पाकिस्तान में ड्रोन हमलों से बचाव का अनोखा तरीका: खैबर पख्तूनख्वा में सेना और पुलिस ठिकानों पर मछली पकड़ने वाले जाल लगाए जा रहे

पाकिस्तान के सुरक्षा बल ड्रोन हमलों से बचने के लिए एक बेहद सस्ता और अलग तरीका अपना रहे हैं। देश की सेना और पुलिस अब संवेदनशील इलाकों में अपने ठिकानों की सुरक्षा के लिए मछली पकड़ने वाले जालों का इस्तेमाल कर रही है। यह कदम पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में उठाया गया है, जहां पिछले कुछ समय से सुरक्षा हालात काफी चुनौतीपूर्ण बने हुए हैं। प्राप्त जानकारी के अनुसार, खैबर पख्तूनख्वा प्रांत के संवेदनशील क्षेत्रों में स्थित पुलिस चौकियों और अन्य सुरक्षा ठिकानों के ऊपर कई मीटर की ऊंचाई पर ये विशेष जाल बिछाए जा रहे हैं। सुरक्षा अधिकारियों का दावा है कि इस व्यवस्था के तहत कोई भी दुश्मन ड्रोन जब इन ठिकानों की ओर आएगा, तो वह इन जालों में फंस जाएगा और उसके बाद वह फट जाएगा या पूरी तरह से निष्क्रिय हो जाएगा।
पाकिस्तान के खैबर पख्तूनख्वा प्रांत को देश के सबसे संवेदनशील और सुरक्षा की दृष्टि से महत्वपूर्ण इलाकों में गिना जाता है। इस प्रांत की सीमाएं अशांत क्षेत्रों से लगती हैं, जिसके कारण यहां आतंकी गतिविधियों और सुरक्षा बलों पर हमलों का खतरा लगातार बना रहता है। हाल के वर्षों में दुनिया भर में युद्ध और आंतरिक सुरक्षा के क्षेत्रों में ड्रोन तकनीक का इस्तेमाल तेजी से बढ़ा है। छोटे और व्यावसायिक रूप से उपलब्ध ड्रोन्स को विस्फोटकों से लैस करके सुरक्षा बलों के ठिकानों, चेकपोस्टों और सैन्य प्रतिष्ठानों को निशाना बनाने की घटनाओं में वैश्विक स्तर पर वृद्धि देखी गई है। पाकिस्तान में भी सुरक्षा बलों को इस तरह के खतरों का सामना करना पड़ रहा है। ऐसे में आधुनिक और महंगी एंटी-ड्रोन तकनीकों की जगह मछली पकड़ने वाले जालों का उपयोग एक जुगाड़ू लेकिन सस्ते विकल्प के रूप में सामने आया है।
सुरक्षा बलों द्वारा अपनाई जा रही इस रणनीति के तहत पुलिस चौकियों और सैन्य ठिकानों के ऊपर मजबूत जालों की कई परतें बिछाई जा रही हैं। इन जालों को इमारतों या खुले मैदानों में स्थित ठिकानों के ऊपर कई मीटर की ऊंचाई पर इस प्रकार बांधा जा रहा है कि वे हवा में एक सुरक्षात्मक छतरी का काम कर सकें। अधिकारियों का मानना है कि जब कोई छोटा ड्रोन किसी ठिकाने पर विस्फोटक गिराने या टकराने के इरादे से नीचे आता है, तो उसके प्रोपेलर या पंख इन मजबूत धागों वाले जालों में उलझ जाते हैं। जाल में फंसने के कारण ड्रोन का संतुलन बिगड़ जाता है और वह नियंत्रण खो देता है। इसके परिणामस्वरूप ड्रोन या तो जाल में ही लटक कर नष्ट हो जाता है या उसमें लगे विस्फोटक जाल में फंसने के कारण ही फट जाते हैं, जिससे नीचे मौजूद सुरक्षाकर्मियों और इमारत को नुकसान होने से बचाया जा सकता है।
यह पहल ऐसे समय में सामने आई है जब ड्रोन हमलों से निपटने के लिए दुनिया भर की सेनाएं लाखों डॉलर की लागत वाली एंटी-ड्रोन प्रणालियां, रडार तकनीक, लेजर हथियार और जैमिंग उपकरण खरीद रही हैं। इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम के जरिए ड्रोन्स के सिग्नल को जैम करना या उन्हें हवा में ही नष्ट करने वाली तकनीकें आम तौर पर बेहद महंगी होती हैं। हर छोटी पुलिस चौकी या सीमावर्ती क्षेत्र की सैन्य चौकी तक इन महंगे उपकरणों को पहुंचाना पाकिस्तान जैसे देश के लिए आर्थिक और रसद दोनों लिहाज से एक बड़ी चुनौती है। ऐसे में मछली पकड़ने वाले जालों का उपयोग एक बेहद किफायती विकल्प के रूप में देखा जा रहा है। स्थानीय बाजारों में आसानी से उपलब्ध होने वाले इन जालों की लागत नगण्य है और इन्हें लगाने के लिए किसी विशेष तकनीकी प्रशिक्षण की भी आवश्यकता नहीं होती।
हालांकि, सुरक्षा विश्लेषकों और रक्षा विशेषज्ञों का मानना है कि मछली पकड़ने वाले जालों का यह तरीका केवल छोटे और कम ऊंचाई पर उड़ने वाले ड्रोन्स के खिलाफ ही कुछ हद तक प्रभावी हो सकता है। यदि हमलावर भारी पेलोड वाले बड़े ड्रोन्स का इस्तेमाल करते हैं या बहुत ऊंची ऊंचाई से विस्फोटक गिराते हैं, तो ये जाल पूरी तरह से सुरक्षा प्रदान करने में सक्षम नहीं हो सकते हैं। इसके अलावा, तेज हवाओं या खराब मौसम में इन जालों को बनाए रखना और उनकी मरम्मत करना भी एक निरंतर चलने वाला कार्य है। फिर भी, तत्काल सुरक्षा सुनिश्चित करने और जान-माल के नुकसान को कम करने के लिए खैबर पख्तूनख्वा की पुलिस और सेना ने इस पारंपरिक तरीके को अपनी एंटी-ड्रोन रणनीति का हिस्सा बना लिया है।
खैबर पख्तूनख्वा प्रांत में सुरक्षा बलों की इस नई व्यवस्था ने स्थानीय स्तर पर चर्चा का विषय बना हुआ है। पुलिस और सेना के जवानों को निर्देश दिए गए हैं कि वे अपने ठिकानों के ऊपर इन जालों को नियमित रूप से जांचें और यदि कोई जाल क्षतिग्रस्त हो जाए तो उसे तुरंत बदलें। पाकिस्तान में आतंकवाद और उग्रवाद से निपटने के लिए सुरक्षा बल लगातार नए-नए तरीके अपना रहे हैं। मछली पकड़ने वाले जालों का यह प्रयोग इसी दिशा में उठाया गया एक कदम है, जो यह दर्शाता है कि कैसे सीमित संसाधनों और तकनीकी उपकरणों की कमी के बीच भी सुरक्षा बल अपने जवानों की जान बचाने के लिए स्थानीय और व्यावहारिक समाधान खोज रहे हैं। भविष्य में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि क्या यह सस्ता तरीका वास्तव में ड्रोन हमलों को विफल करने में कितना कारगर साबित होता है और क्या अन्य प्रांतों या देशों के सुरक्षा बल भी इस मॉडल को अपनाते हैं। फिलहाल, खैबर पख्तूनख्वा के संवेदनशील इलाकों में मछली पकड़ने वाले ये जाल सुरक्षा बलों के लिए आसमान से आने वाले खतरों के खिलाफ एक ढाल का काम कर रहे हैं।

