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Thu, Oct 8, 2026Updated 7:44 AM IST
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कुदरा में हेमू का 470वां विजय दिवस मनाया: वक्ताओं ने 22 युद्ध जीतने की बात कही, हेमू के आदर्शों पर चलने का आह्वान

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बिहार के कैमूर जिले के कुदरा स्थित लालापुर में अखिल भारतीय रौनियार वैश्य महासभा की ओर से हिंदुओं के अंतिम सम्राट माने जाने वाले हेमचंद्र विक्रमादित्य, जिन्हें लोकप्रिय रूप से हेमू के नाम से जाना जाता है, का 470वां विजय दिवस बड़े ही उत्साह और श्रद्धा के साथ मनाया गया। यह आयोजन कुदरा के शगुन लॉन में किया गया, जहाँ समाज के गणमान्य लोग, राजनीतिक हस्तियां और स्थानीय नागरिक बड़ी संख्या में उपस्थित थे। कार्यक्रम का उद्देश्य न केवल ऐतिहासिक स्मृति को ताजा करना था, बल्कि वर्तमान पीढ़ी को हेमू के त्याग, वीरता और प्रशासनिक क्षमता से अवगत कराना भी था।

इस महत्वपूर्ण ऐतिहासिक आयोजन की अध्यक्षता अखिल भारतीय रौनियार वैश्य महासभा के जिलाध्यक्ष राजदेव प्रसाद गुप्ता ने की। उनके कुशल मार्गदर्शन में कार्यक्रम की गरिमा बनी रही। वहीं, मंच का संचालन भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) के नेता मंगल गुप्ता ने किया, जिन्होंने अपने प्रभावशाली वाचन और ऐतिहासिक संदर्भों के माध्यम से उपस्थित जनसमुदाय को बांधे रखा। कार्यक्रम के दौरान मुख्य वक्ताओं ने हेमू के जीवन और उनकी उपलब्धियों पर विस्तार से प्रकाश डाला। उन्होंने विशेष रूप से इस तथ्य को रेखांकित किया कि हेमू ने अपने जीवनकाल में लगातार 22 युद्ध जीते थे, जो उनकी अद्वितीय सैन्य प्रतिभा और रणनीतिक सूझबूझ का प्रमाण है। वक्ताओं ने बताया कि हेमू का विजय अभियान केवल शक्ति प्रदर्शन नहीं था, बल्कि वह धर्म और न्याय की स्थापना के लिए संघर्ष कर रहे थे।

कार्यक्रम में उपस्थित वक्ताओं ने हेमू के आदर्शों पर चलने का स्पष्ट आह्वान किया। उन्होंने कहा कि आज के समय में जब समाज विभिन्न चुनौतियों का सामना कर रहा है, ऐसे में हेमू जैसे महानायकों के चरित्र और उनके कर्मों से प्रेरणा लेने की आवश्यकता है। हेमू का जीवन सादगी, शौर्य और दृढ़ निश्चय का प्रतीक है। वक्ताओं ने जोर देकर कहा कि हेमू ने जिस प्रकार प्रतिकूल परिस्थितियों में भी धैर्य और पराक्रम का परिचय दिया, वह आज की युवा पीढ़ी के लिए एक अनुकरणीय उदाहरण है। उन्होंने समाज से अपील की कि वे केवल विजय दिवस मनाने तक सीमित न रहें, बल्कि हेमू द्वारा स्थापित मूल्यों को अपने दैनिक जीवन और सामाजिक व्यवहार में भी अपनाएं।

ऐतिहासिक पृष्ठभूमि के संदर्भ में, हेमचंद्र विक्रमादित्य का स्थान भारतीय इतिहास में अत्यंत विशिष्ट है। सोलहवीं शताब्दी के मध्यकाल में, जब भारत में मुगलों और अफगानों के बीच सत्ता संघर्ष चरम पर था, उस समय हेमू ने अपनी योग्यता के बल पर दिल्ली के सिंहासन पर अधिकार प्राप्त किया था। उन्हें ‘हिंदुओं का अंतिम सम्राट’ इसलिए कहा जाता है क्योंकि मध्यकालीन भारत में दिल्ली की गद्दी पर बैठने वाले वे अंतिम हिंदू शासक थे जिन्होंने ‘विक्रमादित्य’ की उपाधि धारण की। उनका 470वां विजय दिवस मनाना इस ऐतिहासिक धरोहर को सुरक्षित रखने और उसे जन-जन तक पहुँचाने का एक सार्थक प्रयास है। कुदरा में आयोजित यह कार्यक्रम क्षेत्रीय स्तर पर ऐतिहासिक चेतना जाग्रत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।

अखिल भारतीय रौनियार वैश्य महासभा द्वारा आयोजित इस कार्यक्रम ने समाज में एकजुटता और सांस्कृतिक गर्व की भावना को भी सुदृढ़ किया। जिलाध्यक्ष राजदेव प्रसाद गुप्ता ने अपने अध्यक्षीय संबोधन में संगठन की भूमिका और भविष्य की योजनाओं पर भी चर्चा की। उन्होंने कहा कि ऐसे आयोजनों का उद्देश्य इतिहास को जीवंत रखना और समाज को अपनी जड़ों से जोड़े रखना है। मंच संचालक मंगल गुप्ता ने कार्यक्रम के दौरान हेमू से जुड़े कई अनसुने किस्सों और ऐतिहासिक घटनाओं का उल्लेख किया, जिससे उपस्थित श्रोताओं को उस दौर की राजनीतिक और सामाजिक स्थिति को समझने में मदद मिली।

शगुन लॉन में आयोजित इस समारोह में स्थानीय प्रशासन और पुलिस व्यवस्था भी चाक-चौबंद रही, जिससे कार्यक्रम शांतिपूर्वक संपन्न हुआ। उपस्थित लोगों ने हेमू के प्रति अपनी श्रद्धा व्यक्त करते हुए उनके बलिदान और वीरता को याद किया। कार्यक्रम का समापन राष्ट्रगान और हेमू के प्रति श्रद्धांजलि अर्पित करने के साथ हुआ। कुदरा में मनाया गया हेमू का 470वां विजय दिवस केवल एक औपचारिकता नहीं थी, बल्कि यह भारतीय इतिहास के एक स्वर्णिम अध्याय को पुनः स्थापित करने और आने वाली पीढ़ियों को उनके गौरवशाली अतीत से परिचित कराने का एक ठोस प्रयास था। इस आयोजन ने यह संदेश दिया कि इतिहास के नायकों की गाथाएं केवल पुस्तकों में नहीं, बल्कि जनमानस की स्मृति में भी जीवित रहनी चाहिए।