मुस्लिम से की शादी, भाई की पढ़ाई और राशन बंद:मंदिर में एंट्री नहीं, लड़की शहर भागी; गांव वाले बोले- ये धर्मांतरण की साजिश

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‘मैं और मेरा परिवार गांव में अकेला हो गया है। शादी मैंने की थी, अब उससे बाहर भी आना चाहती हूं, लेकिन फिर भी सजा मिल रही है। छोटे भाई का स्कूल छूट गया क्योंकि कोई ऑटो वाला उसे ले जाने को तैयार नहीं है। खेतों में लगी आलू की फसल खराब हो गई क्योंकि उसे निकालने के लिए कोई मजदूर तैयार नहीं। मेरा परिवार मुसीबत में है।‘ पश्चिम बंगाल के बीरभूम जिले के मेटला गांव में रहने वाली मीता घोष (बदला हुआ नाम) का परिवार सोशल बायकॉट झेल रहा है। मीता ने दो साल पहले एक मुस्लिम लड़के से लव मैरिज की थी। शादी ज्यादा दिन नहीं चली, लेकिन अलग धर्म में शादी करने की ‘सजा’ मीता और उनके परिवार को अब तक मिल रही है। गांववालों का कहना है कि मीता मुसलमान हो गई है। दो साल बाद इसलिए गांव आई है, ताकि लड़के-लड़कियों का धर्म बदलवा सके। ‘न कोई दुकानदार राशन देगा, न मंदिर में मिलेगी एंट्री’
मीता का गांव कोलकाता से करीब 250 किमी दूर है। परिवार गांव के आखिरी छोर पर रहता है। बुजुर्ग माता-पिता के अलावा छह साल का भाई है। सोशल बायकॉट की वजह से परिवार ज्यादातर घर के अंदर ही रहता है। परिवार का हाल पूछने पर मीता बांग्ला में लिखा पैम्फलेट पढ़कर सुनाती हैं, जिसमें उनके पिता के नाम के साथ बायकॉट के पॉइंट्स लिखे हैं। पैम्फलेट में लिखा है, ‘गांव के लोग सुदीप घोष के परिवार से कोई संपर्क नहीं रखेंगे। उनके किसी कार्यक्रम में नहीं जाएंगे। घोष परिवार न मंदिर में पूजा कर सकेगा और न कोई दुकान वाला इन्हें राशन देगा। किसी धार्मिक कार्यक्रम में भी शामिल नहीं किया जाएगा।‘ इसे पढ़ते हुए मीता भावुक हो जाती हैं। वे बताती हैं, ‘मैंने 2024 में एक मुस्लिम लड़के से शादी की थी। शादी ज्यादा दिन नहीं चली। जुलाई 2025 में घर लौट आई। इसके बाद गांव में दिक्कतें शुरू हुईं। आसपास के लोगों ने बहुत बवाल किया। हमारे घर पर पत्थर फेंके। बाबा ने सबसे माफी मांगी। मंदिर जाकर समाज के सामने हाथ जोड़े, लेकिन गांव वाले नहीं माने। वे बस यही चाहते हैं कि मैं गांव में न रहूं।‘ ‘गांववालों ने बाबा से कहा कि अगर बेटी को घर में रखोगे तो पूरे परिवार को बाहर निकाल देंगे। ये सुनकर मैं डर गई। मैंने बाबा से कहा कि मुझे शहर छोड़ दो। गांव के हालात देखते हुए बाबा ने मुझे करीब 10 किमी दूर दुबराजपुर में हॉस्टल भेज दिया। छह महीने बाद हॉस्टल भी खाली हो गया। अब मेरे पास घर लौटने के अलावा कोई दूसरा रास्ता नहीं था।‘ ढोल बजाकर गांव में मुनादी- नियम तोड़े तो 5 हजार जुर्माना लगेगा
मीता आगे बताती हैं, ‘बाबा फरवरी के पहले हफ्ते में मुझे घर वापस ले आए। गांववालों का विरोध फिर शुरू हो गया। चासपाड़ा के लोगों ने ढोल बजाकर पूरे गांव में कहा कि कोई भी घोष परिवार से संबंध नहीं रखेगा। पूरे गांव में पर्चे बांटे गए, जिसमें नियम तोड़ने वाले पर 5 हजार रुपए जुर्माने का आदेश था।‘ हमने मीता से पति से अलग होने की वजह पूछी। उन्होंने कोई साफ वजह तो नहीं बताई, सिर्फ इतना कहा कि माता-पिता के बिना नहीं रह सकती, इसलिए घर वापस आ गई। मीता ने अब तलाक के लिए अर्जी लगाई है। इस साल जुलाई में आपसी रजामंदी से तलाक हो जाएगा। हमने मीता से पूछा, घर की जरूरत का सामान कहां से लाते हैं? वे कहती हैं, ‘सामान तो हम शहर से ले आते हैं, कभी ताऊ के बेटे ले आते हैं। समस्या ये है कि अगर कोई बीमार पड़ जाए तो गांव के डॉक्टर दवा नहीं देते। दिन में कुछ होगा तो शहर चले जाएंगे, लेकिन रात में हुआ तो क्या करेंगे। हमें अब भी डर लगता है कि कोई हमला न कर दे। पहले ही पत्थर मारकर खिड़कियां तोड़ दी थीं, अब पता नहीं क्या करेंगे।‘ ‘बेटी से गलती हुई, माफी मांगी, लेकिन सब बदल नहीं सकते’
मीता के बगल में उनके पिता सुदीप घोष (बदला हुआ नाम) बैठे थे। वे हिंदी नहीं बोल पाते। बंगाली में कहते हैं, ‘गांव वालों ने हमारा जीना मुश्किल कर दिया है। हालत ये है कि मेरा छह साल का बेटा स्कूल नहीं जा सकता। लोगों ने स्कूल वैन वाले को धमकाया है। इसलिए वो स्कूल नहीं जा पा रहा है। पढ़ाई में कोई रुकावट न हो, इसलिए अभी भाई की बहू के पास ट्यूशन जाता है।‘ ‘खेत में आलू लगे हैं, लेकिन उसे निकालने के लिए मजदूर नहीं मिल रहे हैं। पहले जो लोग हमारी एक बोली पर खेत में काम करने आ जाते थे, आज वो बात करने को भी राजी नहीं हैं।‘ सुदीप आगे कहते हैं, ‘बेटी से गलती हो गई, मैंने पूरे गांव से हाथ जोड़कर माफी भी मांग ली है। इससे ज्यादा अब क्या कर सकता हूं, जो हो गया उसे बदला नहीं जा सकता।‘ अब गांववालों की बात…
हमने मीता से विरोध करने वालों के बारे में पूछा तो उन्होंने गांव में रहने वाले पंकज चौधरी और आशीष मंडल का नाम लिया। उनसे मिलने के लिए गांव में आगे बढ़े। करीब सौ कदम दूर मनसा मंदिर पहुंचे। यहां बैठे लोगों से सुदीप घोष के बारे में पूछा। वे कुछ बोलने को राजी नहीं हुए। उनका कहना था कि जो भी फैसला लिया है, वो सही है। इसके बाद हम आशीष मंडल के घर पहुंचे। वे घर पर नहीं थे। उनके भाई की पत्नी मिलीं, लेकिन कैमरे पर बोलने को तैयार नहीं थी। उन्होंने बस इतना कहा कि आशीष हार्ट के मरीज हैं। कुछ वक्त पहले ही उनका ऑपरेशन हुआ है। घोष फैमिली के बायकॉट से उनका कोई लेना-देना नहीं है। इस मामले में पूरा गांव शामिल है। घोष परिवार सिर्फ कुछ लोगों को टारगेट कर रहा है। ‘बेटी भागी तो थाना घिरवाया, लौट आई तो बताया भी नहीं’
गली में आगे पंकज चौधरी का घर है। मिट्टी के मकान का ज्यादातर हिस्सा धान और दूसरी फसलों से भरा है। घर पर हमें पंकज के बुजुर्ग माता-पिता मिले। घोष फैमिली के सोशल बायकॉट के बारे में पूछने पर पिता तारापोदो चौधरी कहते हैं, ‘इसमें सिर्फ मेरा बेटा ही शामिल नहीं है, पूरा गांव विरोध कर रहा है। इस विरोध के कई कारण भी हैं।‘ कारण पूछने पर बताते हैं, ‘दो साल पहले घोष की बेटी मुस्लिम लड़के के साथ चली गई। तब गांव के हर घर से एक व्यक्ति थाने गया था। सब परिवार के साथ खड़े थे, ताकि लड़की समाज में लौट आए। वो वापस नहीं आई। लड़की बालिग थी, इसलिए जोर जबरदस्ती भी नहीं की जा सकी। उस मुश्किल वक्त में पूरे गांव ने घोष परिवार का साथ दिया।‘ ‘दो साल बाद लड़की अचानक गांव में वापस आ गई। तब उसके पिता ने किसी को ये बताना भी जरूरी नहीं समझा। गांव के लोगों को पता चला तो वे नाराज हुए। लोगों ने घोष को मंदिर पर बुलाया और लड़की को गांव से बाहर रखने के लिए कहा।‘ ‘दूसरी सबसे बड़ी बात ये है कि मीता ने मुस्लिम लड़के के साथ शादी की है। अब वो हिंदू समाज का हिस्सा नहीं है। आने वाले समय में गांव के बाकी लड़के-लड़कियां भी ऐसा काम न करें, इसलिए ये फैसला लिया गया।‘
‘बायकॉट जरूरी, ताकि कोई और ये गलती न दोहराए’
सोशल बायकॉट के बारे में पूछने पर वे कहते हैं, ‘पूरे गांव का यही फैसला है कि कोई भी शादी, प्रोग्राम, पूजा-पाठ या बाकी किसी आयोजन में उनके परिवार को शामिल नहीं करेगा। अगर उन्हें मंदिर में पूजा करनी है, तो वे अलग से जाकर करें।‘ गांव से राशन नहीं लेने वाली बात पूछने पर तारापोदो कहते हैं ‘ये सब झूठ है। मीता की नानी का घर इसी गांव में है। पूरा परिवार उनसे मिलता है और उनका सारा काम भी हो रहा है। विरोध इस बात का है कि कहीं भविष्य में कोई बच्चा समाज से बाहर जाने की गलती न करें।‘ घोष परिवार के विरोध में बांटे गए पैम्फलेट में लिखा था कि गांव से उन्हें किसी तरह की सुविधा नहीं दी जाएगी। इसे पुख्ता करने के लिए हम गांव के ही चैताली स्टोर में गए। दुकान मालिक समीर दास से बायकॉट के बारे पूछा। उन्होंने कहा, ‘सोशल बायकॉट का फैसला तो लिया गया है। फिर भी वे समान लेने आएंगे तो मैं दूंगा। अब तक तो समान लेने नहीं आए।‘ मीता अब मुसलमान, धर्मांतरण करने गांव में आई
हमने आशीष मंडल और पंकज चौधरी से दोबारा मिलने की कोशिश की, लेकिन वो नहीं मिले। आखिर में हमने पंकज चौधरी से फोन पर बात की। उनकी एक एडवरटाइजमेंट एजेंसी है। उनका मानना है कि गांव में माहौल सही रहे, इसलिए बायकॉट जरूरी है। हमने पूछा कि लव मैरिज करना या तलाक लेने का अधिकार तो संविधान देता है। क्या आप संविधान को नहीं मानते हैं? इसके जवाब में पंकज कहते हैं, ‘संविधान मानते हैं, लेकिन गांव के भी कुछ नियम-कायदे होते हैं, जिन्हें सभी को मानना होता है। मीता ने मुस्लिम लड़के से शादी की।’ सोशल बायकॉट नहीं हटा तो केस करेंगे
गांव में ही रहने वाले धर्म जागरण समन्वय के सह संयोजक डॉ. रंजन बनर्जी इस मामले को पहले दिन से देख रहे हैं। उनकी राय गांव वालों से अलग है। वे कहते हैं, ‘मीता किसी का धर्म परिवर्तन नहीं कर रही है। वो खुद पीड़ित है। उसने एक शादी की, जो नहीं चल सकी। इसके भी कई कारण है, क्योंकि दोनों का समाज और संस्कृति अलग-अलग है।‘ ‘रही बायकॉट की बात तो इसकी अनुमति न तो हिंदू धर्म देता है और न ही कानून। इसलिए हमने इसके खिलाफ मीता से पहले DM और फिर लोकल पुलिस स्टेशन में मेल करवाया है, लेकिन अब तक कोई जवाब नहीं आया। हमने कोलकाता हाईकोर्ट में सोशल बायकॉट के खिलाफ नोटिस दिया है। अगर ये नहीं हटा, तो केस करेंगे।‘ इसके बाद हम गांव के प्रधान गौतम मंडल से मिले। वे कहते हैं, ‘जिस दिन ये घटना हुई, उस दिन मैं गांव में नहीं था। सुदीप घोष ने मुझे बाद में बताया। इसे लेकर गांव के लोगों से भी बात की, लेकिन कोई नहीं माना। दुबराजपुर थाना के पुलिस अफसरों ने आशीष मंडल और पंकज चौधरी के साथ कुछ लोगों को थाने बुलाकर समझाया था, लेकिन बात नहीं बनी।‘ मीता ने भी हमें मेल दिखाए थे। उस पर अधिकारियों का कोई रिप्लाई नहीं था। हमने केस की स्थिति जानने के लिए DM से भी बात करने की कोशिश की, लेकिन जवाब नहीं मिला। वकील बोले- शादी निजी मामला, इसमें सोशल बायकॉट गैरकानूनी
सोशल बायकॉट को लेकर कलकत्ता हाईकोर्ट के वकील सब्यसाची चटर्जी कहते हैं, ‘बंगाल में खासकर बांग्लादेश के साथ बॉर्डर साझा करने वाले इलाकों में अंतरधार्मिक विवाह का चलन पहले से है। पिछले कुछ साल में आदिवासी और बॉर्डर वाले इलाके में बड़े स्तर पर हिंदुत्व का प्रचार हुआ। इस कारण यहां धर्म को लेकर बड़ा भेदभाव दिखता है।‘ ‘किस इंसान को किसके साथ शादी करनी है, ये उसका निजी मामला है। इसमें समाज का कोई दखल नहीं होना चाहिए। अगर कोई इस आधार पर सोशल बायकॉट कर रहा है, तो ये गैर-कानूनी है। संविधान के अनुसार विवाह धारा-21 के तहत मौलिक अधिकार है। अगर कोई इसमें किसी तरह की अड़चन डालता है तो सजा का प्रावधान है। साथ ही धारा-15 और 17 सोशल बायकॉट के खिलाफ है।‘ वे आगे कहते हैं, ‘अपनी मर्जी से शादी करने के लिए किसी का भी बहिष्कार नहीं किया जा सकता है। इसमें भी अगर व्यक्ति शेड्यूल कास्ट से आता है, तो उसके खिलाफ ऐसा करने पर SC/ST एक्ट 1989 के मुताबिक सजा का प्रावधान है, जो गैर जमानती है।‘
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