्कर एक्सप्लेनर में पूरी कहानी…

सवाल-1: नेतन्याहू ने ट्रम्प को ईरान पर हमले के लिए कैसे तैयार किया? जवाब: नेतन्याहू करीब 2 दशक से यह कहते आ रहे हैं कि ईरान न्यूक्लियर हथियार बनाने की कगार पर है, जो इजराइल के लिए खतरनाक है। बीते साल 4 फरवरी 2025 को इजराइली पीएम नेतन्याहू, ट्रम्प से मिलने अमेरिका पहुंचे थे। इसी मुलाकात के बाद ईरान पर इतने बड़े हमले की पृष्ठभूमि तैयार हुई…

  • इस दौरान इजराइली खुफिया विभाग ने अमेरिका को मैसेज दिया कि ईरान परमाणु बम बनाने की तैयारी कर रहा है। 31 मार्च 2025 को आई इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एजेंसी यानी IAEA की रिपोर्ट में कहा गया कि ईरान ने 60% तक प्योरिटी वाला यूरेनियम बना लिया है। हालांकि इसमें यह भी कहा गया कि ईरान छिपकर कोई न्यूक्लियर वेपन प्रोग्राम नहीं चला रहा है।
  • अमेरिकी खुफिया एजेंसियों ने भी कहा कि ईरान परमाणु बम बनाने की कोशिश नहीं कर रहा था। जून 2025 में IAEA के चीफ राफेल ग्रॉसी ने भी बयान दिया कि उनके पास कोई ठोस सबूत नहीं है कि ईरान का कोई न्यूक्लियर हथियार बनाने का प्रोग्राम या प्लान है।19 जून को IAEA चीफ राफेल ग्रॉसी ने कहा, ‘हमने कभी भी यह नहीं कहा था कि ईरान परमाणु हथियार बना रहा है।’
  • इधर नेतन्याहू, ईरान पर हमला करने पर आमादा थे। जबकि अमेरिका ईरान से न्यूक्लियर डील पर बात कर रहा था। ट्रम्प नहीं चाहते थे कि इजराइल, ईरान पर हमला करे और डील पर इसका असर पड़े।
  • न्यूयॉर्क टाइम्स के मुताबिक, ‘मई में ट्रम्प ने नेतन्याहू को फोन पर चेतावनी भी दी। अपने एक सहयोगी से कहा कि नेतन्याहू उन्हें मिडिल-ईस्ट में एक बड़े युद्ध में घसीटने की कोशिश कर रहे हैं, जबकि उन्होंने अमेरिका की जनता से वादा किया था कि वे अमेरिका को किसी भी जंग से दूर रखेंगे। महीनों तक वे यह सोचते रहे कि नेतन्याहू का गुस्सा कैसे कंट्रोल किया जाए।’
  • ‘जब न्यूक्लियर डील पर बातचीत आगे नहीं बढ़ी, तो इजराइलियों ने ट्रम्प को यकीन दिलाया कि सैन्य विकल्प खोलने से ईरान के साथ डील आसान हो जाएगी। नेतन्याहू बिना अमेरिका की मदद के भी पूरे ईरान पर एक बड़े हमले की तैयारी में थे। ट्रम्प प्रशासन भी नेतन्याहू को रोकने में सक्षम नहीं था। ऐसे में ट्रम्प को उनका समर्थन करना पड़ा।’
  • ‘9 जून 2025 को नेतन्याहू ने ट्रम्प को फोन पर कहा था- मिशन शुरू हो गया है। हमारी सेना ईरान के अंदर मौजूद है। फोन कटने के बाद ट्रम्प ने अपने साथ मौजूद लोगों से कहा- मुझे लगता है, हमें इजराइल की मदद करनी होगी।’18 जून 2025 को जंग के पांचवें दिन इजराइल के तेल अवीव में दो बड़े बोर्ड लगाए गए, जिन पर ट्रम्प की तस्वीर के साथ लिखा था- ‘मिस्टर प्रेसिडेंट, फिनिश द जॉब!’
  • कुछ रिपोर्ट्स में कहा गया कि इजराइल किसी भी कीमत में ईरान और अमेरिका के बीच समझौता नहीं चाहता था। इसलिए ऐन मौके पर हमला कर दिया, ताकी बातचीत बिगड़ जाए। अगर ईरान और अमेरिका के बीच डील हुई तो ईरान को कई कॉमर्शियल फायदे मिल सकते थे।
  • 13 जून 2025 को इजराइल के हमला शुरू करने के बाद ट्रम्प ने शुरुआत में इससे दूरी बनाए रखी, लेकिन जब इजराइल को जंग में ईरान पर शुरुआती बढ़त मिली तो ट्रम्प खुलेआम उनके पक्ष में आ गए।
  • न्यूयॉर्क टाइम्स के मुताबिक, जब ट्रम्प ने अपने पसंदीदा फॉक्स न्यूज चैनल पर इजराइली हमले की तस्वीरें देखीं, तो इसका क्रेडिट लेने से खुद को रोक नहीं पाए। आखिर में 22 जून 2025 को उन्होंने भी B-2 बॉम्बर से ईरान के न्यूक्लियर ठिकानों पर हमले का आदेश दे दिया।

अमेरिकी हमलों में ईरान के न्यूक्लियर ठिकानों को काफी नुकसान पहुंचा। वह न्यूक्लियर हथियार बनाने के लिए जरूरी यूरेनियम जुटाने के टारगेट से भी काफी साल पीछे चला गया था। इसके बाद ईरान और अमेरिका में दोबारा न्यूक्लियर डील पर बात शुरू हुई, लेकिन इस बार नेतन्याहू ने ईरान की मिसाइल्स के खतरे का जिक्र भी शुरू कर दिया।

सवाल-2: जब ईरान के न्यूक्लियर ठिकाने तबाह, तो ट्रम्प ने दोबारा हमला क्यों किया? जवाब: जून में अमेरिकी हमलों के बाद कुछ रिपोर्ट्स में कहा जाने लगा कि ईरान का न्यूक्लियर प्रोग्राम पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। अक्टूबर 2025 में नेतन्याहू ने ईरान से एक और खतरा बताया।

उन्होंने कहा, ‘लोगों को इस पर भरोसा नहीं होता, लेकिन ईरान 8 हजार किमी रेंज वाली इंटर-कॉन्टिनेंटल बैलिस्टिक मिसाइल्स डेवेलप कर रहा है। ईरान किसी भी अमेरिकी शहर को निशाना बना सकता है।’

इसके बाद ट्रम्प भी यही दावा दोहराने लगे। जबकि ईरान ने इससे लगातार इनकार किया। वह अमेरिका के साथ न्यूक्लियर डील और अपने मिसाइल प्रोग्राम को लेकर भी बातचीत कर रहा था।

फरवरी की शुरुआत में ट्रम्प प्रशासन ने ईरान के साथ संघर्ष से पीछे हटकर कूटनीतिक बातचीत से रास्ता निकालने के संकेत दिए थे। दोनों देशों के के बीच डील पर दोबारा बातचीत शुरू हुई।

विशेष दूत स्टीव विटकॉफ और ट्रंप के दामाद जेरेड कुशनर ईरान के न्यूक्लियर और मिसाइल प्रोग्राम को लेकर ईरानी नेताओं से बातचीत कर रहे थे। ओमान इसकी मध्यस्थता कर रहा था।

जेनेवा में 26 फरवरी को डील पर तीसरे दौर की बात हुई। 28 फरवरी को मध्यस्थता कर रहे ओमान के विदेश मंत्री बदर अलबुसैदी ने कहा, ‘मुझे लगता है शांति समझौता हमारी पहुंच में है। हमने समझौते की तरफ काफी प्रगति की है। ईरान ने न्यूक्लियर बम के लिए जरूरी सामग्री त्यागने पर प्रतिबद्धता जताई है। उनके पास इसका कोई स्टोरेज नहीं है। अगर आप संवर्धित मटेरियल यानी यूरेनियम स्टोर नहीं कर सकते, तो बम भी नहीं बना सकते।’

अलबुसैदी ने ये भी कहा, ‘मीडिया ने इस तथ्य को काफी हद तक नजरअंदाज किया है। मैं एक मध्यस्थ के नजरिए से इसे साफ करना चाहता हूं।’

अगले हफ्ते वियना में डील की तकनीकी शर्तों पर बाकी बातचीत होनी थी। इसके पहले ही इजराइल और अमेरिका ने ईरान पर हमला कर दिया। ये दूसरी बार है, जब डील पर निर्णायक बातचीत से ऐन पहले ईरान पर हमला बोल दिया गया।

ओमान के विदेश मंत्री बदर अलबुसैदी ने कहा है कि ईरान न्यूक्लियर डील और अपने मिसाइल प्रोग्राम पर भी समझौते के लिए तैयार था।

ओमान के विदेश मंत्री बदर अलबुसैदी ने कहा है कि ईरान न्यूक्लियर डील और अपने मिसाइल प्रोग्राम पर भी समझौते के लिए तैयार था।

अमेरिकी अखबार वाशिंगटन पोस्ट के मुताबिक, मामले से परिचित 4 लोगों ने बताया कि इजराइल और सऊदी अरब हफ्तों से ईरान पर अमेरिका के हमले की पैरवी कर रहे थे।

रिपोर्ट के मुताबिक, ‘सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान यानी MBS सार्वजानिक तौर पर तो मामले के कूटनीतिक समाधान की बात कह रहे थे, लेकिन पिछले महीने उन्होंने ट्रम्प को कई निजी कॉल किए और ईरान पर हमले की वकालत की। नेतनयाहू ने भी ईरान पर अमेरिका से हमला करवाने का अपना लंबे समय से चला आ रहा अभियान जारी रखा।’

MBS ने अमेरिकी ऑफिसर्स से बातचीत में कहा कि अगर अमेरिका ने अभी कार्रवाई नहीं की, तो ईरान और भी खतरनाक बनकर उभरेगा। MBS के भाई और सऊदी के डिफेंस मिनिस्टर खालिद बिन सलमान ने भी जनवरी में अमेरिकी ऑफिसर्स के साथ सीक्रेट मीटिंग्स में कहा कि हमला न करने से नुकसान होगा।

सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने ईरान के हमलों के खिलाफ चेतावनी दी है।

सऊदी अरब के क्राउन प्रिंस मोहम्मद बिन सलमान ने ईरान के हमलों के खिलाफ चेतावनी दी है।

नेतन्याहू और MBS की इन कोशिशों के बीच 19 फरवरी को ट्रम्प ने कहा कि 10 दिन के अंदर या तो डील होगी या ईरान इसका अंजाम भुगतेगा। जबकि इससे पहले ट्रम्प खुद कह चुके थे कि जून में हुए हमलों में ईरानी न्यूक्लियर प्रोग्राम पूरी तरह खत्म हो गया था।

बीते शुक्रवार को ट्रम्प अपने मार-ए-लागो रिसॉर्ट में थे। वहां मौजूद लोगों ने बताया कि ट्रम्प थके लग रहे थे। फिर वो ईरान पर हमले की घोषणा वाला वीडियो रिकॉर्ड करने अपने प्राइवेट रूम में चले गए। शनिवार को ट्रम्प ने ईरान पर बड़े हमले का आदेश दे दिया।

सवाल-3: तो क्या ईरान के खिलाफ नेतन्याहू की निजी लड़ाई है? जवाब: शुरुआत से ही अमेरिकी जनता और अमेरिका के ज्यादातर सांसद ईरान पर अमेरिकी हमले के खिलाफ रहे हैं। मैरीलैंड यूनिवर्सिटी के हालिया सर्वे में केवल 21% अमेरिकियों ने कहा कि वे ईरान के साथ युद्ध के पक्ष में हैं।

अमेरिकी सांसद रशीदा तलैब कहती हैं, ‘ट्रम्प अमेरिकी राजनीति के एलीट क्लास के लोगों और इजराइली रंगभेदी सरकार की हिंसक कल्पनाओं के आधार पर काम कर रहे हैं, और उन ज्यादातर अमेरिकियों की अनदेखी कर रहे हैं जो साफ तौर पर कहते हैं कि अब और युद्ध नहीं चाहिए।’

ट्रम्प ने अपने दूसरे कार्यकाल की शुरुआत से ‘अमेरिका फर्स्ट’ पॉलिसी की बात कही है, जिसमें पुराने दौर की तरह अमेरिका को युद्धों में घसीटने के बजाय तरक्की पर फोकस है।

वहीं इजराइल और नेतन्याहू के पास इस जंग के पीछे दो बड़े ऑब्जेक्टिव थे..

1. अमेरिका और ईरान के बीच डील रोकना

  • विदेशी मामलों के जानकार JNU के प्रोफेसर राजन कुमार कहते हैं कि इजराइल नहीं चाहता था कि अमेरिका और ईरान के बीच रिश्ते बेहतर हों। ये ईरान पर हमले का सही समय था, क्योंकि अभी वह बहुत कमजोर है, अमेरिका ने उस पर कई बैन लगाए हैं।
  • अगर ईरान और अमेरिका के बीच डील होती, तो ये बैन हटाए जाते, साथ ही ईरान को कई कॉमर्शियल फायदे मिल सकते थे। इसलिए इजराइल चाहता था कि अमेरिका भी ईरान पर हमला कर दे, ताकि ये डील न हो सके।
  • ब्रिटिश अखबार ‘द गार्जियन’ की एक खबर के मुताबिक, एक इजराइली ऑफिसर ने कहा था कि इजराइल का पूरा ऑपरेशन शुरुआत से इस बात पर टिका था कि अमेरिका किसी न किसी समय ईरान के खिलाफ जंग में शामिल हो।

2. मिडिल ईस्ट में सबसे बड़े प्रतिद्वंद्वी ईरान को कमजोर करना

  • इजराइल ने फिलिस्तीन में हमास को लगभग खत्म कर दिया है। ज्यादातर अरब देश भी इजराइल-फिलिस्तीन संघर्ष में ऐतिहासिक पैटर्न के उलट फिलिस्तीन के साथ नहीं खड़े हुए। उनका रोल दोनों पक्षों में सीजफायर करवाने तक सीमित रहा।
  • हमास के अलावा इजराइल को लेबनान के हिजबुल्लाह और यमन के हूती जैसे मिलिटेंट ऑर्गेनाइजेशन से खतरा है, लेकिन ये भी काफी कमजोर हो गए हैं।मिडिल ईस्ट में ईरान अकेला ऐसा देश है, जो इजराइल के लिए चुनौती बना हुआ है। ईरान हूती और हिजबुल्लाह को भी इजराइल के खिलाफ संघर्ष में पैसे और हथियारों से मदद करता रहा है।
  • ऑब्जर्वर रिसर्च फाउंडेशन के सीनियर फेलो सुशांत सरीन कहते हैं कि इजराइल का प्राइमरी ऑब्जेक्टिव ईरान को कमजोर करना था। ईरान की सत्ता पर इस्लामिक मुल्लाओं की जगह इजराइल से अच्छे रिश्ते रखने वाली या कम से कम उसे दुश्मन न मानने वाली सरकार आ जाए, तो सोने पर सुहागा होगा।
इजराइल-अमेरिका ने पिछले एक दिन में ईरान पर 1,200 से ज्यादा बम गिराए हैं। इनमें सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत हो गई है।

इजराइल-अमेरिका ने पिछले एक दिन में ईरान पर 1,200 से ज्यादा बम गिराए हैं। इनमें सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत हो गई है।

सवाल-4: इस जंग से इजराइल को ज्यादा फायदा या अमेरिका को? जवाब: अगर ईरान से अमेरिका के संबंध बेहतर हो जाते, तो इजराइल को मिडिल ईस्ट में एक मजबूत टक्कर मिल सकती थी। अभी तक इजराइल, अमेरिका से सबसे ज्यादा आर्थिक और सैन्य सहायता पाने वाला देश है।

  • काउंसिल ऑन फॉरेन रिलेशंस यानी CFR की एक रिपोर्ट के मुताबिक, 1948 में इजराइल बनने के बाद से अब तक अमेरिका उसे 300 बिलियन डॉलर यानी 25 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा दे चुका है।
  • 2019 में साइन किए गए एक MoU के तहत इजराइल को अमेरिका से सालाना 3।8 बिलियन डॉलर यानी करीब 32 हजार करोड़ रुपए की सैन्य मदद मिलती है। यह इजराइल के कुल सैन्य बजट का लगभग 16% है
  • इसके अलावा हमास के इजराइल पर हमले के बाद अमेरिका एक कानून बनाकर अप्रैल 2024 तक उसे 1719 बिलियन डॉलर यानी करीब 115 लाख करोड़ रुपए दे चुका है।

वहीं खामेनेई के बाद ईरान में नई सत्ता आने से अमेरिका को भी फयदे हैं। मिडिल ईस्ट में कतर, इराक, सीरिया, जॉर्डन, कुवैत और सऊदी अरब जैसे देशों में अमेरिका ने अपने मिलिट्री बेस बनाए हुए हैं।

ईरान के कब्जे वाले लाल सागर के रूट्स के जरिए अमेरिका का तेल और बाकी चीजों का ट्रेड भी चलता है। ईरान अकेला ऐसा देश है, जहां अमेरिका का कोई बेस नहीं है। अगर ईरान में अमेरिका के मन मुताबिक सरकार आती है, तो पूरे मिडिल ईस्ट पर उसका कंट्रोल हो जाएगा।

सवाल-5: इस जंग में सऊदी जैसे अरब देशों ने ईरान का साथ क्यों नहीं दिया? जवाब: मिडिल ईस्ट के मुस्लिम देशों में सुन्नी-शिया बाइनरी है। सऊदी अरब और ईरान के बीच इन देशों की लीडरशिप को लेकर वर्चस्व की पुरानी लड़ाई है।

इसके अलावा सऊदी अरब, कतर, UAE जैसे सुन्नी बहुल अरब देशों से अमेरिका के सैन्य, आर्थिक और कूटनीतिक रिश्ते हैं। ईरान के कमजोर पड़ते ही इन देशों के अमेरिका से संबंध और बेहतर होंगे।

वहीं इस इलाके में ईरान के अलावा इराक, लेबनान और सीरिया ऐसे देश हैं, जो शिया बाहुल्य हैं। हालांकि ये देश खुद बेहद कमजोर हैं और अंदरूनी सत्ता संघर्ष से जूझ रहे हैं।

ईरान, जिन हूती और हिजबुल्लाह जैसे संगठनों को मदद करता रहा है, वो अलग-अलग समय पर बाकी इस्लामिक देशों के लिए खतरा बने रहे हैं।

एक और वजह ये भी है कि दुनिया के सभी इस्लामिक देशों में सिर्फ पाकिस्तान के पास न्यूक्लियर हथियार हैं। मिडिल ईस्ट के अरब देशों को अमेरिका ने सुरक्षा गारंटी दे रखी है, इसके बदले में उन्होंने न्यूक्लियर हथियार न रखने का वादा किया है। ऐसे में ये देश ईरान के न्यूक्लियर प्रोग्राम को खुद के लिए भी एक खतरे की तरह देखते हैं।

सवाल-6: क्या सुप्रीम लीडर खामेनेई को मार देने से ईरान-अमेरिका का मकसद पूरा हो जाएगा? जवाब: एक्सपर्ट्स का मानना है कि खामेनेई की हत्या करने से भी अमेरिका और इजराइल के लिए ईरान में सत्ता परिवर्तन करना आसान नहीं है…

  • सुशांत सरीन कहते हैं कि खामेनेई की हत्या से अमेरिका और इजराइल के खिलाफ ईरान में नफरत भी बढ़ेगी। ईरान की जनता, इजराइल के कहने पर सत्ता के खिलाफ नहीं खड़ी होगी, क्योंकि अभी तक के हमलों में 90% तक आम ईरानी लोग ही मारे गए हैं।
  • लंदन के रॉयल इंस्टीट्यूट ऑफ इंटरनेशनल अफेयर्स में मिडिल-ईस्ट प्रोग्राम की डायरेक्टर सनम वकील कहती हैं कि ऐसा नहीं है कि 86 साल की उम्र में खामेनेई को मार देने से ईरान में कोई सत्ता नहीं बचेगी। खामेनेई के बाद क्या होगा, इस पर पहले ही विचार किया जा चुका था।
  • ईरान के राजा रहे मोहम्मद रेजा शाह पहलवी के बेटे रजा पहलवी शासन करने लायक नहीं हैं। अभी तक कोई ऐसा विपक्ष सामने नहीं आया है, जो इजराइल अमेरिका के बूते तख्तापलट करने की स्थिति में हो।
  • बिना जमीनी सेना भेजे, सिर्फ हवाई हमलों से ईरान पर कंट्रोल नहीं किया जा सकेगा। इजराइल के लिए ईरान में जमीनी सेना भेजना लगभग नामुमकिन है।

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