Nangeli Breast Tax Kerala Story; Mulakkaram History

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साल 1803 यानी आज से करीब 223 साल पहले। केरलम के चेरथला नगर में ऐझावा जाति की एक मजदूर महिला की झोपड़ी के सामने राजमहल से एक टैक्स जमा करने वाला पहुंचा। महिला ने उसे वहीं रुकने के लिए कहा और झोपड़ी में चली गई। कुछ मिनट बाद जब वह बाहर निकली, तो उसके सी

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ये किस्सा केरल के मुलक्करम यानी स्तन ढंकने के लिए दिए जाने वाले टैक्स से जुड़ा है। केरलम में चुनाव होने को है। आज कहानी मुलक्करम की, जिसके जख्म और असर आज की राजनीति में भी दिखते हैं…

मुलक्करमः ब्राह्मणों के सामने महिलाओं को उतारने पड़ते थे ऊपरी वस्त्र

  • 18वीं और 19वीं सदी में केरल के त्रावणकोर स्टेट में आम जनता पर 120 तरह के टैक्स लगते थे। इसमें से 110 टैक्स सिर्फ नीची जातियों को देने होते। घर, सुरक्षा, गहनों, गायों, तेल, यहां तक कि शादी करने पर भी टैक्स लगता था। इनमें से ही एक था- मुलक्करम यानी महिलाओं के स्तन ढंकने पर टैक्स। केरल में एझावा, थिया, नादर, जैसी कई कथित निचली जातियों पर यह लगता था।
  • सामाजिक इतिहासकार एस. एन. सदाशिवन अपनी किताब ‘अ सोशल हिस्ट्री ऑफ इंडिया’ में लिखते हैं, ‘केरल में शूद्र महिलाओं के लिए नियम था कि वो अपनी नाभि के ऊपर कोई कपड़ा नहीं पहन सकतीं। घर पर और बाहर उन्हें अपने स्तन खुले रखने होते। अगर कोई महिला स्तन ढंकती, तो किसी नंबुदरी ब्राह्मण या शासक के सामने वस्त्र हटा लेना होता था।’
1940 के दशक की तस्वीर है। एक एझावा महिला ऊपरी शरीर ढंके बिना काम करती दिख रही है। हालांकि तब तक ज्यादातर जगहों पर ये प्रथा बंद हो चुकी थी। (Courtesy: Swaraj Art Archive)

1940 के दशक की तस्वीर है। एक एझावा महिला ऊपरी शरीर ढंके बिना काम करती दिख रही है। हालांकि तब तक ज्यादातर जगहों पर ये प्रथा बंद हो चुकी थी। (Courtesy: Swaraj Art Archive)

  • कहा जाता है कि महिलाओं के सीने पर कपड़े न रहें, इसकी जिम्मेदारी राजपुरोहित की होती थी। पुरोहित एक लंबी लाठी लेकर चलता था, जिसके सिरे पर एक चाकू बंधा होता। वह चाकू से महिला के कपड़े फाड़ देता और पेड़ पर टांग देता था।
  • करीब 150 से 200 सालों तक केरलम में ब्रेस्ट टैक्स लागू रहा। 1803 में कोच्चि में पहली बार इसका विरोध हुआ।
चेरूमा जाति की महिला की यह तस्वीर 1930 के करीब ली गई थी। (Source: George J Thaliath Foundation)

चेरूमा जाति की महिला की यह तस्वीर 1930 के करीब ली गई थी। (Source: George J Thaliath Foundation)

जब टैक्स देने की बजाए, नंगेली ने स्तन काटकर हाथ पर रख दिए

  • चेरतला नगर में एझावा समुदाय की नंगेली और उसके पति चिरुकंदन रहते थे। दोनों मजदूरी करके सालों से टैक्स दे रहे थे, लेकिन अब कर्ज में डूब चुके थे।
  • नंगेली ने जब टैक्स देने से मना कर दिया, तो एक टैक्स कलेक्टर उसके घर पहुंच गया। नंगेली ने उसे बाहर ठहराया और पैसे लाने का कहकर झोपड़ी के अंदर चली गई।
  • जब वह बाहर आई तो पूरा शरीर लहूलुहान था। हाथ में एक पत्ता था, जिसपर उसके कटे हुए स्तन रखे हुए थे।
  • ब्रेस्ट टैक्स लेने आए कलेक्टर को नंगेली ने यह कहकर अपने स्तन थमा दिए कि जब स्तन ही नहीं है, तो फिर किस बात का मुलक्करम। यह देखते ही टैक्स कलेक्टर डरकर भाग गया।
  • नंगेली के शरीर से इतना खून बहा, कि कुछ ही पल में घर के दरवाजे पर ही उसकी मौत हो गई। जब चिरुकंदन को पूरी घटना पता चली, तो दुख के मारे उसने नंगेली की चिता पर बैठकर अपनी भी जान दे दी।
केरलम में एक कार्यक्रम में नंगेली की यह मूर्ति बनाई गई थी। राज्य में नंगेली का कोई आधिकारिक स्मारक नहीं हैं, लेकिन इतिहासकारों और सामाजिक कार्यकर्ता लगातार इसकी मांग उठा रहे हैं।

केरलम में एक कार्यक्रम में नंगेली की यह मूर्ति बनाई गई थी। राज्य में नंगेली का कोई आधिकारिक स्मारक नहीं हैं, लेकिन इतिहासकारों और सामाजिक कार्यकर्ता लगातार इसकी मांग उठा रहे हैं।

शरीर ढंकने के लिए महिलाओं ने धर्म बदले, तो उनके कपड़े फाड़ दिए गए

  • नंगेली की मृत्यु ने मुलक्करम से छुटकारे और ऊपरी वस्त्र पहनने के विद्रोह को जन्म दिया। बहुत सी महिलाएं धर्म बदलकर ईसाई बन गईं, ताकि अपने शरीर ढंक सकें।
  • लेखक जॉन रेस्टाकिस अपनी किताब ‘सिविलाइजिंग द स्टेट: रिक्लेमिंग पॉलिटिक्स फॉर द कॉमन गुड’ में लिखते हैं कि इन महिलाओं को ऊंची जाति के पुरुष चर्च जाने से रोकते। सार्वजनिक स्थानों पर इनके कपड़े फाड़ दिए जाते। महिलाओं को छूना न पड़े, इसलिए एक डंडे में कुल्हाड़ी फंसाकर महिलाओं के शरीर से कपड़े खींच लिए जाते।
  • महिलाओं ने इस अपमान का विरोध किया। वो ऊंची जाति के मोहल्लों में धावा बोलतीं। उनके सामान तोड़ती, दुकानें लूट ली जातीं। धर्म बदल चुकी महिलाओं के साथ नादर और एझावा जाति की महिलाओं ने भी विद्रोह का समर्थन दिया।
  • 1822-23 के आस-पास त्रावणकोर के छोटे-छोटे इलाकों से शुरू हुआ यह विरोध केरलम से निकलकर आज के तमिलनाडु तक पहुंच गया। इसे नाम दिया गया चन्नार विद्रोह। दरअसल, उस समय नादर समुदाय को चन्नार भी कहा जाता था।
  • आखिरकार त्रावणकोर के राजा उथराम थिरुनल मार्तंड वर्मा ने 26 जुलाई 1859 को फरमान जारी कर एझावा, नादर सहित सभी निम्न जाति की महिलाओं को स्तन ढंकने का अधिकार दिया।
  • त्रिशूर के सेंट मैरीज कॉलेज में इतिहास की प्रोफेसर कीर्तना संतोष के मुताबिक, इसके बाद भी नादर महिलाओं को सवर्ण महिलाओं की तरह कपड़े पहनने की इजाजत नहीं थी। अगर वो ऐसा करती तो सवाल पूछे जाते और कई बार सजा भी मिलती।
20वीं सदी शुरुआत तक भी केरलम की कई जातियों में महिलाएं स्तन नहीं ढंकती थीं। तस्वीर थिय्या समुदाय के एक परिवार की। (Courtesy: George J Thaliath Foundation)

20वीं सदी शुरुआत तक भी केरलम की कई जातियों में महिलाएं स्तन नहीं ढंकती थीं। तस्वीर थिय्या समुदाय के एक परिवार की। (Courtesy: George J Thaliath Foundation)

केरल में ब्रेस्ट टैक्स का इतिहास बताने वाले लेखकों से लेकर केरल की लोक कथाओं में नंगेली की यह कहानी बहुत प्रचलित है। लेकिन इसकी सच्चाई पर कई इतिहासकार सवाल भी उठाते हैं…

दूसरा पहलूः नंगेली का विरोध स्तन ढंकने के लिए नहीं था

साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित लेखक मनु पिल्लई लिखते हैं कि केरल में 1860 तक कोई भी महिला स्तन नहीं ढंकती थी, चाहे वो राजपरिवार से ही क्यों न हो। ऊंची जाति की महिलाएं बस अपने कंधे पर एक कपड़ा डालती थीं। अंग्रेजों के आने से पहले पुरुषों और महिलाओं के लिए धड़ ढंकना शालीनता का प्रतीक नहीं था।

17वीं सदी में यूरोपीय यात्री विलियम वैन नीउहोफ, त्रावणकोर की रानी अश्वथी थिरुनल उमयम्मा से मिलते हैं। अपने यात्रा वृत्तांत में विलियम बताते हैं, ‘रानी ने कमर तक एक कपड़ा बांधा हुआ था। एक कपड़ा कंधे पर डाला हुआ था। कमर के ऊपर के ज्यादातर हिस्से में कोई वस्त्र नहीं पहना था।’

नीउहोफ के यात्रा वृत्तांत में रानी उमयम्मा से मुलाकात का यह चित्र मिलता है। नीउहोफ लिखते हैं, ‘700 से ज्यादा नायर सिपाहियों के बीच रानी सिर्फ अपने कंधों पर एक गमछा लटकाए आईं थी। ’

नीउहोफ के यात्रा वृत्तांत में रानी उमयम्मा से मुलाकात का यह चित्र मिलता है। नीउहोफ लिखते हैं, ‘700 से ज्यादा नायर सिपाहियों के बीच रानी सिर्फ अपने कंधों पर एक गमछा लटकाए आईं थी। ’

केरल के इतिहासकार नंदकुमार बताते हैं, ‘जिस मुलक्करम को ब्रेस्ट टैक्स कह रहे हैं, वो दरअसल मुलाक्करम था। मुला यानी बांस। बांस पर लगने वाले टैक्स को ब्रेस्ट टैक्स बताया जाने लगा। जहां तक बात है स्तन खुले रखने की है, केरल में 18वीं-19वीं सदी के पहले कोई महिला स्तन नहीं ढंकती थी। ऊंची जाति की भी नहीं। केरल में साड़ी पहनना तक 19वीं सदी में शुरु हुआ है।’

इतिहासकारों के मुताबिक 20वीं सदी की शुरुआत में भी कई नायर और ब्राह्मण परिवारों में वृद्ध महिलाएं शरीर के ऊपरी हिस्से में वस्त्र नहीं पहनती थीं। इस समय तक युवा महिलाओं ने साड़ी पहनना शुरू कर दिया था। Courtesy: Matampu Kunhukuttan

इतिहासकारों के मुताबिक 20वीं सदी की शुरुआत में भी कई नायर और ब्राह्मण परिवारों में वृद्ध महिलाएं शरीर के ऊपरी हिस्से में वस्त्र नहीं पहनती थीं। इस समय तक युवा महिलाओं ने साड़ी पहनना शुरू कर दिया था। Courtesy: Matampu Kunhukuttan

नंदकुमार के मुताबिक, ‘1924 में महात्मा गांधी केरल में पहली बार आए थे। उसके बाद 2 बार और आए। उन्होंने छुआछूत और छोटी जाति के अधिकारों पर बात की। लेकिन कभी ब्रेस्ट टैक्स का जिक्र नहीं किया। अगर ऐसा टैक्स होता, तो महात्मा गांधी की किसी किताब में तो इसका जिक्र मिलता। केरल में छोटी जाति के अधिकारों के लिए आवाज उठाने वाले किसी रिफॉर्मर ने ब्रेस्ट टैक्स का कभी जिक्र नहीं किया।’

तिरुवनंतपुरम के सेंटर फॉर डेवलपमेंट स्टडीज में इतिहासकार जे. देविका के मुताबिक, ‘हमारे पास ब्रेस्ट टैक्स जैसे किसी टैक्स के ज्यादा रिकॉर्ड नहीं हैं, लेकिन जो हैं वो बताते हैं कि यह एक सामान्य टैक्स था। कथित नीची जाति के पुरुषों पर भी सिर टैक्स, मूंछों पर टैक्स लगते थे। नंगेली का विरोध स्तन ढंकने के लिए नहीं था, बल्कि टैक्स सिस्टम के जरिए हो रहे भेदभाव के खिलाफ था।’

मुलक्करम जैसी प्रथा का आज की राजनीति पर असर

मुलक्करम और नंगेली की कहानी पर भले ही अलग-अलग हो, लेकिन त्रावणकोर जैसे समाजों में जातिगत भेदभाव के कई सबूत हैं। आज की राजनीति में इसके प्रतीकात्मक और नैरेटिव प्रभाव मजबूत हैं। वामपंथी पार्टियां इस तरह की ऐतिहासिक कहानियों से नैरेटिव बनाते हैं कि वे ऐतिहासिक अन्याय के खिलाफ खड़े हैं।

  • 2023 में चन्नार विद्रोह के 200 साल पूरे होने पर केरल के मुख्यमंत्री पिनरई विजयन और तमिलनाडु के मुख्यमंत्री एम. के. स्टालिन ने लोगों से अपील की कि वो सनातन धर्म की सोच से प्रभावित न हों।
चन्नार विद्रोह की सालगिराह पर तमिलनाडु के नागरकोइल में समारोह आयोजित हुआ था। तमिलनाडु के सीएम स्टालिन ने कहा कि त्रावणकोर में जैसा धर्म 200 साल पहले लागू था, BJP और RSS वैसा ही धर्म लाकर लोगों को बांटना चाहती है।

चन्नार विद्रोह की सालगिराह पर तमिलनाडु के नागरकोइल में समारोह आयोजित हुआ था। तमिलनाडु के सीएम स्टालिन ने कहा कि त्रावणकोर में जैसा धर्म 200 साल पहले लागू था, BJP और RSS वैसा ही धर्म लाकर लोगों को बांटना चाहती है।

  • कार्यक्रम में विजयन ने कहा कि BJP धर्म के नाम पर बांटकर चुनावी फायदा उठाने की कोशिश कर रही है लेकिन चन्नार विद्रोह ऐसे धर्म की सच्चाई बताता है।
  • विपक्षी दल खासकर बीजेपी इसे अक्सर सिलेक्टिव नैरेटिव बताकर काउंटर करते हैं। इससे इतिहास बनाम राजनीति की बहस तेज होती है।
  • NCERT ने 2019 में 9वीं क्लास की इतिहास की बुक से तीन चैप्टर हटाए थे। इसमें एक त्रावणकोर में निचली जातियों के संघर्ष से जुड़ा था। केरल के सीएम पिनाराई विजयन ने इसे RSS का एजेंडा और BJP द्वारा भगवाकरण की कोशिश बताया था। इसके बाद केरल सरकार ने हटाए गए चैप्टर्स को सप्लिमेंट्री किताबों के जरिए पढ़ाना जारी रखा।
  • केरलम में वोटर्स के 4 प्रमुख धड़े हैं- नायर, एझावा, मुस्लिम और ईसाई। पारंपरिक तौर पर 2016 तक नायर और एझावा लेफ्ट को सबसे ज्यादा वोट दे रहे थे लेकिन 2019 के लोकसभा चुनाव से यह ट्रेंड बदलने लगा।
  • BJP ने हिंदू वोटर्स को साधना शुरू किया, जिससे अपर कास्ट, नायर और एझावा के वोट लेफ्ट से शिप्ट होकर BJP की तरफ जाने लगे।
  • 2016 विधानसभा चुनाव में जहां BJP को अपर कास्ट से नायरों के 33% वोट मिले थे, 2019 लोकसभा में यह बढ़कर 43% हो गए। हालांकि 2021 विधानसभा चुनाव में यह 27% तक घट गए।
  • दूसरी तरफ OBC वर्ग की प्रमुख जाति एझावा के 18% BJP को 2016 में मिले थे। 2021 में यह बढ़कर 23% हो गए।

ब्रेस्ट टैक्स और नंगेली की कहानी की सत्यता को लेकर भले ही विवाद हो, लेकिन एझावा जाति के साथ हुए भेदभाव की याद दिलाकर लेफ्ट इन्हें फिर से साधने की कोशिश करता रहता है। हालांकि सेंटर फॉर पब्लिक पॉलिसी रिसर्च के डायरेक्टर डॉ. धनुराज बताते हैं कि अब ब्रेस्ट टैक्स की बात बहुत पुरानी हो गई है। केरल में इसके नाम पर वोट नहीं पड़ते हैं।

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