मुजफ्फरपुर में ‘मां की रसोई’ की अनूठी पहल: पांच साल से हर रात 100 से अधिक जरूरतमंदों को मिल रहा मुफ्त भोजन

बिहार के मुजफ्फरपुर जिले में मानवता और सेवा का एक ऐसा उदाहरण देखने को मिल रहा है, जो पिछले पांच वर्षों से लगातार जारी है। शहर में ‘मां की रसोई’ नामक एक नेक पहल के तहत हर रात सैकड़ों गरीबों और जरूरतमंद लोगों को मुफ्त में भरपेट भोजन कराया जा रहा है। यह निःशुल्क भोजन वितरण सेवा बिना किसी रुकावट के पिछले पांच सालों से निरंतर चल रही है, जिससे शहर के उन तमाम लोगों को राहत मिल रही है जिनके पास रात का खाना जुटाने के साधन नहीं होते।
यह पुनीत कार्य मुजफ्फरपुर शहर के सदर अस्पताल रोड पर स्थित जिला यक्ष्मा केंद्र (टीबी सेंटर) के गेट पर किया जाता है। इस स्थान का चयन इसलिए भी महत्वपूर्ण माना जा सकता है क्योंकि अस्पताल परिसर और उसके आसपास हमेशा मरीजों के तीमारदारों, गरीब मजदूरों, बेघर लोगों और अन्य जरूरतमंदों का आना-जाना लगा रहता है। ऐसे में ‘मां की रसोई’ की इस पहल ने इन सभी के लिए एक बड़ी सहूलियत पैदा कर दी है।
उपलब्ध जानकारी के अनुसार, ‘मां की रसोई’ द्वारा हर रात 100 से अधिक जरूरतमंद लोगों को मुफ्त भोजन उपलब्ध कराया जा रहा है। यह संख्या दर्शाती है कि शहर में ऐसे लोगों की कमी नहीं है जिन्हें दो वक्त की रोटी के लिए संघर्ष करना पड़ता है। इस सेवा के माध्यम से न केवल उनकी भूख मिटाई जाती है, बल्कि उन्हें यह विश्वास भी दिलाया जाता है कि समाज में उनके प्रति संवेदनशील लोग मौजूद हैं। पांच साल का लंबा समय और हर रात बिना किसी बाधा के इस सेवा का जारी रहना अपने आप में एक बड़ी उपलब्धि है।
आमतौर पर देखा जाता है कि कई सामाजिक पहल कुछ दिनों या महीनों तक ही चल पाती हैं, लेकिन ‘मां की रसोई’ ने पांच वर्षों तक अपनी इस सेवा को निरंतर बनाए रखा है। इसमें प्रकाश कुमार जैसे व्यक्तियों की भूमिका जुड़ी हुई बताई जाती है, जो इस सेवा को सुचारू रूप से चलाने में अपना योगदान दे रहे हैं। हालांकि, इस सेवा के संचालन में शामिल अन्य स्वयंसेवकों और सहयोगियों की पूरी सूची स्रोत सामग्री में विस्तार से उपलब्ध नहीं है, लेकिन इतना स्पष्ट है कि यह प्रयास एक संगठित रूप में आगे बढ़ रहा है।
मुजफ्फरपुर के सदर अस्पताल रोड पर जिला यक्ष्मा केंद्र का गेट अब केवल एक सरकारी स्वास्थ्य केंद्र का प्रवेश द्वार नहीं रह गया है, बल्कि रात के समय यह उम्मीद और सेवा का केंद्र बन जाता है। जब पूरा शहर सोने की तैयारी करता है, तब ‘मां की रसोई’ से जुड़े लोग यहां पहुंचकर भोजन तैयार करने और उसे वितरित करने की व्यवस्था में जुट जाते हैं। ताजा और गर्म भोजन का वितरण इस प्रकार किया जाता है कि कोई भी जरूरतमंद व्यक्ति भूखा न रहे।
इस पहल का सबसे बड़ा लाभ उन मरीजों के परिजनों को होता है जो दूर-दराज के गांवों से अपने मरीजों का इलाज कराने के लिए सदर अस्पताल या यक्ष्मा केंद्र आते हैं। कई बार आर्थिक तंगी के कारण ये परिजन खुद के लिए भोजन का इंतजाम नहीं कर पाते हैं। इसके अतिरिक्त, शहर में काम की तलाश में आए दिहाड़ी मजदूर, रिक्शा चालक, और सड़कों पर जीवन यापन करने वाले लोग भी इस मुफ्त भोजन सेवा पर निर्भर हैं। 100 से अधिक लोगों को प्रतिदिन भोजन कराना कोई छोटा कार्य नहीं है, इसके लिए खाद्य सामग्री, रसोई गैस, बर्तन और मैनपावर की निरंतर आवश्यकता होती है।
स्रोत सामग्री में इस बात का उल्लेख नहीं है कि इस सेवा के लिए धन या राशन का प्रबंध किस प्रकार किया जाता है, या क्या इसे किसी सरकारी योजना या निजी दानदाताओं का समर्थन प्राप्त है। हालांकि, पांच साल तक बिना रुके इस सेवा का संचालन यह संकेत देता है कि इसके पीछे जनसहयोग या किसी निश्चित व्यवस्था का हाथ है। ‘मां की रसोई’ का यह नाम भी प्रतीकात्मक है, जो एक मां की उस ममता को दर्शाता है जो अपने बच्चों को कभी भूखा नहीं सोने देती। ठीक उसी तरह, यह पहल शहर के जरूरतमंद लोगों को अपने परिवार जैसा स्नेह और भोजन प्रदान कर रही है।
मुजफ्फरपुर जैसे शहर में, जहां सामाजिक और आर्थिक चुनौतियां मौजूद हैं, ऐसी पहल समाज के लिए एक प्रेरणा का काम करती है। यह सेवा न केवल शारीरिक भूख को शांत करती है, बल्कि सामाजिक सद्भाव और भाईचारे को भी मजबूत करती है। जिला यक्ष्मा केंद्र के गेट पर हर रात लगने वाला यह भोजन का केंद्र अब शहर की एक पहचान बन चुका है।
‘मां की रसोई’ की इस पांच साल की निरंतर यात्रा ने यह साबित कर दिया है कि यदि नीयत साफ हो और सेवा का जज्बा हो, तो संसाधनों की कमी कभी भी बाधा नहीं बन सकती। 100 से अधिक जरूरतमंदों को हर रात भरपेट खाना खिलाने का यह अभियान भविष्य में भी इसी तरह जारी रहेगा, ऐसी उम्मीद शहर के लोगों को है। प्रकाश कुमार और इस सेवा से जुड़े सभी लोगों का यह प्रयास मुजफ्फरपुर की धरती पर मानवता की एक जीवंत मिसाल कायम किए हुए है।

