Kerala Left Survives: Power Politics Over Ideology

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बात जुलाई-अगस्त 1959 की है। जगह थी दिल्ली में प्रधानमंत्री आवास और सुबह का वक्त। पीएम जवाहर लाल नेहरू, उनकी बेटी इंदिरा गांधी और दामाद फिरोज गांधी नाश्ता कर रहे थे। नेहरू थोड़े परेशान लग रहे थे। फिरोज के चेहरे पर भी तनाव था, लेकिन उस वक्त की कांग्रेस

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फिरोज ने इंदिरा की तरफ इशारा करते हुए कहा- ‘यह बिल्कुल भी सही नहीं है। आप लोगों को डरा रही हैं। आप फासीवादी हो।’ इतना सुनते ही इंदिरा भड़क गईं। उन्होंने कहा- ‘आप मुझे फासीवादी कह रहे हैं। मैं इसे बर्दाश्त नहीं करूंगी।’ वह उठकर कमरे से बाहर चली गईं।

इस किस्से का जिक्र स्वीडन के लेखक और जर्नलिस्ट बर्टिल फाक ने अपनी किताब ‘फिरोज द फॉरगॉटन गांधी’ में किया है।

दरअसल, तब नाश्ते की टेबल पर केरल, यानी अब के केरलम के सियासी हालातों की चर्चा हो रही थी। केरलम में वामपंथी सरकार बर्खास्त कर दी गई थी। फिरोज, इस फैसले के खिलाफ थे। उन्हें लगता था कि इंदिरा ने अपनी जिद पर लेफ्ट सरकार बर्खास्त की है।

ये दुनिया में कम्युनिस्टों की पहली चुनी हुई सरकार थी और अब 67 साल बाद देश में इकलौता केरलम ही है, जहां वामपंथी सरकार बची है। पश्चिम बंगाल में लगातार 34 साल राज करने वाली लेफ्ट का ना कोई सांसद है ना विधायक। त्रिपुरा में 25 साल सत्ता में रही लेफ्ट आज मुख्य विपक्षी पार्टी भी नहीं बची।

5 अप्रैल 1957, केरल के पहले सीएम के रूप में शपथ लेते हुए ईएमएस नंबूदिरीपाद।

5 अप्रैल 1957, केरल के पहले सीएम के रूप में शपथ लेते हुए ईएमएस नंबूदिरीपाद।

इलेक्शन एक्सप्लेनर में हम जानेंगे कि आखिर लेफ्ट केरलम में ही क्यों सर्वाइव कर रहा है…

शुरुआत भारत में लेफ्ट के जन्म से करते हैं…

17 अक्टूबर 1920 को उज्बेकिस्तान के ताशकंद में अमेरिकी और रूसी कम्युनिस्टों ने पहली बार भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (CPI) बनाने का ऐलान किया।

तब पहले विश्वयुद्ध के बाद ब्रिटेन मुसलमानों के ऑटोमन साम्राज्य के टुकड़े कर चुका था। तुर्की के खलीफा, यानी मुसलमानों की सबसे बड़ी धार्मिक और राजनीतिक सत्ता खत्म हो चुकी थी। भारत में खलीफा के समर्थन में खिलाफत आंदोलन चल रहा था। जैसे ही CPI बनाने का ऐलान हुआ, खिलाफत आंदोलन से जुड़े नौजवान बड़ी संख्या में इसमें शामिल हो गए।

इसके बावजूद भारतीय कम्युनिस्टों का कहना था कि पार्टी विदेश में बनी है, इसलिए आम लोग इससे नहीं जुड़ रहे। नतीजन 1925 में कानपुर में एक बार फिर कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया (CPI) बनाने का ऐलान हुआ। जल्द इससे गरीब और मजदूर जुड़ गए और अंग्रेजों के खिलाफ प्रदर्शन शुरू हो गए। नाराज अंग्रेजों ने 1934 में इस पर बैन लगा दिया।

1942 में भारत छोड़ो आंदोलन शुरू हुआ, लेकिन कम्युनिस्ट इसमें शामिल नहीं हुए। बदले में अंग्रेजों ने कम्युनिस्ट संगठनों से पाबंदी हटा ली। दरअसल, तब दूसरे विश्वुयुद्ध में कम्युनिस्टों का गढ़, यानी सोवियत संघ, ब्रिटेन के साथ मिलकर हिटलर से लड़ रहा था, इसलिए कम्युनिस्ट अंग्रेजों के खिलाफ आंदोलन नहीं करना चाहते थे।

अब बात केरलम की…

1956 में त्रावणकोर, कोचीन और मालाबार को मिलाकर एक नया राज्य बना- केरल। मार्च 1957 में पहली बार विधानसभा चुनाव हुए। 126 सीटों वालीं विधानसभा में कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ इंडिया यानी CPI को 60 सीट मिलीं। 5 निर्दलीय को मिलाकर उसने सरकार बना ली। ये दुनिया में वामपंथियों की पहली चुनी हुई सरकार थी।

ईएमएस नंबूदिरीपाद ने मुख्यमंत्री बनने के एक हफ्ते बाद ही दो बड़े कानून लागू किए। पहला- भूमि सुधार कानून और दूसरा- शिक्षा में सुधार को लेकर। भूमि सुधार कानून के बाद बटाईदार किसानों को जमीन खरीदने की छूट मिल गई। लैंडहोल्डिंग की लिमिट तय हो गई। वहीं, एजुकेशन बिल के जरिए प्राइवेट संस्थानों को रेगुलेट करने के लिए सख्त नियम बना दिए।

दोनों कानूनों से आम लोगों का एक बड़ा वर्ग खुश था, लेकिन कांग्रेस और इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग को ये बिल रास नहीं आए। केरलम के चर्च और नायर कम्युनिटी भी विरोध में उतर गए। दोनों के पास केरलम में सबसे ज्यादा स्कूल और चैरिटेबल ट्रस्ट थे।

इसी बीच केरलम के स्कूल-कॉलेजों से गांधी की तस्वीर हटाकर माओ और स्टालिन की तस्वीर लगाई जाने लगीं। कहा जाने लगा कि नंबूदिरीपाद की सरकार बनाने के लिए कम्युनिस्ट देशों ने फंड भेजे हैं।

केरलम के गांधी कहे जाने वाले मन्नथ पिल्लई की अगुआई में लाखों लोग सड़कों पर उतर गए। आंदोलन को दबाने के लिए पुलिस ने लाठीचार्ज किया। हजारों लोग जेल में डाल दिए गए। इसी बीच मछुआरे कम्युनिटी की एक प्रेग्नेट महिला की पुलिस लाठी चार्ज में जान चली गई। आंदोलन और भड़क उठा। जगह-जगह हिंसा होने लगीं।

साल 1958-59 केरल में पहली वामपंथी सरकार की नीतियों के खिलाफ भड़के आंदोलन में जान गंवाने वाले लोगों के परिजन।

साल 1958-59 केरल में पहली वामपंथी सरकार की नीतियों के खिलाफ भड़के आंदोलन में जान गंवाने वाले लोगों के परिजन।

इंदिरा गांधी सहित कांग्रेस के कई लोग केरलम की कम्युनिस्ट सरकार को बर्खास्त करना चाहते थे। उनके लिए ये आंदोलन एक मौके जैसा था, लेकिन पीएम नेहरू ऐसा करने के लिए तैयार नहीं थे। उनका मानना था कि चुनी हुई सरकार को बर्खास्त करने से दुनिया में अच्छा संदेश नहीं जाएगा।

2 फरवरी 1959 को इंदिरा गांधी कांग्रेस की राष्ट्रीय अध्यक्ष बनीं। इसके बाद वो केरलम गईं। वहां से लौटने के बाद उन्होंने अपनी रिपोर्ट प्रधानमंत्री नेहरू को सौंप दी। 31 जुलाई 1959 को केरलम सरकार बर्खास्त कर दी गई।

तब कम्युनिस्ट अखबार न्यू एज ने लिखा था- ‘जवाहरलाल नेहरू आपको इतिहास कभी माफ नहीं करेगा।’

1960 में केरलम में फिर से चुनाव हुए। कांग्रेस ने इंडियन मुस्लिम लीग के साथ गठबंधन कर लिया। फिरोज गांधी, इंदिरा के इस फैसले से खुश नहीं थे।

उन्होंने कांग्रेस सांसदों की एक मीटिंग में कहा- ‘कांग्रेस कहां है? कांग्रेस के सिद्धांत कहां हैं? क्या कांग्रेस इतनी नीचे गिर गई है कि हम सांप्रदायिक तत्वों, जातिवादी नेताओं और उन लोगों के इशारों पर चलने लगेंगे जो लोगों में धार्मिक भावनाएं भड़काते हैं।’

हालांकि, कांग्रेस ने प्रजा सोशिलिस्ट पार्टी और इंडियन यूनियन मुस्लिम लीग के साथ गठबंधन किया और चुनाव में 95 सीटें जीत ली, जबकि लेफ्ट 29 सीटों पर सिमट गई। प्रजा सोशिलिस्ट के पीए थानू पिल्लई सीएम बने, लेकिन दो साल बाद कांग्रेस ने थानू को राज्यपाल बनाकर खुद का मुख्यमंत्री बना दिया।

चीन की जंग के बाद दो धड़ों में बंट गया लेफ्ट

1962 की जंग में कम्युनिस्ट पार्टी के कई नेताओं को चीन का समर्थन करने के आरोप में जेल में डाल दिया गया। उसी दौरान कम्युनिस्ट पार्टी दो धड़ों में बंट गई। चीन की नीतियों का समर्थन करने वाले मार्क्सवादी कम्युनिस्ट पार्टी यानी CPI-M और सोवियत संघ का समर्थन करने वाले CPI बने रहे।

हालांकि, 1967 के चुनाव में लेफ्ट ने फिर से सत्ता में वापसी कर ली। तब CPI-M को 52 और CPI को 19 सीटें मिलीं। सीपीआई एम के नंबूदिरीपाद दूसरी बार सीएम बने। उसके बाद 1970 और 1978 के चुनाव में भी लेफ्ट की सरकार बनी।

जनवरी 1980 में लेफ्ट ने सात दलों को मिलाकर गठबंधन बनाया, जिसे लेफ्ट डेमोक्रेटिक फ्रंट यानी LDF कहा गया। लेफ्ट की तर्ज पर कांग्रेस ने भी एक गठबंधन बनाया, जिसे यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट यानी UDF कहा गया।

साल 1964, CPI (M) की स्थापना के दौरान बाएं से दूसरे नंबर पर ज्योति बसु (पश्चिम बंगाल के पूर्व सीएम) और दूसरी पंक्ति में बाएं से तीसरे नंबर पर केरल के पहले सीएम ईएमएस नंबूदिरीपाद।

साल 1964, CPI (M) की स्थापना के दौरान बाएं से दूसरे नंबर पर ज्योति बसु (पश्चिम बंगाल के पूर्व सीएम) और दूसरी पंक्ति में बाएं से तीसरे नंबर पर केरल के पहले सीएम ईएमएस नंबूदिरीपाद।

आखिर लेफ्ट का दबदबा केरलम में ही क्यों बचा है? 5 बड़ी वजहें…

1. भूमि सुधार आंदोलन : भूमिहीन किसान और मजदूर लेफ्ट की तरफ शिफ्ट हो गए

  • 1958 में सरकार ने लैंड रिफॉर्म बिल पेश किया। लैंडलॉर्ड कल्चर खत्म करके हर किसी के लिए एक निश्चित जमीन तय की गई।
  • भूमिहीन किसान और मजदूर जिन जमीनों पर मजदूरी करते थे, उन्हें उस जमीन को खरीदने की छूट मिल गई।

सीनियर जर्नलिस्ट नवीन जोशी बताते हैं- ‘लेफ्ट की सरकार ने गरीब और मजदूरों को राशन के बजाय जमीन का टुकड़ा दिया। कमाने का जरिया दिया। आय के संसाधनों पर हिस्सेदारी दी। इससे उनका झुकाव लेफ्ट की तरफ हो गया और आज भी वे उससे जुड़े हुए हैं।’

2. ट्रेड यूनियन बनाकर लेफ्ट ने लाखों मजदूरों को वोटर बना लिया

  • सत्ता में आने के बाद लेफ्ट ने ट्रेड यूनियन बनाया। मजदूरों के लिए न्यूनतम दिहाड़ी तय कर दी, जो बाकी राज्यों से ज्यादा है।
  • केरलम में लगभग हर सेक्टर यानी बंदरगाह, रबर, प्लांटेशन से लेकर सरकारी दफ्तरों में भी यूनियन की ही चलती है। ज्यादतर यूनियन लेफ्ट से जुड़े हैं।
  • ये संगठन चुनावों में घर-घर संपर्क करने के साथ-साथ बूथ मैनेजमेंट तक लेफ्ट की मदद करते हैं।
पिछले साल लेफ्ट से जुड़े ट्रेड यूनियन के सदस्यों ने केंद्र सरकार के खिलाफ केरल के अलग-अलग शहरों में प्रोटेस्ट किया था।

पिछले साल लेफ्ट से जुड़े ट्रेड यूनियन के सदस्यों ने केंद्र सरकार के खिलाफ केरल के अलग-अलग शहरों में प्रोटेस्ट किया था।

3. आइडियोलॉजी के बजाय पावर और पैसे के जरिए पॉलिटकल मैनेजमेंट

केरलम के सीनियर जर्नलिस्ट कैलाश के मुताबिक…

  • लेफ्ट ने आइडियोलॉजी के बजाय पॉलिटिकल मैनेजमेंट पर काम किया। पावर का इस्तेमाल करके अपने लोगों को सरकारी पदों पर बैठाया।
  • हर शहर में कोऑपरेटिव सोसाइटी बनाकर उससे लोगों को रोजगार दिया। बिना सरकारी टेंडर के ही लेफ्ट से जुड़ीं सोसाइटियों को काम मिल रहा है।
  • जो सरकारी कर्मचारी लेफ्ट को सपोर्ट करता है, उसे सरकार सपोर्ट करती है। उन्हें आसानी से छुट्टी मिलती है। काम का प्रेशर नहीं होता।

4. मुफ्त शिक्षा और प्राइवेट स्कूलों को भी सरकारी फंड देना

  • केरलम की लेफ्ट सरकार ने शुरुआत से ही एजुकेशन सेक्टर पर फोकस किया। खासकर गरीब और मजदूर वर्ग के लोगों के एजुकेशन के लिए।
  • 12वीं तक मुफ्त एजुकेशन के साथ-साथ किताबें और मिड डे मील मुहैया कराने की वजह से गरीब और मजदूर वर्ग के बच्चों ने स्कूल जाना शुरू कर दिया।
  • लेफ्ट सरकार ने प्राइवेट स्कूलों की तर्ज पर राज्य में एडेड स्कूलों की शुरुआत की। ये स्कूल प्राइवेट मैनेजमेंट चलाता है, लेकिन इसके लिए फंड सरकार देती है।
  • इस वजह से यहां एजुकेशन लगभग मुफ्त जैसा ही है। इस वजह से केरलम की लिटरेसी रेट करीब 94% है, जो देश में सबसे ज्यादा है।
  • हर विधानसभा में इंटरनेशनल स्तर के स्कूल खोलने की योजना शुरू की। इससे करीब 2.5 लाख बच्चे प्राइवेट स्कूलों से सरकारी स्कूल में आ गए।

5. लेफ्ट और कांग्रेस के बीच लड़ाई, कोई तीसरा विकल्प नहीं

पॉलिटिकल एक्सपर्ट और केरलम यूनिवर्सिटी के पूर्व वीसी प्रोफेसर जयप्रसाद के मुताबिक…

  • केरलम में हमेशा से बाइपोलर इलेक्शन होता रहा है। यानी लोग या तो कांग्रेस गठबंधन UDF को वोट करते हैं या लेफ्ट गठबंधन LDF को।
  • 2021 को छोड़कर 1982 से लेकर 2016 तक हर चुनाव में लेफ्ट गठबंधन और कांग्रेस गठबंधन के बीच सत्ता अदला-बदली होती रही।
  • कोई तीसरा विकल्प नहीं होने की वजह से लेफ्ट या तो सत्ता में रहता है या विपक्ष में। ये उसके सर्वाइवल की एक बड़ी वजह है।

केरल में तीसरा मोर्चा यानी बीजेपी के नहीं आने की एक वजह 30% आबादी वाली मुस्लिम कम्युनिटी भी है। दरअसल, उत्तर भारत की तरह केरल में मुस्लिम आक्रांता के रूप में नहीं आए। यहां वे कारोबारी बनकर आए थे। इसलिए यहां उत्तर भारत की तरह हिंदू-मुस्लिम पॉलिटिक्स नहीं हो पाती। यहां ध्रुवीकरण मुश्किल है।

साल 2016 पहली बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते हुए पिनाराई विजयन। 2021 में उन्होंने दूसरी बार सीएम पद की शपथ ली।

साल 2016 पहली बार मुख्यमंत्री पद की शपथ लेते हुए पिनाराई विजयन। 2021 में उन्होंने दूसरी बार सीएम पद की शपथ ली।

लेफ्ट के लिए इस बार का चुनाव मुश्किल क्यों हैं? 3 बड़ी वजह…

1. लोकसभा के हिसाब से 111 पर UDF आगे, LDF को महज 18 पर बढ़त

2. लोकल चुनावों में लेफ्ट वाले LDF को 30-35% तक नुकसान

  • 2025 में हुए स्थानीय चुनावों में UDF ने क्लीन स्वीप कर लिया। कुल 941 ग्राम पंचायतों में से 505 UDF को, 340 LDF को 26 NDA को मिलीं।
  • यानी 54% UDF को और 36% LDF को मिलीं। जबकि 2020 के चुनाव में UDF को 36% और LDF को 62% सीटें मिली थीं।
  • ब्लॉक लेवल पर 2020 में लेफ्ट ने 73% सीटों पर जीत हासिल की थी, लेकिन 2025 में वो घटकर 42% पर पहुंच गई। जबकि कांग्रेस वाला UDF 26% से 52% तक पहुंच गया।
  • शहरी इलाकों में भी लेफ्ट पिछड़ गई है। 2020 में 49% म्यूनिसिपल जीतने वाली लेफ्ट 2025 में 32% पर सिमट गई।
  • कुल मिलाकर लोकल चुनावों में लेफ्ट की सीटें 2020 के 41.2% से 2025 में 36.3% पर पहुंच गईं। यानी लेफ्ट की सीटों की हिस्सेदारी 4.9% घट गई।

3. तीसरे मोर्चे के रूप में बीजेपी की बढ़ती सेंधमारी

पॉलिटिकल एक्सपर्ट प्रोफेसर जयप्रसाद बताते हैं- ‘अब कांग्रेस और लेफ्ट का ट्रेडिशनल फॉर्म कमजोर पड़ रहा है। कम्युनिस्ट के बड़े-बड़े नेता पार्टी छोड़कर बीजेपी और कांग्रेस में जा रहे हैं। उनके खिलाफ करप्शन के चार्ज हैं। मुस्लिम माइनोरिटी कांग्रेस की तरफ जा रही है। ऐसे में इस बार का चुनाव लेफ्ट के लिए बहुत बड़ी चुनौती साबित होने वाला है।’

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