7वीं सदी का एक किस्सा है। एक रात मालाबार के राजा चेरामन को सपना आया। उन्होंने देखा कि आसमान में चांद के दो टुकड़े हो गए हैं।
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अगले दिन राजा ने दरबार में ज्योतिषियों को बुलवाया और सपना समझने की कोशिश की, लेकिन वे संतुष्ट नहीं हुए। तभी अरब से आए कुछ मुस्लिम व्यापारी उनसे मिलने आ गए। राजा ने उन्हें अपने सपने के बारे में बताया।
व्यापारियों ने राजा को मक्का-मदीना के पैगंबर मोहम्मद के बारे में बताया और कहा कि यह उन्हीं का चमत्कार होगा। राजा ने कहा, ‘मैं पैगंबर से मिलना चाहता हूं।’
मुस्लिम व्यापारी ये सुन काफी खुश हुए और मक्का-मदीना जाने की तैयारी करने लगे। राजा ने भी अपने दरबारियों को राज-पाट का काम सौंप दिया। इसके बाद राजा, व्यापारियों के साथ समुद्र के रास्ते नाव पर सवार होकर मक्का के लिए निकल पड़े।
मक्का-मदीना पहुंचकर राजा पैगंबर मोहम्मद से मिले। कुछ समय उनके साथ रहे। वे यहां मौजूद दुनिया की पहली मस्जिद ‘अल-हरम’ में गए। पैगंबर से प्रभावित होकर राजा चेरामन ने इस्लाम अपना लिया और मुस्लिम बन गए। पैगंबर ने उन्हें नया नाम दिया- ‘ताजुद्दीन’। यानी ‘धर्म का मुकुट’।
राजा चेरामन अपने देश लौटने के लिए जमीनी रास्ते से रवाना हुए। लेकिन बीच रास्ते में ही उनकी तबीयत बिगड़ गई। ओमान पहुंचते ही उनकी मृत्यु हो गई।
बीमारी के दौरान राजा को पहले ही एहसास हो गया था कि वे जिंदा नहीं बचेंगे। इसलिए उन्होंने एक खत लिखा और इस्लामिक विद्वान मलिक बिन दीनार को सौंप दिया। दीनार कुछ वक्त बाद मालाबार पहुंचे। उन्होंने राजा चेरामन के अधिकारियों को खत सौंपा।
खत में राजा का आदेश था- ‘कोडंगलूर में वीरान पड़े एक बौद्ध विहार की जगह पर मस्जिद बनाई जाए।’
अधिकारियों और दीनार ने राजा के नाम पर 629 ईस्वी में चेरामन जुमा मस्जिद बनावई। यानी आज से 1400 साल पहले एक हिंदू राजा ने केरलम में भारत की पहली और दुनिया की दूसरी मस्जिद बनवाई थी और यहीं से केरलम में इस्लाम धर्म फैला।
अभी केरलम में चुनाव है और यहां की 140 में से 32 सीटों पर मुस्लिम विधायक हैं। यहां की 26.5% आबादी मुस्लिम है। यानी केरलम के चुनाव में मुस्लिम एक अहम कड़ी है।
आज इस स्टोरी में जानेंगे, भारत की इसी पहली मस्जिद की कहानी…

केरलम में मौजूद चेरामन जुमा मस्जिद, भारत की पहली मस्जिद है, जो 629 ईस्वी में बनवाई गई थी।
हिंदू राजा ने पैगंबर को अदरक का अचार दिया
चेरामन जुमा मस्जिद के वाइस प्रेसिडेंट बशीर भी हिंदू राजा चेरामन के मस्जिद बनवाने और पैगंबर मोहम्मद से मिलने की यही कहानी बताते हैं। राजा की इस यात्रा का जिक्र अरबी पांडुलिपि ‘किस्सत शकरवती फार्माद’ में भी मिलता है, जिसे ‘महान चेरा शासक की कहानी’ माना जाता है।
त्रावणकोर राजवंश की राज्यभिषेक परंपरा में भी चेरामन की मक्का-मदीना यात्रा के सबूत हैं। राज्याभिषेक में एक वाक्य बोला जाता रहा है- ‘मैं यह तलवार तब तक रखूंगा, जब तक मक्का गए चाचा वापस नहीं आ जाते।’ यहां चाचा राजा चेरामन को कहा गया है।
राजा की पैगंबर से मुलाकात का एक और दिलचस्प किस्सा है। पैगंबर के साथ रहने वाले इस्लामिक विद्वान अबू सईद अल खुदरी ने अपनी किताब ‘अल मुस्तदरक’ में इसका जिक्र किया- ‘भारत के एक राजा ने पैगंबर मोहम्मद को एक मर्तबान, यानी चीनी मिट्टी का बर्तन भेंट किया। इसमें अदरक का अचार था। पैगंबर ने इसे अपने साथियों में बांटा और मुझे भी एक टुकड़ा खाने को मिला।’

इस्लाम से पहले ईसाई धर्म पहुंचा केरलम
- करीब दो हजार साल पहले रोम के व्यापारियों को पता चला कि जून में अगर कोई नाव लाल सागर से निकले, तो भारत की ओर बहने वाली हवाएं उसे केवल 6 हफ्तों में मलाबार तट तक पहुंचा देती हैं। इससे पहले यही यात्रा कई महीनों में पूरी होती थी।
- दिसंबर आते-आते हवाएं दिशा बदल लेतीं और भारत से अरब की ओर बहने लगतीं।

- व्यापारियों को अपने देश लौटने के लिए 3 महीने का इंतजार करना पड़ा। इसी इंतजार के दौरान कई व्यापारियों ने यहीं बसना शुरू कर दिया। स्थानीय लोगों से रिश्ते बनाए। उनकी धार्मिक आस्था भी जड़ पकड़ने लगी। यानी ईसाई धर्म फैलने लगा।
- कुछ ही साल बाद 52 ईस्वी में केरलम में पहला चर्च ‘सेंट थॉमस साइरो मालाबार चर्च’ बना, जो आज के त्रिशूर जिले में मौजूद है।
मानसून पर सवार होकर केरलम पहुंचा इस्लाम
- 7वीं सदी की शुरुआत में पैगंबर मोहम्मद ने अरब में इस्लाम धर्म शुरू किया। धीरे-धीरे ये दुनिया के कई इलाकों तक पहुंचा।
- भारत भी इस्लाम पहुंचा, लेकिन घोड़े पर सवार होकर नहीं, बल्कि समुद्र के रास्ते नाव में बैठकर पहली बार भारत आया। जैसे ईसाई धर्म भारत पहुंचा।
- इतिहासकार सेबेस्टियन प्रेंज इस प्रक्रिया को ‘मानसून इस्लाम’ कहते हैं। उनके मुताबिक, यह वह इस्लाम था जो तलवार से नहीं, बल्कि हवाओं, व्यापार और रिश्तों के सहारे फैला।

नाव पर सवार होकर मुस्लिम व्यापारी अरब से केरलम पहुंचे।
- दरअसल, केरलम के मालाबार तट में मुस्लिम व्यापारी आने लगे। यहां वे व्यापार करते और कुछ वक्त ठहरते। धीरे-धीरे वे यहां रिश्ते भी बनाने लगे और बसने लगे।
- यहां बने नए समुदाय को आज मपिल्ला कहा जाता है। माना जाता है कि मपिल्ला शब्द ‘महा’ और ‘पिल्ला’ से मिलकर बना है, जिसका अर्थ ‘सम्मानित अतिथि’ या ‘दामाद’ होता है।
मुस्लिम महिलाएं भी पहनती हैं मंगलसूत्र
- उत्तर मालाबार में रहने वाले मपिल्ला समुदाय में ‘मरुमक्कथयम’ यानी मातृसत्तात्मक व्यवस्था थी, जहां परिवार और विरासत का फैसला महिला के वंश से होता था।
- ‘तरावड’ यानी पैतृक घर का मुखिया ‘करणवर’ होता था, जो आमतौर पर मामा होता था। विवाह के बाद भी महिला अपने मायके में रहती थी, जबकि उसका पति मेहमान की तरह आता-जाता था।
- धीरे-धीरे मपिल्ला समुदाय ने कुछ स्थानीय परंपराएं अपना ली, जो आज भी बरकरार हैं। यहां मुस्लिम महिलाएं मंगलसूत्र पहनती हैं। शादी के समय ‘कबूल’ दोहराने की रवायत भी नहीं है।
- निकाह से एक दिन पहले काजी लड़की के घर जाकर उसकी रजामंदी लेता है। निकाह वाले दिन केवल दूल्हा और दुल्हन के परिवार आमने-सामने होते हैं।
- दुल्हन के पिता कहते हैं कि मैं बेटी का इतनी मेहर के बदले में फलां से निकाह करवा रहा हूं, दूल्हा बोलता है कि इतनी मेहर के बदले मैं आपकी बेटी को स्वीकार करता हूं। इसके बाद दुआ होती है। इस तरह शादी हो जाती है।

2018 में कांग्रेस सांसद शशि थरूर केरलम में एक मुस्लिम जोड़े की शादी में गए। इसकी तस्वीर उन्होंने सोशल मीडिया पर पोस्ट करते हुए लिखा, ‘केरलम की मुस्लिम महिलाएं भी हिंदुओं की तरह मंगलसूत्र पहनती हैं।’
- मुस्लिम महिलाएं आमतौर पर बुर्के नहीं पहनतीं। हालांकि हिजाब में या सिर पर दुपट्टा लिए रहती हैं। वे दुकानें भी चलाती हैं और रात में अकेले आ-जा भी सकती हैं।
- जैसे उत्तर भारत में बच्चों की शिक्षा की शुरुआत एक संस्कार से होती है, वैसे ही यहां भी एक परंपरा है। गैर-मुस्लिम बच्चे भी स्कूल शुरू करने से पहले चेरामन मस्जिद में आकर इमाम का आशीर्वाद लेते हैं। इसे विद्यारंभम कहा जाता है।
- अरक्कल परिवार केरलम का पहला मुस्लिम राजवंश है। इसमें पुरुषों से ज्यादा महिलाएं शासक हुई हैं। जैसे- 1921-31 तक सुल्तान आयशा बीबी, 1946-57 तक सुल्तान आदिराज मरियम्मा बीबी, 1957-80 तक सुल्तान अमीना बीबी, 1998-06 तक सुल्तान आयशा मुत्थु…।
घोड़ों पर सवार होकर मुस्लिम उत्तर भारत पहुंचे
- जैसे दक्षिण भारत में इस्लाम समुद्र के रास्ते व्यापार के मकसद से आया, वैसा उत्तर भारत में नहीं हुआ। यहां इस्लाम घोड़ों पर सवार सेनाओं और युद्धों के जरिए आया।
- इतिहासकार रिचर्ड ईटन अपनी किताब ‘द राइज ऑफ इस्लाम एंड बेंगॉल फ्रंटियर’ में ‘कैवेलरी इस्लाम’ की थ्योरी देते हैं। इसके मुताबिक, यह ऐसा इस्लाम था, जो घुड़सवार सेनाओं के साथ आगे बढ़ा।
- 8वीं सदी की शुरुआत में इराक के गवर्नर हज्जाज ने दो सेनापतियों को अलग-अलग दिशाओं में भेजा। एक उत्तर-पूर्व की ओर और दूसरा दक्षिण-पूर्व की ओर।
- दक्षिण पूर्व की दिशा में भेजा गया सेनापति मुहम्मद बिन कासिम था। उसका लक्ष्य केवल जीत हासिल करना नहीं, बल्कि सत्ता पर काबिज होना भी था।
- साल 711 में मुहम्मद बिन कासिम लगभग 15 हजार घुड़सवारों के साथ सिंध की सीमा पर पहुंचा। यहां के राजा दाहिर से उसने जंग लड़ी।
- सिंध की लड़ाई में राजा दाहिर की मृत्यु हो गई। इसके साथ ही इस्लामिक शासन ने भारतीय उपमहाद्वीप में अपनी पहली मौजूदगी दर्ज की और यहीं उत्तर भारत में इस्लाम ने जड़े जमाईं।

उत्तर भारत में आने वाले मुस्लिमों ने तलवार और तोप के दम पर सत्ता हासिल की।
भारत की पहली मस्जिद का केरलम की राजनीति पर असर
- चेरामन जुमा मस्जिद का असर आज भी केरलम की राजनीति, समाज और कारोबार में दिखता है। राज्य की आबादी में 55% हिंदू, 26.5% मुस्लिम और 18.4% ईसाई हैं।
- इस कॉम्बिनेशन के चलते यहां की राजनीति कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट यानी UDF और लेफ्ट के लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट, यानी LDF के बीच झूलती है।
- 1982 से बीजेपी में यहां चुनाव लड़ रही है। लेकिन कोई खास हासिल नहीं कर पा रही। 2016 में एक विधानसभा सीट और 2024 में एक लोकसभा सीट जीत सकी। वोट शेयर मुश्किल से 16% पहुंचा।
- जिस कोडंगलूर इलाके में चेरामन जुमा मस्जिद है, वहां करीब 30% मुस्लिम आबादी है। यहां की 13 में से 12 सीटों पर LDF काबिज है।
- सेंटर फॉर पब्लिक पॉलिसी रिसर्च के मुताबिक, राज्य की 50 से 55 सीटों पर मुस्लिम वोटर्स निर्णायक हैं। इनमें से 25 से 30 सीटों पर इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के कैंडिडेट उतरते हैं। 2021 में मुस्लिम लीग के 15 कैंडिडेट जीते थे।
- कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी की मैगजीन मॉडर्न एशियन स्टडीज के एक आर्टिकल के मुताबिक, ‘केरलम में बीजेपी-संघ का केरलम में फोकस केवल चुनाव जीतने में नहीं, बल्कि लॉन्ग टर्म सोशल और कल्चरल बदलाव पर है। राज्य में करीब 45% आबादी मुस्लिम या ईसाई है। इसी के चलते बीजेपी-संघ यहां हिंदुत्व का माहौल बनाकर बाकी के 55% आबादी यानी हिंदुओं को लामबंद करना चाहती है।
उत्तर भारत की तरह केरल में नहीं चलती हिंदू-मुस्लिम पॉलिटिक्स
- केरल में लंबे समय से बाइपोलर चुनाव हो रहा है। बीजेपी इस बाइनरी को तोड़ना चाहती है, लेकिन अब तक वो असफल रही है। इसकी एक वजह मुस्लिम फैक्टर है।
- पॉलिटिकल एनालिस्ट सुमंत सी रमण बताते हैं- ‘केरल के लोगों को धर्म के आधार पर बांटना मुश्किल है, क्योंकि यहां इस्लाम आक्रांता के रूप में नहीं आया। यहां इस्लाम समुद्र के रास्ते व्यापार के लिए आया था।’
- हालांकि, हाल के दिनों में मुस्लिम पॉलिटिक्स में बदलाव हुआ है। वीकली ओपन मैगजीन के मुताबिक अब ज्यादातर मुस्लिम सीपीएम से अलग होकर कांग्रेस की तरफ शिफ्ट हो रहे हैं। क्योंकि उन्हें लगता है कि सीपीएम हिंदुओं पर फोकस कर रही है।
- केरल के गरीब हिंदू खुद में और मुस्लिमों के बीच गैप देख पा रहे हैं। उन्हें लग रहा है कि मुस्लिमों की स्थिति बेहतर है। इसलिए वे RSS की आइडियोलॉजी की तरफ शिफ्ट हो रहे हैं।
- लव जिहाद, केरल फाइल्स और हिजाब जैसे मुद्दों के बाद केरल के स्कूल-कॉलेजों में हिंदू-मुस्लिम पॉलिटिक्स पनप रही है। इसमें जेन Z वर्ग के स्टूडेंट्स शामिल हैं।
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References-
- ए कलचरल हिस्टरी ऑफ इंडिया-एल बाशम
- चेरामन जुमा मस्जिद: द फर्सट मॉस्क इन इंडिया-मो. कमरूल हसन
- चेरामन पेरुमल: बिटवीन लिजेंड ऐंड हिस्ट्री-पीटी पार्थासार्थी
- ए स्टोरी ऑफ सिविलाइजेशन वॉल्युम 1-विल ड्यूरंट
- द राइज ऑफ इस्लाम एंड बेंगॉल फ्रंटियर- रिचर्ड ईटन
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साल 1803 यानी आज से करीब 223 साल पहले। केरलम के चेरथला नगर में ऐझावा जाति की एक मजदूर महिला की झोपड़ी के सामने राजमहल से एक टैक्स जमा करने वाला पहुंचा। महिला ने उसे वहीं रुकने के लिए कहा और झोपड़ी में चली गई। कुछ मिनट बाद जब वह बाहर निकली, तो उसके सीने से दोनों स्तन कटे हुए थे। उसने खून से लथपथ स्तनों को एक पत्ते पर रखकर टैक्स कलेक्टर की तरफ बढ़ा दिए। पूरी खबर पढ़ें…















