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Tue, Oct 6, 2026Updated 12:38 PM IST
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पंचायत कर्मियों को पेंशन का अधिकार नहीं: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने 24 याचिकाएं खारिज कीं, कहा- सरकारी कर्मचारी नहीं हैं

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बिलासपुर। छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने पंचायत विभाग के सेवानिवृत्त कर्मचारियों को पेंशन दिए जाने से संबंधित एक अत्यंत महत्वपूर्ण मामले में अपना स्पष्ट और निर्णायक फैसला सुनाया है। उच्च न्यायालय ने यह स्पष्ट किया है कि पंचायत विभाग में कार्यरत कर्मचारी राज्य सरकार के नियमित सरकारी कर्मचारी नहीं माने जा सकते हैं। इसी आधार पर न्यायालय ने तर्क दिया कि इन कर्मचारियों के लिए जो सेवा नियम लागू होते हैं, उनमें पेंशन का कोई प्रावधान मौजूद नहीं है। ऐसे में सेवानिवृत्त पंचायत कर्मियों द्वारा पेंशन का दावा करना कानूनी रूप से गलत ठहराया गया है।

इस मामले में उच्च न्यायालय के न्यायमूर्ति बीडी गुरु की एकल पीठ ने सुनवाई करते हुए यह ऐतिहासिक टिप्पणी की है। न्यायालय के समक्ष सेवानिवृत्त पंचायत कर्मचारियों की कुल 24 याचिकाएं दायर की गई थीं। इन सभी याचिकाओं में सेवानिवृत्त कर्मचारियों ने मांग की थी कि उन्हें भी राज्य सरकार के अन्य नियमित कर्मचारियों की तरह सेवानिवृत्ति के बाद पेंशन का लाभ दिया जाए। हालांकि, न्यायालय ने सभी 24 याचिकाओं को एक साथ खारिज कर दिया है। अपने विस्तृत आदेश में न्यायालय ने कहा कि चूंकि पंचायत कर्मी तकनीकी और कानूनी रूप से सीधे राज्य सरकार के कर्मचारी नहीं हैं, इसलिए वे पेंशन के अधिकारी नहीं बनते हैं।

यह मामला छत्तीसगढ़ राज्य के पंचायती राज व्यवस्था के तहत काम करने वाले कर्मचारियों की लंबे समय से चली आ रही मांग से जुड़ा हुआ था। राज्य भर में बड़ी संख्या में ऐसे कर्मचारी हैं जिन्होंने पंचायत विभाग के तहत अपनी सेवाएं दी हैं और अब सेवानिवृत्त हो चुके हैं। इन कर्मचारियों का मानना था कि उन्होंने अपना पूरा कार्यकाल जनसेवा और ग्रामीण विकास के कार्यों में बिताया है, इसलिए उन्हें बुढ़ापे में आर्थिक सुरक्षा प्रदान करने के लिए पेंशन मिलनी चाहिए। इसी मांग को लेकर रिटायर्ड कर्मचारियों ने सामूहिक और व्यक्तिगत रूप से उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था। लेकिन न्यायालय ने कानूनी प्रावधानों और सेवा नियमों का हवाला देते हुए उनकी इस मांग को खारिज कर दिया है।

न्यायमूर्ति बीडी गुरु ने अपने आदेश में सेवा नियमों का विशेष उल्लेख किया। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि किसी भी कर्मचारी को पेंशन का लाभ तभी दिया जा सकता है जब उसके लिए लागू होने वाले सेवा नियमों में पेंशन का स्पष्ट प्रावधान हो। पंचायत विभाग के कर्मचारियों के मामले में उनके सेवा नियमों की जांच करने पर यह पाया गया कि इन नियमों में पेंशन देने का कोई जिक्र या प्रावधान नहीं है। जब नियमों में ही इसका उल्लेख नहीं है, तो न्यायालय अपने स्तर से पेंशन का आदेश जारी नहीं कर सकता। यही कारण है कि न्यायालय ने इन कर्मचारियों के पेंशन के दावे को पूरी तरह से गलत बताया है।

छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के इस फैसले का सीधा असर राज्य के हजारों सेवानिवृत्त पंचायत कर्मचारियों पर पड़ने की संभावना है। पंचायत विभाग में सचिव, रोजगार सहायक, ग्राम पंचायत अधिकारी और अन्य विभिन्न पदों पर कार्यरत रहे कर्मचारी इस फैसले से सीधे तौर पर प्रभावित होंगे। इन कर्मचारियों ने वर्षों तक ग्रामीण क्षेत्रों में सरकार की विभिन्न योजनाओं को लागू करने और पंचायती राज संस्थाओं को सुचारू रूप से चलाने में अहम भूमिका निभाई है। इसके बावजूद, न्यायालय ने कानूनी स्थिति को देखते हुए यह माना कि सेवा की प्रकृति चाहे जो भी हो, यदि कर्मचारी सरकारी कर्मचारी की श्रेणी में नहीं आता और उसके सेवा नियमों में पेंशन नहीं है, तो उसे यह लाभ नहीं दिया जा सकता।

कानूनी जानकारों का कहना है कि पंचायत कर्मियों और नियमित सरकारी कर्मचारियों की नियुक्ति प्रक्रिया, सेवा शर्तें और नियंत्रण अधिकारी अलग-अलग होते हैं। सरकारी कर्मचारियों की नियुक्ति राज्य सरकार के विभिन्न विभागों में होती है और वे छत्तीसगढ़ सिविल सेवा (पेंशन) नियमों के तहत आते हैं। वहीं, पंचायत कर्मियों की नियुक्ति और सेवा शर्तें पंचायती राज अधिनियम और उससे जुड़े विशिष्ट नियमों के तहत तय होती हैं। उच्च न्यायालय ने इसी कानूनी अंतर को रेखांकित करते हुए अपना फैसला सुनाया है।

उल्लेखनीय है कि देश के कई अन्य राज्यों में भी पंचायत कर्मियों को सरकारी दर्जा और पेंशन दिए जाने की मांग समय-समय पर उठती रही है। कुछ राज्यों में सरकारों ने नीतिगत फैसले लेकर पंचायत कर्मियों को कुछ राहत दी है, लेकिन छत्तीसगढ़ में यह मामला न्यायिक प्रक्रिया के माध्यम से तय किया गया है। न्यायालय ने यह स्पष्ट कर दिया है कि यह विषय पूरी तरह से नीतिगत और सेवा नियमों से जुड़ा है।

उच्च न्यायालय द्वारा 24 याचिकाओं को एक साथ खारिज किए जाने के बाद अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि सेवानिवृत्त पंचायत कर्मचारी इस फैसले के खिलाफ उच्चतम न्यायालय में अपील करते हैं या नहीं। इसके अलावा, यह भी संभावना व्यक्त की जा रही है कि कर्मचारी संगठन राज्य सरकार से नीतिगत स्तर पर हस्तक्षेप करने और सेवा नियमों में संशोधन कर पेंशन का प्रावधान जोड़ने की मांग कर सकते हैं। फिलहाल, छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय का यह आदेश पंचायत कर्मियों की पेंशन की उम्मीदों पर विराम लगाता है और कानूनी स्थिति को अत्यंत स्पष्ट रूप से परिभाषित करता है। वंदे भारत न्यूज की यह रिपोर्ट न्यायालय के आदेश पर आधारित है।

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पंचायत कर्मियों को पेंशन का अधिकार नहीं: छत्तीसगढ़ हाईकोर्ट ने 24 याचिकाएं खारिज कीं, कहा- सरकारी कर्मचारी नहीं हैं

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बिलासपुर। वंदे भारत न्यूज़। छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने राज्य के सेवानिवृत्त पंचायत कर्मचारियों को एक बड़ा झटका देते हुए उनकी पेंशन संबंधी मांगों को खारिज कर दिया है। उच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया है कि पंचायत विभाग में कार्यरत कर्मचारी सरकारी कर्मचारी की श्रेणी में नहीं आते हैं। इसके अलावा, इन कर्मचारियों पर लागू सेवा नियमों में पेंशन का कोई प्रावधान मौजूद नहीं है। ऐसे में उनके द्वारा पेंशन का दावा करना कानूनी रूप से गलत है। यह महत्वपूर्ण फैसला न्यायमूर्ति बीडी गुरु की एकल पीठ ने सुनाया है। इस निर्णय के साथ ही उच्च न्यायालय ने सेवानिवृत्त पंचायत कर्मचारियों द्वारा दायर की गई कुल 24 रिट याचिकाओं को एक साथ खारिज कर दिया है।

इस मामले की सुनवाई के दौरान उच्च न्यायालय ने पंचायत कर्मचारियों की कानूनी स्थिति और उन पर लागू होने वाले सेवा नियमों का गहन विश्लेषण किया। न्यायमूर्ति बीडी गुरु ने अपने आदेश में स्पष्ट रूप से कहा कि पंचायत विभाग के कर्मचारियों को राज्य सरकार का नियमित कर्मचारी नहीं माना जा सकता है। चूंकि ये कर्मचारी सरकारी कर्मचारी की परिभाषा में शामिल नहीं हैं, इसलिए उन्हें उन लाभों का दावा करने का अधिकार नहीं है जो विशेष रूप से राज्य सरकार के नियमित कर्मचारियों के लिए निर्धारित किए गए हैं। इन लाभों में सेवानिवृत्ति के बाद मिलने वाली पेंशन भी शामिल है।

उच्च न्यायालय ने अपने फैसले में इस बात पर विशेष जोर दिया कि किसी भी कर्मचारी को पेंशन का अधिकार तभी प्राप्त हो सकता है, जब उसके विभाग के सेवा नियमों में इसका स्पष्ट प्रावधान हो। न्यायालय ने पाया कि पंचायत विभाग के कर्मचारियों पर जो सेवा नियम लागू होते हैं, उनमें पेंशन देने का कोई भी प्रावधान शामिल नहीं किया गया है। जब नियमों में ही पेंशन का उल्लेख नहीं है, तो कर्मचारियों द्वारा न्यायालय के माध्यम से पेंशन की मांग करना पूरी तरह से अनुचित और गलत है। न्यायालय ने यह भी रेखांकित किया कि सेवा नियमों में जिन प्रावधानों का अभाव है, उन्हें न्यायिक आदेश के जरिए लागू नहीं किया जा सकता है।

यह मामला उन 24 सेवानिवृत्त पंचायत कर्मचारियों की याचिकाओं से जुड़ा था, जिन्होंने अपनी सेवानिवृत्ति के बाद पेंशन दिए जाने की मांग को लेकर उच्च न्यायालय का दरवाजा खटखटाया था। इन सभी कर्मचारियों ने अपनी रिट याचिकाओं में यह तर्क प्रस्तुत किया था कि उन्होंने पंचायत विभाग में अपनी सेवाओं के दौरान कई वर्षों तक काम किया है। लंबे समय तक सेवा देने के आधार पर वे सेवानिवृत्ति के बाद पेंशन पाने के हकदार हैं। याचिकाकर्ताओं की ओर से यह भी प्रयास किया गया कि उन्हें राज्य सरकार के अन्य नियमित कर्मचारियों के समान माना जाए और उन्हें पेंशन का लाभ दिया जाए।

हालांकि, उच्च न्यायालय ने याचिकाकर्ताओं के इन सभी तर्कों को स्वीकार करने से इंकार कर दिया। न्यायालय ने स्पष्ट किया कि पंचायत कर्मचारियों की नियुक्ति, उनकी सेवा शर्तें और उन पर लागू होने वाले नियम राज्य सरकार के नियमित कर्मचारियों से भिन्न होते हैं। पंचायत संस्थाएं स्थानीय स्वशासन की इकाइयां हैं और इनके कर्मचारी सीधे तौर पर राज्य सरकार के अधीनस्थ सरकारी कर्मचारी नहीं माने जा सकते हैं। इसलिए, सरकारी कर्मचारियों के लिए बने पेंशन नियमों को पंचायत कर्मचारियों पर लागू करने की मांग कानूनी दृष्टिकोण से सही नहीं ठहराई जा सकती है।

न्यायमूर्ति बीडी गुरु ने सभी 24 याचिकाओं पर एक साथ सुनवाई करते हुए इन्हें खारिज कर दिया। न्यायालय ने अपने आदेश में यह निष्कर्ष निकाला कि चूंकि पंचायत कर्मचारी सरकारी कर्मचारी नहीं हैं और उनके सेवा नियमों में पेंशन का कोई प्रावधान नहीं है, इसलिए इन याचिकाओं को स्वीकार करने का कोई कानूनी आधार नहीं बनता है। इस फैसले के बाद सेवानिवृत्त पंचायत कर्मचारियों की पेंशन पाने की उम्मीदों पर विराम लग गया है।

छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय का यह फैसला राज्य के पंचायत विभाग में कार्यरत और सेवानिवृत्त हो चुके सभी कर्मचारियों के लिए एक बड़ा कानूनी संदेश है। इस निर्णय ने यह स्पष्ट कर दिया है कि पेंशन कोई ऐसा अधिकार नहीं है जिसका दावा बिना स्पष्ट नियमों के किया जा सके। सेवा नियमों में पेंशन का प्रावधान होना अनिवार्य शर्त है। यदि किसी विभाग के नियमों में ऐसा प्रावधान नहीं है, तो कर्मचारी न्यायालय से इसकी मांग नहीं कर सकते हैं।

इस मामले में उच्च न्यायालय ने कानून और सेवा नियमों को सर्वोपरि रखा है। न्यायालय ने भावनात्मक आधार पर या लंबी सेवा का हवाला देकर पेंशन देने की मांग को कानूनी मान्यता नहीं दी। यह फैसला इस सिद्धांत को मजबूत करता है कि किसी भी कर्मचारी के अधिकार और लाभ उसी नियमावली से तय होंगे जो उसकी सेवा शर्तों के लिए बनाई गई है। पंचायत कर्मचारियों की 24 याचिकाओं को खारिज करने वाला यह आदेश छत्तीसगढ़ में स्थानीय निकायों और पंचायत संस्थाओं के कर्मचारियों की सेवा शर्तों को लेकर एक महत्वपूर्ण कानूनी नजीर स्थापित करता है। अब यह पूरी तरह से स्पष्ट हो गया है कि पंचायत विभाग के सेवानिवृत्त कर्मचारियों को पेंशन का लाभ लेने का कोई कानूनी अधिकार प्राप्त नहीं है।