Nepal Elections 2026 Crisis; Gen Z Protest Leaders

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‘अगर चुनाव बाद देश को फिर से बदलाव की जरूरत पड़ी, तो हम किसी भी वक्त, किसी भी जगह फिर आंदोलन के लिए तैयार हैं। कुछ लोग एंटी-इंडिया प्रचार की कोशिश करते हैं, लेकिन हम असल Gen Z लीडर भारत को लेकर कोई नेगेटिव सेंटिमेंट नहीं रखते हैं।‘

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नेपाल में हुए Gen Z प्रोटेस्ट के बड़े चेहरों में से एक टंका धामी आने वाले चुनाव को लेकर उत्साहित हैं। वे मानते हैं कि प्रोटेस्ट ने चुनाव में पॉलिटिकल पार्टियों की प्राथमिकताएं बदल दी हैं। हालांकि एक और Gen Z लीडर तनुजा पांडे की राय इससे अलग है। वे कहती हैं, ‘सियासी दलों ने हमारे आंदोलन का जरूरत पड़ने पर इस्तेमाल किया और फिर नजरअंदाज कर दिया।‘

नेपाल में बीते साल 8-9 सितंबर को Gen Z प्रोटेस्ट हुए, जिसके बाद प्रधानमंत्री रहे केपी ओली और उनके मंत्रियों को इस्तीफा देना पड़ा। प्रोटेस्ट के बाद अब पहली बार 5 मार्च को चुनाव हो रहे हैं। इस चुनाव में Gen Z आंदोलन से निकले लीडर्स कहां हैं? भारत को लेकर नेपाल का Gen Z क्या सोचता है और नई सरकार से उनकी क्या उम्मीदे हैं। ये जानने के लिए हमने काठमांडू में Gen Z प्रोटेस्ट के बड़े लीडर्स और आम लोगों से बात की।

नेपाल में 275 सीटों के लिए 5 मार्च को वोटिंग होनी है। इसमें 1 करोड़ 90 लाख लोग वोट डालेंगे।

नेपाल में 275 सीटों के लिए 5 मार्च को वोटिंग होनी है। इसमें 1 करोड़ 90 लाख लोग वोट डालेंगे।

सड़कों से लेकर रैलियों तक Gen Z का जिक्र सितंबर से नेपाल में सुशीला कार्की के नेतृत्व में अंतरिम सरकार चल रही है। चुनाव भले चरम पर हैं लेकिन काठमांडू की सड़कें भारत की तरह बैनर पोस्टर से पटी नजर नहीं आतीं। सड़क किनारे चुनावी सभाएं जरूर होती दिख जाती हैं।

Gen Z प्रोटेस्ट के वक्त संसद, सुप्रीम कोर्ट से लेकर कई सरकारी भवनों में आगजनी की गई थी। दीवारों पर उनके निशान अब भी हैं। नुक्कड़ों से लेकर चुनावी सभाओं में एक जिक्र बार-बार आता है, वो है Gen Z का। इससे समझ आता है कि Gen Z प्रोटेस्ट के बाद हो रहे पहले चुनाव पर किन मुद्दों का असर रहने वाला है।

हमने Gen Z लीडर टंका (पंकज) धामी से इसे और समझने की कोशिश की। टंका फिलहाल नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी में सेंट्रल कमेटी मेंबर के तौर पर एक्टिव हैं। हमने पूछा कि इस चुनाव में Gen Z प्रोटेस्ट के बड़े चेहरे कहां हैं? इस पर वे बताते हैं, ‘प्रोटेस्ट के दौरान जो साथी जुड़े थे, वे अब अलग-अलग पॉलिटिकल पार्टियों में हैं। जिनसे उनके विचार मिलते हैं, वे उनके साथ जुड़ गए।’

‘प्रोटेस्ट के जरिए हमने देश की सियासी सोच बदलने की कोशिश की थी। बदलाव एक दिन में नहीं आता, उसके लिए समय और सियासी समझ दोनों चाहिए। हम किसी को राजनीति से दूर नहीं रखना चाहते। हर व्यक्ति को राजनीति में हिस्सा लेने का अधिकार है। इसलिए हमने तय किया कि हममें से कुछ लोग नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी के साथ मिलकर काम करेंगे।’

टंका धामी दावा करते हैं कि अब सभी पार्टियां करप्शन और युवाओं से जुड़े मुद्दों को लेकर ज्यादा सजग दिख रही हैं। वे युवाओं का नजरिया समझने की कोशिश कर रही हैं।

बालेन शाह के सपोर्ट में नहीं Gen Z लीडर्स टंका धामी नई सरकार से उम्मीद करते हैं कि वे युवाओं को नेतृत्व में शामिल करे और करप्शन खत्म करे।

वे कहते हैं, ‘अगर जमीनी हकीकत देखी जाए तो नेपाली कम्युनिस्ट पार्टी को समर्थन मिल रहा है। हमें उम्मीद है कि हमारे नेता देश को आगे बढ़ाने की पहल करेंगे। जहां तक बालेन शाह और राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी का सवाल है, हमें उनके एजेंडे और डेवलपमेंट के प्लान पर संदेह है। देश को आगे कैसे बढ़ाया जाएगा, हमें इसका क्लियर रोपमैप चाहिए, जो उनके पास नजर नहीं आता।’

टंका धामी Gen Z के बीच भारत विरोधी सेंटीमेंट के दावों को गलत बताते हैं। वे कहते हैं, ‘भारत के साथ हमारा सनातन काल से गहरा रिश्ता रहा है। हम चाहते हैं कि भारत, नेपाल के विकास और तरक्की में सहयोग करे। कुछ लोग एंटी-इंडिया प्रचार की कोशिश करते हैं, लेकिन हम भारत को लेकर कोई ऐसा सेंटीमेंट नहीं रखते। हम दोनों देशों के बीच मजबूत रिश्ते चाहते हैं।‘

नेपाल में Gen Z प्रोटेस्ट के दौरान काठमांडू के मेयर रहे बालेन शाह का नाम काफी चर्चा में रहा था। इस चुनाव में वो राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी से PM कैंडिडेट हैं।

नेपाल में Gen Z प्रोटेस्ट के दौरान काठमांडू के मेयर रहे बालेन शाह का नाम काफी चर्चा में रहा था। इस चुनाव में वो राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी से PM कैंडिडेट हैं।

Gen Z को एक बार फिर कम टिकट मिले हमने टंका धामी की तरह ही Gen Z प्रोटेस्ट के बड़े चेहरों में से एक तनुजा पांडे से भी बात की। वे फिलहाल किसी पार्टी से नहीं जुड़ी हैं। तनुजा कहती हैं कि आंदोलन से जुड़े बहुत कम लीडर्स इस बार चुनाव लड़ रहे हैं। हालांकि वे प्रोटेस्ट से निकले लोगों की राजनीति में हिस्सेदारी देखना चाहती हैं।

तनुजा आरोप लगाते हुए कहती हैं, ‘नई पीढ़ी को राजनीति में उसका हिस्सा नहीं मिला है। पॉलिटिकल पार्टियों ने जरूरत पड़ने पर हमारे आंदोलन का इस्तेमाल किया और फिर नजरअंदाज कर दिया, जो बेहद निराशाजनक है।‘

‘संसाधनों के लिहाज से नेपाल में चुनाव लड़ना आसान नहीं है। हमारा इरादा कभी राजनीतिक पार्टी जॉइन करना नहीं था, बल्कि मौजूदा पार्टियों में सुधार लाना था। आज उन्हीं पार्टियों के भीतर युवा कार्यकर्ता अपने नेताओं से जवाब मांग रहे हैं।’

चुनावों को कैसे देख रहे Gen Z लीडर्स? चुनाव को लेकर तनुजा कहती हैं, ‘नेपाल इस समय ट्रांजीशन फेज में है। चुनाव में सिर्फ चंद दिन बाकी हैं और देश में मिली-जुली भावना है। कुछ लोग राजनीति में आई नई ताकतों से उम्मीद कर रहे हैं। जबकि कुछ पुरानी लीडरशिप की वापसी से डर रहे हैं।‘

वे सभी दलों पर आरोप लगाती हुए कहती हैं, ‘किसी भी पॉलिटिकल पार्टी ने 8 और 9 सितंबर की घटनाओं की जांच रिपोर्ट सार्वजनिक करने की स्पष्ट मांग नहीं की है। हमें चुनाव चाहिए क्योंकि लोकतंत्र में इसका कोई विकल्प नहीं है लेकिन कई सवालों के जवाब हमें अब तक नहीं मिले हैं। ये जाने बिना वोटिंग करना दुविधा भरा है कि 8 और 9 सितंबर को क्या हुआ, किसने हमारे दोस्तों की हत्या की और किसने आगजनी।’

क्या Gen Z आंदोलन के मुद्दे चुनाव में दिख रहे? इस पर तनुजा कहती हैं, ’Gen Z के उठाए मुद्दे पार्टियों के चुनावी घोषणापत्रों में जरूर हैं लेकिन उनके इरादों में नहीं हैं।’ हालांकि वे ये भी मानती हैं कि करप्शन एक गंभीर मुद्दा है, जो सिस्टम का हिस्सा बन चुका है। इसलिए इसे खत्म करने में वक्त लगेगा।

वे आगे कहती हैं, ’अभी जो संकेत दिख रहे हैं, वे बहुत उत्साह नहीं देते। क्योंकि कई पुराने करप्ट लोग फिर चुनाव लड़ रहे हैं। अगर वे संसद में लौटे तो लोकतंत्र के नाते हमें नतीजे स्वीकारने होंगे, लेकिन जिन ताकतों के खिलाफ हमने आंदोलन किया, उन्हें फिर स्वीकार करना हमारे लिए मुश्किल होगा।’

Gen Z भारत विरोधी नहीं, चीन से भी दोस्ती जरूरी इस चुनाव को तनुजा विदेश नीति के लिहाज से भी जरूरी मानती हैं। वे कहती हैं, ‘नेपाल जियोपॉलिटिक्स के लिहाज से अहम है। उसमें भारत और चीन जैसे पड़ोसियों की दिलचस्पी स्वाभाविक है। ये हमारी लीडरशिप पर निर्भर करता है कि वो इसे देश हित में कैसे इस्तेमाल करती है।’

हाल के दिनों में सामने आए कुछ नेताओं के भारत विरोधी बयानों को तनुजा गलत बताती हैं। वे कहती हैं, ‘हमारी विदेश नीति गुटनिरपेक्षता पर आधारित है और हमें उसी पर कायम रहना चाहिए। अल्ट्रा-नेशनलिज्म हमें कहीं नहीं ले जाएगा। नेताओं को पड़ोसियों के बारे में भड़काऊ बातें करने के बजाय उनसे बातचीत करनी चाहिए। हम भारत और चीन दोनों से अच्छे रिश्ते चाहते हैं।’

आंदोलन के वक्त बालेन शाह हीरो, अब सपोर्ट क्यों नहीं? Gen Z प्रोटेस्ट के वक्त बालेन शाह का नाम सबसे ज्यादा चर्चा में रहा था। रैपर से राजनेता बने बालेन की राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी को Gen Z का फेवरेट माना जा रहा था। हालांकि तनुजा इससे इत्तेफाक नहीं रखतीं। वे मानती हैं कि बालेन शाह वादे करते हैं, लेकिन काम में कच्चे हैं। वे बालेन को Gen Z के सपोर्ट करने के दावे को गलत बताती हैं।

Gen Z के क्या मुद्दे, किसका सपोर्ट कर रहे? 24 साल की मोनिका स्टूडेंट हैं। वे चाहती हैं कि अब देश में एक स्थिर सरकार बने। करप्शन रुके और सबको रोजगार मिले। वे बालेन शाह का समर्थन करती हैं। मोनिका कहती हैं, ‘जो प्रोटेस्ट हुआ था, उसका असर इस चुनाव में जरूर दिखेगा। ये चुनाव बदलाव के लिए ही हो रहा है और हमें उम्मीद है कि अब बदलाव होगा। हमें बालेन शाह जैसा नया लीडर चाहिए। हम चाहते हैं कि लोग घंटी (बालेन शाह की राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी का चुनाव चिन्ह) को वोट दें।‘

25 साल की स्टूडेंट दीपा खड़का भी करप्शन को बड़ा मुद्दा मानती हैं। वे कहती हैं, ‘प्रोटेस्ट के बाद हमें उम्मीद है कि हालात पहले से बेहतर होंगे। जो कुछ हुआ, वो करप्शन की वजह से हुआ इसलिए अब इसका अंत होना चाहिए। हमें उसी बदलाव की उम्मीद है।‘

पहली बार वोट डालने जा रहे Gen Z क्या बोले? 5 मार्च को होने वाले चुनाव में 8 लाख नए वोटर भी हैं। इन फर्स्ट टाइम Gen Z वोटर्स पर सभी पार्टियों की नजर है। इनमें से एक 21 साल के अपशन चंद महेंद्रनगर के कंचनपुर में रहते हैं। वे काठमांडू में रहकर पढ़ाई कर रहे हैं। अपशन मानते हैं कि आने वाला चुनाव काफी क्रांतिकारी साबित हो सकता है।

करप्शन और बेरोजगारी जैसे मुद्दों के सवाल पर अपशन हताशा जताते हैं। वे कहते हैं, ‘मुझे नहीं लगता कि अचानक कोई बड़ा बदलाव दिखेगा, क्योंकि करप्शन नीचे से लेकर ऊपर तक है। अगर सरकार बदलती है और युवाओं को लीडरशिप का मौका मिलता है, तो उम्मीद है कि एक-दो साल में कुछ बदलाव दिखे।‘

बेरोजगारी के मुद्दे पर वे आगे कहते हैं, ‘स्थिति गंभीर है। नेपाल एक अंडर-डेवलपिंग देश है। यहां 30% से ज्यादा युवा नौकरी के लिए विदेश जा रहे हैं। मुझे उम्मीद है कि नई सरकार नई नीतियां लाएगी और जॉब के मौके बढ़ाने के लिए काम करेगी। हालांकि तुरंत बदलाव मुश्किल है, इसमें वक्त लगेगा।‘

चुनाव में अपशन नए चेहरों को सपोर्ट करने की बात करते हैं। वे मानते हैं कि देश की बागडोर अब नए और युवा लीडर्स के हाथ में होनी चाहिए। सिर्फ प्रधानमंत्री या राष्ट्रपति ही नहीं, बल्कि लोकल लेवल से उभरने वाले युवा लीडर्स भी देश के डेवलपमेंट में बड़ा रोल अदा कर सकते हैं।

Gen Z बदलाव के लिए कुछ भी करने को तैयार अपशन की तरह ही 21 साल के पिसभत्ता भी फर्स्ट टाइम वोटर हैं। वे काठमांडू यूनिवर्सिटी में पढ़ाई कर रहे हैं। पिसभत्ता प्रोटेस्ट को याद कर दुखी हो जाते हैं।

वे बताते हैं, ‘मैं प्रोटेस्ट के दिन एग्जाम देने गया था। एग्जाम खत्म होने पर खबर मिली कि इसमें कई लोग मारे गए। सुनकर बहुत बुरा लगा। ऐसा लगा कि करप्शन के खिलाफ आवाज उठाने वाले युवाओं को इसकी कीमत जान देकर चुकानी पड़ी।‘

पिसभत्ता मानते हैं कि प्रोटेस्ट का चुनाव पर असर जरूर पड़ेगा। पहले बहुत लोग बार-बार एक ही पार्टी को वोट देते थे, लेकिन अब वो वोट देने पहले एक बार जरूर सोचेंगे और शायद दूसरी पार्टी को भी मौका देंगे। आने वाले चुनावों से पिसभत्ता को बड़े बदलाव की उम्मीद है।

वे कहते हैं, ‘एक युवा के तौर पर मेरी उम्मीद है कि देश में बेहतर डेवलपमेंट हो, करप्शन खत्म हो और सरकार में बदलाव आए। पहले एक ही पार्टी की सरकार बार-बार आती रही इसलिए उस तरह का बदलाव नहीं दिखा और करप्शन बना रहा। अबकी बदलाव होना चाहिए, इसलिए मैं नई सरकार का समर्थन कर रहा हूं।‘

‘दोबारा प्रोटेस्ट करने की जरूरत पड़ी तो हम उसके लिए भी तैयार हैं। युवाओं में ऊर्जा की कमी नहीं है, बदलाव और रिफॉर्म के लिए हम सब कुछ करेंगे।‘ ………………….. ये खबर भी पढ़ें…

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